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अध्याय 7 बुद्धि निर्माण तथा बहुआयामी बुद्धि (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 7 बुद्धि निर्माण तथा बहुआयामी बुद्धि

बुद्धि का अर्थ तथा परिभाषाएँ

► बुद्धि अमूर्त ढंग से सीखने या चिंतन करने की योग्यता है। एक शिक्षार्थी अपनी बुद्धि द्वारा सामाजिक-शैक्षिक परिवेश के साथ स्वयं को समायोजित करना सीखता है। मनोवैज्ञानिक स्टर्न का मानना है कि बुद्धि किसी शिक्षार्थी की सामान्य योग्यता है, यह उसे जीवन की समस्याओं एवं स्थितियों के अनुसार स्वयं को बदलने की समझ देती है।
► अमूर्त चिंतन, सीखने की योग्यता और समायोजन जैसी मानसिक क्रियाओं से किसी शिक्षार्थी की बौद्धिक क्षमताएँ विकसित होती हैं। किसी व्यक्ति की योग्यता एवं व्यक्तित्व का निर्धारण उसकी बुद्धिलब्धि के मापन द्वारा किया जाता है। एक व्यक्ति या शिक्षार्थी का विभिन्न अवस्थाओं में बौद्धिक विकास भी विभिन्न स्तरों पर होता है।

बुद्धि की विशेषताएँ

► सामाजिक, स्थूल एवं अमूर्त ये बुद्धि की तीन श्रेणियाँ हैं। संरचना संबंधी, कार्य संबंधी एवं क्रिया संबंधी ये बुद्धि के तीन पहलू हैं। बुद्धि के विकास में वंशानुक्रम एवं परिवेश ये दो मुख्य कारक उत्तरदायी होते हैं। थर्सटन के अनुसार, बुद्धि के 9 कारक क्रमश: सांख्यिक (गणित कार्य करने की योग्यता), शाब्दिक अवबोध (बोलने के अवबोध की योग्यता), स्थानिक (वस्तुओं को परिचालित करने की योग्यता), भाशा प्रवाह कारक, प्रत्यक्ष ज्ञान बोध की योग्यता, आगमन कारक (विशिश्ट से सामान्य), सामान्य तर्कणा कारक होते हैं।
गिलफोर्ड के अनुसार बुद्धि के तीन आयाम क्रमश: विशयवस्तु, संक्रिया तथा उत्पाद हैं।
► उनके अनुसार संज्ञान, स्मरण, अभिसारी चिंतन, अपसारी चिंतन तथा मूल्यांकन ये बुद्धि संक्रिया के पाँच रूप होते हैं।

बुद्धि की परिभाषा

एल.एम.टर्मन के अनुसार, ‘बुद्धि अमूर्त विचारों के सन्दर्भ में सोचने की योग्यता है’।
वुडवर्थ के अनुसार, बुद्धि कार्य करने की विधि है।
वुडरों का मानना है कि बुद्धि ज्ञान अर्जन की विधि है।
वेशलर के अनुसार, बुद्धि एक सतत चलने वाली क्रिया है जिसकी मदद से शिक्षार्थी विवेकशील चिंतन एवं उद्देश्यपूर्ण क्रिया करता है। बुद्धि द्वारा वह परिवेश के साथ प्रभावी ढंग से समायोजन करता है।
थॉर्नडाइक के अनुसार, ‘सत्य या तथ्य के दृश्टिकोण से उत्तम प्रतिक्रियाओं की शक्ति ही बुद्धि है।’
पी. ई. वर्नन (P.E.Vernon, 1969) के अनुसार, बुद्धि संप्रत्यय के तीन अर्थ हैं।
► वंशानुगत क्षमता के रूप में: इस प्रकार की बुद्धि जीनोटाइपिक होती है और इसे किसी व्यक्ति या शिक्षार्थी का वंशानुगत गुण माना जाता है। हेब (Hebb) ने इसे बुद्धि ‘A’ कहा है।
► प्रेक्षित व्यवहार के रूप में: इस प्रकार की बुद्धि फीनोटाइपिक होती है। यह शिक्षार्थी के जीन एवं परिवेश की अंत:क्रिया का परिणाम है। हेब (Hebb) ने इसे बुद्धि ‘B’ कहा है।
► परीक्षण प्राप्तांक के रूप में: किसी शिक्षार्थी के बुद्धि परीक्षण द्वारा मापी गई बुद्धि को उस शिक्षार्थी या व्यक्ति की बुद्धि कहते हैं।

बुद्धि के प्रकार

ई. एल. थॉर्नडाइक के अनुसार, बुद्धि के तीन प्रकार होते हैं:
सामाजिक बुद्धि: एक व्यक्ति या शिक्षार्थी समाज में अन्य व्यक्तियों या समूह से संबंध बनाने के लिए सामान्य बुद्धि का उपयोग करता है। इस बुद्धि को ही सामाजिक बुद्धि कहते हैं।
अमूर्त बुद्धि: व्यक्ति या शिक्षार्थी जब शब्द, प्रतीक या अन्य काल्पनिक अथवा अमूर्त वस्तुओं की मदद से चिंतन करता है तो उसे अमूर्त बुद्धि कहते हैं। इस प्रकार की बुद्धि कल्पनाशील व्यक्ति जैसे कलाकारों में होती है।
मूर्त बुद्धि: व्यक्ति या शिक्षार्थी जब विद्यमान वस्तुओं या पदार्थ की सहायता से सोचता है और आवश्यकता पड़ने पर उसमें बदलाव लाता है तो उसे मूर्त बुद्धि कहते हैं। इसे व्यावहारिक बुद्धि भी कहते हैं।

बुद्धि के सिद्धान्त

एक-कारक सिद्धांत: मनोवैज्ञानिक बिने (Binet) के अनुसार, बुद्धि किसी शिक्षार्थी के लिए शक्ति का कार्य करती है। शिक्षार्थी बुद्धि द्वारा अपने कार्यों को संचालित करता है तथा दूसरों के व्यवहारों से प्रभावित होता है। इस सिद्धांत को एक-कारक सिद्धांत कहते हैं। मनोवैज्ञानिक टर्मन एवं स्टर्न ने इस सिद्धांत को आगे बढ़ाने का कार्य किया था।
द्वि-कारक सिद्धांत: मनोवैज्ञानिक स्पीयरमैन (Spearman) के अनुसार, किसी शिक्षार्थी में सामान्य योग्यता जितनी अधिक होगी वह उतना ही बुद्धिमान होगा। इसे द्वि-कारक सिद्धांत कहा जाता है। बुद्धि किसी शिक्षार्थी की निम्न दो प्रकार की योग्यताओं को दर्शाती है:
सामान्य मानसिक योग्यता: यह सभी सामान्य कार्यों से संबधित होती है। जैसे आम को उसकी आकृति अनुसार पहचानना।
विशिष्ट मानसिक योग्यता: किसी विशिश्ट कार्य जैसे आम का जेली बनाना या वस्तुओं के स्वाद को पहचानना। इस तरह के विशिश्ट कार्य को करने की योग्यता को विशिश्ट मानसिक योग्यता कहते हैं।

बहुकारक सिद्धांत

थॉर्नडाइक के अनुसार, बुद्धि में कई विशिश्ट तत्व होते हैं जो एक साथ दो या दो से अधिक कार्यों को करने में सक्षम होते हैं, बुद्धि कई तत्वों का एक समूह होती है इसे बहुकारक सिद्धांत कहते हैं।

प्रतिदर्श या नमूना सिद्धांत

प्रतिदर्श सिद्धांत, स्पीयरमैन (Spearman) के द्वि-कारक सिद्धांत के विरोध में उभरा और इसकी अवधारणा थॉम्पसन (Thompson) ने दी। इस सिद्धांत के अनुसार, किसी शिक्षार्थी का व्यवहार उसकी स्वतंत्र बौद्धिक योग्यताओं पर निर्भर करता है। शिक्षार्थी के बौद्धिक व्यवहार की पहचान विशिश्ट परीक्षण या कार्यों द्वारा की जाती है। कभी-कभी दो से अधिक परीक्षणों में भी बुद्धि के एक ही तत्व या लक्षण दिखाई देते हैं। ऐसी स्थिति में सभी तत्वों में से सामान्य तत्व को शिक्षार्थी का बौद्धिक तत्व माना जाता है। इसी प्रकार से यदि अन्य परीक्षणों में विशिश्ट तत्व लक्षित हों तो कोई भी तत्व सामान्य नहीं होगा और प्रत्येक तत्व को विशिश्ट तत्व माना जायेगा।

समूह कारक सिद्धांत

किसी शिक्षार्थी के बुद्धि की मात्रा या बुद्धिलब्धि को मापने के सिद्धांत को समूह कारक सिद्धांत कहते हैं। इस सिद्धांत का प्रतिपादन थर्स्टन (Thurston) ने किया था। थर्स्टन ने कारक विश्लेशण (factor analysis) के आधार पर शिक्षार्थी की बौद्धिक योग्यताओं को 7 मानसिक योग्यताओं में बांटा है:
वाचिक भाषिक योग्यता: शिक्षार्थी दूसरों द्वारा कहे गए विचारों को समझने के लिए वाचिक भाशिक योग्यता का उपयोग करता है।
संख्यात्मक योग्यता: गणित संबंधी कार्य जैसे जोड़-घटाव, गुणा-भाग को करने के लिए शिक्षार्थी संख्यात्मक योग्यता का उपयोग करता है।
वस्तु प्रेक्षण योग्यता: शिक्षार्थी, वस्तुओं का अवलोकन करने जैसे ज्यामितीय प्रश्नों को हल करने के लिए वस्तु प्रेक्षण योग्यता का उपयोग करता है।
प्रत्यक्षपरक योग्यता: शिक्षार्थी किसी वस्तु या तत्व को तुरंत पहचानने जैसे लिखने के लिए अक्षरों की पहचान करने के लिए बोधात्मक योग्यता का उपयोग करता है।
स्मृति योग्यता: शिक्षार्थी अपने पाठ्यक्रम को सीखने तथा सूचनाओं को ग्रहण करने के लिए स्मृति योग्यता का उपयोग करता है।
तार्किक योग्यता: किसी दो अमूर्त वस्तुओं या संबंधों के बीच अवलोकन कर परिणाम प्राप्त करने के लिए एक शिक्षार्थी तार्किक योग्यता का उपयोग करता है।
शाब्दिक योग्यता: शिक्षार्थी किसी शब्दों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए शाब्दिक योग्यता का उपयोग करता है। गिलफोर्ड का सिद्धांत:
जे. पी. गिलफोर्ड ने किसी व्यक्ति की बुद्धि के विभिन्न तत्वों को समझने के लिए कारक विश्लेशण तकनीक का प्रयोग किया था। उन्होंने इन प्रयोगों द्वारा बौद्धिक योग्यता को निम्नलिखित भागों में बांटा है:
संज्ञान: शिक्षार्थी के संज्ञान में बौद्धिक योग्यता में जाँच, पुर्नजाँच जैसी योग्यताओं को शामिल किया जाता है।
अभिसारी चिंतन: शिक्षार्थी उपयुक्त उत्तर देने के लिए सभी प्राप्त सूचनाओं पर सोच विचार कर परिणाम निकालता है। इस प्रक्रिया को अभिसारी चिंतन कहते हैं।
अपसारी चिंतन: शिक्षार्थी प्राप्त सूचनाओं के विभिन्न पहलुओं पर चिंतन करने के लिए अपसारी चिंतन प्रक्रिया का उपयोग करता है।
स्मृति: सभी प्राप्त सूचनाओं को ग्रहण करने अथवा आगे उपयोग करने के लिए धारण करने की प्रक्रिया को स्मृति कहते हैं।
मूल्यांकन: शिक्षार्थी प्राप्त सूचनाओं की शुद्धता, उपयुक्तता की जाँच करने के लिए मूल्यांकन पद्धति का उपयोग करते हैं।
फ्लूइड तथा क्रिस्टलाइज्ड सिद्धांत: फ्लूइड किसी शिक्षार्थी की सामान्य योग्यता है। यह वंशानुगत रूप से शिक्षार्थी के कार्य कुशलता पर आधारित होता है जो शिक्षार्थी की नवीन एवं पुरानी परिस्थितियों से प्रभावित होता है। मनोवैज्ञानिक कैटेल ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। इसी प्रकार से क्रिस्टलाइज्ड भी शिक्षार्थी की सामान्य योग्यता को लक्षित करता है। यह शिक्षार्थी के अनुभव, सीखने की प्रक्रिया एवं परिवेश संबंधी कारकों पर निर्भर करता है।
पदानुक्रमिक सिद्धांत: किसी शिक्षार्थी के सामान्य मानसिक योग्यताओं के कारक जैसे बुद्धि, शारीरिक योग्यता, मौखिक, सांख्यिकी, शैक्षिक आदि कारकों को क्रमबद्धता के आधार पर मापने को पदानुक्रमिक सिद्धांत कहते हैं। इस सिद्धांत का प्रतिपादन वर्नन (Vernon) ने किया था।
गार्डनर का बहुबुद्धि सिद्धांत: गार्डनर ने न्यूरोमनोविज्ञान (Neuropsychology) एवं मनोमितिक विधियों (Psychometric methods) के आधार पर बहुबुद्धि का सिद्धांत दिया था। उनके अनुसार, बुद्धि का स्वरूप बहुकारकीय होता है। गार्डनर ने कुल 9
प्रकार की बुद्धि का वर्णन किया है जो निम्न प्रकार से हैं:
► भाशाई बुद्धि (Linguistic Intelligence)
► तार्किक गणितीय बुद्धि (Logical mathematical intelligence)
► स्थानिक बुद्धि (Spatial intelligence)
► शारीरिक-गतिक बुद्धि (Body-kinesthetic intelligence)
► सांगीतिक बुद्धि (Musical Intelligence)
► व्यक्तिगत-आत्मन् बुद्धि (Interpersonal Intelligence)
► व्यक्तिगत-अन्य बुद्धि (Intrapersonal Intelligence)
► प्रकृतिवादी बुद्धि (Naturalistic Intelligence)
► अस्तित्ववादी बुद्धि (Existentialistic Intelligence)

बहुआयामी बुद्धि

► मनोवैज्ञानिक केली एवं थर्सटन के अनुसार, प्राथमिक मानसिक योग्यता द्वारा बुद्धि निर्मित होती है।
केली के अनुसार, इन प्राथमिक योग्यताओं के अंतर्गत किसी व्यक्ति या शिक्षार्थी की वाचिक, सांख्यिक, यां़त्रिक, सामाजिक, संगीतात्मक, शारीरिक योग्यता तथा रूचि को सम्मिलित किया जाता है।
थर्सटन के अनुसार, बुद्धि की प्राथमिक योग्यताओं के अंतर्गत किसी व्यक्ति या शिक्षार्थी की अवलोकन संबंधी योग्यता, तार्किक एवं सांख्यिक योग्यता, स्थानिक योग्यता, समस्या समाधान योग्यता, स्मृति, आगमनात्मक एवं निगमनात्मक योग्यताओं को शामिल किया जाता है।
► मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बहुआयामी बुद्धि के व्यक्ति विभिन्न गुणों में निपुण होते हैं। स्टर्नबर्ग का सिद्धांत: स्टर्नबर्ग ने मूल कौशल के आधार पर बुद्धि को तीन भागों में बांटा है। बुद्धि के प्रत्येक भाग के आधार पर किसी शिक्षार्थी को विशेश सूचनाएँ मिलती हैं। इन सूचनाओं की विवेचना एवं संशोधन के बाद शिक्षार्थी समस्याओं का समाधान करता है। स्टर्नबर्ग के अनुसार, बुद्धि के तीन भाग निम्न प्रकार हैं:
विश्लेषणात्मक बुद्धि: किसी समस्या को अलग-अलग भागों में बाँटकर समाधान करने की प्रक्रिया को विश्लेशणात्मक बुद्धि कहते हैं। इस प्रक्रिया का उपयोग शैक्षिक उपलब्धियों के परीक्षण के लिए होता है। इसे घटकीय बुद्धि भी कहते हैं।
सर्जनात्मक बुद्धि: किसी समस्या के समाधान के लिए जब नई प्रक्रिया या विधि अपनायी जाती है तो उसे सर्जनात्मक बुद्धि कहते हैं। इस तरह की बुद्धि में बदलती स्थितियों के साथ सामंजस्य करने की क्षमता होती है।
व्यावहारिक बुद्धि: शिक्षार्थी, वर्तमान परिवेश या परिस्थिति के अनुसार उपलब्ध सूचनाओं को जब समस्याओं के समाधान के लिए प्रयोग करता है तो उसे व्यावहारिक या संदर्भात्मक बुद्धि कहते हैं।

बुद्धि-लब्धि एवं बुद्धि-परीक्षण

► फ्रांसीसी मनोवैज्ञानिक एल्फ्रेड बिने के अनुसार, किसी शिक्षार्थी के निर्णय लेने की क्षमता, स्मृति, तर्कक्षमता एवं मानसिक कार्य के आधार पर उसकी बुद्धि को मापा जा सकता है। बिने ने साइमन के साथ बुद्धि मापन की अवधारणा का विकास किया था। उन्होंने इस संबंध में शिक्षार्थियों पर कई परीक्षण किए थे। जो शिक्षार्थी या बच्चा सभी संबंधित प्रश्नों के जवाब दे देता उसे सामान्य बुद्धि का माना जाता है। इसी प्रकार, जो शिक्षार्थी अपने से अधिक आयु के शिक्षार्थियों के लिए निर्धारित प्रश्नों का जवाब दे देता है उसे उच्च बुद्धि का माना जाता है। उत्कृश्ट श्रेणी की बुद्धि वाले शिक्षार्थी अपने से अधिक आयु के शिक्षार्थियों के लिए निर्धारित सभी प्रश्नों का सही जवाब देने में सक्षम होते हैं। किसी शिक्षार्थी की विशेशताएँ जानने के लिए उसकी बुद्धि-लब्धि का परीक्षण करना आवश्यक होता है।
विलियम स्टर्न ने बुद्धि-लब्धि (Intelligence Quotient –IQ) के प्रयोग द्वारा बुद्धि को मापने का प्रस्ताव दिया था।
टर्मन ने किसी शिक्षार्थी की बुद्धि-लब्धांक ज्ञात करने की विधि बताई थी। उनके अनुसार, किसी शिक्षार्थी की मानसिक आयु को उसकी वास्तविक आयु से भाग देकर उसे 100 से गुणा करके बुद्धि लब्धि की गणना की जा सकती है।

बिने-साइमन परीक्षण, वेशलर बुद्धि परीक्षण, कैटेल बुद्धि परीक्षण, रैवेन प्रोग्रेसिव मैट्रिसेज आदि बुद्धि-लब्धि परीक्षण की प्रमुख विधियाँ हैं।
► मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बुद्धि परीक्षण के प्रमुख भेद क्रमश: शाब्दिक बुद्धि परीक्षण, अशाब्दिक बुद्धि परीक्षण, क्रियात्मक बुद्धि परीक्षण तथा अभाशाई बुद्धि परीक्षण हैं। कारक सिद्धांत एवं प्रक्रिया प्रधान सिद्धांत द्वारा बुद्धि की व्याख्या की जा सकती है। पियाजे, स्टर्नबर्ग तथा जेन्सन प्रमुख प्रक्रिया प्रधान सिद्धांतवादी हैं। विभिन्न बुद्धि सिद्धांत के प्रवर्तकों के नाम निम्नलिखित प्रकार से हैं:
► एक-कारक सिद्धांत – बिने-साइमन, टर्मन, स्टर्न
► द्वि-कारक सिद्धांत – स्पीयरमैन
► बहुकारक सिद्धांत – थॉर्नडाइक
► समूहकारक सिद्धांत – थर्सटन
► पदानुक्रमिक सिद्धांत – फिलिप वर्नन
► त्रि-आयामी बुद्धि संरचना सिद्धांत – जे. पी. गिलफोर्ड
► तरल ठोस बुद्धि सिद्धांत – आर. बी. कैटेल
► बहुबुद्धि सिद्धांत – हॉवर्ड गार्डनर
► संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत – जीन पियाजे
► त्रितंत्र सिद्धांत – राबर्ट स्टैनबर्ग मनोवैज्ञानिक वेशलर के अनुसार, बुद्धि-लब्धि (IQ) का वितरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है:
► 130 या इससे अधिक बुद्धि-लब्धि — प्रतिभाशाली
► 120 से लेकर 129 तक की बुद्धि-लब्धि — श्रेश्ठ बुद्धि
► 110 से लेकर 119 तक की बुद्धि-लब्धि — उच्च सामान्य बुद्धि
► 90 से लेकर 109 तक की बुद्धि-लब्धि — सामान्य बुद्धि
► 80 से लेकर 89 तक की बुद्धि-लब्धि — मंद बुद्धि
► 70 से लेकर 79 तक की बुद्धि-लब्धि — क्षीण बुद्धि
► 69 से नीचे की बुद्धि-लब्धि — मानसिक विकलांग या अति क्षीण बुद्धि इसके अतिरिक्त, अन्य मनोवैज्ञानिकों ने 140 या इससे अधिक बुद्धिलब्धि वाले बालक को प्रतिभाशाली माना है।

बौद्धिक वृद्धि एवं विकास

► मनोवैज्ञानिक थर्सटन के अनुसार, शिक्षार्थियों में बौद्धिक विकास आयु बढ़ने के साथ-साथ बढ़ता रहता है। 12 वर्श की आयु में शिक्षार्थी में अवलोकन करने की क्षमता आ जाती है और उसकी मानसिक योग्यता पूर्णता की ओर बढ़ने लगती है। 14 वर्श की आयु में शिक्षार्थी के अंदर वस्तु अवलोकन तथा तकर्श् ाक्ति विकसित होती है। 16 वर्श की आयु में शिक्षार्थी के अंदर स्मृति एवं संख्यात्मक योग्यता विकसित होती है। शिक्षार्थियों की भाशा एवं शाब्दिक योग्यताएँ भी इसी के साथ परिपक्वता की ओर बढने लगती है। बौद्धिक विकास अनेक कारकों पर निर्भर करता है। यह मस्तिश्क तथा स्नायुओं को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।
► विकास की गति शैशवावस्था से बाल्यावस्था तक तेज गति से और किशोरावस्था से प्रौढावस्था तक धीमी गति से होती है।
वेशलर के अनुसार, बौद्धिक वृद्धि 20 वर्श की आयु तक जबकि आधुनिक शोध के अनुसार बुद्धि-लब्धांक में 60 वर्श तक वृद्धि होती है।

शैक्षिक क्षेत्र में बुद्धि-परीक्षणों का महत्व

किसी शिक्षार्थी की सफलता या असफलता में उसकी बुद्धि की प्रमुख भूमिका होती है। बुद्धि परीक्षणों द्वारा मंद बुद्धि वाले शिक्षार्थियों की पहचान की जाती है जैसे 69 से कम बुद्धि-लब्धि वाले शिक्षार्थी को मंद बुद्धि समझा जाता है। शिक्षक उसके अनुसार ही शिक्षार्थियों के लिए शिक्षण नीति बनाते हैं। जैसे शिक्षण के लिए विभिन्न क्रियाओं, पाठ्यक्रमों का चयन करना। शिक्षार्थियों के वर्गीकरण जैसे सामान्य, प्रतिभाशाली एवं मानसिक विकलांग के लिए भी बुद्धि-लब्धि की जाँच की जाती है। इस विधि द्वारा शिक्षार्थियों को समूह में बांटकर तदनुरूप ही पाठ्यपुस्तकों का चयन कर विशेश शिक्षा दी जाती है। शिक्षार्थियों के लिए सही दिशा एवं लक्ष्य निर्धारण करने में मदद मिलती है। कमजोर शिक्षार्थियों के लिए गौण पाठ्यक्रम बनाया जाता है जो प्रत्येक शिक्षार्थी की उन्नति के लिए आवश्यक है।

शिक्षा में बुद्धि परीक्षण के लाभ

शिक्षार्थी की क्षमताओं तथा व्यक्तित्व की जानकारी: बुद्धि परीक्षण शिक्षार्थियों को अपनी क्षमताओं एवं व्यक्तित्व की पहचान करने में सक्षम बनाता है। इससे उनकी कमजोरियों का पता लगता है तथा शिक्षक उनके समाधान के लिए उचित योजना बनाता है।
शिक्षकों को शैक्षिक निदेशन देने में सहायक: शैक्षिक निदेशन जैसे शिक्षार्थियों को किस प्रकार बोलना चाहिए और किस तरह सुनने पर ध्यान देना चाहिए यह बुद्धि परीक्षण से स्पश्ट होता है।
शिक्षार्थियों का सरल वर्गीकरण: स्पीयरमैन के अनुसार, लड़के एवं लड़कियों में पाई जाने वाली सामान्य एवं विशिश्ट योग्यताओं की पहचान बुद्धि परीक्षण द्वारा की जाती है। इससे उनके बीच सामाजिक समायोजन करना संभव होता है।
सामाजिक अनुकूलन में सहायक: गरीब एवं वंचित शिक्षार्थियों को उनकी आवश्यकता अनुसार छात्रवृति, पुस्तकों की मदद देने में भी बुद्धि परीक्षण मदद करता है। इसके द्वारा शिक्षार्थियों के बीच संतुश्टि का भाव आता है।
अनुसंधान में सहायक: शैक्षिक क्षेत्र में विकास करने तथा विभिन्न घटकों का चयन करने में बुद्धि परीक्षण की प्रक्रिया सहायक होती है।
शिक्षार्थियों की क्षमता अनुसार नीति निर्माण: शिक्षार्थियों की सीखने की क्षमता उनकी बुद्धि पर निर्भर करती है। उसी के अनुसार की गयी गलतियों का निराकरण, धारणा के निर्माण में बुद्धि परीक्षण का उपयोग किया जाता है।

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