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अध्याय 50. राजनीतिक विज्ञान – संविधान (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 50. राजनीतिक विज्ञान – संविधान

भारतीय संविधान निर्माण के आरम्भिक प्रयास
लगभग 200 वर्षों के औपनिवेशिक शासन, जन आधारित स्वतंत्रता संघर्ष, राष्ट्रीय आंदोलन, देश के विभाजन व राष्ट्रव्यापी सांप्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि में स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण हो रहा था। इसलिए, संविधान निर्माता जन आकांक्षाओं की पूर्ति, देश की एकता व अखण्डता तथा लोकतांत्रिक समाज की स्थापना के प्रति सचेत थे। सभा के अंदर भी विभिन्न विचारधाराओं को मानने वाले सदस्य थे। कुछ सदस्यों का झुकाव समाजवादी सिद्धांतों के प्रति था, जबकि अन्य गाँधीवादी दर्शन से प्रभावित थे। परन्तु अधिकांश सदस्यों का दृष्टिकोण उदार था। आम सहमति बनाने के प्रयास होते रहते थे ताकि संविधान बनने की प्रगति में बाधा न आए। उनका मुख्य लक्ष्य था भारत को एक ऐसा संविधान देना जो देश के लोगों के आदर्शों एवं विचारों को पूरा कर सके।
विभिन्न देशों के संविधानों से लिये गये प्रावधान
जर्मनी – आपातकालीन उपबंध दक्षिण अफ्रीका – संविधान संशोधन ऑस्ट्रेलिया – प्रस्तावना, समवर्ती सूची, केंद्र-राज्य संबंध पूर्व सोवियत संघ – मौलिक कर्तव्य जापान – विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया फ्रांस का संविधान – स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व का सिद्धांत, गणतंत्र आयरलैण्ड का संविधान – राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व, राष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधी प्रक्रिया, राज्य सभा में मनोनीत सदस्य कनाडा का संविधान – सरकार का अर्द्ध-संघात्मक स्वरूप (सशक्त केंद्रीय सरकार वाली संधात्मक व्यवस्था), केंद्र तथा राज्यों के मध्य शक्तियों का वितरण, अवशिष्ट शक्तियों का सिद्धांत अमेरिका का संविधान – मौलिक अधिकारों की सूची, न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति एवं न्यायपालिका की स्वतंत्रता, उच्चतम न्यायालय, राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया, उपराष्ट्रपति का पद ब्रिटिश संविधान – सर्वाधिक मत के आधार पर चुनाव में जीत का फैसला, संसदीय शासन प्रणाली, संसदीय विशेषाधिकार, राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति, कानून का शासन, कानून निर्माण की विधि, एकल नागरिकता
संविधान सभा और संविधान का निर्माण
भारतीय संविधान की रचना एक संविधान सभा द्वारा हुई। यह सभा एक अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित संस्था थी। इस सभा ने भारतीय संविधान में शामिल किये जाने हेतु कुछ आदर्श सुनिश्चित किये। ये आदर्श थे – लोकतंत्र के प्रति कटिबद्धता, सभी भारतवासियों के लिए न्याय, समानता तथा स्वतंत्रता की गारंटी। इस सभा के द्वारा यह भी घोषणा की गयी कि भारत एक प्रभुसत्ता सम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य होगा। भारतीय संविधान का प्रारम्भ एक प्रस्तावना के साथ होता है। प्रस्तावना के अन्तर्गत संविधान के आदर्श, उद्देश्य तथा मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख है। भारत का संविधान एक संविधान सभा द्वारा निर्मित किया गया है। इस सभा का गठन सन् 1946 में हुआ था। संविधान सभा के सदस्य तत्कालीन प्रांतीय विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित हुए थे। इसके अतिरिक्त ऐसे सदस्य भी थे जो रियासतों के शासकों द्वारा मनोनीत किये गये थे। भारत की आजादी के साथ ही संविधान सभा एक पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न संस्था बन गयी। 1947 में देश के विभाजन के पश्चात् संविधान सभा में 31 दिसम्बर 1947 को 299 सदस्य थे। इनमें से 229 सदस्यों का चुनाव प्रांतीय विधान सभाओं ने किया था तथा शेष देसी रियासतों के शासकों ने मनोनीत किये थे। संविधान सभा के अधिकांश सदस्य भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से थे। स्वतंत्रता आंदोलन के सभी प्रमुख नेता सभा के सदस्य थे। संविधान सभा की अध्यक्षता सभा के अध्यक्ष द्वारा की जाती थी। डॉराजेन्द्र प्रसाद इस संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित हुए। सभा अनेक समितियों तथा उप समितियों की मदद से कार्य करती थी। ये समितियाँ दो प्रकार की थीं, (d) कार्य विधि संबंधी, (ख) महत्त्वपूर्ण मुद्दों संबंधी। इसके अतिरिक्त एक परामर्श समिति भी थी। इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण समिति प्रारूप समिति थी जिसके अध्यक्ष डॉभीम राव अम्बेडकर थे। विभिन्न मुद्दों तथा सिद्धान्तों के प्रति आम सहमति बनाने तथा असहमति से बचने के भरपूर प्रयास संविधान सभा ने किये। यह आम सहमति 3
दिसम्बर, 1946 को ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ के रूप में पं. नेहरू द्वारा प्रस्तुत की गयी तथा यह प्रस्ताव 22 जनवरी, 1947 को लगभग सर्वसम्मति से अपनाया गया। इन उद्देश्यों के आधार पर सभा ने 26 नवम्बर, 1949 को अपना कार्य पूरा किया तथा 26 जनवरी, 1950 से संविधान को लागू किया गया। कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में 31
दिसम्बर, 1929 को लिये गये निर्णय के आधार पर 26 जनवरी, 1930 को मनाये गये प्रथम स्वाधीनता दिवस के ठीक 20 वर्ष बाद 26 जनवरी, 1950 को भारत एक गणराज्य बना। अत: 26 जनवरी, 1950 की तिथि को ही संविधान के लागू होने की तिथि के रूप में निश्चित किया गया।
संसदीय सरकार
भारत में संसदात्मक शासन प्रणाली है जिसमें प्रधानमंत्री तथा मंत्री-परिषद् सामूहिक रूप से संसद के निचले सदन अर्थात् लोकसभा के प्रति उत्तरदायी हैं। किसी भी संसदात्मक सरकार में संसद सबसे महत्त्वपूर्ण अंग होता है। जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद सदस्यों के रूप में निर्वाचित करती है और ये प्रतिनिधि जनता की ओर से कानून बनाते हैं तथा कार्यपालिका पर नियंत्रण बनाये रखते हैं। प्रधानमंत्री तथा उसकी मंत्री-परिषद् तब तक सभी मामलों में सर्वोपरि होती है जब तक उन्हें लोकसभा का विश्वास प्राप्त होता है। संसद (केवल लोकसभा) चाहे तो प्रधानमंत्री और उसकी मंत्री-परिषद् के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पारित करके उन्हें सत्ता से अपदस्थ कर सकती है। इस प्रकार हमारी संसदीय व्यवस्था का एक प्रमुख स्थान है।
न्यायपालिका
भारतीय संविधान एकीकृत न्यायिक व्यवस्था की स्थापना करता है। इसका अर्थ यह है कि विश्व के अन्य संघीय देशों के विपरीत भारत में अलग से प्रांतीय स्तर के न्यायालय नहीं हैं। भारत में न्यायपालिका की संरचना पिरामिड की तरह है जिसमें सबसे ऊपर सर्वोच्च न्यायालय, फिर उच्च न्यायालय तथा सबसे नीचे जिला और अधीनस्थ न्यायालय हैं।
भारत का सर्वोच्च न्यायालय
इसके फैसले सभी अदालतों को मानने होते हैं।
► यह उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का तबादला कर सकता है।
► यह किसी अदालत का मुकदमा अपने पास मंगवा सकता है।
► यह किसी एक उच्च न्यायालय में चल रहे मुकदमे को दूसरे उच्च न्यायालय में भिजवा सकता है।
उच्च न्यायालय
निचली अदालतों के फैसले पर की गयी अपील की सुनवाई कर सकता है।
► मौलिक अधिकारों को बहाल करने के लिए रिट जारी कर सकता है।
► राज्य के क्षेत्राधिकारों में आने वाले मुकदमों का निपटारा कर सकता है।
► अपने अधीनस्थ अदालतों का पर्यवेक्षण और नियंत्रण करता है।
जिला अदालत
जिले में दायर मुकदमों की सुनवाई करती है।
► निचली अदालतों के फैसले पर की गयी अपील की सुनवाई करती है।
► गंभीर किस्म के आपराधिक मामलों पर फैसला देती है।
अधीनस्थ अदालत
यह फौजदारी और दीवानी के मुकदमों पर विचार करती है।
सामाजिक न्याय एवं हाशिए पर खड़े लोग
जिन पृष्ठों पर हम लिखने का कार्य करते हैं वहां अक्सर बाईं ओर खाली जगह होती है जहाँ आमतौर पर लिखना असंभव होता है। उन्हीं पृष्ठों को हाशिया कहा जाता है। कुछ इस प्रकार हमारे समाज में भी होता है। कुछ लोगों को समाज की कार्यविधि से अलग रखा जाता है। हाशिए से हमारा तात्पर्य किनारे पर धकेल देने से है। समाज में भी ऐसे समुदाय हैं जिन्हें इस तरह के किनारेपन या बेदखली का अहसास कराया जाता है। विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में इसे देहाती भाषा में हुक्का-पानी बंद करना कहा जाता है। समाज में अधिकतर ऐसे लोगों को भी हाशिए पर खड़ा हुआ कहा जाता है जो किसी अलग धर्म, भाषा और रीति-रिवाज़ को अपनाते हों। हाशिए के शिकार हुए लोगों को संसाधनों और उन्हें विभिन्न अवसरों के लाभ से वंचित होना पड़ता है। कई बार ऐसा हाशिए के कारण स्वयं भी होता है। परन्तु, कई बार यह भी देखा गया है कि इनको हाशिए पर पहुँचने के लिए विवश किया जाता है।
आदिवासी और हाशियाकरण
मूल निवासी को आदिवासी कहा जाता है। ये ऐसे समूह होते हैं जो अपना जीवन जंगलों में रहकर व्यतीत करते हैं। भारत के संदर्भ में देखें तो लगभग 80 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है। इन्हें अनुसूचित जनजाति कहा जाता है। भारत में 500 से अधिक तरह के आदिवासी पाये जाते हैं, जो छत्तीसगढ़, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, गुजरात इत्यादि क्षेत्रों में निवास करते हैं। आदिवासी लोगों का जीवन जंगलों पर ही निर्भर होता है, वहीं वह अपने पूर्वजों की परम्परा का निर्वहन करते हैं।
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 में दलितों तथा पीड़ित समुदायों की माँगों के जवाब में बनाया गया। यह वह समय था जब इन समुदायों व जातियों ने उनके साथ हो रहे दुर्व्यवहारों और तिरस्कृत जीवन से मुक्ति के लिए सरकार से ठोस कदम उठाने को कहा। इससे संबंधित कानूनों के अंतर्गत आने वाले अपराधों की एक लम्बी सूची दी गयी, जिसमें ऐसे अपराध थे जिनके बारे में सोचकर लोगों का दिल दहल जाता था। इस सूची के जरिए यदि किसी दलित और आदिवासियों से जबरन कार्य करवाया जाता है या कार्य कराकर उसे वेतन उचित नहीं मिलता तो कानून में प्रावधान है कि ”अगर कोई भी व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति के किसी व्यक्ति के नाम पर आबंटित की गयी या उसकी स्वामित्व वाली जमीन पर कब्जा करता है या खेती करता है अथवा उसे अपने नाम पर स्थानान्तरित करवा लेता है तो वह कठोर सज़ा का हकदार होगा।
यदि अनुसूचित जाति या जनजाति पर किसी भी तरह का हमला, जोर जबरदस्ती या फिर उसका तिरस्कार करते हैं तो अपराध करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही का प्रावधान है।

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