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अध्याय 4 समाजीकरण की प्रक्रिया (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 4 समाजीकरण की प्रक्रिया

समाजीकरण की अवधारणाएँ

► प्रत्येक व्यक्ति या बच्चा सामाजिक प्राणी के रूप में समाज में रहता है और समाज में स्वीकृति अथवा मान्यता प्राप्त करना चाहता है। एक व्यक्ति समाज के मानक रूपों के अनुसार व्यवहार करने का प्रयास करता है ताकि दूसरों के साथ सामंजस्य स्थापित कर सके। इस पूरी प्रक्रिया को हम समाजीकरण कहते हैं। सामाजिक संपर्क से एक बच्चे के सीखने की क्षमता का विकास होता है। जैसे शिक्षार्थियों में भाशा का प्रयोग करने की क्षमता होती है जो कि समाज के संपर्क में आने के बाद ही व्यावहारिक रूप लेती है।
► समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा ही शिक्षार्थी रीति-रिवाजों, प्रथाओं, मूल्यों, विश्वासों, संस्कृतियों एवं सामाजिक गुणों को सीखता है। इसके द्वारा संस्कृति का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरण संभव होता है। इस प्रक्रिया द्वारा शिक्षार्थियों के व्यवहार को नियंत्रित तथा अनुशासित किया जाता है। सामाजिक व सांस्कृतिक परम्पराओं के स्थानांतरण की प्रक्रिया को समाजीकरण कहते हैं। यह स्थानांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक होता है, जिसमें संचार की भूमिका महत्वपूर्ण होती हैं।
► सामाजिक निरंतरता को बनाए तथा बचाए रखने के लिए संचार की विभिन्न क्रियाओं का ज्ञान होना अनिवार्य है। इसकी अनिवार्यता का अनुमान बड़ी ही आसानी से लगाया जा सकता है, क्योंकि समाजीकरण की प्रत्येक क्रिया संचार पर ही निर्भर हैं। उदाहरणार्थ, मानव संचार की मदद से जैसे-जैसे सांस्कृतिक अभिवृत्तियों, मूल्यों और व्यवहारों को करता जाता है, वैसे-वैसे सामाजिक प्राणी बनता जाता है।
► सामाजिक सम्बन्धों के लिए पारस्परिक जागरूकता का होना जरूरी है। पानी-गिलास, कलम-दवात, पंखा-बिजली के बीच सम्बन्ध होता है, लेकिन उसे सामाजिक सम्बन्ध नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि इनके बीच मानसिक जागरूकता का अभाव होता है। अत: मानसिक जागरूकता के अभाव में सामाजिक सम्बन्धों का निर्माण संभव नहीं है।
► शिक्षार्थी में बुद्धि, तर्क, भाषा, अभिव्यक्ति, संस्कृति इत्यादि के रूप में कई नैसर्गिक गुणों का समावेश होता है। जिनकी मदद से वह भौतिक माध्यमों द्वारा सम्प्रेषित संदेशों का मूल्यांकन करता है। संचार की विभिन्न विधाएँ समाजीकरण के साथ-साथ सामाजिक निरंतरता को बनाये रखने का कार्य करती हैं।

समाजीकरण की अवधारणा संबंधी परिभाषाएँ

ए. डब्ल्यू. ग्रीन (A.W.Green) के अनुसार, समाजीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा एक बच्चा या शिक्षार्थी सांस्कृतिक विशेषताओं, आत्मपन और व्यक्तिव को अपनाता है।
हरलॉक (Hurlock) के अनुसार, समाजीकरण की प्रक्रिया से तात्पर्य है कि कोई शिक्षार्थी किसी समूह का क्रियाशील सदस्य बनता है, समूह की कार्यविधियों में समन्वय स्थापित करता है तथा उसकी परम्पराओं को ध्यान रखता है। इसके साथ ही वह सामाजिक परिस्थितियों से अनुकूलन करके अपने साथियों के प्रति सहनशक्ति की भावना विकसित करता है।
किम्बाल यंग (Kimball young) के अनुसार, समाजीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में प्रवेश करता तथा समाज के विभिन्न समूहों का सदस्य बनता है और जिसके द्वारा उसे समाज के मूल्यों और मानकों को स्वीकार करने की प्रेरणा मिलती है।
सोरेनसन (Sorensen) ने समाजीकरण के तीन तत्वों को आवश्यक बतलाया हैं। पहला- अंत:क्रिया, दूसरा- भावनात्मक स्वीकृति और तीसरा- संचार एवं भाषा। दूसरे व्यक्तियों के साथ अंत:क्रिया के दौरान शिक्षार्थी सही व्यवहार करना सीखता है। वह यह भी सीखता है कि किस प्रकार के व्यवहारों को समाज द्वारा स्वीकृति प्राप्त है और किस प्रकार के व्यवहार प्रतिबंधित हैं। इस दौरान वह अपने अधिकारों, दायित्वों तथा कर्तव्यों को भी सीखता है।
समाजीकरण के सिद्धांत
► व्यवहारवादी परस्पर क्रियावादी सिद्धांत: जार्ज सी. होम्नस
(George C. Homans) ने यह सिद्धांत दिया था। होम्स के अनुसार, ‘अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष प्रशिक्षण के फलस्वरूप व्यक्ति में होने वाले परिवर्तन को समाजीकरण कहते हैं।’ समाजीकरण की प्रक्रिया में यह महत्वपूर्ण नहीं है कि व्यक्ति या शिक्षार्थी कैसे सीखता है या क्या सीखता है? इस सिद्धांत के अनुसार, महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षार्थी सीखने के बाद क्या करता है अर्थात् समाजीकरण किस प्रकार से होता है?
प्रतीकात्मक व्यक्तिपरक सिद्धांत: सोरोकिन (Sorokin), जार्ज मीड (George Mead) तथा कूले (Cooley) ने यह सिद्धांत दिया था। इस सिद्धांत के अनुसार, मूल्यों, सांस्कृतिक अर्थों, प्रतिमानों आदि को सीखने की प्रक्रिया को समाजीकरण कहते हैं। एक शिक्षार्थी इस प्रक्रिया के अनुरूप ही सामाजीकरण सीखता है।
प्रतीकात्मक परस्पर क्रियात्मक सिद्धांत: मर्टन (Merton) एवं टालकोट पारसन्स (Talcott parsons) ने यह सिद्धांत दिया था। इस सिद्धांत के अनुसार, किसी व्यक्ति तथा सामाजिक परिस्थितियों से चलने वाली पारस्परिक क्रिया को सामाजीकरण कहते हैं। एक व्यक्ति या शिक्षार्थी समाजीकरण द्वारा सामाजिक मूल्यों को अपने व्यक्तित्व का अंग बना लेता है।
समाजीकरण की विशेषताएँ
एक शिक्षार्थी खेल द्वारा समूह में सामाजिक प्रतिक्रियाएँ करता है।
► सामाजिक विकास का पहला चरण सामाजिक प्रतिक्रियाएँ होती हैं। शिक्षार्थी इसके द्वारा अपने विचारों का आदान-प्रदान करता है।
► आपसी सहयोग से समाज में बड़े से बड़ा काम पूरा किया जाता है।
► शिक्षार्थी समाज में अपने पास-पड़ोस एवं सहपाठियों के साथ प्रतिस्पर्धा करना सीखता है।
► समाज में रहकर आपसी सहयोग तथा सहानुभूति जैसे व्यवहारों का विकास होता है।
► शिक्षार्थी निशेधात्मक अर्थात् मना करने की स्थिति में तर्क करने लगते हैं। वे ऐसा अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए करते हैं।
► शिक्षार्थियों में अहं (Ego) की भावना सामाजिक विकास द्वारा विकसित होती है।

शिक्षार्थी की अलग-अलग अवस्थाओं में समाजीकरण की प्रक्रिया

एक शिक्षार्थी का सामाजिक विकास उसके जीवनकाल में अलग-अलग ढंग से होता है। सामाजिक विकास का यह क्रम निम्न प्रकार से है:
शिशुकाल में सामाजिक विकास
हरलॉक के अनुसार, ‘शिशुकाल में शिशु अपने अभिभावक पर निर्भर होता है। उसमें दोस्ती एवं सहयोग, सामाजिक स्वीकृति, स्पर्धा तथा आत्मकेंद्रित होने की भावना रहती है। यह भावनाएँ क्रमश: इस प्रकार से बढ़ती हैं: 1 महीना – शिशु, ध्वनियों में अंतर समझने लगता है।
2 महीना – शिशु, ध्वनियों तथा व्यक्तियों का स्वागत मुस्कान के साथ करने लगता है।
3 महीना – शिशु, अपनी माँ को पहचानने लगता है साथ ही वह उससे दूर होने पर दु:खी हो जाता है।
4 महीना – शिशु, व्यक्तियों को पहचानने लगता है।
5 महीना – शिशु, प्यार या क्रोध की आवाज समझने लगता है।
6 एवं 7 महीना – शिशु, परिचितों का स्वागत मुस्कान के साथ करने लगता है।
8 से 9 महीना – शिशु, अपनी परछाई के साथ खेलने लगता है।
24 महीना – शिशु, बड़ों जैसा काम करना चाहता है।
बाल्यकाल में सामाजिक विकास
► हरलॉक के अनुसार, बाल्यकाल में शिक्षार्थियों में दूसरों से स्नेह की अपेक्षा, सहयोग की भावना, पसंदीदा कामों में रूचि, दोस्तों का चुनाव, सामाजिक सूझ और आदतों का विकास देखने को मिलता है। इस काल में बच्चा विद्यालय में प्रवेश लेता है और नये परिवेश के साथ खुद को समायोजित करना सीखता है। समायोजन करने के बाद शिक्षार्थी के व्यवहार में विकास देखने को मिलता है। इसके परिणामस्वरूप उसमें जिम्मेदारी, सहायता एवं स्वतंत्रता जैसे गुण आने लगते हैं।
► शिक्षार्थी विद्यालय में किसी ना किसी समूह का सदस्य बनता है और समूह के अनुसार व्यवहार करना सीखता है। इससे शिक्षार्थी में कई सामाजिक गुणों का विकास होता है।
किशोरावस्था में सामाजिक विकास
► क्रो एवं क्रो के अनुसार, 13 से 14 वर्श में सामाजिक संबंधों में परिवर्तनों के कारण दूसरों के प्रति शिक्षार्थी का दृश्टिकोण बदलने लगता है। शिक्षार्थी अपने स्वभाव के अनुसार समूह बनाते हैं और एक-दूसरे के प्रति आकर्शित होते हैं।
► कुछ शिक्षार्थी समूह के बजाए अकेले रहना पसंद करते हैं या किसी एक सहपाठी के साथ ही रहते हैं।
► समूह में रहने की वजह से उनमें नेतृत्व, उत्साह, सहानुभूति, सदभावना जैसे सामाजिक गुणों का विकास होता है।
► इस अवस्था में शिक्षार्थी का अपने अभिभावक से किसी ना किसी मुद्दे पर मतभेद हो जाता है।

समाजीकरण के तत्त्व

पियाजे के अनुसार, ‘किसी शिक्षार्थी के सामाजीकरण में उसके परिवेश एवं वातावरण का मुख्य योगदान होता है।’ समाजीकरण की प्रक्रिया के महत्वपूर्ण तत्व या कारक निम्नलिखित प्रकार से हैं:
स्कूल: किसी शिक्षार्थी का समाजीकरण परिवारों के अलावा स्कूल से भी होता है, जिसे द्वितीयक सामाजीकरण कहते हैं। परिवार के बाद बच्चे का समाजीकरण करने में विद्यालय सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शिक्षार्थी अपने परिवार के बाद सबसे ज्यादा वक्त स्कूल में बिताते हैं। वे अपने दोस्त बनाते हैं, चीज़ों के बारे में जानना सीखते हैं और दुनिया में अपनी जगह को पहचानना और समझना सीखते हैं। एक शिक्षार्थी अपने जीवन में बहुत बाद तक, स्कूल के शिक्षकों और साथ में पढ़ने वालों के व्यवहार और नजरिये से काफी प्रभावित रहता है। इसलिए मूल्यों और चेतना के स्तर पर शिक्षार्थी कैसा बनेगा, इसमें उसके स्कूल की शिक्षा प्रणाली की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। स्कूल में विशिष्ट गतिविधियों का आयोजन करना चाहिए ताकि सक्षम और विभिन्न अक्षमताओं को झेल रहे बच्चे एक साथ उसमें भाग ले सकें। यह सबको सीखाने एवं समाजीकरण के लिए ज़रूरी है।
वंशानुक्रम: किसी शिक्षार्थी को कुछ शारीरिक गुण जैसे लंबाई, भार वंशानुक्रम के अनुसार मिलते हैं। इसी तरह संवेग, सहानुभूति जैसे मानसिक गुणों में भी इसकी भूमिका होती है। ये सभी तत्व या कारक शिक्षार्थी के समाजीकरण की प्रक्रिया में उपयोगी हैं।
संचार माध्यम: एक व्यक्ति या शिक्षार्थी अपने परिवार एवं समुदाय के साथ संबंध स्थापित करने के लिए आधुनिक संचार माध्यमों जैसे मोबाइल फोन, ई-मेल तथा इंटरनेट का प्रयोग करता रहता है। वह टेलीविजन, सिनेमा तथा रेडियो जैसे जन संचार के माध्यमों द्वारा बहुत कुछ सीखता-समझता है। ये सभी माध्यम किसी शिक्षार्थी के समाजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
समुदाय: एक व्यक्ति या शिक्षार्थी अपने समुदाय की प्रथाओं एवं परम्पराओं, संस्कृति, कला साहित्य, जातीय धारणाओं से प्रभावित होता है। समुदाय के विभिन्न साधनों द्वारा उसका समाजीकरण होता है। एक बच्चे या शिक्षार्थी के समाजीकरण को उसके दोस्त, मनोरंजन केंद्र तथा धार्मिक समूह सर्वाधिक प्रभावित करते हैं।
आस-पड़ोस: शिक्षार्थी का पड़ोस उसके लिए बाहरी परिवार की तरह होता है। वह पड़ोसी के साथ भी समय बिताता है और उनके सांस्कृतिक-व्यावहारिक गुणों से प्रभावित होता है। शिक्षार्थी के व्यक्तित्व विकास एवं समाजीकरण में पड़ोसियों का भी योगदान होता है।
पालन-पोषण: शिक्षार्थी या एक शिशु को उसके अभिभावक जिस प्रकार का पालन-पोशण देते हैं उसी के अनुसार उसमें भावनाएँ एवं अनुभूतियाँ विकसित होती हैं। यदि किसी शिशु का पालन-पोशण ठीक तरीके से नहीं हुआ हो तो उसमें समाज विरोधी आचरण दिखाई देने लगता है।
सहानुभूति: शिक्षार्थी की सीखने की प्रक्रिया एवं गलतियों के प्रति यदि अभिभावक एवं शिक्षक सहानुभूति रखें तो उसमेंं अपनत्व की भावना विकसित होती है। इसके फलस्वरूप वह अपनों के बीच अंतर करना सीख लेता है। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह उसी व्यक्ति पर भरोसा करता है जो उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं। इस तरह वह समाज में उसी समूह या संस्कृति से जुड़ता है जो उसे अपने लगते हैं। समाजीकरण की प्रक्रिया के लिए यह प्रमुख तत्व है।
सहकारिता: सहकारिता अर्थात् आपसी सहयोग की प्रक्रिया द्वारा शिक्षार्थी में सामाजिक कार्यों एवं संस्कृति की समझ विकसित होती है। एक शिशु या शिक्षार्थी जब दूसरे व्यक्तियों से सहयोग पाता है तो वह भी सहयोग देना प्रारंभ करता है। जैसे एक शिशु को जब सहपाठी अपनी पुस्तक देता है तो वह भी अपना सामान उससे साझा करता है। यह समाजीकरण की प्रक्रिया का अंग है।
निर्देश: शिक्षार्थी या एक शिशु, बाल्यकाल में वही कार्य करता है जो उसे निर्देश दिया जाता है। जैसे बड़ों को प्रणाम करना, अपनी वस्तु दूसरों को देना आदि। इस प्रकार से अभिभावक या शिक्षक के निर्देशानुसार उसमें सामाजिक व्यवहार की दिशा तय होती है।
आत्मीकरण: शिक्षार्थी या शिशु में आत्मीकरण की भावना अभिभावक, परिवार तथा पड़ोसियों के सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार से विकसित होती है। आत्मीकरण द्वारा शिशु उन आदर्शों को अपनाने लगता है और इस तरह समाजीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है।
पुरस्कार तथा दंड: शिक्षार्थी या शिशु जब सामाजिक मान्यताओं या संस्कृति के अनुसार कार्य करता है तो उसे शाबाशी या पुरस्कार दिया जाता है। इसी तरह जब वह असामाजिक कार्य करता है तो उसे दंडित किया जाता है। इस तरह शिक्षार्थी समाजीकरण की प्रक्रिया से गुजरता है।
खेलों द्वारा समाजीकरण: शिक्षार्थियों को खेल द्वारा रचनात्मकता तथा खुद को अभिव्यक्त करने का अवसर मिलता है। वह समूह में कार्य करने का महत्व, आदान-प्रदान करना, नेतृत्व करना सीखता है। अन्य बच्चों के साथ खेलने से वह अपरिचितों के साथ सहयोग करना सीखता है।

समाजीकरण की प्रक्रिया में शिक्षक, परिवार और समाज की भूमिका

परिवार की भूमिका: किसी शिक्षार्थी के समाजीकरण की प्रथम पाठशाला उसका परिवार होता है। उसके समाजीकरण के अनेक प्रारूप हो सकते हैं परन्तु परिवार की भूमिका अहम् होती है। परिवार में शिक्षार्थी या बच्चा समावेशन की प्रक्रिया सीखता है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चे परिवार द्वारा समाज में समायोजन करना सीखते हैं। परिवार लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देता है। परिवार में निर्णयों में सहभागिता होती है। यदि परिवार में सभी को अपनी सहमति या असहमति व्यक्त करने के समान अवसर प्राप्त हो तो शिक्षार्थी के समाजीकरण के प्रति सकारात्मक अनुभव होंगे। उदाहरणस्वरूप: परिवार में खान-पान, शिक्षा, व्यवसाय, सम्पत्ति आदि के बारे में निर्णय एवं सहभागिता में लैंगिक आधार पर विभेद किया जाता है या नहीं किया जाता है। परिवार में या आसपास मौजूद परिवेश में शारीरिक एवं मानसिक रूप से विशेष चुनौती वाले बच्चों या व्यक्तियों के प्रति परिवार का नजरिया किस प्रकार का है? समाज के सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित वर्गों के बच्चों/व्यक्तियों के प्रति परिवार का नजरिया किस प्रकार का है? परिवार में लोकतांत्रिक मूल्यों
(समानता, विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, न्याय एवं व्यक्ति की गरिमा आदि) मूल्यों के लिए पोषक वातावरण है या नहीं।
शिक्षक की भूमिका
किसी शिक्षार्थी के समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार के बाद स्कूल और स्कूल में विशेष रूप से शिक्षक का स्थान आता है। समाज में विश्वास, दृष्टिकोण, मान्यताएँ, कुशलताएँ और परंपराएँ होती हैं। शिक्षार्थी, शिक्षक द्वारा समाज की इस संस्कृति को ग्रहण करता है।
► शिक्षक, माता-पिता के साथ शिक्षार्थी के चरित्र एवं व्यक्तित्व विकास में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
► शिक्षक, कक्षा, खेल के मैदान, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक क्रियाओं में सामाजिक व्यवहार का आदर्श प्रस्तुत करता है। शिक्षार्थी अपनी अनुकरण प्रवृति के कारण शिक्षक के ढंगों, कार्यों, आदतों और नीतियों का अनुकरण करता है। इन आदर्शों के अनुकरण से धीरे-धीरे शिक्षार्थी का समाजीकरण होता है।
► समाजीकरण में प्रतियोगिता का महत्वपूर्ण स्थान होता है। एक शिक्षक, स्कूल में स्वस्थ प्रतियोगिता आयोजित कर शिक्षार्थी में समाजीकरण की भावना विकसित करता है।
► शिक्षक स्कूल में विभिन्न सामाजिक योजनाओं के द्वारा शिक्षार्थियों को सामूहिक क्रियाओं में सक्रिय रूप से भाग लेने का अवसर प्रदान करता है। इन क्रियाओं में भाग लेने से उसके समाजीकरण को बल मिलता है।

समाज निर्माण में लैंगिक मुद्दे

► लिंग, हर शिक्षार्थी का जैविक गुण है। परंतु लिंग के आधार पर एक लड़की को समाज एवं परिवार द्वारा अलग व्यवहार का सामना करना पड़ता है। स्पश्टत: लिंग की रचना समाज में होती है। लिंग के आधार पर सामाजिक-सांस्कृतिक अंतर देखा जाता है। उदाहरणस्वरूप मैदानी खेल क्रिकेट में लड़कों की भागीदारी लड़कियों की तुलना में बहुत अधिक होती है।
► लिंग अर्थात् जेण्डर, लड़के एवं लड़कियों में विभिन्न सामाजिक मूल्यों का निर्माण करते हैं। यह एक ही सांस्कृतिक कार्य जैसे पूजा में दोनों की अलग-अलग भूमिका निर्धारित करता है। जैसे लड़के पूजन-सामग्री लाएगें और लड़कियाँ प्रसाद बनायेंगी। इन भूमिकाओं के पीछे सामाजिक आदर्श और पितृसत्तात्मक परिवार होता हैं। इसका प्रभाव लड़कियों की शिक्षा तथा मानसिक- शारीरिक विकास पर पड़ता है। लड़कों तथा लड़कियों के बीच अंतर किये बिना सभी शिक्षार्थियों को एक समान शिक्षा दी जाये तो यह समावेशी समाज निर्माण के लिए महत्वपूर्ण होगा। लड़कों तथा लड़कियों के बीच अंतर करने से पूर्वाग्रहों, पक्षपातों, अपमान, भेदभाव तथा दोनों लिंगों के बीच संघर्श की स्थिति उत्पन्न होती है।

समाजीकरण एवं व्यक्तित्व निर्माण

किसी व्यक्ति या शिक्षार्थी के व्यक्तित्व निर्माण में समाजीकरण का प्रभाव पड़ता है। शिक्षार्थी की मनोवृत्ति पर सामाजिक-सांस्कृतिक कारक प्रभावी होते हैं। आईसैक (Eysenck) एवं कैटेल (Cattell) ने इस संबंध में अस्थिर व्यक्तित्व तथा स्थिर व्यक्तित्व का सिद्धांत दिया था। अपने इन निश्कर्शों को उन्होंने व्यक्तित्व में पाये जाने वाले अन्तर्मुखी तथा बर्हिमुखी गुणों में विभाजित किया। कैटेल के अनुसार, यदि बच्चा या शिक्षार्थी मितभाशी, अनासक्त तथा आलोचक हो तो समाजीकरण द्वारा वह अतिचारी या उदार चरित्र का हो सकता है। इसी तरह कम कुशाग्र या स्थूल विचारक वाला शिक्षार्थी कुशाग्र या सूक्ष्मचेत्ता वाला हो सकता है। गिलफोर्ड के अनुसार, ‘व्यक्तित्व गुणों का समन्वित रूप है।’
समाजीकरण में बाधा डालने वाले तत्त्व
► बाल्यकालीन परिस्थितियाँ: मॉसलो एवं मिटिलमैन (Maslow and Mittleman) के अनुसार, किसी बच्चे को बचपन में अभिभावकों का प्यार ना मिले, उनमें हमेशा लड़ाई हो, असुरक्षा की भावना हो, बच्चा अकेला रहता हो, विधवा माँ हो तो इन परिस्थितियों में बच्चे का समाजीकरण ठीक से नहीं हो पाता है।
सांस्कृतिक परिस्थितियाँ: संस्कृति विरोधी तत्व, वर्ग एवं जाति से संबंधित पूर्वाग्रह, दरिद्रता जैसी परिस्थितियाँ एक शिक्षार्थी के समाजीकरण में बाधक होती हैं।
तत्कालिक परिस्थितियाँ: निराशा, अपमान, परिवार की उपेक्षा, असफलता, शारीरिक हीनता आदि ऐसी तत्कालिक परिस्थितियाँ हैं जो समाजीकरण में बाधक हैं।

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