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अध्याय 5 पियाजे, कोह्लबर्ग तथा वाइगोत्सकी के सिद्धान्त (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 5 पियाजे, कोह्लबर्ग तथा वाइगोत्सकी के सिद्धान्त

पियाजे का विकास अवस्था का सिद्धान्त

► एक शिक्षार्थी या शिशु के मानसिक विकास एवं शारीरिक वृद्धि के अनेकों पहलू होते हैं। वह विचार, अनुभव और ज्ञानेद्रियों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करता है। अपनी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से एक शिक्षार्थी बाह्य जगत को जानने समझने की कोशिश करता है उसे ही संज्ञान कहते हैं। संज्ञान का अर्थ है-जानना। संज्ञान अर्थात् चेतना ज्ञान प्राप्त करने एवं चीज़ों को समझने की मानसिक प्रक्रिया है। इसके द्वारा हमारे मन में विचार पैदा होते हैं। हम किसी चीज के बारे में पूर्वानुमान भी संज्ञान द्वारा ही लगा पाते हैं।
► संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत में संज्ञान का काफी विस्तृत अध्ययन किया जाता है। इसको विशेष महत्व देने वाले मनोवैज्ञानिकों ने संज्ञानावादी समूह का निर्माण किया था। जिसके संस्थापक स्विट्जरलैंड के मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे माने जाते हैं। जीन पियाजे ने मनोविज्ञान में संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत दिया था। जिसके अनुसार, शिक्षार्थी अपनी चेतना का प्रयोग करते हुए वातावरण एवं परिवेश के साथ सीखता है। सीखना ज्यादा अर्थपूर्ण तब होता है जब वह शिक्षार्थी की रुचि और जिज्ञासा के अनुरूप हो। जीन पियाजे के विकास की अवस्थाओं के सिद्धांत के प्रमुख भाग निम्नलिखित प्रकार से हैं:
सात्मीकरण
जब किसी नई वस्तु या तथ्य का ज्ञान बालक के पुराने ज्ञान के साथ जाकर मिलता है तो इसे सात्मीकरण की संज्ञा दी जाती है। शिशु या शिक्षार्थी अपनी ज्ञानेंद्रियों के प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर चीज़ों को समझता है। जैसे एक शिशु जब किसी गरम पदार्थ को जिज्ञासावश छूता है तो उसे जलने के बाद अहसास होता है कि यह तो खतरनाक चीज़ है और इससे दूर रहना चाहिए। उसके पास अपने अनुभव को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त शब्द नहीं होते पर वह जान लेता है कि इसे दूर रहना चाहिए। वह अपना डर जाहिर करने के लिए बाकी लोगों की तरफ इशारा करता है। इस प्रकार शिशु या शिक्षार्थी अपने परिवेश और वातावरण के साथ सक्रिय रूप से अंत:क्रिया कर सक्रिय रूप से सीखता है। वह किसी कार्य को करते हुए उसमें नए विचारों को शामिल करता है। इसके द्वारा उससे स्पष्ट जुड़ाव देख और समझ पाता है। इस प्रक्रिया को सात्मीकरण (Assimilation) कहते हैं।
व्यवस्थापन तथा संतुलन स्थापित करना
शिशु या शिक्षार्थी में मानसिक वृद्धि के साथ नये विचार उत्पन्न होते हैं जिन्हें वह परिस्थितियों के साथ समायोजित करता है। सात्मीकरण की प्रक्रिया में वह नये विचारों के साथ तालमेल करना सीखता है। इस पूरी प्रक्रिया में उसका बौद्धिक विकास मजबूत होता है जिसे व्यवस्थापन संतुलन (Equilibration) कहते हैं।
निर्माण एवं खोज: शिशु जैसे-जैसे बड़े होते हैं वे ऐसे नये व्यवहारों तथा क्रियाओं को करने की कोशिश करते रहते हैं जो उन्होंने पहले नहीं किया था, जैसे एक 2 वर्श का शिशु अपने खिलौने को प्रत्येक बार विभिन्न क्रम में सजाता है जिससे उसकी खोज करने की प्रवृति का पता लगता है। पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को चार अवस्थाओं में विभाजित किया है-
संवेदिक पेशीय अवस्था: जन्म से 2 वर्ष
पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था: 2-7 वर्ष
मूर्त संक्रियात्मक अवस्था: 7 से 11 वर्ष
अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था: 11 वर्श से प्रौढ़ावस्था तक
संवेदिक पेशीय अवस्था/इन्द्रिय जनित अवस्था/संवेदी
गत्यात्मक अवस्था
यह अवस्था जन्म से 2 वर्ष तक होती है। इस अवस्था में बालक ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से किसी भी विषय को सीखने की कोशिश करता है। इस अवस्था में देखकर, सुनकर, सूंघकर, स्पर्शद्वारा, चखकर ज्ञानेन्द्रियों द्वारा किसी भी विषय का अधिगम किया जा सकता है। शिक्षार्थी की संवेदनाएँ इसी अवस्था में विकसित होती है। इसलिए इसे संवेदी पेशीय अवस्था कहते हैं। 22-23 माह की अवस्था में जब शिशु की किसी वस्तु को छिपा दिया जाता है, तो वह उसे ढूंढने की कोशिश अवश्य करता है। इस प्रयास को वस्तु स्मृति कहते हैं।
पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था
यह अवस्था 2-7 वर्ष तक होती है। इस अवस्था में शिशु के अन्दर सजीव चिन्तन विकसित होता है।
► उसकी भाषा का उचित विकास हो जाता है एवं सम्प्रत्यय निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। इस अवस्था में बालक में नकल करने की प्रवृत्ति पाई जाती है। बालक में अहम् केन्द्रियता का भाव विकसित होने लगता है। शिक्षार्थी दो वस्तुओं के बीच अन्तर पहचानने लगता है।
मूर्त संक्रियात्मक अवस्था
यह अवस्था 7 से 11 वर्ष तक होती है। इस अवस्था में शिक्षार्थी किसी भी विषय-वस्तु को देखकर सोचता है। बालक में संरक्षण की समझ भी विकसित होती है। वह विभिन्न वस्तुओं के बीच अन्तर, गणना, समानता व असमानता वस्तुओं के गुण, लंबाई, चौड़ाई तथा भार आदि के आधार पर करना सीख जाता है।
► इस अवस्था में शिक्षार्थी में पलटकर सोचने की योग्यता अर्थात् अनुत्क्रमणीयता विकसित हो जाती है।
► इस अवस्था को स्थूल संक्रियात्मक अवस्था भी कहते हैं।
औपचारिक संक्रिया अवस्था
यह अवस्था 11 वर्श से प्रौढावस्था तक होती है। यह संज्ञानात्मक विकास की अन्तिम अवस्था है एवं इस अवस्था में शिक्षार्थी में सम्प्रत्यय निर्माण की योग्यता का पूर्ण विकास हो जाता हैं। शिक्षार्थी की बुद्धि तर्क-वितर्क करने लगती है। शिक्षार्थी कठिन सवालों को हल करने एवं अमूर्त चिन्तन करने में सक्षम होता है। इस अवस्था को अमूर्त चिन्तन की अवस्था भी कहते हैं।

कोह्लबर्ग का नैतिक विकास की अवस्था का सिद्धान्त

लॉरेन्स कोह्लबर्ग ने यह सिद्धांत दिया था कि शिक्षार्थियों के लिए तार्किकता महत्वपूर्ण है। शिक्षार्थी को सीखने के क्रम में नैतिकता का सामना करना पड़ता है और ऐसी स्थिति में तार्किकता उन्हें अंतिम निर्णय लेने में मदद करती है। कोह्लबर्ग के अनुसार, शिक्षार्थियों के जीवन काल में ऐसी कुछ निश्चित अवस्थाएँ होती हैं जो शिक्षार्थियों के नैतिक एवं चारित्रिक विकास क्रम में सार्वभौमिक रूप से पायी जाती हैं।
सीखने की सार्वभौमिक अवस्था
► प्राकनैतिक अवस्था: यह अवस्था शिक्षार्थी के 4 वर्श से 10 वर्श तक मानी जाती है। इस अवस्था में शिक्षार्थी परिवार, शिक्षक, पड़ोसी आदि से अधिक प्रभावित होता है। वह अपना नैतिक निर्णय स्वयं नहीं ले पाता है और दूसरों के द्वारा सुझाये गये निर्णयों को आत्मसात करता है। इस अवस्था में उसे अभिभावक, शिक्षक एवं अन्य बड़ों से दंडित होने का भय रहता है जिसके फलस्वरूप उसका कार्य या व्यवहार भौतिक रूप से नियंत्रित होता है। शिक्षार्थी अभिभावक या समाज के नैतिकताओं के साथ सहभागिता का रवैया अपनाता है जो कई बार आत्म-परिपूरक पारस्परिकता होती है। इसमें आपसी लेन-देन का भाव होता है।
रूढ़िगत नैतिक अवस्था: यह अवस्था शिक्षार्थी के 10 वर्श से 13 वर्श तक मानी जाती है। इस अवस्था में शिक्षार्थी परिवार, शिक्षक, पड़ोसी आदि से प्रभावित होता है और उनके द्वारा बताये गये नैतिक या सामाजिक मानकों को ग्रहण कर लेता है। किसी विशय पर निर्णय लेने के लिए वह दूसरों पर निर्भर नहीं रहता है और सीखे हुए पारिवारिक या सामाजिक मानकों के अनुसार निर्णय लेता है। इस अवस्था में शिक्षार्थी परिवार तथा समाज द्वारा स्वीकृति पाना चाहता है।
उत्तररूढ़िगत नैतिक अवस्था: यह शिक्षार्थी के 13 वर्श से आरंभ होकर उसके प्रौढ़ावस्था तक चलती है। इस अवस्था में उच्च स्तर की नैतिकता का विकास होता है। यहाँ आकर बालक का नैतिक व्यवहार उच्च स्तर पर होता है। इस अवस्था में शिक्षार्थी अपने स्व-विवेक के आधार पर निर्णय लेता है। वे समाज एवं परिवार द्वारा मान्य नियमों को समझता है तथा अपने निर्णयों में उन नियमों को शामिल भी करता है परंतु अंतिम निर्णय वैयक्तिक आधार पर ही लेता है।
नैतिक विकास के चरण
आत्मकेन्द्रित निर्णय (वैयक्तिकता और विनिमय)
► दण्ड तथा आज्ञापालन
► यांत्रिक सापेक्षिक उन्मुखीकरण
► परस्पर एकरूप उन्मुखीकरण
► अधिकार संरक्षण उन्मुखीकरण
► सामाजिक अनुबंध एवं व्यक्तिगत अधिकार उन्मुखीकरण
► सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत उन्मुखीकरण
कोह्लबर्ग के सिद्धांत की सीमाएँ
कोह्लबर्ग के सिद्धांत में शिक्षार्थियों के वास्तविक व्यवहार की अपेक्षा तार्किकता पर अधिक बल दिया गया है।
► कोह्लबर्ग ने शिक्षार्थियों की तर्क-शक्ति पर ही जोर दिया है और उन्होंने सामाजिक या पारिवारिक मूल्यों पर ध्यान नहीं दिया है जो कि एक शिक्षार्थी के निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करते हैं।
► कोह्लबर्ग के नैतिक सिद्धांतों का सारा ध्यान नैतिक सोच तक सीमित है और उनमें नैतिक व्यवहार के बारे में ज़्यादा बात नहीं की गई है। नैतिकता की समझ होते हुए भी लोग अनैतिक कार्य करते हैं। जैसे चोरों को पता है कि चोरी करना गलत काम है परन्तु इसके बावजूद वह चोरी करते हैं।

वाइगोत्सकी का सामाजिक विकास का सिद्धान्त

लिव सिमनोविच वाइगोत्सकी ने शिक्षार्थियों के संज्ञानात्मक विकास में समाज की भूमिका पर आधारित सामाजिक विकास का सिद्धांत दिया था। उनका मानना था कि शिक्षार्थियों या बच्चों का विकास सांस्कृतिक संदर्भ में होता है तथा इसमें भाशा, समाज तथा सामाजिक विकास की भूमिका अहम् होती है। वाइगोत्सकी के अनुसार, अधिगम अर्थात् सीखना तथा विकास की पारस्परिक प्रक्रिया में शिक्षार्थी की सक्रिय भागीदारी होती है।
► भाषा का शिक्षार्थी के संज्ञान पर सीधा प्रभाव होता है। अधिगम और विकास अन्त:सम्बन्धित प्रक्रियाएँ है जो एक शिक्षार्थी के जीवन के आरंभकाल से ही शुरू हो जाती है। अलग-अलग विकास स्तरों पर शिक्षार्थियों के अधिगम की व्यवस्था में कुछ समानता तो हो सकती है किन्तु एकरूपता नहीं हो सकती है, क्योंकि सभी बच्चों का सामाजिक अनुभव अलग-अलग होता है।
► वाइगोत्सकी के अनुसार, सामाजिक अन्त:क्रिया (interaction) शिक्षार्थी की सोच तथा व्यवहार में निरन्तर परिवर्तन लाती है। यह एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में अलग हो सकती है। किसी शिक्षार्थी का संज्ञानात्मक विकास उसके अन्य व्यक्तियों या सहपाठियों से अन्त:सम्बन्धों पर निर्भर करता है। शिक्षार्थी, बाल्यकाल में समाज एवं सामाजिक धारणाओं से परिचित होता है। वह स्कूल जाना प्रारंभ करता है और सहपाठियों के सानिध्य में समूह में रहना व सोचना सीखता है।
► शिक्षार्थी को किशोरावस्था में लिंग का संज्ञान होता है। किशोर और किशोरियाँ अपने समवयस्कों के साथ समूह में सक्रिय रहते हैं। समूह के अंदर रहना, नेतृत्व करना तथा स्कूल, राज्य व समुदाय के आधार पर अपनी पहचान बड़े समूह के साथ करने लगता है। इस समय शिक्षार्थी के सीखने की प्रक्रिया को सामाजिक संस्कृति, परिवार, यौन स्वतंत्रता, व्यक्तिगत रूचि भी प्रभावित करने लगती है।
► वाइगोत्सकी के सिद्धांतो का सार ‘सहयोगात्मक समस्या- समाधान’ है अर्थात् शिक्षार्थी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए शिक्षकों से निर्देश तो लेते हैं पर उसे लागू करने से पहले सहपाठियों की सहायता से उसे हल करने की कोशिश करते हैं। शिक्षक भी उन्हें केवल सहयोग देते हैं और कठोर नियंत्रण नहीं रखते हैं।
सामाजिक संरचना का निर्माण: वाइगोत्सकी के अनुसार, आपसी संवाद सामाजिक संरचना या ढाँचा निर्माण के लिए प्रमुख साधन का कार्य करती है। एक शिशु या शिक्षार्थी के पास अव्यवस्थित एवं असंगठित संप्रत्यय होते हैं जबकि उसके परिवार या विद्यालय के पास तार्किक एवं तर्क संगत विचार होते हैं। शिक्षार्थी तथा उनके सीखने के क्रम में सहायता देने वालों के बीच जब संवाद होता है तो शिक्षार्थियों के विचार संगठित, तर्कसंगत तथा औचित्यपूर्ण होते हैं।
भाषा द्वारा सीखना: वाइगोत्सकी का कहना है कि शिक्षार्थी सामाजिक संप्रेशण एवं अपने कार्यों के लिए भाशा का प्रयोग करते हैं। इसके द्वारा शिक्षार्थियों के व्यवहार को निर्देशित तथा उनके सीखने की प्रक्रिया का मूल्यांकन किया जाता है। स्व-निर्देशन में प्रयुक्त भाशा को निजी भाशा कहते हैं। यह शिक्षार्थियों के बाल्यकाल में अभिव्यक्ति का प्रमुख साधन है।

वाइगोत्सकी का संभावित विकास का क्षेत्र

► वाइगोत्सकी के अनुसार, एक शिक्षार्थी अपने अभिभावक या शिक्षक के निर्देशन में जो कर रहा है तथा इसके अतिरिक्त जो कार्य वह स्वंय करने की संभावना रखता है, उसके बीच के क्षेत्र को संभावित विकास का क्षेत्र कहते हैं।
► इनका मानना है कि खेल के द्वारा शिक्षार्थी अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखना सीखता है। खेल में आने वाली परिस्थितियों के अनुसार अपनी कल्पना शक्ति का प्रयोग करता है और उससे उभर कर बाहर आता है। खेल एक बाहरी कारक है जो शिक्षार्थियों के संज्ञानात्मक, भावनात्मक एवं सामाजिक विकास में मदद करता है। यह उनके मानसिक स्तर को बढ़ाता है तथा स्व-नियंत्रण करना भी सीखाता है।
► किसी शिक्षार्थी के संभावित विकास की पहचान के लिए बाहरी कारक जैसे खेल अधिक उपयुक्त साधन है।
► शिक्षार्थी खेल में निभायी गयी अपनी भूमिकाओं एवं नियमों से प्रभावित होता है जो उसके मानसिक विकास को प्रेरित करती है और निकट विकास क्षेत्र का निर्माण करती है। खेल में मानसिक एवं शारीरिक विकास के सभी आवश्यक तत्व मौजूद होते हैं। वाइगोत्सकी ने शिक्षार्थियों पर सामाजिक निर्देशों के प्रभाव को दर्शाने के लिए इस संप्रत्यय का प्रयोग किया था।

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