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अध्याय 37. भूगोल – पर्यावरण: प्राकृतिक एवं मानव पर्यावरण (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 37. भूगोल – पर्यावरण: प्राकृतिक एवं मानव पर्यावरण

पर्यावरण
पर्यावरण का निर्माण दो शब्दों ‘परि’ और ‘आवरण’ से मिलकर हुआ है, जिसमें परि का अर्थ है हमारे आसपास अर्थात् जो हमारे चारों ओर है एवं आवरण का अर्थ जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है। पर्यावरण उन सभी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक कारकों की कुल इकाई है जो किसी जीवधारी अथवा परितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं तथा उनके रूप, जीवन और जीविता को तय करते हैं। पर्यावरण के जैविक संघटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, सभी जीव-जन्तु और पेड़-पौधे के अलावा उनसे जुड़ी सारी जैव प्रक्रियाएँ शामिल हैं जबकि पर्यावरण के अजैविक संघटकों में निर्जीव तत्त्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएँ शामिल हैं। पर्यावरण के अजैविक संघटकों में पर्वत, चट्टानें, नदी, हवा और जलवायु के तत्त्व शामिल हैं।
प्राकृतिक पर्यावरण
प्राकृतिक पर्यावरण में सभी जीवित एवं निर्जीव, पृथ्वी के क्षेत्र पर स्वाभाविक रूप से होने वाली क्रियाएँ शामिल होती हैं। इसमें भूमि, जल, वायु, पेड़-पौधे एवं जीव-जंतु शामिल होते हैं। ये पारिस्थितिक इकाइयाँ हैं जिनमें बड़े पैमाने पर मानवीय हस्तक्षेप के बिना प्राकृतिक प्रणालियों के रूप में कार्य सहित सभी वनस्पति, सूक्ष्म जीवाणुओं, मिट्टी, चट्टानों, माहौल और प्राकृतिक घटना शामिल हैं जिसमें अपनी सीमाओं के अंतर्गत क्रियाएँ होती रहती हैं। स्थलमंडल, जलमंडल एवं वायुमंडल के समस्त स्वरूप को प्राकृतिक पर्यावरण कहा जाता है। कृषि, वन, रहने के लिए भूमि, भोजन एवं खनिज संपदा की प्राप्ति स्थलमंडल से होती है। जलमंडल के अंतर्गत नदी, झील, समुद्र एवं महासागर आते हैं। वायुमंडल में हमें कई तरह की परिघटना देखने को मिलती है। वायुमंडल में गैस, धूलकण एवं जलवाष्प उपस्थित रहता है। वायुमंडल में प्राकृतिक परिवर्तन से मौसम और जलवायु में परिवर्तन होता है। पृथ्वी के चारों ओर फैली वायु की पतली परत को वायुमंडल कहा जाता है।
मानवीय पर्यावरण
मानवीय पर्यावरण में मनुष्य स्वविकसित तकनीक की सहायता से संशोधन तथा परिवर्तन करता रहता है और उसे अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप बना लेता है। वह भूमि को जोतकर खेती करता है, जंगलों को साफ करता है, सड़कें, नहरें, रेलमार्ग इत्यादि का निर्माण करता है। मानव पर्वतों को काटकर सुरंगें बनाता है, नयी बस्तियाँ बसाता है एवं भूगर्भ से खनिज संपत्ति निकालकर अनेक उपकरण एवं अस्त्र-शस्त्र आदि बनाता है और प्राकृतिक संसाधनों का विभिन्न प्रकार से शोषण कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इसे मानवीय पर्यावरण कहा जाता है। इसके अंतर्गत औजार, गहने, खेत, कृत्रिम चारागाह व उद्यान, पालतू पशु, संपदा, उद्योग एवं विविध उद्यम, परिवहन और संचार के साधन इत्यादि सम्मिलित किये जाते हैं। मानव को जिस-जिस प्रकार की विशिष्ट सुविधाओं की आवश्यकता होगी वह उन्हीं पर शोध कर उन्हें खोजेगा।
परितंत्र
पौधे, जीव-जंतु और भौतिक पर्यावरण के सामूहिक रूप को परितंत्र कहा जाता है। परितंत्र के अंतर्गत जीवों एवं उसके पर्यावरण के बारे में अध्ययन किया जाता है। परितंत्र एक प्राकृतिक इकाई है जिसमें एक क्षेत्र विशेष के सभी जीवधारी अर्थात् पौधे, जानवर और अनुजीव शामिल हैं जो अपने अजैव पर्यावरण के साथ अंत:क्रिया करके एक संपूर्ण जैविक इकाई बनाते हैं। इस प्रकार परितंत्र अन्योन्याश्रित अवयवों की एक इकाई है जो एक ही आवास को बांटते हैं। परितंत्र आमतौर पर अनेक खाद्य जाल बनाते हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर इन जीवों के अन्योन्याश्रय और ऊर्जा के प्रवाह को दिखाते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र में जीवित जीव अपने स्थानीय परिवेश में हर दूसरे तत्त्व को प्रभावित करते हैं। परितंत्र के अंतर्गत अधिक वर्षा वाला वन, घास स्थल, रेगिस्तान, पर्वत, झील, नदी, महासागर एवं छोटा-सा तालाब आता है।
पर्यावरण संरक्षण
पर्यावरण संरक्षण से तात्पर्य पर्यावरण की सुरक्षा करना है। वृक्ष, वनस्पतियों का मानव जीवन में बहुत अधिक महत्त्व है। वे मनुष्य के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। वे मानव जीवन का आधार हैं परंतु आज मानव इनके इस महत्त्व व उपयोग को न समझते हुए इनकी अपेक्षा कर रहा है। गौण लाभों को महत्त्व देते हुए मनुष्य पर्यावरण का लगातार दोहन करता जा रहा है। मानव द्वारा जितने वृक्ष काटे जाते हैं उतने लगाने भी चाहिए। परंतु ऐसा नहीं हो रहा है और वृक्षों की संख्या में लगातार कमी हो रही है। परिणामस्वरूप अनेक समस्याओं को मनुष्य द्वारा झेलना पड़ रहा है। प्राणी अपने जीवन-यापन हेतु वनस्पति जगत पर आश्रित है। मानव हवा में उपस्थित ऑक्सीजन को श्वास द्वारा ग्रहण करके जीवित रहता है। पेड़-पौधे द्वारा ही प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया में ऑक्सीजन छोड़ी जाती है। इसके अतिरिक्त प्राणियों का आहार वनस्पति है। वनस्पति ही प्राणियों को पोषण प्रदान करती है जिसके कारण पर्यावरण का संरक्षण करना जरूरी है। पर्यावरण से धरती हरी-भरी बनी रहती है जिससे मानव को कई तरह के प्रत्यक्ष लाभ होते हैं। पर्यावरण से ईंधन व इमारती लकड़ी से लेकर फल-फूल, औषधियाँ प्रदान करने, वर्षा का संतुलन, पत्तों से मिलने वाली खाद, धरती के कटाव का बचाव, बाढ़ रोकने इत्यादि अनेक लाभ होते हैं। वायु प्रदूषण आज पूरे विश्व के लिए एक बहुत ही विकट समस्या है। संपूर्ण विश्व के लिए पर्यावरण संरक्षण एक महत्त्वपूर्ण घटक है।

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