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अध्याय 6 बाल-केन्द्रित शिक्षा तथा प्रगतिशील शिक्षा की अवधारणा (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 6 बाल-केन्द्रित शिक्षा तथा प्रगतिशील शिक्षा की अवधारणा

बाल-केन्द्रित शिक्षा

राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा रूपरेखा 2005 के अनुसार, एक बच्चे को समावेशी शिक्षा देने के लिए बाल-केन्द्रित शिक्षा नीति अपनायी गई है। बालकों या शिक्षार्थियों को लक्ष्य कर बनाई गई शिक्षा नीति को बाल-केन्द्रित शिक्षा कहते हैं। इसमें शिक्षार्थियों के सीखने का चरण, शिक्षण कार्य में आने वाली बाधाएँ, सीखने का वक्र तथा प्रशिक्षण आदि कारकों को शामिल किया जाता है। बाल-केन्द्रित शिक्षा नीति मनोवैज्ञानिक विश्लेशण पर आधारित होती है। यह सीखने के क्रम में आने वाली कठिनाईयों को शिक्षार्थी की मनोदशा के अनुसार सुधारती है और नई शिक्षण व्यवस्था बनाती है। बाल-केन्द्रित शिक्षा नीति प्रयोगवादी विचारधारा पर आधारित है जो विशय-केन्द्रित शिक्षा के बदले बाल-केन्द्रित शिक्षा पर जोर देती है।
शिक्षाविद फलॉम (Flaum) के अनुसार, ‘पाठ्यक्रम को बाल-केन्द्रित बनाने के लिए उसे शिक्षार्थी की जरूरतों, अभिप्रायों, संवेगों के आधार पर बनाया जाना चाहिए।
► शिक्षार्थी के व्यक्तित्व के लक्षणों जैसे मानसिक कमजोरी, शारीरिक समस्याएँ, अपराध भावना आदि का निदान करने के उद्देश्य से बाल-केन्द्रित शिक्षा नीति बनाई जाती है और शारीरिक एवं मानसिक योग्यताओं के आधार पर उनका अध्ययन किया जाता है। शिक्षक अलग-अलग शिक्षार्थियों की समस्याओं को समझते हुए उनकी शारीरिक, सामाजिक एवं मानसिक कमियों को पूरा करने की कोशिश करते हैं। इससे बाल-केन्द्रित शिक्षा नीति को बढ़ावा मिलता है। कमजोर, पिछड़े हुए तथा प्रतिभाशाली शिक्षार्थियों को विशेश शिक्षा पाठ्यक्रम देने के लिए बाल-केंद्रित शिक्षा नीति पर जोर दिया जाता है। शिक्षक व्यावहारिक मनोविज्ञान द्वारा विभिन्न शिक्षार्थियों की अलग-अलग क्षमताओं एवं रूचियों को समझता है और उसी के अनुसार शिक्षा देता है।

बाल केन्द्रित शिक्षण के सिद्धांत

क्रियाशीलता का सिद्धांत: शिक्षार्थियों को शिक्षण तथा खेल गतिविधियों में सक्रिय रखकर शिक्षा प्रदान करना ताकि शिक्षार्थी शारीरिक एवं मानसिक रूप से क्रियाशील रहे।
प्रेरणा का सिद्धांत: इसके अंतर्गत शिक्षार्थियों को महापुरुषों, वैज्ञानिकों का उदाहरण देकर प्रेरित किया जाता है। साथ ही उन्हें अनुकरणीय व्यवहार, नैतिक कहानियों तथा नाटकों द्वारा शिक्षित किया जाता है।
उद्देश्यपूर्ण शिक्षा का सिद्धांत: शिक्षा उद्देश्यपूर्ण हो अर्थात् शिक्षार्थियों को दी जाने वाली शिक्षा कुछ नया सीखने के उद्देश्य को पूरा करती हो। जैसे विशय वस्तु को परीक्षा से पहले खत्म कर लेना अर्थात् शिक्षार्थी का समय न बर्बाद हो।
रुचि का सिद्धांत: विषय-वस्तु का चयन शिक्षार्थी की योग्यता और रुचि के अनुसार करना चाहिए। उदाहरणस्वरूप, शिक्षार्थी को हस्तकला जैसे रचनात्मक कार्य द्वारा शिक्षा देनी चाहिए। इससे उसे ध्यानपूर्वक कार्य करने एवं क्रमानुसार कार्य को आगे बढ़ाने की सीख मिलती है।
विभाजन का सिद्धांत: पाठ्यक्रम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर पढाने से शिक्षार्थी पाठ की विशय-वस्तु को जल्दी सीख लेता है। इस प्रक्रिया में शिक्षक पाठ्यक्रम की पुनरावृति भी सुनिश्चित करता है। जैसे- इतिहास के अध्याय की पुनरावृति से ऐतिहासिक लेख याद रहते हैं।

बाल-केन्द्रित शिक्षा की विशेषताएँ

► शिक्षार्थियों की समस्याओं एवं विशेष गुणों को समझने के लिए शिक्षक बाल मनोविज्ञान पढ़ता है। उसी के अनुरूप शिक्षक किसी शिक्षार्थी से व्यवहार करता है और उन्हें शिक्षा देता है। शिक्षक का उद्देश्य शिक्षार्थी के व्यवहार एवं सीखने की प्रक्रिया में सुधार करना है। इसके लिए किसी शिक्षक को शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं, मानसिक स्तर, अभिरुचि, योग्यता एवं व्यक्तित्व के बारे में पता होना चाहिए। शिक्षा नीति शिक्षार्थियों के प्रवृति, प्रेरणाओं तथा संवेदनाओं के आधार पर होनी चाहिए। शिक्षार्थियों के व्यवहार के इन आधारों को बदला जा सकता है तथा शिक्षार्थी को अनुचित व्यवहारों को छोड़ने के लिए कहा जा सकता है।
एक सफल शिक्षक निरन्तर शिक्षार्थियों के व्यवहार को सुधारने की कोशिश करता है।
► स्कूल में कुछ शिक्षार्थियों का मन पढ़ाई में नहीं लगता है। वे किसी को परेशान करने, स्कूल से भागने तथा आवारागर्दी करने आदि कार्यों में लगे रहते हैं। शिक्षार्थी ऐसा क्यों करते हैं यह समझने के लिए शिक्षक को बाल मनोविज्ञान की जानकारी होनी चाहिए। इसके द्वारा एक शिक्षक को शिक्षार्थियों की शारीरिक, मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक समस्याओं की जानकारी होती है और वह उसी अनुसार बाल-केंद्रित शिक्षा नीति अपनाता है। बाल-मनोविज्ञान की जानकारी के अभाव में शिक्षक निर्दोशी शिक्षार्थियों को दंड भी देते हैं जो उचित नहीं है।
► शिक्षार्थी, स्वभाव एवं बुद्धि के अनुसार वैयक्तिक रूप से अलग-अलग गुण वाले होते हैं अर्थात् प्रत्येक बालक में व्यक्तिगत भिन्नता पाई जाती है। शिक्षक बाल-मनोविज्ञान की सहायता से मंदबुद्धि, सामान्य बुद्धि तथा बुद्धिमान शिक्षार्थियों के बीच अंतर करता है। इससे शिक्षार्थियों को उनकी योग्यता एवं आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा देने में मदद मिलती है।

शिक्षण विधि

प्रत्येक शिक्षार्थी की आवश्यकताएँ भिन्न होती हैं। इसलिए शिक्षक, बाल मनोविज्ञान द्वारा उन्हें किस प्रकार पढ़ाये, यह जानकारी प्राप्त करता है। शिक्षक को बाल मनोविज्ञान द्वारा शिक्षार्थियों के सीखने की प्रक्रिया तथा महत्वपूर्ण कारकों की जानकारी मिलती है। बाल मनोविज्ञान द्वारा शिक्षण विधियों का विश्लेशण किया जाता है और उसी अनुसार शिक्षण विधि को सुधारा जाता है।

पाठ्यक्रम का स्वरूप

► बाल केन्द्रित शिक्षा के पाठ्यक्रम में बालक को शिक्षा प्रक्रिया का केंद्र बिंदु माना जाता है।
► शिक्षार्थियों की रुचियों, आवश्यकताओं एवं योग्यताओं के आधार पर पाठ्यक्रम तैयार किया जाता है।
► पाठ्यक्रम जीवनोपयोगी होना चाहिए।
► पाठ्यक्रम पूर्वज्ञान पर आधारित होना चाहिए।
► पाठ्यक्रम बालकों की रूचि के अनुसार होना चाहिए।
► पाठ्यक्रम लचीला होना चाहिए।
► पाठ्यक्रम वातावरण के अनुसार होना चाहिए।
► पाठ्यक्रम को राष्ट्रीय भावनाओं को विकसित करने वाला होना चाहिए।
► पाठ्यक्रम समाज की आवश्यकतानुसार होना चाहिए।
► पाठ्यक्रम शिक्षार्थियों के मानसिक स्तर के अनुसार होना चाहिए।
► पाठ्यक्रम में व्यक्तिगत भिन्नता को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
► पाठ्यक्रम शैक्षिक उद्देश्य के अनुसार होना चाहिए।

शिक्षक की भूमिका

► शिक्षक, शिक्षार्थियों का सहयोगी तथा मार्गदर्शक होता है।
► बाल केन्द्रित शिक्षा में शिक्षक की भूमिका और बढ़ जाती है। बाल केन्द्रित शिक्षा में शिक्षक को शिक्षार्थी का सभी प्रकार से मार्गदर्शन करना चाहिए तथा विभिन्न क्रिया-कलापों को क्रियान्वित करने में सहायता करनी चाहिए।
► शिक्षा के यथार्थ उद्देश्यों के प्रति पूर्णतया सजग रहना चाहिए।
► शिक्षक का उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान प्रदान करना ही नहीं होता बल्कि शिक्षार्थी का सर्वोन्मुखी विकास करना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शिक्षार्थी की अधिक से अधिक सहायता करनी चाहिए।
► शिक्षार्थियों को क्या सीखाना है इस संबंध में शिक्षक को स्वतंत्र रह कर निर्णय लेना चाहिए।

मूल्यांकन एवं परीक्षण विधि

► शिक्षार्थियों के मानसिक विकास के लिए शिक्षक समय-समय पर उसके विकास का मूल्यांकन एवं परीक्षण करता है।
► सीखने के क्रम में शिक्षार्थी कई गलतियाँ करता है। इन गलतियों में सुधार करने तथा शिक्षण विधि को बाल-केंद्रित बनाने के लिए शिक्षार्थी की उन्नति का मूल्यांकन किया जाता है। मूल्यांकन करने के लिए समय-समय पर परीक्षा ली जाती है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण किये जाते हैं। इन प्रक्रियाओं द्वारा यह निर्धारित किया जाता है कि शिक्षार्थी को किस क्षेत्र में सुधार करने की जरूरत है।
► शिक्षार्थियों का मूल्यांकन करने के लिए वार्शिक परीक्षा का आयोजन किया जाता है। इस प्रक्रिया में शिक्षार्थी, तनाव एवं चिंता से ग्रस्त हो जाता है। बाल-केंद्रित शिक्षा नीति में इस स्थिति को खत्म करने के लिए अविरल तथा व्यापक मूल्यांकन पर जोर दिया जाता है।
► सतत या अविरल मूल्यांकन का उद्देश्य सीखने की प्रक्रिया तथा व्यवहार के परिणामों का मूल्यांकन करना है। यह स्कूल आधारित मूल्यांकन प्रणाली है और इसमें शिक्षार्थियों के मानसिक, शारीरिक एवं सामाजिक विकास के तत्व शामिल रहते हैं।
► अध्यापन-अधिगम की प्रक्रिया में वर्श में एक बार मूल्यांकन किया जाता है जबकि सतत एवं व्यापक मूल्यांकन प्रणाली में शिक्षक पढ़ाते समय ही परीक्षणों द्वारा शिक्षार्थी का मूल्यांकन करता रहता है। इसमें निरंतर मूल्यांकन, सीखने के समयांतर में हुए अंतर, सुधार के उपायों, शिक्षार्थियों को अपना मूल्यांकन करने के लिए फीडबैक देना सम्मिलित होते हैं।
► शिक्षार्थियों के सीखने की प्रक्रिया का व्यापक रूप से मूल्यांकन करने के लिए एक शिक्षार्थी की विशय की समझ, व्याख्या करने की क्षमता, सृजनात्मकता को जाँचा जाता है। ‘व्यापक’ प्रणाली में किसी शिक्षार्थी को कक्षा में सिखाए गए शैक्षिक तथा गैर-शैक्षिक शिक्षण को शामिल किया जाता है। इसमें सीखने के साधनों तथा तकनीकों के उपयोग को देखा जाता है।

व्यवस्थापन और अनुशासन

► शैक्षिक परिसर में शिक्षार्थियों के बीच अनुशासन एवं सुव्यवस्था बनाए रखने के लिए बाल मनोवैज्ञानिकों से मदद ली जाती है। जैसे कुछ शिक्षार्थी पढ़ने में तो तेज होते हैं परन्तु अन्य कार्यों में कमजोर होते हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षक, शिक्षार्थी को समझता है और उसी के अनुसार नीति बनाता है। एक शिक्षक को उन्हें हतोत्साहित करने के बजाए सीखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
► व्यवस्थापन प्रक्रिया द्वारा शिक्षक, शिक्षार्थियों के अधिगम प्रेरणा के कारणों का पता लगाता है। यदि किसी शिक्षार्थी को समस्या हो तो वह उसे सुलझाता है तथा उसके अनुकूल व्यवहार करता है।
► इस प्रक्रिया द्वारा शिक्षक कक्षा में उपस्थित होने वाली समस्याओं को चिह्नि करता है और उसका निराकरण करता है।

प्रगतिशील शिक्षा तथा इसका महत्व

► पारंपरिक शिक्षा में मूल्यांकन पर कम जोर दिया जाता था, इस शिक्षा नीति में सुधार करने के लिए प्रगतिशील शिक्षा की शुरूआत की गई थी। अमेरिका के बाल मनोवैज्ञानिक जॉन डीवी (1859-1952) ने प्रगतिशील या विकासवादी शिक्षा का प्रतिपादन किया था। जॉन डीवी ने लैब विद्यालयों को प्रगतिशील विद्यालय के उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत किया था। प्रगतिशील शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों पर आधारित शिक्षण पर जोर नहीं देती बल्कि इसमें सहायक शिक्षण पद्धति को भी शामिल किया जाता है। प्रगतिशील शिक्षा में अध्ययन की समय-सारणी और कक्षा में बैठने की व्यवस्था आदि को लचीला बनाया जाता है।
► बाल-केन्द्रित शिक्षा पद्धति अपनाकर ‘शिक्षण से अधिगम’ अर्थात् सीखने पर जोर दिया जाता है। बाल केन्द्रित शिक्षा का उद्देश्य शिक्षार्थियों में मुक्त ढंग से सीखने की योग्यताओं का विकास करना होता है। बाल केन्द्रित शिक्षा में अधिगम-प्रक्रिया में शिक्षार्थियों की पूर्ण सहभागिता होती है। प्रगतिशील शिक्षा में शिक्षक को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसके अनुसार, शिक्षक समाज का सेवक है। उसे विद्यालय में ऐसा वातावरण बनाना पड़ता है जिसमें बालक के सामाजिक व्यक्तित्व का विकास हो सके और जनतंत्र के योग्य नागरिक बन सके। शिक्षक को शिक्षार्थियों पर आज्ञा और उपदेशों के द्वारा अपने विचारों और प्रवृत्तियों को शिक्षार्थियों पर लादने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
► इस शिक्षा में प्रोजेक्ट प्रणाली, समस्या प्रणाली, शिक्षण विधि तथा कार्यक्रम को दर्शाया गया है। प्रगतिशील शिक्षा में शिक्षण प्रक्रिया को अधिक व्यावहारिक बनाने पर जोर दिया जाता है। शिक्षक को विद्यालय में ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जिसमें शिक्षार्थी के सामाजिक व्यक्तित्व का विकास हो सके और जनतंत्र के योग्य नागरिक बन सके। बाल केन्द्रित शिक्षा प्रकृतिवाद की देन है। प्राकृतिक ज्ञान का सिद्धांत बताता है कि शिक्षार्थियों को स्वाभाविक रूप से सीखने और विकसित होने का अवसर मिलना चाहिए। नि:शक्त शिक्षार्थियों के लिए केंदीय प्रायोजित ‘समेकित शिक्षा योजना’ चलाई जा रही है। इसका उद्देश्य नि:शक्त शिक्षार्थियों को सामान्य विद्यालयों में सभी के साथ नियमित शिक्षण देना है। परिवार, अनौपचारिक शिक्षा का साधन है। अनौपचारिक शिक्षा का आरम्भ शिक्षार्थी के परिवार तथा परिवेश से होता है। दुर्खिम के अनुसार, ‘परिवार जीवन की पहली पाठशाला है‘। एक शिक्षक स्वंय आदर्श रूप से व्यवहार कर शिक्षार्थियों में सामाजिक मूल्यों को विकसित कर सकता है। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य ‘शिक्षार्थियों का सर्वांगीण विकास’ करना है।

सर्वशिक्षा अभियान और मध्याह्न भोजन स्कीम

► नामांकन बढ़ाने, उपस्थिति तथा शिक्षार्थियों के पोशण स्तर में सुधार करने के लिए 15 अगस्त, 1995 को केन्द्रीय सरकार द्वारा ‘राष्ट्रीय पौषणिक सहायता कार्यक्रम (एनपी-एनएसपीई)’ शुरू किया गया था। 2001 में इस योजना को बदलकर ‘मध्याह्न भोजन योजना’ बनाई गई। इस योजना के अंतर्गत सरकारी एवं सरकारी सहायता प्राप्त प्राथमिक स्कूल के शिक्षार्थियों को न्यूनतम 200 दिनों के लिए 8-12 ग्राम प्रतिदिन प्रोटीन और न्यूनतम 300 कैलोरी ऊर्जा के साथ मध्याह्न भोजन परोसने की योजना थी। अक्तूबर 2007 में इस योजना को शैक्षिक रूप से पिछड़े 3,479 ब्लॉकों (ईबीबी) में अपर प्राइमरी स्कूलों (अर्थात् कक्षा VI से VIII) में पढ़ने वाले बच्चों को शामिल करने के लिए विस्तारित किया गया था। इस योजना का नाम ‘राष्ट्रीय प्राथमिक शिक्षा पौषणिक सहायता कार्यक्रम’ से बदल कर ‘स्कूलों में मध्याह्न भोजन का राष्ट्रीय कार्यक्रम’ कर दिया गया था।
► अपर प्राथमिक अवस्था के लिए पोषण का मानदण्ड 700 कैलोरी और 20 ग्राम प्रोटीन निश्चित किया गया था। 01/04/2008
से इस स्कीम को देश के सभी क्षेत्रों में लागू किया गया है। इस योजना की निगरानी का काम ग्राम पंचायतें करती हैं। अप्रैल, 2008 में इस योजना में सरकारी मान्यता प्राप्त मदरसा/मकतबों को भी शामिल किया गया है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम

6 से 14 वर्ष के हर बच्चे को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 बनाया गया है। यह 2005 के शिक्षा अधिकार विधेयक का संशोधित रूप है। 2002 में 86वें संविधान संशोधन द्वारा 6 से 14 वर्श तक के शिक्षार्थियों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान किया गया था। इसे 1
अप्रैल 2010 से लागू किया गया है। प्रत्येक शिक्षार्थी के निवास स्थान से एक किलोमीटर के अंदर प्राथमिक स्कूल और तीन किलोमीटर के दायरे में माध्यमिक स्कूल उपलब्ध होना चाहिए। निर्धारित दूरी पर स्कूल नहीं हो तो उसे स्कूल जाने के लिए छात्रावास या वाहन उपलब्ध कराया जाएगा। शिक्षार्थी को स्कूल में दाखिला लेते समय कोई अनुदान नहीं देना होगा। बच्चे या उसके अभिभावक को साक्षात्कार देने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। अनुदान की राशि मांगने या साक्षात्कार लेने के लिए भारी दंड का प्रावधान है। विकलांग बच्चे भी मुख्यधारा की नियमित स्कूल से शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। इस अधिनियम में 0 से 6 वर्श और 14 से 18 वर्श की आयु के शिक्षार्थियों के बारे में कोई प्रावधान नहीं किया गया है। अन्तर्राश्ट्रीय बाल अधिकार समझौते में 18 वर्श के शिक्षार्थी को बच्चा माना गया है, जिससे भारत भी संबद्ध रखता है। परंतु शिक्षा अधिकार अधिनियम के अंतर्गत 14 से 18 वर्श तक के बच्चे को स्थान नहीं दिया गया है।
सर्वशिक्षा अभियान (SSA)
► सर्व शिक्षा अभियान का कार्यान्वयन वर्ष 2000-2001 से किया जा रहा है। इसका उद्देश्य सार्वभौमिक सुलभता एवं प्रतिधारण, प्रारंभिक शिक्षा में बालक-बालिका के बीच सामाजिक श्रेणी के अंतरों को दूर करना तथा अधिगम की गुणवत्ता में सुधार करना है। वैकल्पिक स्कूली सुविधाएँ प्रदान करना, स्कूलों एवं अतिरिक्त कक्षा-कक्षाओं का निर्माण किया जाना, प्रसाधन-कक्ष एवं पेयजल सुविधा प्रदान करना, अध्यापकों का प्रावधान करना, नियमित अध्यापकों का सेवाकालीन प्रशिक्षण तथा अकादमिक संसाधन सहायता, नि:शुल्क पाठ्यपुस्तकें एवं अधिगम स्तरों/परिणामों में सुधार हेतु सहायता प्रदान करना शामिल हैं। भारतीय संविधान के 86वें संशोधन के माध्यम से सह निर्देश दिया गया है कि 6-14 वर्श के बच्चों की मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के प्रावधान को मौलिक अधिकार बनाया गया है। एसएसए (SSA) में 8 मुख्य कार्यक्रम हैं, जिसमें आंगनबाड़ी (ICDS) और कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय (KGBVY) भी शामिल हैं। सर्वशिक्षा अभियान (SSA) को देश के सभी जिलों में लागू किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य 6 से 14 वर्ष के आयु वर्ग वाले सभी शिक्षार्थियों को उपयोगी और जरुरी शिक्षा उपलब्ध करवाना है। इस अभियान के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में भी कंप्यूटर शिक्षा उपलब्ध करवाई जा रही है। 2010 तक सभी शिक्षार्थियों को विद्यालय में बनाए रखना था, यह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका। इसे संशोधित कर सर्वशिक्षा अभियान से संबंधित अधिनियम 2011 लागू किया गया था।
अनुशासन: शिक्षार्थियों को सिखाने के लिए उनके बीच अनुशासन होना आवश्यक है। अनुशासन का तात्पर्य सीखने या जिम्मेदारियों को पूरा करने से है। अनुशासन आन्तरिक एवं बाह्य दो प्रकार के होते हैं।
डॉ. एडमस के अनुसार, अनुशासन तीन प्रकार के होते हैं। दमनात्मक अर्थात् जो किसी भय से उत्पन्न हुआ हो। प्रभावात्मक जो किसी सामाजिक या शैक्षिक प्रभाव से हुआ हो और मुक्त अनुशासन जो स्वतंत्र रूप से शिक्षार्थी के ऊपर निर्भर हो। शिक्षार्थियों के बीच अनुशासन स्थापित करने के साधन:
► आदर्श प्रस्तुत करके
► शिक्षार्थियों को प्रेरणादायक परिवेश में रखकर
► पढ़ने एवं लिखने का वातावरण बनाकर
► शिक्षार्थियों को प्रयोगशाला तथा पुस्तकालय की सुविधा देकर
► शिक्षार्थियों की रुचि अनुसार पाठ्यक्रम में परिवर्तन करके
► शिक्षण प्रणाली में समय-समय पर परिवर्तन करके
► व्यावसायिक शिक्षा की सुविधा देकर
► परीक्षा प्रणाली को शिक्षाभिमुख बनाकर
► मूल्यांकन पद्धति में आवश्यक सुधार कर
► पुरस्कार एवं दंड का प्रावधान करके

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