अध्याय 5 सामाजिक अध्ययन का अधिगम सामाजिक अध्ययन सामाजिक विज्ञान शिक्षण की समस्याएँ

सामाजिक विज्ञान शिक्षण की सीमाएं
वास्तव में सामाजिक विज्ञान का क्षेत्र बड़ा व्यापक है और विश्व में मनुष्य कार्बन वर्तमान सामाजिक जीवन ही इसका सार है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि सामाजिक अध्ययन एक असीम व अंतहीन सागर है। आवश्यक सामान्य ज्ञान की रूपरेखाएँ सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि इसकी सीमाएँ निर्धारित की जाएँ। अत: सामाजिक अध्ययन में विभिन्न विषयों से केवल व्यावहारिक ज्ञान की बातें ही ग्रहण करनी चाहिए और ऐसी सामग्री को छोड़ देना चाहिए, जिसका सामाजिक मूल्य कुछ भी न हो। सामाजिक विज्ञान शिक्षण की समस्याएँ निम्नलिखित है:
सामाजिक अध्ययन के पाठ्यक्रम का लचीला न होना, इसकी बड़ी समस्या है। इसे व्यावहारिक ज्ञान के स्थान पर सूचनाओं का संग्रहदाता बना दिया जाता है।
• सामाजिक अध्ययन शिक्षण में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप संसाधनों की आवश्यकता होती है। इस प्रकार के संसाधनों का अधिकतर विद्यालयों में नितांत अभाव होता है।
• सूचनाओं को प्रदान करने की होड़ में प्राय: शिक्षक अध्येता विद्यार्थियों के निजी अनुभव का प्रयोग नहीं करता है, जिससे अधिगम में बाधा होती है।
• विभिन्न सामाजिक एवं भौगोलिक वातावरण के छात्रों के लिए भी सामान्य अथवा एक ही पाठ्यक्रम का प्रयोग किया जाता है।
• सामाजिक अध्ययन के अध्यापकों को शिक्षण की नवीनतम तकनीकों एवं विधियों को अपनाने के लिए प्रेरित करने के स्थान पर पारम्परिक शिक्षण विधियों को सिखाने पर बल दिया जाता है। इसकी वजह से सामाजिक अध्ययन के शिक्षण का स्तर कमजोर होता है।
• विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के बालकों को समझे बिना सामाजिक अध्ययन का शिक्षण अंधेरे में तीर चलाने के समान है।
• सामाजिक अध्ययन शिक्षण की एक प्रमुख समस्या यह है कि शिक्षक पूर्ण रूप से क्रियाशीलता के सिद्धांत
(करके सीखना) का अनुपालन नहीं कर पाते हैं। परियोजना पद्धति के स्थान पर व्याख्यान पद्धति का अधिकतर प्रयोग करने से छात्रों के व्यावहारिक सामाजिक जीवन हेतु यथोचित ज्ञान नहीं प्राप्त हो पाता है। प्राय: छात्रों की अभिक्षमता एवं रुचि के अनुसार उचित शिक्षण विधियों का प्रयोग नहीं किया जाता है।
• सामाजिक अध्ययन के शिक्षण में उपचारात्मक एवं नैदानिक शिक्षण का अभाव होता है।
• सामाजिक अध्ययन विषय को आसान मानकर विद्यार्थी अपेक्षाकृत कम रुचि लेते हैं। साथ ही दिए गए गृहकार्य के प्रति भी हताशा दिखाते हैं।
क्रियाशीलता सिद्धांत
‘क्रियाशीलता’ से तात्पर्य करके सीखने से है। सामाजिक अध्ययन के शिक्षण में क्रियाशीलता के सिद्धांत का अनुपालन किया जाना चाहिए।
• प्राणी की आवश्यकता से ‘चालक’ का जन्म होता है। चालक, शक्ति का वह स्रोत है जो प्राणी को क्रियाशील करता है। जैसे भोजन की आवश्यकता से भूख-चालक की उत्पत्ति होती है। भूख चालक उसे भोजन की खोज करने के लिए प्रेरित करता है।
• क्रियाशीलता के सिद्धांत यानी करके सीखने में अधिक में इन्द्रियों का अधिक प्रयोग होता है, जिसके कारण अधिगम बेहतर होता है।
क्रियाशीलता के सिद्धांत को परियोजना पद्धति भी कहा जाता है। इसमें विद्यार्थियों को विषय के पाठ से कुछ परियोजनाएँ दी जाती हैं जिसे विद्यार्थी स्वयं करता है। इससे विद्यार्थी किताबी ज्ञान को व्यवहार द्वारा समाज से सीखता है। यही व्यावहारिक ज्ञान विद्यार्थी के समाजीकरण में मदद करता है।
व्यक्तिगत भिन्नता (विद्यार्थियों के बौद्धिक स्तर में भिन्नता)
व्यक्तिगत भिन्नता का अर्थ है – एक बालक का दूसरे बालक से भिन्न होना अर्थात् लोगों का एक-दूसरे से भिन्न होना ही व्यक्तिगत भिन्नता है।
• यह सर्वविदित तथ्य है कि दो मनुष्य एक-दूसरे से मानसिक योग्यताओं, शारीरिक क्षमताओं तथा शील-गुणों के आधार पर भिन्न होते हैं, यहाँ तक कि जुड़वां भाई-बहन भी एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।
• ‘स्किनर’ के अनुसार, ”मापन दिए जाने वाला व्यक्ति का प्रत्येक पहलू वैयक्तिक भिन्नता का अंश है।
• व्यक्तिगत भिन्नता के कारक हैं – वंशानुक्रम, वातावरण, आर्थिक स्थिति, लिंग भेद आदि।
• व्यक्तिगत भिन्नता के कारण विद्यार्थियों के बौद्धिक स्तर में भिन्नता होती है। अत: शिक्षक को चाहिए कि विभिन्न सामाजिक, आर्थिक पृष्ठभूमि एवं संज्ञान वाले विद्यार्थियों की बौद्धिक भिन्नता का सम्मान करें।
शिक्षण विधि से संबंधित समस्याएँ
छात्रों की अभिरुचि और क्षमता के अनुसार उपयुक्त शिक्षण विधियों के चयन की समस्या सामाजिक अध्ययन शिक्षण की एक प्रमुख समस्या है।
प्राथमिक स्तर पर शिक्षण-विधियाँ
प्राथमिक स्तर पर सामग्री को वातावरण के आधार पर और बच्चों की रुचियों के अनुसार संगठित किया जाना चाहिए।
• विस्तृत ब्यौरे और तकनीकी बातों से बचना चाहिए।
• तथ्यों को एक रोचक कथा के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
• सभी अवसरों पर चित्रों, नक्शों, चार्टों, मॉडलों, आरेखों तथा अन्य दृश्य-श्रव्य साधनों का व्यापक प्रयोग करना चाहिए।
• विद्यार्थियों को अपनी समस्याएं सुलझाने के लिए विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में वास्तविक भागीदारी द्वारा व्यावहारिक अनुभव उपलब्ध कराना चाहिए।
• प्राथमिक अवस्था में विभिन्न क्रियाकलापों के माध्यम से स्वच्छ एवं शिष्ट आदतों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाए।
माध्यमिक स्तर पर शिक्षण-विधियाँ
इस अवस्था में कहानी सुनाने और पाठ्यपुस्तक प्रक्रियाओं के साथ समस्या एवं परियोजना विधियों का भी प्रयोग करना चाहिए।
• दृश्य-श्रव्य साधनों, चित्रों, नक्शों, फिल्म की कतरनों, फिल्मों, मॉडलों तथा भ्रमणों का प्रभावी प्रयोग करना चाहिए।
• अभिवृत्तियों तथा कुशलताओं के विकास के लिए विभिन्न गतिविधियां आयोजित की जाएं। जैसे- नाटक, झांकी बनाना, वाद-विवाद, भाषण प्रतियोगिता, ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा।
• छात्रों को प्रोत्साहित किया जाए कि वे मानचित्रों को भरें, चार्ट, ग्राफ तथा मॉडल बनाएं।
उच्च विद्यालय स्तर पर शिक्षण-विधियाँ
इस अवस्था में शिक्षण में कार्य-कारण संबंध पर अधिक जोर देना चाहिए।
• इकाई विधि, समस्या तथा योजना विधि और सामूहिक विवेचना विधि के माध्यम से अध्ययन-अध्यापन किया जाना चाहिए।
• चार्टों, नक्शों, मॉडलों, सामूहिक चर्चाओं और भ्रमणों का व्यापक प्रयोग करना चाहिए।
• इस स्तर पर अधिक विविध साधनों तथा उपकरणों का प्रयोग किया जाना चाहिए।
• राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दिवसों के आयोजन को एवं सामुदायिक सर्वेक्षणों को सामाजिक अध्ययन कार्यक्रम का एक नियमित अंग बनाया जाना चाहिए।
सामाजिक अध्ययन शिक्षण को प्रभावशाली बनाने के सूत्र
सरल से जटिल ज्ञान की ओर बढ़ना चाहिए।
• ज्ञात से अज्ञात की ओर बढ़ें, अर्थात् विद्यार्थी के पूर्व ज्ञान का प्रयोग करना चाहिए।
• विशिष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर, इन उदाहरणों का परीक्षण कर तथ्यों के प्रति सामान्य सिद्धांत का निर्माण करना चाहिए।
• मनोवैज्ञानिक शिक्षण पद्धति का क्रमश: प्रयोग किया जाना चाहिए।
• विभिन्न समस्या का विश्लेषण करके संश्लेषण (समस्या का समाधान) की ओर बढ़ना चाहिए।
• विद्यार्थी के व्यवहारिक ज्ञान (पूर्व ज्ञान) द्वारा वर्ग में वार्तालाप शैली में विचार विमर्श के द्वारा ज्ञान का आदान-प्रदान करना चाहिए।
समस्या समाधान
किसी समस्या का समाधान प्राप्त करने हेतु क्रमबद्ध तरीके से किसी सामान्य विधि का उपयोग करना पड़ता है। समस्या समाधान अधिगम (learning by solving problem) के अंतर्गत जीवन में आने वाली नवीन समस्याओं के समाधान के तरीकों को सीखने से है।
• समस्या आधारित शिक्षण छात्र-केन्द्रित शिक्षण है। इसमें छात्रों को समस्या के हल करने के अनुभव के माध्यम से छात्रों को रणनीतियां और विषय-विशेष का ज्ञान मिलता है।
• समस्या-समाधान विधि का लक्ष्य छात्रों को लचीला ज्ञान, प्रभावी समस्या को सुलझाने के कौशल का विकास करता है।
• समूहों में कार्य करने की यह एक सक्रिय शैली है।
• इसमें प्रशिक्षक की भूमिका समर्थन, मार्गदर्शक और सीखने की प्रक्रिया की निगरानी के द्वारा सिखाने की है।
• इससे छात्रों में अनुभव, टीम वर्क, सम्मान और सहयोग का सकारात्मक विकास होता है।
शिक्षक प्रशिक्षण
एक अच्छे और उत्परिवर्तित (Updated) कर्मठ शिक्षक के निर्माण हेतु सेवा पूर्व प्रशिक्षण (Preservice Training) के साथ-साथ सेवाकालीन शिक्षक परीक्षक (In-service training) की व्यवस्था की जानी चाहिए।
• सेवाकालीन प्रशिक्षण के लिए राज्य को आवश्यक व्यवस्था तंत्र का निर्माण करना चाहिए ताकि जिससे शिक्षकों के विषय संबंधी ज्ञान को अद्यतन किया जा सके।
• प्रशिक्षण के माध्यम से शिक्षक स्वयं को बदलते वक्त के साथ केवल अपडेट करेगा, और साथ ही साथ नए विचारों और नई तकनीक के साथ सामंजस्य बिठाएगा।
• शिक्षक प्रशिक्षण के दौरान किसी क्षेत्र विशेष की अवधारणाओं पर व्यापक समझ बनाने का प्रयास किया जाता है। उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि शिक्षा के क्षेत्रों में प्रशिक्षण की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसी कारण से समय-समय पर शिक्षक प्रशिक्षण आवश्यक है।

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