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अध्याय 46. राजनीतिक विज्ञान – लोकतंत्र (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 46. राजनीतिक विज्ञान – लोकतंत्र

लोकतंत्र क्या है?
लोकतंत्र को अंग्रेजी में डेमोक्रेसी (Democracy) कहते हैं जो यूनानी शब्दों से मिलकर बना है। ‘डिमॉ’ (Demo) यानी ‘जनता’ तथा ‘क्रेटिया’ (Kratia) यानी ‘शक्ति’ अथवा ‘शासन’। इस प्रकार लोकतंत्र का मतलब है ‘जनता’ का शासन अर्थात् एक ऐसी शासन-प्रणाली जिसमें सर्वोच्च सत्ता जनता के पास हो। अमेरिका के सुप्रसिद्ध राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को ”जनता का जनता द्वारा और जनता के लिए शासन“ कहा था। ले. के अनुसार ”लोकतंत्र वह शासन व्यवस्था है जिसमें हर व्यक्ति भागीदार होता है।“ लॉर्ड बाइस ने कहा है ”लोकतंत्र एक ऐसी शासन-प्रणाली का नाम है जिसमें राजसत्ता किसी एक समूचे वर्ग या किन्हीं खास वर्गों के हाथ में न होकर समूची जनता के हाथों में होती है।“ एस.ई. फाइनर के अनुसार लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ ‘जन सहमति’ पर आधारित हैं। ये वे व्यवस्थाएँ हैं जिनमें नीतियाँ जनप्रतिनिधियों के द्वारा निर्धारित की जाती हैं। इसमें जनता की व्यापक भागीदारी देखने को मिलती है।
लोकतंत्र की विशेषताएँ
लोकतंत्र की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें अंतिम फैसले की शक्ति लोगों द्वारा अपने संसद को चुने हुए प्रतिनिधियों के पास होती है उसका हस्तांतरण नहीं होता है। जनता के प्रमुख फैसले इन्हीं निर्वाचित नेताओं के हाथों में होते हैं। लोकतंत्र में लोगों के पास अपना प्रतिनिधि चुनने का विकल्प होता है तथा यह चुनाव स्वतंत्र व निष्पक्ष रूप से होते हैं। इससे सत्ताधारी को भी अपनी कमजोरियों व गलतियों का अहसास होता है। एक से अधिक प्रतिनिधियों के विकल्प होने से सभी को सत्ता पाने का अधिकार व अवसर भी मिल जाता है। लोकतंत्र में देश हर वयस्क नागरिक, जिसकी उम्र 18 वर्ष या उससे ऊपर है, वोट देने का अधिकार रखता है तथा हर वोट का समान मूल्य होता है। इस व्यवस्था में जो भी अधिकार नागरिकों को दिए जाते हैं या जो भी नियम कानूनों का निर्माण होता है वह जनता को ध्यान में रखकर ही लिया जाता था। उसे जनता का ही फैसला माना जाता है।
लोकतांत्रिक अधिकार
लोकतंत्र में अधिकार अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करते हैं।
ये अधिकार शोषित पीड़ित जनता को अपने अधिकारों के प्रति शक्ति प्राप्त कराते हैं तथा अपने शोषण से वे मुक्त हो सकें तथा अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो सकें।
► अधिकतर लोकतांत्रिक सरकारों में नागरिकों के अधिकार संविधान में लिखित रूप में दर्ज होते हैं।
► भारत के संविधान में 7 मौलिक अधिकार वर्णित हैं। यद्यपि वर्ष 1976 में 44वें संविधान संशोधन द्वारा मौलिक अधिकारों की सूची में सम्पत्ति का अधिकार हटा दिया गया था। तब से यह एक कानूनी अधिकार बन गया है। अब निम्न छ: मौलिक अधिकार हैं:
(1) समानता का अधिकार
(2) स्वतंत्रता का अधिकार
(3) शोषण के विरुद्ध अधिकार
(4) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
(5) सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार, तथा
(6) संवैधानिक उपचारों का अधिकार ये वे अधिकार हैं जो संविधान में वर्णित हैं। ये अधिकार सभी नागरिकों के शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक विकास को पूर्ण रूपेण सुनिश्चित करते हैं। मौलिक अधिकार देश में अल्पसंख्यकों के बीच में एक सुरक्षा का अहसास पैदा करते हैं। वे बहुसंख्यकों के शासन के लिए लोकतांत्रिक वैधता की रूपरेखा प्रतिस्थापित करते हैं। आधारभूत अधिकार जैसे भाषा तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बिना कोई लोकतंत्र कार्य नहीं कर सकता है।
लोकतंत्र के परिणाम
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था तानाशाही व अन्य व्यवस्थाओं से कहीं अधिक बेहतर है। इसमें नागरिकों को अपना प्रतिनिधि चुनने की स्वतंत्रता प्राप्त होती है।
► लोकतंत्र में सभी नागरिकों को समान समझा जाता है जिससे समानता को बढ़ावा मिलता है।
► लोकतंत्र से प्रत्येक व्यक्ति के गौरव और सम्मान को बढ़ावा मिलता है।
► लोकतंत्र में निर्णय लेने की ताकत जनता के हाथ में होती है जिसके परिणामस्वरूप फैसलों में सुधार आता है।
► लोकतंत्र में सत्ता को अपनी भूलें सुधारने का मौका दिया जाता है।
लोकतंत्र की चुनौतियाँ
विश्वभर में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को मुश्किल चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ये समस्याएँ साधारण नहीं हैं। अधिकतर हम उन्हीं समस्याओं को ‘चुनौती’ कहते हैं जो लाभदायक तो हैं लेकिन जिन पर जीतना आसान होता है अर्थात् किसी समस्या के भीतर ऐसी सम्भावना है कि उस समस्या का निदान मिल सके तो हम उसे चुनौती कहते हैं।
► विभिन्न देशों के सामने भिन्न-भिन्न प्रकार की चुनौतियाँ है।
► विश्व में कुछ देश ऐसे भी हैं जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था की तरह जाने या लोकतांत्रिक सरकार का गठन करने के लिए मूल आधार भी नहीं है। इनमें मौजूद तानाशाही या गैर लोकतांत्रिक शासन को गिराने की चुनौतियाँ तथा उसके स्थान पर एक सम्प्रभुता तथा कारगर शासन स्थापित करने की चुनौती भी है।
► लोकतंत्र की अंतिम चुनौती है उसे अपनी शासन व्यवस्था को मज़बूत रखने की चुनौती। इसमें लोकतंत्र से जुड़ी समस्त संस्थाओं व उनके व्यवहारों को मज़बूत बनाना शामिल है जिससे लोग अपनी उम्मीदों को भी पूरा कर सकें।
राजनीतिक सुधारों पर विचार
प्रत्येक समस्या के साथ उसके समाधान भी जुड़े होते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था की भिन्न-भिन्न चुनौतियों से संबंधित सभी हाल या प्रस्ताव ‘लोकतांत्रिक सुधार’ या ‘राजनीतिक सुधार’ कहे जाते हैं।
► कानूनों में परिवर्तन करने से पहले राजनीति पर उसके कुप्रभावों से बचने का तरीका ढूंढ़ना होगा क्योंकि कई बार परिणाम विपरीत दिशा की ओर चले जाते हैं। जैसे – कुछ राज्यों ने दो से अधिक संतान वाले लोगों के पंचायती चुनाव करने पर प्रतिबंध लगा दिया है जिसका परिणाम यह हुआ कि अधिकतर गरीब लोग और विशेष रूप से महिलाएँ लोकतांत्रिक अवसरों से वंचित हुईं जबकि ऐसा करने के पीछे उनका कोई हाथ नहीं था।
► भारत के संदर्भ में लोकतंत्र के कुछ विस्तृत दिशा-निर्देश हैं जिससे इन समस्याओं के समाधान ढूंढ़ते वक्त उन्हें अपने ध्यान में रखना होता है।
► सबसे अच्छे कानून वह हैं जो लोगों में लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुधार लाने की शक्ति देते हैं। जैसे – सूचना का अधिकार जो देश को भ्रष्टाचार से तो मुक्ति दिलाता ही है साथ ही उन्हें कानून का एक अच्छा ज्ञाता भी बनाता है।
► मुख्य रूप से राजनीतिक दल ही लोकतांत्रिक सुधार कार्य करते हैं। राजनीतिक सुधारों का सीधा उद्देश्य लोकतांत्रिक शासन को अधिक बल प्रदान करना होना चाहिए ताकि सामान्य नागरिक की राजनीतिक भागीदारी में, गुणवत्ता में उसका पूर्ण सहयोग होता या नहीं।
► राजनीतिक सुधार के लिए यह पहले से ही सोचकर रखना चाहिए कि इस प्रस्ताव को कौन पारित करेगा और क्यों? इन्हें लागू किया जाएगा? इस बात में कोई समझदारी नजर नहीं आती कि संसद ऐसा कोई कानून बनाएगी जो हर राजनीतिक दल या सांसद के हितों के विरुद्ध हो। किंतु लोकतांत्रिक आंदोलन नागरिकों का संगठन तथा मीडिया पर विश्वास करने वाले तरीकों के सफल होने की आशंका की जाती है।

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