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अध्याय 47. राजनीतिक विज्ञान – राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य सरकार (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 47. राजनीतिक विज्ञान – राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य सरकार

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एक स्वतंत्र आयोग है जो 1993 में कानून द्वारा बनाया गया। यह सरकार से उसी प्रकार स्वतंत्र है जिस प्रकार न्यायपालिका स्वतंत्र है।
► राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की नियुक्ति का कार्य राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है जिसमें आमतौर पर सेवानिवृत्त जज अधिकारी या प्रमुख नागरिकों को ही नियुक्त किया जाता है।
► मानवाधिकारों को अधिनियम की धारा 2(1) (d) में परिभाषित किया गया, जिसका अर्थ है कि जीवन स्वतंत्रता और व्यक्ति की गरिमा से जुड़े सभी अधिकार मानवाधिकार हैं जिनकी सुरक्षा की गारंटी संविधान देता है अथवा ये अधिकार अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदाओं में दर्ज हैं और भारत में न्यायालय द्वारा लागू करने योग्य हैं।
► आयोग के कार्य की गणना अनुच्छेद 12 में की गई जिसमें आयोग को एक व्यापक क्षेत्र बताया गया है। जो न केवल मानवाधिकारों के उल्लंघन अथवा लापरवाही के मामलों की पूछताछ और जांच करने तक ही सीमित है अपितु मानवाधिकार संस्कृति को बढ़ावा देना तथा मानवाधिकारों के प्रोत्साहन के लिए आवश्यक कार्य करने का क्षेत्र भी शामिल है।
► 1993 में अपने गठन के समय से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सर्वोच्च न्यायालय की पूरक संस्था के रूप में अपना कार्य कर रहा है तथा किसी संस्थान के क्रिया-कलाप पर नज़र रखने का काम अपने स्वभावगत ढंग से बेहतर तरीके से कर रहा है। इन संस्थानों की परस्पर निर्भरता ने देश में मानवाधिकारों के संरक्षण की प्रक्रिया में काफी सुधार किया है जो कि प्राथमिक रूप से राज्य का दायित्व है।
► सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत समानता का अधिकार तथा अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत जीवन का अधिकार, की व्याख्या से भारत में मानवाधिकारों के अर्थ व क्षेत्र को विस्तार मिला है।
► राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुच्छेद 12 में दर्ज अपने कार्यों, विशेष रूप से शासन चलाने वाली संस्थाओं की कार्य प्रणाली की जांच करने से संबंधित अपनी शक्ति, मानवाधिकारी की सुरक्षा तथा उनके उल्लंघन की रोंक को सुनिश्चित करने के लिए व्याख्या भी की है।
► राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग किसी सामान्य न्यायालय की तरह न तो कोई फैसला सुनाता है और न ही न्यायालय के फैसले की भांति इसकी संस्कृतियाँ जनता में खूब प्रचारित होती हैं और सामाजिक एवं राजनीतिक रूप में अपना विशिष्ट प्रभाव छोड़ती है। आयोग का टाडा के विरुद्ध छेड़ा गया अभियान एक उल्लेखनीय कदम है। यह एक अस्थायी कानून है, जो 23 मई 1995 को समाप्त हो गया। टाडा के समाप्त होने पर सरकार द्वारा किसी वैकल्पिक कानून को सदन में पारित नहीं किया गया।
राज्य सरकार
राज्य सरकार राज्य स्तर पर कानून बनाने वाली संस्था है। वर्तमान समय में भारत में 29 राज्य हैं और प्रत्येक में एक-एक विधान मण्डल है।
► राज्य सरकार में विधानसभा एवं विधान परिषद् दो महत्वपूर्ण अंग हैं। इनके अलावा राज्यपाल, मुख्यमंत्री तथा मंत्री परिषद् आदि राज्य सरकार की कार्यपालिका में शामिल हैं।
विधानसभा एवं सरकार का गठन
राज्य कई निर्वाचन क्षेत्रों में बंटा है। कई राज्य में विधानमंडल के दो सदन हैं – विधानसभा और विधान परिषद्। विधानसभा को निचला सदन या लोकप्रिय सदन कहा जाता है। विधान परिषद् को ऊपरी सदन कहा जाता है। राज्य सभा में विधानसभा को केंद्रीय स्तर पर लोकसभा की तरह सुरक्षित बनाया जाता है।
► हर एक निर्वाचन क्षेत्र से जनता अपने एक प्रतिनिधि का चुनाव करती है जो विधानसभा का विधायक कहलाता है तथा सरकार का निर्माण किया जाता है।
► विधायक भिन्न राजनीतिक पार्टियों से संबंधित होते हैं। जिस भी राजनीतिक पार्टी के विधायक आधे से ज्यादा निर्वाचित क्षेत्रों में सफलता हासिल कर लेते हैं तो राज्य में उस पार्टी को बहुमत में शामिल किया जाता है।
► जिस भी पार्टी को अधिक बहुमत मिलती है उसको सत्ता पक्ष तथा अन्य को विपक्ष की सूची में रखा जाता है।
► अधिकतर समय यह होता है कि किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत न मिले तो वह अन्य दलों की सहायता से मिली-जुली सरकार यानी गठबंधन सरकार का निर्माण कर लेता है।
► विधानसभा के सदस्यों की संख्या 500 से अधिक तथा 60 से कम नहीं हो सकती। किन्तु बहुत छोटे राज्यों को न्यूनतम संख्या से भी कम सदस्यों को रखने की अनुमति दी गई है। जैसे गोवा की विधानसभा में केवल 40 सदस्य हैं। 2002 में उत्तरांचल को उत्तर प्रदेश में से अलग कर देने के बाद भी यह एक बहुत बड़ा राज्य है इसलिए विधानसभा की सदस्य संख्या अब भी 403 है।
► अनुच्छेद 356 के अंतर्गत यदि राष्ट्रपति किसी राज्य में संवैधानिक सरकार की स्थिति में आपातकाल की घोषणा करे तो भी राष्ट्रपति विधानसभा को भंग कर सकता है। अनुच्छेद 352
के अंतर्गत राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा होने पर संसद विधानसभा के कार्यकलाप को एक बार में एक वर्ष तक बढ़ा सकती है।
विधान परिषद्
विधान परिषद् राज्य विधायिका का उच्च सदन है। अधिकतर राज्यों में विधान परिषद् नहीं है। बहुत कम राज्यों में द्विसदनीय विधायिका है। वर्तमान में सात राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र तथा जम्मू कश्मीर में विधान परिषद् है जबकि 22
राज्यों में केवल एक सदन यानी विधानसभा है।
► विधान परिषद् ब्रिटिश काल की देन है। यदि किसी राज्य की विधानसभा जहाँ विधान परिषद् नहीं है, अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से पारित करके द्वितीय सदन अर्थात् विधान परिषद् बनाने का प्रस्ताव संसद में भेजे तो संसद उस स्थिति में विधान परिषद् का निर्माण कर सकती है।
► इसी तरह यदि किसी राज्य में विधान परिषद् है परन्तु वे उनकी इच्छा इसे समाप्त करने की है तो उससे संबंधित राज्य को विशेष बहुमत से एक प्रस्ताव पारित कर संसद को भेजना होता है। फिर संसद एक प्रस्ताव पारित करेगी जिससे दूसरा सदन समाप्त कर दिया जाएगा।
► संविधान के अनुसार विधान परिषद् के सदस्यों की कुल संख्या विधानसभा के कुल सदस्य संख्या के एक तिहाई से ज्यादा नहीं होनी चाहिए परन्तु संख्या कम से कम 40 अवश्य होनी चाहिए। इसका अपवाद जम्मू तथा कश्मीर है जहाँ परिषद् की सदस्य संख्या मात्र 36 है।
विधान परिषद् का निर्वाचन
विधान परिषद् के सदस्य आंशिक रूप से निर्वाचित तथा आंशिक रूप से मनोनीत होते हैं। अधिक सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। विधान परिषद् की रचना इस प्रकार है:
► परिषद् के एक तिहाई सदस्य विधानसभा के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
► इसके एक तिहाई सदस्य एक निर्वाचक मण्डल द्वारा निर्वाचित होते हैं जिसमें नगर निगम, नगर परिषद्, जिला बोर्ड तथा राज्य की अन्य स्थानीय शासन की संस्थाओं के प्रतिनिधि होते हैं।
► कुल सदस्यों का बारहवां भाग राज्य के स्नातकों द्वारा निर्वाचित होता है जिनको स्नातक बने कम से कम तीन वर्ष हो चुके हों।
► कुल सदस्यों का बारहवां भाग राज्य के उन अध्यापकों द्वारा निर्वाचित होता है जिनका अध्यापन का अनुभव कम से कम तीन वर्ष का हो तथा वे उच्च माध्यमिक या उससे ऊपर के स्तर के शैक्षणिक संस्थाओं में पढ़ाते हों।
शेष लगभग छठा भाग राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। ये वह लोग होते हैं जो साहित्य विज्ञान, कला, सहकारी तथा सामाजिक क्षेत्र में ख्याति प्राप्त व्यक्ति हों। केन्द्र में राज्यसभा की तरह, विधान परिषद् भी एक स्थायी सदन है। यह कभी भंग नहीं होता है। इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष है। प्रत्येक दो वर्ष के बाद इसके एक तिहाई सदस्य सेवा-निवृत्त हो जाते हैं। सेवा-निवृत्त होने वाले सदस्य पुन: चुनाव लड़ सकते हैं। यदि किसी सदस्य के मरने से अथवा त्याग पत्र देने से कोई स्थान रिक्त होता है तो उसका चुनाव केवल बचे हुए कार्यकाल के लिए होता है।
राज्य मंत्रीमंडल एवं मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री राज्य सरकार का वास्तविक मुखिया है। उसी की सहमति/परामर्श पर मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है। राज्यपाल मंत्रियों के विभागों का विभाजन भी मुख्यमंत्री की सलाह पर ही करता है।
► मुख्यमंत्री मंत्रीमंडल की बैठकों की अध्यक्षता करता है। वह विभिन्न मंत्रालयों से समन्वय बनाता है तथा मंत्री परिषद् का मार्गदर्शन कराता है।
► राज्य सरकार के कानून तथा नीतियाँ बनाने में मुख्यमंत्री की भूमिका प्रमुख होती है। उसकी स्वीकृति से ही कोई मंत्री सदन में विधेयक प्रस्तावित करता है। वह विधानसभा के अंदर तथा बाहर दोनों जगह सरकार की नीतियों का मुख्य प्रवक्ता होता है।
► संविधान के अनुसार प्रशासन राजकीय मामले तथा प्रस्तावित विधेयकों के बारे में राज्यपाल को जानकारी देने का दायित्व मुख्यमंत्री का होता है।
► जब भी राज्यपाल चाहे तो मुख्यमंत्री को उपरोक्त विषयों से संबंधित किसी भी सूचना को राज्यपाल ग्रहण कर सकता है।
► राज्यपाल तथा मंत्रिमंडल के बीच संचार का एकमात्र सेतु मुख्यमंत्री ही है। मंत्री परिषद् द्वारा लिए गए सभी निर्णयों के बारे में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार राज्यपाल को है।
स्वास्थ्य में सरकार की भूमिका
लोकतांत्रिक देश में लोगों की सरकार से यह अपेक्षा रहती है। सरकार उनके स्वास्थ्य से संबंधित बात हो क्योंकि वर्तमान समय में स्वास्थ्य बिगड़ता ही जा रहा है और इलाज भी काफी मंहगे होते जा रहे हैं। ऐसी-ऐसी बीमारियाँ उत्पन्न हो रही हैं जिसका भारत जैसे देश में न तो इलाज सम्भव है और न ही उसकी रोकथाम के उपाय।
► बीमार से इतर उन कारणों की ओर भी हम आकर्षित होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए यदि लोगों को पीने के लिए स्वच्छ पानी और प्रदूषण मुक्त वातावरण मिले तो वे सामान्यत: स्वस्थ ही रहेंगे। दूसरी तरफ यदि लोगों को आधारभूत वस्तुओं की प्राप्ति न हो तो बीमारी की ओर ही अग्रसर होंगे और यह आने वाली पीढ़ी को भी प्रभावित करेगा।
► स्वास्थ्य से संबंधित सरकार की भूमिका है कि लोगों द्वारा जितना भी टैक्स धन के रूप में आता है उसी से वह स्वास्थ्य संबंधी चिकित्सालय स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित करती है जो मुख्य रूप से सभी के लिए उपलब्ध होते हैं। जहाँ कम पैसों में या आर्थिक रूप से गरीब नागरिकों का मुफ्त में इलाज किया जाता है।
► सरकारी स्वास्थ्य केन्द्र समय-समय पर कैम्पों का आयोजन भी करते हैं जिसमें कम दर पर अधिक से अधिक लोगों की स्वास्थ्य से संबंधित पूरी जांच की जाती है।
► भारत में विभिन्न तरह से निजी स्वास्थ्य सेवाएं भी कार्यरत हैं। इन पर सरकार का नियंत्रण नहीं होता। अधिकतर चिकित्सक अपने निजी दवाखाने चलाते हैं। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायी मिल जाते हैं।
► नगरों में बड़े-बड़े चिकित्सक जिन्होंने किसी विशेष चिकित्सा का अध्ययन किया होता है विशेषज्ञ की सेवाएं मुहैया कराते हैं। निजी रूप से नर्सिंग होम भी चलाए जाते हैं।
► काफी संख्या में परीक्षण केन्द्र भी हैं जो स्वास्थ्य से संबंधित विशिष्ट सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं। जैसे – एक्सरे, सिटी स्कैन आदि।
► सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा केन्द्रों व चिकित्सालयों की एक शृंखला है जो सरकार द्वारा चलाई जाती है। ये केन्द्र एवं चिकित्सालय परस्पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं जिससे ये शहरी व ग्रामीण दोनों क्षेत्रों को सुविधाएँ उपलब्ध कराते हैं।
► ग्राम स्तर पर स्वास्थ्य केन्द्र होता है जहाँ नर्स और ग्राम स्वास्थ्य सेवक होते हैं, इन्हें आम बीमारियों के लिए ट्रेनिंग दी जाती है। जो प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के चिकित्सकों की देखरेख में अपना कार्य करते हैं। यह एक से अधिक गांवों की जरूरतों को पूरा करते हैं।
► जिला स्तर पर जिला चिकित्सालय होता है, जो इन सभी स्वास्थ्य केन्द्रों की देखरेख में ही होता है। इसके अतिरिक्त सरकार बीमारी से जागरूक व सचेत करने के लिए विभिन्न तरह के विज्ञापनों व संक्रमण की रोकथाम के लिए नि:शुल्क दवाइयाँ उपलब्ध कराती है।

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