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अध्याय 48. राजनीतिक विज्ञान – मीडिया की समझ (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 48. राजनीतिक विज्ञान – मीडिया की समझ

संचार
‘संचार’ मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। अपने जीवन में प्रत्येक व्यक्ति जागृतावस्था में लगभग 70 प्रतिशत से अधिक का समय संचार में व्यतीत करता है। एशले फ्लाएड का मानना है कि ”व्यक्ति को कुछ पराधीन करके संप्रेषण करने से रोक दिया जाए तो उसे ‘भावनात्मक धक्का’ सा लगेगा। उस स्थिति में भी अत: संचार चलता रहेगा। उसे किसी तरह से रोका नहीं जा सकता।“ अत: संचार एक ऐसी जटिल प्रक्रिया का परिणाम है जिसके द्वारा दो या दो से अधिक लोगों के बीच अर्थपूर्ण संदेशों का आदान-प्रदान किया जाता है। ये संदेश संप्रेषक और प्रापक के बीच सामंजस्य और समझदारी बनाते हैं। सरल शब्दों में कहा जाए तो दो व्यक्तियों के बीच होने वाली गपशप, टेलीफोन पर होने वाली बातचीत, पत्र लिखना और पढ़ना इत्यादि रोजमर्रा के कार्य ‘संचार’ के अंतर्गत ही आते हैं।
संचार के कार्य
समाज की मानसिक अवस्था, वैचारिक चिंतन की प्रवृत्ति, संस्कृति तथा जीवन की विभिन्न दिशाओं को नियंत्रित करने में संचार की महती भूमिका है। यह व्यक्ति को समाज के साथ जोड़ती है और समाज को सूचनाओं के सम्प्रेषण के साथ-साथ ज्ञान और मूल्यों को भी प्रसारित करता है।
(1) सूचनाओं का संग्रह तथा प्रसार: संचार के विभिन्न माध्यमों द्वारा सूचनाओं को जगह-जगह से इकट्ठा किया जाता है तथा विभिन्न माध्यमों के द्वारा उसका विश्वभर में प्रसार किया जाता है।
(2) व्यक्ति का बहुआयामी विकास: संचार के माध्यम से सूचनाओं को संग्रहीत तथा प्रसारित करने के साथ-साथ उन सूचनाओं का गम्भीरता से विश्लेषण भी करते हैं। इस विश्लेषण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण लेखों तथा विचारकों के वक्तव्यों द्वारा जन-सामान्य के विचार, दृष्टिकोण और मूल्यों का विकास होता है। इसमें जन-सामान्य की सहभागिता तथा विशेषज्ञों की राय दोनों को ही स्वीकार किया जाता है।
(3) सामाजिक मूल्यों एवं ज्ञान का प्रेषण: संचार के सभी माध्यमों द्वारा केवल सूचनाएं ही सम्प्रेषित नहीं की जाती हैं बल्कि समाज की प्रत्येक गतिविधि और उसकी जीवन-धारा के अनसुलझे प्रश्नों, उनके कारणों तथा परिणामों के विषय में भी समाज को परिचित कराया जाता है।
(4) राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की दृढ़ता: भारत विभिन्न वर्गों, समुदायों, जातियों व मतों और विचारधाराओं का देश है। उसके बावजूद भी भारत को यदि धर्मनिरपेक्ष देश कहा जाता है तो उसमें संचार के माध्यम व उनके प्रशंसनीय कार्य का विशेष योगदान है। संचार माध्यमों द्वारा अनेक भाषाओं में ऐसे संदेशों का प्रकाशन या प्रसारण किया जाता है जो समाज को अपने राष्ट्र के प्रति एक होने के लिए प्रेरित करते हैं। उदाहरण के लिए आपातकाल की स्थिति में भी एक राज्य पर आई विपदा के समय समूचा राष्ट्र धर्म, जाति या वर्ग की दीवार तोड़कर एक हो उठता है।
(5) मनोरंजन: संचार के सभी माध्यमों द्वारा मनोरंजन का लाभ प्राप्त होता है। मानव जीवन की नीरसता और तनाव मुक्त वातावरण में संचार माध्यम जन-समुदाय का मनोरंजन भी करते हैं। ये विभिन्न कार्यक्रमों के द्वारा मानव जीवन को सरस बनाते हैं। जैसे- गीत, संगीत, कविताएं, फिल्में, धारावाहिक इत्यादि।
(6) सांस्कृतिक उन्नयन: संचार के विभिन्न माध्यम राष्ट्र की महानतम उपलब्धियों को विश्व में प्रचारित-प्रसारित करने के साथ-साथ वह संस्कृति के सभी प्रतिमानों के विकास के लिए अपना योगदान देते हैं। भाषा, साहित्य, धर्म, दर्शन तथा परम्परा आदि के जीवन्त एवं वास्तविक स्वरूप की झांकियों से समाज का परिचय करना और उन्हें विश्व समुदाय तक पहुँचाना इसका मुख्य लक्ष्य होता है।
जन-संचार माध्यमों का वर्गीकरण
(1) प्रिंट माध्यम: समाचार पत्र-पत्रिकाएं समाचार एजेंसियां इश्तहार पर्चे पुस्तक ें
(2) इलेक्ट्रॉनिक माध्यम: रेडियो टेलीविजन ऑडियो कैसेट वीडियो फिल्म कम्प्यूटर मोबाइल
(3) बाह्य संचार माध्यम: प्रदर्शनी एवं मेले नुक्कड़ नाटक
(4) विज्ञापन: मुद्रित और इलेक्ट्रॉनिक
(5) नव इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यम: उपग्रह इंटरनेट
समाज में मीडिया की भूमिका
समाज में संचार के बिना शक्ति का अस्तित्व शून्य की तरह है। जन-संचार के माध्यमों द्वारा ही किसी भी समाज की जीवन-धारा की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित किया जा सकता है। समाज की प्रगति और संस्कृति के विकास में जन-संचार अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
► यह समाज में व्याप्त रूढ़ और अंध परम्पराओं, जड़ मतमतांतरों और ढोंग आदि को तोड़ने तथा समाज को उनसे मुक्त करने में सशक्त भूमिका निभाता है। इस तरह से परम्परागत कुरीतियों को समाप्त कर वह सामाजिक परिवर्तन करता है। समाज को आगे बढ़ने की दिशा देता है।
► शासक और जन-समुदाय के बीच बढ़ती हुई खाईं को पाटने का बड़ा प्रबल कार्य करने में जन-संचार ही सहभागी रहता है। आज के समय में सत्ताधीशों की अपनी सत्ता से मोह होने के साथ-साथ जन-संचार के माध्यमों के द्वारा उनकी वास्तविकता को उजागर होने का भी भय रहता है। सत्ता पर बैठे लोगों की व्यवस्था की प्रशंसा के साथ-साथ उसकी आलोचना विरोध और सामाजिक असहमति को समाज तथा शासन के सामने प्रस्तुत कर जन-संचार उसमें संरचनात्मक सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
► सामाजिक समानता और राष्ट्रीय एकता की भावना को बनाए रखने में भी जन-संचार की सशक्त भूमिका है जिससे राष्ट्र की उन्नति और प्रगति को बल मिलता है। ”लिखित, मुद्रित, मौखिक तथा ग्राफिक विक्रय क्षमता ही विज्ञापन है।“ – फ्रैंक प्रेसनी ”विज्ञापन वस्तुत: किसी वस्तु-व्यवस्था आदि के गुणों का ऐसा प्रचार है जिसका उद्देश्य अपनी ओर आकर्षित करना और लाभ उठाना होता है।“ – मधुकर गंगाधर
विज्ञापन के कार्य
वस्तु या सेवा के नाम को जन-सामान्य में प्रचलित करना।
► वस्तु या सेवा के गुणों द्वारा आकर्षण पैदा करना।
► वस्तु या सेवा के प्रति लोगों में विश्वास बनाना।
► वस्तु या संस्था, सेवा के प्रति जनसामान्य में रुचि पैदा करना, इत्यादि।
विज्ञापन के लाभ
विज्ञापन के द्वारा ही जहाँ किसी उत्पाद की बिक्री में वृद्धि होती है वहीं इसके द्वारा समाज विभिन्न सूचनाओं को भी प्राप्त करता है। यह उपभोक्ता समाज को किसी भी वस्तु को खरीदने के लिए निर्णय लेने में मदद देता है। इतना ही नहीं, एक स्तर पर वह समाज में उपलब्ध किसी वस्तु के अनेक विकल्पों की सूचना देकर सामाजिकों की सहायता करता है, वहीं दूसरी ओर उन वस्तुओं के गुणों को सामने रखकर उसकी स्पष्ट एवं अनुकूल छवि द्वारा उपभोक्ताओं को आकर्षित करने में भी सक्षम होता है। वर्तमान में बाजारवाद और व्यावसायिक प्रगति के दौर में विज्ञापन की भूमिका महत्वपूर्ण है।
विज्ञापन के दोष
विज्ञापन करने से उत्पादित वस्तु के मूल्य में वृद्धि अधिक हो जाती है क्योंकि विज्ञापन में किए गए व्यय को भी जनता से वसूला जाता है। विज्ञापन जन-सामान्य की आदतों में इस तरह परिवर्तन ला देते हैं कि उनकी नैतिक सोच क्षीण हो जाती है जिसका कुप्रभाव यह होता है कि ये समाज में नैतिकता के मूल्यों को पतन के कगार तक पहुँचा देते हैं। विज्ञापन से एकाधिकार की प्रवृद्धि को बल मिलता है जिससे वस्तु की कीमत में वृद्धि हो जाती है। विज्ञापन द्वारा समाज को भ्रम के आवरण में खड़ा किया जाता है यानि जो वस्तुएँ दिखाई जाती हैं, जो गुण बताए जाते हैं वे वास्तविक रूप से संपूर्ण सत्य नहीं होते हैं।
सामाजिक परिवर्तन में मीडिया की भूमिका
मीडिया तथा समाज दोनों परस्पर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। आज जब विश्व शिक्षा के प्रचार और प्रसार में लाखों, करोड़ों रुपए खर्च करके भी इसे जितना समाज तक नहीं पहुँचा पाता, उससे कहीं अधिक जन-संचार के माध्यमों द्वारा यह समाज तक पहुँच जाती है। प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा के लिए विशेषज्ञों की सहायता से विभिन्न कार्यक्रमों का निर्माण किया जाता है। इन कार्यक्रमों को रेडियो और दूरदर्शन पर दिखाने के साथ-साथ कुछ ऐसी लघु फिल्मों का निर्माण भी किया जाता है जिनसे शिक्षा के किसी क्षेत्र में सहायता मिल सकती है। उदाहरण के लिए यू.जी.सी. द्वारा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के सहयोग से अनेक कार्यक्रमों का निर्माण कर उनका दूरदर्शन पर प्रसारण नियमित रूप से वर्षों से हो रहा है जो कि एक अद्भुत व अविस्मरणीय कार्य माना गया है। मीडिया सामाजिक मूल्यों के निर्माण में अपना अपरिवर्तनीय योगदान देता है। समाज की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा और उसकी अस्मिता की रक्षा दायित्व जन-संचार बखूबी निभाता है। वह समाज परिवर्तन के साथ व्यक्ति परिवर्तन पर भी बल देता है जिससे परम्परागत मूल्यों के साथ नवीन मूल्यों का भी सृजन होता है और यह मूल्य समय के साथ समाज की धारा में समाहित हो जाते हैं। परम्परागत मूल्यों का पोषण करते हुए भी मीडिया नवीन मूल्यों को स्थान देता है।
मीडिया का राजनीति पर प्रभाव
मीडिया राजनीति मामलों में हुए घोटलों का पर्दाफाश करने में अपना सहयोग देती है।
► मीडिया के माध्यम से जनता की समस्या को सत्ताधारियों तक सीधा पहुँचाया जाता है तथा लोक हित पर कार्य न करने वाली सत्ताधारी वर्ग की कठोर निंदा का माध्यम मीडिया होता है।
मीडिया द्वारा राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति
मीडिया के माध्यम से देश के नागरिकों के उद्देश्यों को उनकी इच्छाओं और विचारों को व उनकी पूर्ति के लिए आग्रह मीडिया के द्वारा हमारे सत्ताधारी वर्ग तक पहुँचता है। इसमें देश में शांतिपूर्ण एवं व्यवस्थित माहौल राष्ट्रीय एकता, विकास व उन्नति की दिशा में निरंतर वृद्धि होना इत्यादि उद्देश्य शामिल होते हैं जिसमें मीडिया का होना अत्यंत आवश्यक है।
विज्ञापन: अर्थ एवं परिभाषा
विज्ञापन अंग्रेजी के एडवरटाइजिंग शब्द का पर्याय है। इस शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘एडवर्टर’ से हुई है। अंग्रेजी में इसका अर्थ ‘टू टर्न टू’ अर्थात् ‘किसी ओर मोड़ना या आकर्षित करना’ है। किसी वस्तु और सेवा के संदर्भ में इसका तात्पर्य लोगों को अपनी ओर आकर्षित करना होता है। विज्ञापन को सामान्य रूप से भुगतान किया गया व्यावसायिक जनसंचार माना जाता है। विभिन्न विद्वानों ने विज्ञापन को परिभाषित किया है – ”विज्ञापन मुद्रित विक्रय क्षमता है।“ – लस्कर

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