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अध्याय 8 भाषा तथा चिन्तन (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 8 भाषा तथा चिन्तन

भाषा

► एक शिक्षार्थी या व्यक्ति अपने विचारों एवं चिंतन को व्यक्त करने के लिए भाषा का उपयोग करता है। किसी व्यक्ति के सम्पूर्ण कार्य व्यवहार को व्यक्त करने के लिए भाषा माध्यम का कार्य करती है। मनोविज्ञानी हरलॉक (Hurlock) के अनुसार, ‘‘भाषा में सम्प्रेशण के वे सभी साधन आते हैं जिसमें विचारों एवं भावों को प्रतीकात्मक बना दिया जाता है जिससे कि अपने विचारों एवं भावों को दूसरे से अर्थपूर्ण ढंग से कहा जा सके।’’
► इसमें कुछ शब्द एवं ध्वनियों का उच्चारण किया जाता है। भाषा, एक शिक्षार्थी के मानसिक विकास का एक पहलु है जो जन्म के बाद सीखी जाती है। भाषा के विकास में शिक्षार्थी द्वारा अभिभावकों का अनुकरण, सामाजिक परिवेश के साथ सामंजस्य एवं शिक्षा का योगदान रहता है।

बच्चों में भाषा का विकास

ध्वनियों को सुनना एवं समझना किसी बच्चे या शिक्षार्थी के लिए भाषा के विकास का पहला चरण है। बच्चों द्वारा जन्म से 3 महीने तक निकाली गई ध्वनियाँ नैसर्गिक होती हैं जो बच्चे को सिखाई नहीं जाती। 3 से 6 माह का बच्चा कुछ-कुछ बोलने की चेश्टा करने लगता है और सुनी हुई ध्वनियों जैसे अ, उ, त, म को दोहराने लगता है।
6 से 9 माह का बच्चा अपने अभिभावकों से या वातावरण में सुनी हुई ध्वनियों को पहचानने लगता है। 9 से 18 माह का बच्चा ‘ना’ जैसे शब्दों को समझता है। वह सामान्य आदेशों का प्रत्युत्तर भी देने लगता है। 18 से ढाई वर्श का बच्चा अभिभावको के अनुरोधों का प्रत्युत्तर देना सीख जाता है जैसे कि ‘मुझे दो’।

भाषा की प्रकृति

भाषा-व्यवस्था: भाषा सार्थक ध्वनियों का समूह है, इसमें ऐसी ध्वनियों का प्रयोग करना चाहिए जिनका विश्लेशण एवं अध्ययन किया जा सके। भाषा संघटन के कुछ नियम होते हैं। जैसे हिन्दी भाषा के शब्दों के क्रम में कर्ता, कर्म तथा क्रिया आते हैं और अंग्रेज़ी भाषा में पहले क्रिया तथा बाद में कर्म आते हैं।
भाषा-प्रतीक: भाषा व्यवस्था में बोले गए शब्द, ध्वनि या वाक्य किसी वस्तु, घटना या भाव के प्रतीक होते हैं। भाषा को समझने के लिए इन तीनों प्रतीकों की समझ होनी चाहिए। भाषा एक प्रकार का स्रोत हैं जो एक व्यक्ति या शिक्षार्थी के विचारों को दूसरों पर प्रकट करता है। भाषा का लिखित रूप उच्चारित ध्वनियों का प्रतिनिधित्व करता है।
सामाजिक क्रिया का आधार: एक शिक्षार्थी सामाजिक परिवेश से भाषा सीखता है। सामाजिक आधार, विशय, प्रसंग आदि भाषा की शैली को बदल देते हैं। सामाजिक परिस्थितियाँ भाषा के स्वरूप को निर्धारित करती हैं और उसमें परिवर्तन लाती हैं।

भाषा की विशेषताएँ

परंपरागत विकास: भाषा का विकास क्रमिक रूप से होता है तथा यह परंपरागत रूप से विकसित होती है। भाषा का अस्तित्व सामाजिक परंपराओं से ही संभव है। विभिन्न संस्कृतियों के संयोग से भाषा में नये-नये शब्द जुड़ते चले जाते हैं। किसी भाषा के साहित्य में प्रयोग किए गए शब्दों में उसके इतिहास की कहानी झलकती है।
अर्जित सम्पत्ति: एक शिक्षार्थी अपने परिवेश या परिवार से भाषा सीखता है। शिक्षार्थी अपनी तीन पीढ़ियों जैसे दादा, पिता तथा समवयस्क बालकों से भाषा सीखता है। यदि शिक्षार्थी को परिवेश में गलत भाषा सुनने को मिलती है तो वह गलत भाषा सीख लेता है। इसलिए भाषा के विकास में परिवेश का विशेश महत्व होता है।
सतत परिवर्तनशील प्रक्रिया: शिक्षार्थी अपने परिवेश या परिवार का अनुकरण कर भाषा सीखते हैं जो भाषा की परिवर्तनशीलता का प्रमुख कारण है। सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भौगोलिक परिवर्तनों के कारण भी भाषा परिवर्तित होती है। ये परिवर्तन ध्वनियों, शब्दों तथा वाक्य रचनाओं के स्तर पर हो सकते हैं।
समाज सापेक्ष प्रक्रिया: शिक्षार्थी अपनी भाषा द्वारा समाज से जुड़ता है और इससे उसके सामाजिक व्यक्तित्व का विकास होता है। सामाजिक स्तर पर वह अपने विचारों को जितनी कुशलता से व्यक्त कर पाता है उतना ही अधिक सामाजिक रूप से दक्ष माना जाता है।
भाषा का मानकीकरण: प्रत्येक भाषा का एक स्वीकृत मानक रूप होता है। भाषा के सही प्रयोग के लिए सभी शिक्षार्थियों को यह मानक रूप सीखना आवश्यक है।

भाषा विकास के सिद्धान्त

स्वर की परिपक्वता का सिद्धांत

शिक्षार्थी या कोई व्यक्ति अपने शरीर के अंगों जैसे गले, तालु, जीभ तथा दांत की सहायता से स्वरों का उच्चारण करता है। यदि इन सभी स्वर उच्चारण के अंगों में परिपक्वता न हो तो भाषा के विकास में बाधा आती है। इन अंगों का समय तथा आयु के अनुसार विकसित होना आवश्यक है। शिक्षार्थी इन अंगों द्वारा भाषा को अभिव्यक्त करने में सक्षम होता है।

अनुबंधन सिद्धांत

शिक्षार्थी, साहचर्य अर्थात् सहज संबंध के आधार पर भाषा सीखता है। स्कीनर के अनुसार, यह ध्वनियों के संयोजन पर आधारित होता है। भाषा सीखने के क्रम में शिक्षार्थी को जब दृश्य या मूर्त वस्तु दिखाकर उसके बारे में बताया जाता है तो वह उस वस्तु से जुड़े शब्द को अपनी स्मृति में सहजता से धारण कर पाता है। इस प्रकार से वह उस मूर्त या विशिश्ट वस्तु से सहज संबंध के आधार पर शब्दों तथा भाषा को सीखता है। अभ्यास होने पर शिक्षार्थी संबंद्ध वस्तु को देखकर उसके बारे में सहज रूप से बता पाता है। इस प्रकार अनुबंधन के आधार पर भी भाषा का विकास होता हैं।

चोमस्की का भाषा सिद्धांत

नॉम चॉमस्की ने भाषा के व्यवहारवादी नियमों के बदले एक व्यक्ति या शिक्षार्थी द्वारा अपनी भाषिक क्षमता के आधार पर भाषा सीखने के नियम का प्रतिपादन किया। चॉमस्की का मानना था कि प्रत्येक अर्थपूर्ण वाक्य न सिर्फ अपनी भाषा बल्कि सभी भाषाओं पर लागू होने वाले वैश्विक व्याकरण का पालन करती है। शिक्षार्थी बड़ों का अनुकरण कर भाषा सीखने की अपेक्षा भाषा में महारत प्राप्त करने की अंदरूनी क्षमता से परिपूर्ण होते हैं।
► चॉमस्की द्वारा दी गयी भाषा अधिगम प्रणाली (Language Acquisition Device & LAD) की प्रक्रिया का प्रारूप निम्न प्रकार से है: भाषा तथ्य  भाषा अर्जन क्षमता  भाषा संरचना नियम
► चॉमस्की ने इसे जेनेरेटिव ग्रामर कहा, इसमें शिक्षार्थी सुने हुए शब्दों को अपने अनुसार पुनरोत्पादित कर सकता है।

भाषा विकास को प्रभावित करने वाले कारक

विशिष्ट विकलांगता: किसी बच्चे के श्रवण तंत्र या स्वरतंत्रियों में किसी प्रकार की विकलांगता हो तो उसका भाशिक विकास मंद गति से होता है। ऐसे शिक्षार्थियों को विशेश सहायता की आवश्यकता होती है। मानसिक एवं दृश्टि दोश के कारण भी भाशिक विकास में बाधा आती है।
घर का परिवेश: शिक्षार्थी या बच्चे द्वारा बोली जाने वाली भाषा, शब्दावली तथा व्याकरण प्रतिरूप उसके परिवेश से प्रभावित होता है। अभिभावकों द्वारा बच्चों के साथ बिताया गया समय तथा अंत:क्रिया उनकी भाषा विकास को प्रभावित करती है। छोटे परिवारों में भाषा विकास बड़े परिवार की अपेक्षा शीघ्र होता है क्योंकि माता-पिता बच्चे के साथ अधिक समय बिताते हैं तथा बच्चों को अभिव्यक्ति करने के अधिक अवसर मिलते हैं जबकि बड़े परिवारों में ऐसी स्थिति नहीं होती।
विद्यालय: विद्यालय में सीखने के अनुभव, कक्षा में स्वंय को अभिव्यक्त करने तथा नए शब्द सीखने के अवसर किसी बच्चे या शिक्षार्थी के भाषा विकास को प्रभावित करते हैं। इसमें शिक्षक की भूमिका, कई तरह की पुस्तकों की उपलब्धता तथा पठन-पाठन की आदतों का भाषा विकास में विशेश महत्व है।
सहपाठियों की भूमिका: एक शिक्षार्थी को कक्षा में अपने सहपाठियों के साथ पाठ्यचर्चा करने से सीखी गई भाषा को याद रखने एवं उसमें अपनी अभिरूचि के अनुसार परिवर्तन करने में मदद मिलती है। दूसरी भाषाओं को सीखने के संदर्भ में भी सहपाठियों की अनौपचारिता सहायक सिद्ध होती है।
जनसंचार माध्यम: भाषा सीखने में फिल्मों, रेडियो, टी.वी तथा पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका भी होती है। शिक्षार्थियों को इनसे विभिन्न नए शब्द, विचार तथा वाक्य रचना सीखने को मिलते हैं। जनसंचार माध्यमों द्वारा संपर्क भाषा सीखने में मदद मिलती है।
संवेगात्मक तनाव: यदि किसी बच्चे को संवेदनाओं या संवेग को व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता है तो उसका भाषा विकास देर से होता है। जैसे कुछ अटपटा बोलने से रोकना या रोने से रोकना आदि।
व्यक्तित्व: एक बहिर्मुखी शिक्षार्थी को भाषा सीखने में किसी अन्तर्मुखी शिक्षार्थी की तुलना में कम समय लगता है। बहिर्मुखी व्यक्तित्व वाला शिक्षार्थी, अन्तर्मुखी व्यक्तित्व वाले शिक्षार्थी की तुलना में दूसरे लोगों से अधिक बातचीत करता है, उसका सामाजिक दायरा अधिक विकसित होता है। इसलिए उनका भाषा विकास जल्दी होता है।
उपयुक्त प्रशिक्षण: शिक्षार्थी को यदि भाषा सीखने का व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं दिया जाए तो उसका भाषा विकास अवरूद्ध होगा। जैसे नये शब्दों को दोहराना आदि। भाषा विकास के लिए अभ्यास भी आवश्यक है।

अवधारणा

शिक्षार्थी किसी समस्या पर चिन्तन करने से पहले उसकी विशयवस्तु तथा क्रियाओं की अवधारणा या संकल्पना पर विचार करता है। ये संकल्पनाएँ सामान्यत: किसी व्यक्ति या भाव का निरूपण करती है। इसके अंतर्गत किसी वस्तु, स्वाद, भाव जैसे भय, उल्लास के बीच अच्छे एवं बुरे संबंधों पर विचार किया जाता है। अवधारणा को व्यवहार द्वारा अनुमानित किया जा सकता है लेकिन इसका निरीक्षण नहीं किया जा सकता है। वस्तुत: अवधारणा मानसिक संरचना है जो किसी शिक्षार्थी के ज्ञान को एक क्रम में रखती हैं। शिक्षार्थी पूर्व परिचित वस्तुओं या घटनाओं को अमूर्त रूप में याद रखता है। जैसे वर्शा होने पर भींगने की घटना से परिचित होने पर वह अगली बार वर्शा होने पर छाता लेकर निकलता है। इस प्रकार यह अवधारणा विकसित होने का उदाहरण है।

तर्क

एक शिक्षार्थी अनुमानों द्वारा तर्क लगाता है। यह उसके चिन्तन का प्रमुख कारक है जो अवधारणा एवं समस्या के समाधान के लिए आवश्यक है। तर्क किन्हीं मान्य तथ्यों पर निकाले जाते हैं जो निर्णय लेने के उद्देश्यों से महत्वपूर्ण होते हैं। शिक्षार्थी अपने परिवेश से प्राप्त सूचनाओं तथा पूर्व की अवधारणाओं का उपयोग कुछ निर्धारित नियमों के अनुसार करता है। निगमन एवं आगमन तर्क के आधार पर निश्कर्श निकाला जाता है। शिक्षार्थी, निगमन तर्क से पूर्व कथनों के आधार पर तथा आगमन तर्क से प्रमाणों के आधार पर परिणाम निकालते हैं।

भाषा-दोष

भाषा को स्पश्ट रूप से व्यक्त करने के लिए सही उच्चारण करना आवश्यक होता है। यदि स्वरतंत्रियों में किसी प्रकार का विकार हो तो शिक्षार्थी में भाषा दोश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस तरह के शिक्षार्थी अन्तर्मुखी स्वभाव के होते हैं। ऐसे शिक्षार्थियों में कई प्रकार के भाषा दोश जैसे हकलाना, तुतलाना, अस्पश्ट वाणी तथा ध्वनि में परिवर्तन देखे जाते हैं।

चिन्तन की प्रकृति

भाषा या किसी विशय को सीखने की प्रक्रिया में शिक्षार्थी द्वारा की गई कल्पना, स्मृति, संकल्पनाएँ तथा कथन को चिन्तन कहते हैं। इसमें अनुमान, तर्कशक्ति, समस्या समाधान, रचनात्मक विचार जैसी क्रियाएँ शामिल होती हैं। सामान्यत: किसी समस्या के समाधान के लिए चिन्तन किया जाता है। जैसे शिक्षक पढ़ाने से पहले पाठ-योजना बनाते हैं और यह निर्धारित करते हैं कि कौन-सा पाठ कब तथा कितने दिन पढ़ाया जाएगा। इस समस्त प्रक्रिया में चिन्तन की प्रक्रिया भी शामिल होती है। मनोवैज्ञानिक कॉलिन्स तथा ड्रेवर ने चिन्तन को किसी व्यक्ति द्वारा अपने परिवेश के साथ समायोजन करने की प्रक्रिया कहा है।

चिन्तन प्रक्रिया

शिक्षार्थी के सम्मुख जब कोई समस्या उत्पन्न होती है तब वह उस समस्या का समाधान करने के लिए चिन्तन करता है। चिन्तन का लक्ष्य समस्या को दूर करना होता है। चिन्तन में शिक्षार्थी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहता है। उसका प्रयास होता है कि जल्द से जल्द समस्या का समाधान हो जाए। चिन्तन में शिक्षार्थी अपने पुराने अनुभवों को पुन: स्मरण करता है जिससे उनके आधार पर वह वर्तमान समस्या का समाधान करने में समर्थ हो सके। जब शिक्षार्थी अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर वर्तमान समस्या का समाधान खोजने का प्रयास करता है तब उसके सम्मुख समस्या के अनेक संभावित समाधान उपस्थित होने लगते हैं। किसी शिक्षार्थी के चिंतन में उसकी समस्या के सम्बन्ध में कई समाधान प्रस्तुत होते हैं। वह उनमें से किसी एक समाधान का चयन करता है तथा उसे व्यावहारिक रूप देकर समस्या के समाधान में उसकी सार्थकता प्रमाणित करता है।

चिन्तन के प्रकार

प्रत्यक्षात्मक चिन्तन
यह सर्वाधिक निम्न स्तर का चिन्तन है जो प्राय: छोटे बालकों में पाया जाता है। इस प्रकार के चिन्तन का मुख्य आधार संवेदना तथा प्रत्यक्षीकरण से प्राप्त प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। इस प्रकार के चिन्तन में भाषा अथवा संकेतों का प्रयोग नहीं किया जाता है। यह चिन्तन किसी प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित घटना पर आधारित होता है। जैसे एक बार आग से जल जाने वाला बालक पुन: आग को देखता है तो सोच लेता है कि आग के पास जाने पर मैं जल जाऊँगा।
कल्पनात्मक चिन्तन
कल्पनात्मक चिन्तन का आधार मानसिक अवधारणाएँ होती हैं। इस प्रकार के चिन्तन में कोई वस्तु अथवा परिस्थिति प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं होती अर्थात् इसमें प्रत्यक्षीकरण का अभाव होता है। शिक्षार्थी अवधारणा की समझ नहीं होने पर भी स्मृति के आधार पर भविष्य के विषय में सोचता है।
प्रत्ययात्मक चिन्तन
यह चिन्तन का सबसे उच्च रूप है। शिक्षार्थी इस प्रकार के चिन्तन में पूर्व निर्मित प्रत्ययों के आधार पर ही चिन्तन करता है।
► इस प्रकार के चिन्तन में भाषा तथा संकेतों का प्रयोग किया जाता है। प्रत्ययात्मक चिन्तन एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है।
► इसमें शिक्षार्थी पुराने अनुभवों के आधार पर अपनी वर्तमान समस्या का सूक्ष्मतम विश्लेषण करता है तथा उसके सम्बन्ध में किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है।
समस्या-समाधान
शिक्षार्थी दिन-प्रतिदिन आने वाली समस्याओं का समाधान निर्देशित चिन्तन द्वारा खोजता है। निर्देशित चिन्तन, समस्या, लक्ष्य एवं लक्ष्य दिशा में उठाये गए कदमों से प्रभावित होता है। वह सही निर्णय पर पहुँचने के लिए आन्तरिक कारक अर्थात् चिन्तन एवं बाहरी कारक अर्थात् दूसरों की सलाह दोनों की मदद लेता है। समस्या-समाधान के लिए मध्यमान-अन्त-विश्लेशण तथा कलन विधि का उपयोग किया जाता है।

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