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अध्याय 45. राजनीतिक विज्ञान – स्थानीय सरकार (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 45. राजनीतिक विज्ञान – स्थानीय सरकार

परिचय
जन प्रशासन का वह रूप जो किसी राज्य या राष्ट्र की सबसे निचली श्रेणी की प्रशासनिक इकाई होती है, उसे स्थानीय सरकार कहा जाता है। स्थानीय सरकार के पास संवैधानिक रूप से या विधेयकों द्वारा प्राप्त अधिकार होता है। भारत की 70 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या गाँवों में निवास करती है। यही कारण है कि ग्रामीण स्तर पर स्वशासन विशेष महत्व रखता है। जब शासन के सभी स्तरों पर जनता की भागीदारी सुनिश्चित हो, तभी लोकतंत्र की वास्तविक सफलता मानी जाती है। वर्ष 1882 में लार्ड रिपन के शासन के समय में स्थानीय लोगों को सम्मिलित किया गया। उसके द्वारा जिला बोर्डों की स्थापना की गई। स्थानीय सरकार द्वारा शासन व्यवस्था निचले स्तर तक लोकतांत्रिक बनती है। स्थानीय स्वशासन में स्थानीय लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि वह स्थानीय समस्याओं को अच्छे रूप से समझ सकते हैं। साथ ही साथ उस समस्या का निदान भी अच्छी तरह से कर सकते हैं। केंद्र या राज्य सरकार के लिए तत्काल समस्या का निदान करना संभव नहीं हो पाता है। इसके लिए स्थानीय सरकार ही कार्य करती है।
पंचायती राज
भारत का विकास गाँव के विकास पर निर्भर करता है। महात्मा गाँधी के अनुसार यदि गाँव नष्ट होता है तो भारत का भी अस्तित्व नहीं बचेगा। अनुच्छेद 40 के अंतर्गत पंचायती राज व्यवस्था को राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांतों के अंतर्गत रखा गया है। पंचायती राज में शासन के प्रत्येक स्तर पर स्थानीय जनता कार्य करे और इस कार्य के लिए स्वयं जिम्मेवार हो यह सुनिश्चित करना होता है। भारतीय संसद के द्वारा 1992 में संविधान में 73वां एवं 74वां संशोधन किया गया।
73वें संशोधन में पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया गया और 74वें संशोधन में नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
पंचायती राज से संबंधित समितियाँ
बलवंत राय मेहता समिति
बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई। समिति का गठन 1957 में हुआ। इसने अपनी रिपोर्ट 1958 में प्रस्तुत की। इस समिति ने लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के सिद्धांत पर आधारित त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का सुझाव प्रदान किया। त्रिस्तरीय व्यवस्था के अन्तर्गत गाँव स्तर पर ग्राम पंचायत, प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद् का गठन करने का सुझाव दिया गया। इस समिति ने लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को प्रमुख माना जिससे लोगों में उत्तरदायित्व की भावना का विकास हो सके। राजस्थान के नागौर जिले में 2 अक्टूबर 1959 को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के द्वारा प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण की योजना को सर्वप्रथम शुरू किया गया।
अशोक मेहता समिति
अशोक मेहता समिति का गठन पंचायती राज संस्थाओं पर विचार करने एवं पंचायती राज को और अधिक मजबूत बनाने के लिए 1977
में किया गया। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट 1978 में प्रस्तुत की। इस समिति ने पंचायती राज को दो भागों में बांटने का सुझाव प्रस्तुत किया। ”मंडल पंचायत“ निचले स्तर के प्रशासन के लिए और ”जिला परिषद्“ जिला स्तर के प्रशासन के लिए। राजनीतिक अस्थिरता के कारण देश में अशोक मेहता समिति को लागू नहीं किया गया।
डॉ. पी.वी.के. राव समिति
इस समिति का गठन 1985 में हुआ। इसके अध्यक्ष डॉ. पी.वी.के. राव थे। इस समिति का गठन ग्रामीण विकास के लिए प्रशासनिक समायोजन एवं गरीबी निवारण के उन्मूलन के लिए किया गया था। इस समिति ने ग्राम स्तर पर ग्राम सभा, मंडल स्तर पर मंडल पंचायत, जिला स्तर पर जिला परिषद् और राज्य के लिए राज्य विकास परिषद् की स्थापना करने का सुझाव दिया।
डॉ. एल.एम. सिंघवी समिति
यह समिति 1986 में गठित की गई। इसके अध्यक्ष एल.एम. सिंघवी थे। इस समिति के द्वारा लोकतंत्र एवं विकास के लिए पंचायती राज संस्थाओं का पुनर्शक्तिकरण करने की सिफारिश की गई थी।
पंचायती राज का त्रिस्तरीय भाग
1. ग्राम पंचायत: ग्राम पंचायत पंचायती राज व्यवस्था में सबसे निचले स्तर पर होता है। ग्राम सभा में एक गाँव या कई छोटे-छोटे गाँव सम्मिलित होते हैं। इसका सदस्य होने के लिए कम से कम 18 वर्ष की आयु होनी चाहिए। ग्राम सभा के द्वारा ग्राम पंचायत की प्रशासनिक कार्यवाही होती है। इसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। सभी वयस्क व्यक्ति ग्राम सभा के अलग-अलग चुनाव क्षेत्रों में बंटवारा होने की स्थिति में अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित तिथि को मतदान करते हैं। इस सभा द्वारा वार्षिक बजट पास किया जाता है। सभा में निर्धारित किया जाता है कि अगले वित्तीय वर्षों में उपज कितनी होगी। सभा में ग्रामीण विकास की योजना बनाई जाती है। ग्राम पंचायत की प्रत्येक महीने में एक बैठक होती है जिसका अध्यक्ष सरपंच होता है। बैठक में बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाता है। सामुदायिक केंद्र उपयोग के बदले प्राप्त किराया एवं न्याय पंचायत द्वारा लगाया गया जुर्माना पंचायतों की आय का मुख्य श्रोत है।
2. पंचायत समिति: पंचायती राज व्यवस्था में प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति होती है। विकास पदाधिकारी इसका सचिव होता है। इसका अध्यक्ष निर्वाचित किया जाता है। प्रखंड और ग्राम पंचायत के बीच सामंजस्य स्थापित करना एवं विकास के कार्यों को सुचारू रूप से चलाना पंचायत समिति का कार्य है। पंचायत समिति का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है। इसके पहली बैठक से अगले पांच वर्षों की कार्यावधि होती है। पंचायत समिति, ग्राम पंचायत और जिला परिषद् के बीच डोर का काम करती है।
यह ग्राम पंचायत के द्वारा तैयार की गई सभी योजनाओं को संग्रहीत करती है तथा उसका वित्तीय समावेशन, समाज कल्याण और क्षेत्र विकास को ध्यान में रखते हुए योजना शुरू करती है।
3. जिला परिषद्: पंचायती राज व्यवस्था में जिला परिषद् सबसे शीर्षस्थ संस्था है। जनता के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से इसके सदस्यों का चुनाव किया जाता है। ग्राम पंचायतों और पंचायत समितियों की नीति निर्धारण एवं मार्गदर्शन जिला परिषद् के द्वारा किया जाता है। जिला परिषद् का निर्वाचन क्षेत्र होता है जिसमें लगभग 50,000 आबादी अपने मताधिकार का प्रयोग करती है। एक प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधि का चुनाव किया जाता है। जिला परिषद् का कार्यकाल 5 वर्षों के लिए होता है। इसके निर्वाचित सदस्यों में से अपने दो सदस्यों को अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के पद पर चुनती है। इसकी एक महीने में बैठक कराना अनिवार्य है। पंचायती राज व्यवस्था के तीनों अभिन्न अंग अर्थात् ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद् एक दूसरे के पूरक हैं। विकास के कार्यों में पंचायती राज संस्थाओं के बीच आपसी संबंध के अनुरूप लक्ष्य ”गांधी का सपना ग्राम स्वराज हो“ तक पहुंचाना है।
नगरीय स्थानीय प्रशासन
1. नगर निगम: नगर निगम एक स्थानीय सरकार के रूप में दो लाख या उससे अधिक के एक शहर की देख-रेख करता है। नगर की देखभाल करने वाला नगर निगम कहलाता है। नगर निगम के नागरिक प्रतिनिधियों के चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। नगर निगम के लिए सभासद (Councilor) की संख्या सरकार निर्धारित करती है। सभासद बनने के लिए जरूरी है कि वह व्यक्ति किसी भी तरह के लाभ के पद पर न हो। सार्वजनिक सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सार्वजनिक शिक्षा, सार्वजनिक सुविधाएँ इत्यादि नगर निगम के कार्य हैं। नगर निगम को आय की प्राप्ति चुंगी, पानी एवं बिजली कर, सफाई पर कर, शिक्षा शुल्क, मनोरंजन कर इत्यादि से होती है।
2. नगर पालिका: नगर पालिका एक शहर या कस्बे के रूप में होता है। इसमें महापौर मुख्य प्रशासनिक अधिकारी होते हैं। नगरपालिका में 20 हजार या उससे अधिक परंतु तीन लाख से कम आबादी होनी चाहिए। यदि आबादी तीन लाख से ज्यादा है तो उसे नगर निगम माना जाएगा। इसके अधिकतर सदस्यों को नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग कर चुनते हैं। नगर पालिका का कार्यकाल पांच वर्षों के लिए होता है। प्रत्येक व्यक्ति जो राज्य विधानसभा की सदस्यता ग्रहण करने की योग्यता रखते हैं, वे सभी नगर पालिका सदस्य बन सकते हैं परंतु दोनों के बीच एक भिन्नता पाई जाती है। विधानसभा की सदस्यता के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष होनी चाहिए जबकि नगर पालिका सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष होनी चाहिए। नगर पालिका नगर की स्वास्थ्य रक्षा के लिए सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण करती है और साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देती है।

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