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अध्याय 32. इतिहास – भारत का संवैधानिक विकास (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 32. इतिहास – भारत का संवैधानिक विकास

भारत के संवैधानिक विकास के अंतर्गत कई प्रकार के एक्ट और अधिनियम आदि समय-समय पर पारित किये गये हैं।
कम्पनी शासन के अधीन लाये गये अधिनियम 1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट
रेग्युलेटिंग एक्ट का उद्देश्य भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की गतिविधियों को ब्रिटिश सरकार की निगरानी में लाना था। इसके अतिरिक्त कम्पनी की संचालक समिति में आमूल-चूल परिवर्तन करना तथा कम्पनी के राजनीतिक अस्तित्व को स्वीकार कर उसके व्यापारिक ढांचे को राजनीतिक कार्यों के संचालन योग्य बनाना भी इसका उद्देश्य था। इस अधिनियम को 1773 ई. में ब्रिटिश संसद में पास किया गया तथा 1774 ई. में इसे लागू किया गया। 1781 ई. में इस अधिनियम में संशोधन किया गया। इसके अंतर्गत कम्पनी के पदाधिकारियों को उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया गया। इसके साथ ही गवर्नर-जनरल तथा उसकी परिषद द्वारा बनाये गये नियमों तथा विनियमों को उच्चतम न्यायालय में पंजीकृत कराने की बाध्यता खत्म कर दी गयी।
1784 का पिट्स एक्ट
रेग्युलेटिंग एक्ट में व्याप्त खामियों को दूर करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने पिट्स एक्ट को पारित किया। इस एक्ट के तहत भारत के गवर्नर-जनरल की काउंसिल के सदस्यों की संख्या तीन कर दी गयी। मद्रास एवं बम्बई की सरकारें पूरी तरह से बंगाल सरकार के अधीन कर दी गयीं। ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ की अनुमति के बिना गवर्नर-जनरल को किसी भी भारतीय शासक के साथ युद्ध करने या किसी अन्य नरेश द्वारा अन्य राज्य पर आक्रमण करने के विरुद्ध सहायता देने का अधिकार नहीं था। छ: कमिश्नरों के एक बोर्ड का गठन कर भारत में अंग्रेजी क्षेत्र पर नियंत्रण का पूरा अधिकार दे दिया गया।
1786 का एक्ट
यह एक्ट पिट्स द्वारा रखा गया था, जिसमें गवर्नर जनरल को विशेष परिस्थितियों में अपनी परिषद के निर्णय को रद्द करने तथा अपने निर्णय लागू करने का अधिकार भी दे दिया गया था।
1793 का चार्टर एक्ट
इस अधिनियम के तहत कम्पनी द्वारा भारत में व्यापार करने का अधिकार 20 वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया। साथ ही अपनी परिषदों के निर्णय को रद्द करने का अधिकार भी सभी गवर्नर को दिया गया।
1813 का चार्टर एक्ट
1793 के चार्टर एक्ट के बाद 1813 (बीस वर्ष बाद) में यह अधिनियम लाया गया जिसके अनुसार कम्पनी का भारतीय व्यापार पर एकाधिकार समाप्त कर दिया गया, परन्तु चीन के साथ व्यापार का एकाधिकार कम्पनी के पास ही रहा। साथ ही, कम्पनी के भागीदारों को भारतीय राजस्व से 10.5 प्रतिशत लाभांश देने का निश्चय किया गया।
1833 का चार्टर एक्ट
इस एक्ट ने 1813 में पारित कम्पनी का चीन के साथ व्यापार के अधिकार को समाप्त कर दिया। कम्पनी को आने वाले 20 वर्षों के लिए क्राउन व उसके उत्तराधिकारियों के न्यास के रूप में भारत पर प्रशासन का अधिकार दे दिया गया। प्रशासन का केन्द्रीकरण किया गया एवं बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया। बम्बई, मद्रास तथा बंगाल व अन्य प्रदेश गवर्नर-जनरल के नियंत्रण में दे दिये गये। गवर्नर-जनरल को अपनी काउंसिल सहित सारे अंग्रेजी इलाकों के लिए कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो गया। बम्बई व मद्रास की संविधान सभाओं की कानून बनाने की शक्ति समाप्त कर दी गयी। ‘विधि कमीशन’ (भारतीय कानूनों को संहिताबद्ध करने हेतु) का निर्माण किया गया।
1853 का चार्टर एक्ट
इस एक्ट ने कम्पनी को एकतरफा फायदा पहुँचाया। कम्पनी को ब्रिटिश सरकार की ओर से भारत का क्षेत्र ट्रस्ट के रूप में तब तक रखने की आज्ञा दी, जब तक ब्रिटिश संसद की मनाही न हो। इस अधिनियम ने ब्रिटिश सरकार को यह अधिकार दिया कि वह नियंत्रण बोर्ड, सचिव एवं अन्य अधिकारियों का वेतन निश्चित करे। सरकारी सेवाओं में नियुक्तियाँ अब डायरेक्टरों के द्वारा न होकर प्रतियोगी परीक्षाओं द्वारा की जाने लगीं। 1854 ई. में ‘मैकाले समिति’ नियुक्त की गयी, ताकि इस योजना को क्रियान्वित किया जा सके। इस अधिनियम में भारतीयों को अपने संबंधित विषयों में कानून बनाने में अनुमति नहीं दी गयी थी।
क्राउन शासन में विकास
1857 ई. के विद्रोह के शांत होने के बाद भारत का शासन ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथों से निकलकर ब्रिटिश क्राउन के हाथों में पहुँच गया।
ब्रिटिश संसद द्वारा पारित 1858 का अधिनियम
इस अधिनियम के पारित होने के कुछ महत्त्वपूर्ण कारण थे। भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम (1857) ने भारत में कम्पनी शासन के दोषों के प्रति ब्रिटिश जनमानस का ध्यान आकृष्ट किया। इसी समय ब्रिटेन में सम्पन्न हुए आम चुनावों के बाद पामस्टर्न प्रधानमंत्री बने। इन्होंने तत्काल कम्पनी के भारत पर शासन करने के अधिकार को लेकर ब्रिटिश क्राउन के अधीन करने का निर्णय लिया।
अधिनियम (1858) की मुख्य विशेषताएँ
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन समाप्त कर शासन की जिम्मेदारी ब्रिटिश क्राउन को सौंप दी गयी। ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ एवं ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ के समस्त अधिकार ‘भारत सचिव’ को सौंप दिये गये। भारत का गवर्नर-जनरल अब ‘भारत का वायसराय’ कहा जाने लगा। ‘भारत सचिव’ व उसकी काउंसिल का खर्च भारतीय राजकोष से दिये जाने का प्रस्ताव पास हुआ।
1861 का भारतीय परिषद अधिनियम
1858 ई. का अधिनियम अपनी कसौटी पर पूर्णत: खरा नहीं उतरा, परिणामस्वरूप 3 वर्ष बाद 1861 ई. में ब्रिटिश संसद ने ‘भारतीय परिषद अधिनियम’ पारित किया। यह पहला ऐसा अधिनियम था जिसमें ‘विभागीय प्रणाली’ एवं ‘मंत्रिमंडलीय प्रणाली’ की नींव रखी गयी। पहली बार विधि निर्माण हेतु भारतीयों का सहयोग लेने का प्रयास किया गया। इस परिषद का कार्य क्षेत्र कानून निर्माण तक ही सीमित था। इस अधिनियम के अनुसार बम्बई एवं मद्रास प्रांतों को विधि निर्माण एवं उसमें संशोधन का अधिकार पुन: प्रदान किया गया। वायसराय को प्रांतों में विधान परिषद की स्थापना का अधिकार तथा लेफ्टिनेन्ट गवर्नर की नियुक्ति का अधिकार प्राप्त हो गया।
1892 का भारतीय परिषद अधिनियम
1861 का भारतीय परिषद अधिनियम जहाँ एक ओर उत्तरदायी सरकार स्थापित करने में असमर्थ रहा, वहीं दूसरी ओर लिटन की बर्बर नीतियों से जनता में असंतोष व्याप्त हो गया। ऐसी स्थिति में 1892
का परिषद अधिनियम पारित किया गया। इस अधिनियम द्वारा जहाँ एक ओर संसदीय प्रणाली का रास्ता खुला व भारतीयों को काउंसिलों में अधिक स्थान मिला, वहीं दूसरी ओर चुनाव पद्धति व गैर सदस्यों की संख्या में वृद्धि से असंतोष उत्पन्न हुआ।
1909 का भारतीय परिषद अधिनियम
इस अधिनियम को ‘मार्ले-मिण्टो सुधार अधिनियम’ के नाम से भी जाना जाता है। इस अधिनियम का उद्देश्य कांग्रेस के उदारवादी दल के नेताओं एवं मुसलमानों को पढ़ाना तथा उग्र राष्ट्रवादी तत्त्वों का दमन करना था। इसके तहत मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था की गयी। इस अधिनियम की मुख्य बुराई थी – मुसलमानों को पृथक प्रतिनिधित्व प्रदान करना। अधिनियम में ऐसी व्यवस्था कर सरकार ने भारत में साम्प्रदायिकता का बीज बो दिया, जो कालान्तर में ‘भारत-विभाजन’ का कारण बना।
1919 का भारत सरकार अधिनियम
इस अधिनियम को ‘मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार’ के नाम से भी जाना जाता है। भारत मंत्री लॉर्ड मांटेग्यू ने 20 अगस्त, 1917 को ब्रिटिश संसद में यह घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य भारत में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना है। यह अधिनियम अंतिम रूप से 1921 ई. में लागू किया गया था। मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के प्रवर्तनों को भारत के रंग-बिरंगे इतिहास में ‘सबसे महत्त्वपूर्ण घोषणा’ की संज्ञा दी गयी।
1935 का भारत सरकार अधिनियम
भारत सरकार अधिनियम 1935 के पारित होने से पूर्व इसमें ‘साइमन आयोग रिपोर्ट’, ‘नेहरू समिति की रिपोर्ट’, ब्रिटेन में सम्पन्न तीन गोलमेज सम्मेलनों में हुए कुछ विचार-विमर्शों से सहायता ली गयी। तीसरे गोलमेज सम्मेलन के सम्पन्न होने के बाद कुछ प्रस्ताव ‘श्वेत पत्र’ के नाम से प्रकाशित हुए, जिन पर बहस के लिए ब्रिटेन के दोनों सदनों एवं कुछ भारतीय प्रतिनिधियों ने रिपोर्ट प्रस्तुत की। अंतत: इस रिपोर्ट के आधार पर 1935 ई. का अधिनियम पारित हुआ।
1935 ई. का अधिनियम काफी लम्बा और जटिल था। इसे 3 जुलाई 1936 को आंशिक रूप से लागू किया गया, किन्तु यह पूर्ण रूप से चुनावों के बाद अप्रैल, 1937 में लागू हो पाया। प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता की व्यवस्था की गयी।
1947 का भारतीय स्वाधीनता अधिनियम
भारतीय स्वाधीनता अधिनियम, 1947 को ब्रिटिश संसद द्वारा भारत को दिया गया तोहफा था। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउन्टबेटन की योजना पर आधारित यह विधेयक 4 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद में पेश किया गया और 18 जुलाई, 1947 को शाही संस्तुति मिलने पर यह विधेयक अधिनियम बना। अंतत: भारत 15 अगस्त, 1947 को एक स्वाधीन राष्ट्र बना।

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