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अध्याय 33. इतिहास – स्वतंत्रता के पश्चात् भारत (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 33. इतिहास – स्वतंत्रता के पश्चात् भारत

अगस्त 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो उसके सामने कई बड़ी चुनौतियाँ थीं। बँटवारे की वजह से 80 लाख शरणार्थी पाकिस्तान से भारत आ गये थे। इन लोगों के लिए रहने का इंतजाम करना और उन्हें रोजगार देना जरूरी था। उस समय लगभग 500 रियासतें राजाओं या नवाबों के शासन में चल रही थीं। इन सभी को नये राष्ट्र में शामिल होने के लिए तैयार करना एक टेढ़ा काम था।
1947 में भारत की जनसंख्या बहुत अधिक थी। यह लगभग 34.5
करोड़ थी। यह जनसंख्या भी आपस में बंटी हुई थी। इसमें ऊँची जाति और नीची जाति, बहुल हिन्दू समुदाय और अन्य धर्मों को मानने वाले भारतीय थे। दिसम्बर, 1946 से नवम्बर 1949 के बीच लगभग 300 भारतीयों ने देश के राजनीतिक भविष्य के बारे में लंबा विचार-विमर्श किया। यद्यपि इस ‘संविधान सभा’ की बैठकें नयी दिल्ली में आयोजित की गयी थीं। परंतु इसके सदस्य पूरे देश में फैले हुए थे और वे बहुत सारी राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि थे। इन्हीं चर्चाओं के फलस्वरूप भारत का संविधान लिखा गया। जिसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया।
भारतीय रियासतों का एकीकरण
स्वतंत्रता के समय ‘भारत’ के अन्तर्गत तीन तरह के क्षेत्र थे:
1. ब्रिटिश भारत के क्षेत्र (वे राज्य जो भारत के गवर्नर-जनरल के सीधे नियंत्रण में थे।)
2. देसी राज्य (हैदराबाद, जम्मू और कश्मीर आदि)
3. फ्रांस और पुर्तगाल के औपनिवेशिक क्षेत्र (पाण्डिचेरी, गोवा आदि) इन सभी क्षेत्रों को एक राजनैतिक इकाई के रूप में एकीकृत करना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का घोषित लक्ष्य था। स्वतंत्रता के दौरान भारत में लगभग 562 देशी रियासतें थीं। सरदार पटेल अंतरिम सरकार में उप प्रधानमंत्री के साथ देश के गृहमंत्री थे। उनको रियासतों से संबंधित गृह विभाग सौंपा गया था। उनके सलाहकार वी.पी. मेनन थे। रियासतों की सर्वसत्ता समाप्त कर दी गयी थी किन्तु कुछ राज्य अपनी स्वतंत्रता बनाए रखना चाहते थे। जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर को छोड़कर 562 रियासतों ने स्वेच्छा से भारतीय परिसंघ में शामिल होने की स्वीकृति दी थी। भोपाल का विलय सबसे अंत में भारत में हुआ। पाकिस्तान के हमले के बाद, जम्मू कश्मीर के शासक हरिसिंह ने अक्टूबर, 1947 ई. को विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये। जूनागढ़ पाकिस्तान में मिलने की घोषणा कर चुका था। अपितु, जूनागढ़ में मत विभाजन के बाद भारतीय संघ में विलय को स्वीकार किया गया। हैदराबाद ने 26 अक्टूबर 1948 को विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किये। कुछ रियासतें इतनी छोटी थीं कि प्रशासनिक गतिविधियों का संचालन कठिन था। अत: देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय तर्क संगत था। उड़ीसा में 39 रियासतों का विलय उड़ीसा प्रांत में किया गया। पाण्डिचेरी, चन्दननगर तथा माहे स्वतंत्रता के बाद भी फ्रांसीसी अधिपत्य में थे। 1954 ई. में फ्रांस की सरकार ने इन तीनों स्थानों को भारत को सौंप दिया। गोवा पुर्तगाल के अधीन था। अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों द्वारा अपने क्षेत्र सौंपने के बावजूद पुर्तगाल ने गोवा भारत को नहीं सौंपा था। गोवा में राजनयिक प्रयासों के विफल होने के बाद गोवा पर सैन्य कार्यवाही की गयी। 19 सितम्बर 1961 ई. को गोवा एवं दमन-दीव को भी भारत में मिला लिया गया।
महात्मा गाँधी की हत्या
1947 में स्वतंत्रता के बाद देश विभाजन ने गाँधीजी को निराश किया। पाकिस्तान को शेश राशि दिलाने के लिए गाँधीजी ने आमरण अनशन किया और काँग्रेस के नेताओं को इसके लिए राजी किया। वहीं, उनकी प्रार्थना-सभा में कुरान की आयतों का पढ़ा जाना कट्टरपंथी हिन्दुओं को पसन्द नहीं आया। मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 की शाम को नयी दिल्ली स्थित बिड़ला भवन में गोली मारकर की गयी थी। जब वे संध्याकालीन प्रार्थना के लिए जा रहे थे तभी नाथूराम गोड़से नाम के व्यक्ति ने पहले उनके पैर छुए और फिर सामने से उन पर बैरेटा पिस्तौल से तीन गोलियाँ दाग दीं। इससे गाँधीजी की मृत्यु मौके पर ही हो गयी थी।
नेहरू की विदेश नीति
जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। स्वतंत्रता के पूर्व और पश्चात् की भारतीय राजनीति में वे केन्द्रीय व्यक्ति थे। महात्मा गांधी के संरक्षण में वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सर्वोच्च नेता के रूप में उभरे और उन्होंने 1947 में भारत के एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापना से लेकर 1964 तक अपने निधन तक भारत पर शासन किया। जब 1946 ई. में भारतीय प्रशासकों को स्वतंत्र विदेश नीति निर्धारण का अवसर मिला, उस समय विश्व दो गुटों में विभाजित था। पहला गुट अमेरिका समर्थित पूँजीवादी देशों का था जबकि दूसरा गुट सोवियत संघ समर्थित साम्यवादी देशों का था। तत्कालीन राजनीतिक प्रवृत्तियों को देखते हुए भारत का झुकाव सोवियत संघ की ओर था। नेहरूजी ने द्विगुटीय विश्व व्यवस्था में निष्पक्षता की नीति अपनायी। तत्कालीन आजाद भारत के विदेश-नीति निर्धारण के निम्नलिखित आयाम थे:- भौगोलिक तत्व, गुटबन्दियाँ, विचारधाराओं का प्रभाव, सैनिक तत्व, नेहरू का व्यक्तित्व, आर्थिक तत्व, राष्ट्रीयता, ऐतिहासिक परंपराएँ, आंतरिक शक्तियों एवं प्रभावों का दबाव आदि।
भारत-पाकिस्तान संबंध
1947 में देश विभाजन के बाद भारतीय नेताओं को यह आशा थी कि धर्म के आधार पर देश विभाजन होने से दोनों देशों में शांति और आपसी मेलजोल को बढ़ावा मिलेगा। किन्तु भारत विभाजन के बाद कई विकट समस्याएँ उत्पन्न हो गयीं। ऋण अदायगी, सिंधु जल विवाद और कश्मीर के मुद्दों से कई प्रकार की राजनैतिक समस्याएँ उत्पन्न हुईं। इससे आपसी कटुता बढ़ी। सितंबर, 1951 ई. में विश्व बैंक के अध्यक्ष यूजीन ब्लैक ने मध्यस्थता की। इसके बाद मिस्टर इल्कि के सहयोग से आपसी वार्ता हुई। 19 सितम्बर 1960 ई. में यह जल विभाजन समझौता हुआ। इसे ‘सिंधु-जल समझौता’ की संज्ञा दी गयी। 12 जनवरी, 1961 ई. से इस संधि की शर्तों को लागू कर दिया गया। सन् 1949 ई. में युद्ध विराम रेखा निर्धारित हो जाने पर कश्मीर का 32000 वर्ग मील पाकिस्तान में चला गया जबकि नियंत्रण रेखा के इस पार का 53000 वर्ग मील पर भारत का अधिकार हो गया। भारत और पाकिस्तान का तनाव बढ़ता ही गया और इसी का परिणाम है कि इनके बीच अब तक चार युद्ध हुए हैं। ये चार युद्ध 1947, 1965, 1971 और 1999 में हुए।
ताशकंद समझौता
सोवियत संघ के प्रधानमंत्री कोसीजिन के प्रयास से भारत-पाकिस्तान के बीच उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में एक समझौता हुआ।
यह शांति समझौता 11 जनवरी 1966 को हुआ। इस समझौते पर पाकिस्तानी राष्ट्रपति अय्यूब खाँ और भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने हस्ताक्षर किये। इस समझौते के अनुसार यह तय हुआ कि भारत और पाकिस्तान अपने झगड़ों को शांतिपूर्ण ढंग से तय करेंगे। साथ ही एक-दूसरे के प्रति अपनी शक्ति का प्रयोग नहीं करेंगे। इस समझौते के क्रियान्वयन के फलस्वरूप दोनों पक्षों की सेनाएँ उस सीमा रेखा पर वापस लौट आयीं, जहाँ पर वे युद्ध के पूर्व तैनात थे।
बांग्लादेश का उदय
बांग्लादेश का स्वतंत्रता संग्राम 1971 में हुआ था। इसे ‘मुक्ति संग्राम’ भी कहते हैं। इसका नेतृत्व शेख मुजीबुर्रहमान कर रहे थे। उस समय पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) की जनता पूरी तरह शेख मुजीबुर्रमान के साथ थी।
2 दिसम्बर, 1971 में पाकिस्तान ने भारतीय हवाई अड्डों पर भीशण बमबारी की। 4 दिसम्बर 1971 ई. को भारत ने जवाबी कार्यवाही की और पाकिस्तान के लगभग 6000 वर्ग मील भूमि पर अधिकार कर लिया।
16 दिसम्बर, 1971 ई. को ढ़ाका में एक सैनिक समारोह में पाकिस्तान के जनरल नियाजी ने भारत के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सम्मुख आत्मसमर्पण कर दिया। भारत की पाकिस्तान पर इस ऐतिहासिक जीत को ‘विजय दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस प्रकार 16 दिसम्बर, 1971 ई. को बंग्लादेश का उदय एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हुआ। शेख मुजीबुर्रहमान देश के प्रथम राष्ट्रपति बने।
शिमला समझौता
सन् 1971 ई. में भारत-पाक युद्ध के बाद भारत ने शिमला में एक संधि पर हस्ताक्षर किये, इसे ‘शिमला समझौता’ के नाम से जाना जाता है। इसमें भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान की तरफ से जुल्फीकार अली भुट्टो शामिल थे। इस समझौते से भारत को पाकिस्तान के सभी 93000 से अधिक युद्धबन्दियों को छोड़ने पड़े और युद्ध में जीती गयी 5600 वर्ग मील जमीन भी लौटानी पड़ी।
भारत-श्रीलंका संबंध
भारत और श्रीलंका भारत के दक्षिण में स्थित पाक जलडमरूमध्य से पृथक है। भारत की तरह श्रीलंका भी लगभग डेढ़ सौ सालों तक औपनिवेशिक शासन की मार झेलता रहा। यहाँ पर सर्वप्रथम पुर्तगालियों ने, उसके बाद में डचों और अंत में अंग्रेजों ने अधिकार किया। श्रीलंका में अधिकांश दक्षिण भारतीय प्रवासी वे थे, जिन्हें अंग्रेजों द्वारा चाय या रबड़ के बागानों में काम करने के लिए ले जाया गया था।
1948 में श्रीलंका के स्वतंत्र होने तक इन प्रवासी भारतीयों को ब्रिटिश नागरिकों के रूप में समान अधिकार एवं मताधिकार प्राप्त था। 1948
के सीलोन मताधिकार अधिनियम तथा 1949 ई. के सीलोन संसदीय अधिनियम द्वारा भारतीय प्रवासी मताधिकार से वंचित हो गये। इसी समस्या के समाधान हेतु जनवरी 1954 में श्रीलंका के राष्ट्रपति जॉन कॉटलेवाला एवं जवाहरलाल नेहरू के मध्य समझौते पर नयी दिल्ली में हस्ताक्षर हुए। इसे ‘नेहरू कोटलेवाला’ समझौता भी कहा जाता है। भारतीय शांति रक्षा सेना (IPKF) का गठन भारत-श्रीलंका संधि के अधिदेश के अन्तर्गत किया गया था। यह एक सेना दल था जो 1987
से 1990 के मध्य श्रीलंका में शांति स्थापना ऑपरेशन क्रियान्वित कर रहा था। इस सेना का उद्देश्य युद्धरत श्रीलंकाई तमिल राष्ट्रवादियों जैसे ‘लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम’ (LTTE) और श्रीलंकाई सेना के मध्य श्रीलंकाई गृहयृद्ध को समाप्त करना था।
भारत-भूटान संबंध
भारत और भूटान के द्विपक्षीय संबंध परंपरागत रूप से बड़े मधुर रहे हैं। भारत की उत्तरी प्रतिरक्षा व्यवस्था में भूटान का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। भूटान पूर्वी हिमालय में स्थित छोटा स्वतंत्र पर्वतीय राश्ट्र है। यहाँ मूलत: भूटिया जाति के लोग हैं, जिनमें लगभग सभी बौद्ध धर्मावलम्बी हैं। भारत-भूटान संबंधों की शुरुआत 1865 ई. की ‘सिनचुला सिन्धु’ से प्रारंभ मानी जाती है। 1910 ई. में दोनों देशों के बीच पुनरवा संधि हुई, जिसके कारण तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने भूटान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने तथा भूटान ने अपने विदेशी मामलों को भारत के निर्देशन में चलाना स्वीकार कर लिया।
भारत-चीन संबंध
1 अक्टूबर, 1940 ई. को चीन में साम्यवादी सरकार की स्थापना के अगले वर्ष, भारत ने चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किये। इस तरह भारत चीन लोक गणराज्य को मान्यता देने वाला प्रथम गैर-समाजवादी देश बना।
1950 ई. में कोरिया युद्ध के समय भारत ने चीन का साथ दिया। 25
अक्टूबर 1950 को जब चीनी सेना ने तिब्बत पर आक्रमण किया तो भारत ने इसका कड़ा विरोध किया। विदेश नीति पर चीन व भारत बहुधु्रवीय दुनिया की स्थापना करने का पक्ष लेते हैं, प्रभुत्ववादी व बल की राजनीति का विरोध करते हैं और किसी एक शक्तिशाली देश के विश्व की पुलिस बनने का विरोध करते हैं।
2003 में भारतीय प्रधानमंत्री वाजपयी ने चीन की यात्रा की। उन्होंने चीनी प्रधानमंत्री वन चा पाओ के साथ चीन-भारत संबंधों के सिद्धांत और चतुर्मुखी सहयोग के घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किये।
शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांत यानी पंचशील चीन, भारत व म्यांमार द्वारा वर्ष 1954 के जून माह में प्रवर्तित किये गये। चीन व भारत के बीच सबसे बड़ी समस्या सीमा विवाद और तिब्बत की है।
पंचशील समझौता
पंचशील चीन व भारत द्वारा दुनिया की शांति व सुरक्षा में किया गया एक महत्वपूर्ण योगदान है। भारत-चीन के बीच 29 अप्रैल, 1954 को दिल्ली में तिब्बत को लेकर समझौता हुआ। इसे पंचशील समझौता कहा गया। देशों के संबंधों को लेकर स्थापित इन सिद्धांतों की मुख्य विषय-वस्तु निम्न है:
► एक-दूसरे की प्रभुसत्ता व प्रादेशिक अखंडता का सम्मान किया जाए।
► एक-दूसरे पर आक्रमण न किया जाए।
► एक-दूसरे के अंदरूनी मामलों में दखल न दिया जाए और समानता व आपसी लाभ के आधार पर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व बरकरार रखा जाए। पंचशील ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की सैद्धांतिक व यथार्थ कार्रवाइयों में रचनात्मक योगदान किया।
भारत-चीन युद्ध
चीन में 1959 के तिब्बती विद्रोह के बाद जब भारत ने दलाई लामा को शरण दी तो भारत-चीन सीमा पर हिंसक घटनाएँ शुरू हो गयीं। भारत ने फॉरवर्ड नीति के तहत मैकमोहन रेखा से लगी सीमा पर अपनी सैनिक चौकियाँ रखीं, जो 1959 में चीनी प्रीमियर झोउ एनलई के द्वारा घोषित वास्तविक नियंत्रण रेखा के पूर्वी भाग के उत्तर में थी। चीनी सेना ने 20 अक्टूबर 1962 को लद्दाख में और मैकमोहन रेखा के पार एक साथ हमले शुरू कर दिये। चीन ने 20 नवम्बर 1962 को युद्ध विराम की घोषणा की। यह युद्ध दक्षिणी क्सिंजिंग (अक्साई चीन) व अरुणाचल प्रदेश में लड़ा गया। अंतत: चीनी सेना की जीत हुई। वर्तमान म ें लद्दाख का 36260 वर्ग किमी और अरुणाचल प्रदेश (नेफा) का 5180 वर्ग किमी चीन के कब्जे में है। ज्ञात हो कि इस युद्ध में चीन व भारत, दोनों पक्षों द्वारा नौसेना का उपयोग नहीं किया गया था। युद्ध के बाद भारत ने फॉरवर्ड नीति को त्याग दिया और वास्तविक नियंत्रण रेखा, वास्तविक सीमाओं में परिवर्तित हो गयी।
भारत की एशियाई नीति
भारत की विदेश नीति में शन्तिपूर्ण सह-अस्तित्व व विश्व-शांति का विचार है। भारत की विदेश नीति में उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद व रंगभेद की नीति का विरोध महान राष्ट्रीय आंदोलन की उपज है। भारत का अधिकतर एशियाई देशों के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध हैं। मार्च, 1947 में वैश्विक मामलों की भारतीय परिषद ने नयी दिल्ली में एक एशियाई मैत्रीपूर्ण सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन का उद्देश्य एशियाई देशों के बीच मैत्री को प्रोत्साहित व एशियाई जनता की प्रगति व हितों में वृद्धि करना था। इन्डोनेशिया के प्रश्न पर विचार हेतु नयी दिल्ली में जनवरी 1949 ईमें द्वितीय एशियाई सम्मेलन का आयोजन हुआ। इसमें 19 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
2014 में भारत के नये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सभी सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित करके पड़ोसियों के साथ भारत के रिश्तों में जान फूंक दी।
सार्क
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) दक्षिण एशिया के आठ देशों का आर्थिक और राजनीतिक संगठन है। इसकी स्थापना दक्षिण एशिया के देशों के मध्य क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने के लिए 8 दिसम्बर 1985 को हुई थी। इसके सदस्य देश थे: भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और भूटान। अप्रैल, 2007 में संघ के 14वें शिखर सम्मेलन में अफगानिस्तान इसका आठवाँ सदस्य बन गया। प्रत्येक दो वर्षों में सार्क शिखर सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। इसका मुख्यालय काठमाण्डु में है।

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