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अध्याय 40. भूगोल – आवास, परिवहन एवं संचार (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 40. भूगोल – आवास, परिवहन एवं संचार

आवास की अवधारणा
बस्तिया
बस्तियाँ वे स्थान हैं जहाँ लोग अपने लिए घर बनाते हैं। प्रारंभ में मनुष्य वृक्षों एवं गुफाओं में निवास करते थे। जब उन्होंने फसलें उगाना आरम्भ किया, तो उनके लिए एक जगह स्थायी घर बनाना आवश्यक हो गया। बस्तियों का विकास नदी घाटियों के निकट हुआ, क्योंकि वहाँ पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध था एवं भूमि उपजाऊ थी। व्यापार, वाणिज्य एवं विनिर्माण के विकास के साथ ही मानव बस्तियाँ बड़ी होती गईं। नदी घाटी के निकट बस्तियों एवं सभ्यता का विकास होना शुरू हो गया। बस्तियाँ, स्थायी या अस्थायी हो सकती हैं। जो बस्तियाँ कुछ समय के लिए बनाई जाती हैं, उन्हें अस्थायी बस्तियाँ कहते हैं। घने जंगलों, गर्म एवं ठण्डे रेगिस्तानों तथा पर्वतों के निवासी अक्सर अस्थायी बस्तियों में रहते हैं। वे आखेट, संग्रहण स्थानान्तरी कृषि एवं ऋतु-प्रवास करते हैं। अधिकांश बस्तियाँ आज स्थायी बस्तियाँ हैं। इन बस्तियों में लोग रहने के लिए घर बनाते हैं। वे स्थान जहाँ भवन तथा बस्तियाँ विकसित होती हैं उसे बसाव स्थान कहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग पर्यावरण के अनुकूल घर बनाते हैं। अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में ढाल वाली छत बनाते हैं। गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में मिट्टी की मोटी दीवार वाले घर पाये जाते हैं जिनकी छतें फूस की बनी होती हैं। नगरीय बस्तियों में नगर छोटे एवं शहरों में बड़ी बस्तियाँ होती हैं। नगरीय क्षेत्रों में लोग निर्माण, व्यापार एवं सेवा क्षेत्रों में कार्यरत होते हैं।
परिवहन के स्वरूप एवं सुविधाएँ
परिवहन लोगों एवं सामान के आवागमन के साधन होते हैं। पुराने समय में अधिक दूरी की यात्रा करने में अत्यधिक समय लगता था। उस समय लोग पैदल चलते थे एवं अपने सामान को ढोने के लिए पशुओं का उपयोग करते थे। पहिए की खोज से परिवहन आसान हो गया। परिवहन की निम्न सुविधाएँ हैं-
(i) सामान को एक जगह से दूसरी जगह आसानी से पहुँचाया जा सकता है।
(ii) सामान की सीमा पहले कम थी लेकिन अब यह बढ़कर एक शहर से दूसरे शहर हो चुकी है।
(iii) परिवहन द्वारा समय की बचत हुई है जिसे कम समय में ज्यादा दूरी तक पहुँचाया जा सकता है।
सड़क मार्गों की स्थिति
कम दूरी के यातायात के लिए सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला मार्ग सड़क हैं। सड़के पक्की एवं कच्ची हो सकती हैं। मैदानी क्षेत्रों में सड़कों का घना जाल बिछा है। मरुस्थलों, वनों एवं ऊँचे पर्वतों जैसे स्थानों पर भी सड़कें बनी हुई हैं। हिमालय पर्वत पर मनाली लेह मार्ग विश्व के सबसे ऊँचे सड़क मार्गों में से एक है। भूमिगत सड़कों को भूमिगत मार्ग (सब-वे) कहते हैं।
फ्लाई-ओवर, उत्थित संरचनाओं के ऊपर बनाए जाते हैं। किसी क्षेत्र में प्रति सौ वर्ग किमी में सड़कों की लम्बाई को सड़क घनत्व कहा जाता है। देश में सड़कों का वितरण एक समान नहीं है। इनका घनत्व जम्मू-कश्मीर में 10 किमी. प्रति सौ वर्ग किमी. से केवल में 375 किमी. प्रति सौ वर्ग किमी. तक है। भारत में सड़कों की सक्षमता के आधार पर इन्हें निम्न छ: वर्गों में वर्गीकृत किया गया है:
स्वर्णिम चतुर्भुज महा राजमार्ग
यह दिल्ली-कोलकाता, चेन्नई-मुम्बई व दिल्ली को जोड़ने वाली छह लेन वाला महा राजमार्गों की सड़क परियोजना है। यह राजमार्ग परियोजना भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के अधिकार क्षेत्र में है।
राष्ट्रीय राजमार्ग
राष्ट्रीय राजमार्ग देश के दूरस्थ भागों को जोड़ते हैं। ये प्राथमिक सड़क तंत्र है जिनका निर्माण एवं रख-रखाव केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिकार क्षेत्र में है। दिल्ली-अमृतसर के मध्य ऐतिहासिक शेरशाह सूरी मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-1 के नाम से जाना जाता है। राष्ट्रीय राजमार्ग-7, देश का सर्वाधिक लम्बा राजमार्ग है जिसकी लम्बाई 2369 किमी. है। यह वाराणसी से कन्याकुमारी को जोड़ता है।
राज्य राजमार्ग
राज्यों की राजधानियों को जिला मुख्यालयों से जोड़ने वाली सड़कें राज्य राजमार्ग कहलाती हैं। राज्य तथा केन्द्र शासित क्षेत्रों में इनकी व्यवस्था एवं निर्माण का दायित्व राज्य के सार्वजनिक निर्माण विभाग
(PWD) का होता है।
जिला मार्ग
ये सड़कें जिले के विभिन्न प्रशासनिक केन्द्रों को जिला मुख्यालय से जोड़ती हैं। इन सड़कों की व्यवस्था का उत्तरदायित्व जिला परिषद् का होता है।
अन्य सड़कें
इस वर्ग के अंतर्गत वे सड़कें आती हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों तथा गांवों को शहरों से जोड़ती हैं। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क परियोजना से सड़कों के विकास कों प्रोत्साहन मिला है।
रेलमार्गों की स्थिति
रेलमार्ग तीव्रता से एवं कम खर्च में लोगों के आवागमन को सुनिश्चित करता है एवं इसका उपयोग भारी सामान को ढोने के लिए भी किया जाता है। भारत में रेल परिवहन, वस्तुओं तथा यात्रियों के परिवहन का प्रमुख साधन है। रेल परिवहन अनेक कार्यों जैसे- व्यापार, भ्रमण, तीर्थ यात्रा व लम्बी दूरी तक सामान के परिवहन आदि में सहायक है। पिछले 150 वर्षों से भी अधिक समय में भारतीय रेल एक महत्वपूर्ण समन्वयक के रूप में भी जानी जाती है। भारतीय रेलवे देश की अर्थव्यवस्था, उद्योगों व कृषि की तीव्र गति के विकास के लिए उत्तरदायी है। मैदानी भागों में रेलमार्गों का जाल व्यापक रूप से फैला है। उन्नत प्रौद्योगिकी कौशल से दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में भी रेलमार्ग बनाना सम्भव हो गया है। लेकिन इनकी संख्या काफी कम है। ट्रांस साइबेरियन रेलमार्ग विश्व में सबसे लम्बा रेलमार्ग है, जो पश्चिमी रूस के सेंट पीटर्सबर्ग से प्रशांत महासागरीय तट तक विस्तृत है।
जलमार्गों की स्थिति
अधिक दूरी में भारी एवं बड़े आकार वाले सामानों को ढोने के लिए जलमार्ग सबसे सस्ता साधन है। ये मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं- अन्तर्देशीय जलमार्ग एवं समुद्री मार्ग। नाव्य नदियों एवं झीलों का उपयोग अन्तर्देशीय जलमार्ग के लिए होता है। कुछ महत्वपूर्ण अन्तर्देशीय जलमार्ग निम्न हैं- गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तन्त्र, उत्तरी अमेरिका में ग्रेट लेक एवं अफ्रीका में नील नदी। हल्दिया तथा इलाहाबाद के मध्य गंगा जलमार्ग जो 1620 किमीलम्बा है। यह नौगम्य जलमार्ग संख्या-1 है। सदिया व झाबुरी के मध्य 891 किमी. लम्बा ब्रह्मपुत्र नदी जलमार्ग जो नौगम्य जलमार्ग संख्या-2 है। केरल में पश्चिमी तटीय शहर (कोयकारपुरम से कोम्मान तक, उद्योग मण्डल तथा चम्पक्कारा नहरें 205 किमी.) नौगम्य जलमार्ग संख्या-3
है। विदेशी व्यापार भारतीय तट पर स्थित पत्तनों द्वारा किया जाता है। देश का 95 प्रतिशत व्यापार (मुद्रा रूप में 68 प्रतिशत) समुद्रों द्वारा ही होता है।
भारत के प्रमुख बंदरगाह
(i) मुम्बई: यह प्राकृतिक बंदरगाह है। देश का 25 प्रतिशत से अधिक व्यापार का संचालन इस बंदरगाह से होता है। इसके अंतर्गत आयातित वस्तुओं में पेट्रोलियम, रसायन, रासायनिक खाद, नमक, कागज तथा मशीनें इत्यादि शामिल हैं।
(ii) कांडला: यह प्राकृतिक पोताश्रय 1955 में निर्मित हुआ था। यहाँ से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में कपास, सूती वस्त्र, मशीनें, उर्वरक, पेट्रोल, गंधक, पोटाश, फास्फेट एवं लम्बे रेशे की कपास आदि है।
(iii) कोलकाता: यह सम्पूर्ण भारत में द्वितीय वृहतम बंदरगाह है। विदेशी व्यापार के मामले में इसका चौथा (11 प्रतिशत) स्थान है।
(iv) चेन्नई: यह कृत्रिम पोताश्रय है, जो तमिलनाडु राज्य में स्थित है।
यहाँ से निर्यात की जाने वाली वस्तुओ में मूँगफली, कहवा, तम्बाकू आदि प्रमुख है।
(v) विशाखापट्टनम: यह आन्ध्र प्रदेश के पूर्वी तट के किनारे स्थित है। यह प्राकृतिक पोताश्रय है।
(vi) मर्युगाओ: गोवा राज्य में अरब सागर तट के सहारे स्थित है, जो पूर्णतया प्राकृतिक पोताश्रय है।
(vii) नया मंगलौर: यह गोवा एवं कोच्चि के बींचो बीच स्थित है। सम्पूर्ण राष्ट्र का 6 प्रतिशत व्यापार इस बंदरगाह से होता है।
(viii) कोच्चि: यह भारत के पश्चिमी तट पर केरल में है। यहाँ प्राकृतिक पोताश्रय है तथा बड़े जलयान भी ठहर सकते हैं।
वायुमार्ग
20वीं सदी के आरम्भ में विकसित यह परिवहन का सबसे तीव्र मार्ग है। ईंधन की लागत अधिक होने के कारण यह सर्वाधिक महंगा है। वायु-यातायात खराब मौसम, जैसे – कोहरे एवं तूफान से प्रभावित होता है। यह यातायात का अकेला साधन है जो सर्वाधिक दुर्गम एवं दुरुह स्थानों तक पहुँच सकता है। विशेष रूप से जहाँ सड़क एवं रेलमार्ग नहीं है। कुछ महत्वपूर्ण हवाई पत्तन दिल्ली, मुम्बई, न्यूयॉर्क, लन्दन, पेरिस हैं। भारत में सन् 1953 में वायु परिवहन का राष्ट्रीयकरण किया गया था।
एयर इण्डिया अन्तर्राष्ट्रीय वायु सेवाएँ प्रदान करती है। व्यावहारिक तौर पर इण्डियन एयरलाइन्स, एलाइन्स एयर तथा कई निजी एयरलाइन्स घरेलू सेवाएँ उपलब्ध कराती हैं।
पाइपलाइन
भारत के परिवहन मानचित्र पर पाइपलाइन एक नया परिवहन का नाम है। पहले पाइपलाइन का उपयोग शहरों व उद्योगों में पानी पहुँचाने हेतु होता था। आज इसका प्रयोग कच्चा तेल, पेट्रोल उत्पाद तथा तेल से प्राप्त प्राकृतिक तथा गैस क्षेत्र में उपलब्ध गैस शोधन शलाओं उर्वरक, कारखानों व बड़े ताप विद्युत गृहों तक पहुँचाने में किया जाता है। ऊपरी असम के तेल क्षेत्रों से यह गुवाहाटी, बरौनी व इलाहाबाद के रास्ते कानपुर तक आती है। गुजरात में सलामा से वीरमगांव, मथुरा, दिल्ली व सोनीपत के रास्ते पंजाब में जालंधर तक आती है। गैस पाइपलाइन गुजरात में हजीरा को उत्तर प्रदेश के जगदीशपुर से मिलाती है। यह मध्य प्रदेश के विजयपुर के रास्ते होकर जाती है।
संचार की अवधारणा एवं प्रकार
संचार दूसरों के पास एक सूचना पहुँचाने की प्रक्रिया है। तकनीकी विकास के साथ मानव ने संचार के नए एवं तीव्र साधनों को विकसित कर लिया है। संचार के क्षेत्र में विकास से विश्व में सूचना क्रान्ति आई है। सूचना प्रदान करने के लिए शिक्षा तथा मनोरंजन के लिए संचार के विभिन्न साधनों का उपयोग होता है। समाचार-पत्रों, रेडियो एवं टेलीविजन के द्वारा हम बड़ी संख्या में लोगों के साथ संचार कर सकते हैं। इसलिए इनको जनसम्पर्क माध्यम भी कहते हैं। सैटेलाइट से संचार में तीव्रता आई है। तेल की खोज, वनों का सर्वेक्षण, भूमिगत जल, खनिज सम्पदा, मौसम पूर्वानुमान एवं आपदा पूर्व चेतावनी आदि में सैटेलाइट सहायक होती है। आज सेल्युलर फोन के द्वारा बेतार टेलिफोनिक संचार अत्यधिक लोकप्रिय हो चुका है। इन्टरनेट के माध्यम से विश्वभर में केवल सूचना एवं परस्पर समीपता ही नहीं मिलती, अपितु इनसे हमारा जीवन सुखमय भी बन गया है। अब हम घर बैठे ही रेल, हवाई जहाज एवं सिनेमा या होटल तक के लिए टिकट आरक्षित करवा सकते हैं। संचार के निम्नलिखित माध्यम हैं:
► दूरदर्शन
► रेडियो
► समाचार-पत्र
► प्रेस
► सिनेमा
► टेलीफोन
► इंटरनेट
► टेलीविजन

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