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अध्याय 31. इतिहास – राष्ट्रवादी आंदोलन (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 31. इतिहास – राष्ट्रवादी आंदोलन

भारत के लोगों के हित के प्रश्नों को उठाने के लिए जन आंदोलन के रूप में कई राष्ट्रवादी आंदोलन की शुरुआत हुई। इन आंदोलनों की औपचारिक शुरुआत 1885 ई. में हुई और ये 15 अगस्त 1947 तक अनवरत रूप से जारी रहे। 1857 ई. से भारतीय राष्ट्रवाद के उदय का प्रारंभ माना जाता है। राष्ट्रीय साहित्य और देश के आर्थिक शोषण ने भी राष्ट्रवाद को लाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन आंदोलनों में लोगों को स्वयं कार्यवाही करने के लिए उत्साहित किया जाता था या उन लोगों से निवेदन किया जाता था। यद्यपि इन आंदोलन के कारण भारत को प्रत्यक्ष रूप से स्वतंत्र नहीं मिली, किंतु इनसे भारत के लोगों में राष्ट्रवाद की भावना भर गई। कई लोगों ने सरकारी कार्य तथा स्कूल, कारखानें और सेवाएँ छोड़ दी।
पहला विश्वयुद्ध
प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1919 ई. तक चलने वाला एक विश्व स्तरीय युद्ध था। इसमें विश्व के 3 महाद्वीप यूरोप, एशिया और अफ्रीका के बीच जल, थल और आकाश में युद्ध लड़ा गया था। इस युद्ध में भाग लेने वाले देशों की संख्या, इसका क्षेत्र और इससे हुई हानि के अभूतपूर्व आँकड़ों के कारण ही इसका विश्व युद्ध नामकरण किया गया। इस युद्ध को ग्रेट वार या ग्लोबल वार कहा गया है। यह युद्ध 52 महीनों तक लड़ा गया।
खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन
ब्रिटिश शासन के प्रति बढ़ते क्रोध ने खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन को जन्म दिया। 1919 ई. में मोहम्मद अली और शौकत अली एवं कुछ अन्य के नेतृत्व में तुर्की के साथ हुए अन्याय के विरुद्ध खिलाफत आंदोलन चलाया गया था। तुर्की के सुल्तान को खलीफा या मुस्लिमों का धर्म गुरु भी माना जाता था। खिलाफत के मुद्दे को लेकर शुरु हुआ आंदोलन जल्द ही स्वराज और पंजाब में दमन के विरोध में चलाए जा रहे आंदोलन के साथ मिल गया। यह आंदोलन तुर्की और पंजाब में हुए अन्याय के विरोध और स्वराज की प्राप्ति के लिए शुरू हुआ था। इसमें अपनाये गये तरीकों के कारण इसे असहयोग आंदोलन कहा गया। इसकी शुरुआत ब्रिटिशों द्वारा भारतीयों को प्रदान की जाने वाली ‘सर’ की उपाधि की वापसी के साथ हुई थी।
सविनय अवज्ञा की ओर
गांधीजी की डांडी यात्रा के पश्चात् सविनय अवज्ञा आन्दोलन की शुरुआत हुई। 1930 ई. में गांधीजी ने आह्वान किया कि वह नमक कानून तोड़ने के लिए यात्रा निकालेंगे। उस समय नमक के उत्पादन और बिक्री पर सरकार का एकाधिकार होता था। यह यात्रा 12 मार्च, 1930 को आरंभ हुई और गांधीजी तथा उनके अनुयायी साबरमती से 200 किलोमीटर का सफर तय कर डांडी पहुँचे। गांधीजी ने नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा, जो देशव्यापी विद्रोह का संकेत था। देशभर में शराब की दुकानों, अफीम के अड्डों और विदेशी वस्त्रों को बंद किया गया। गांधीजी की प्रभावशाली अपील से प्रेरित होकर हजारों महिलाएँ सविनय अवज्ञा आन्दोलन में शामिल होने के लिए आगे आयीं। इस आन्दोलन को कुचलने के लिए सरकार ने दमनात्मक रवैया अपनाया। नेताओं व हजारों कार्यकर्ताओं को जेल में ठूंस दिया गया। प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। देश में अब खुले विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी। अत: यह आन्दोलन देश के कोने-कोने में फैल गया।
1937 ई. का चुनाव
भारतीय जनता के साझा संघर्षों के फलस्वरूप 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट में प्रांतीय स्वायत्तता का प्रावधान किया गया। सरकार ने ऐलान किया कि 1937 में प्रांतीय विधायिकाओं के लिए चुनाव कराए जाएँगे। मतदान का अधिकार केवल 14 प्रतिशत जनसंख्या को प्रदान किया गया। कांग्रेस ने 11 प्रांतों में से 9 में मंत्रालयों का गठन किया और सभी सीटों पर प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों में से भी केवल एक-तिहाई सीट प्राप्त कर सकी। इन मंत्रालयों ने शिक्षा आर्थिक सुधारों तथा प्रेस और राजनीतिक गतिविधियों पर से प्रतिबंध उठाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया।
अगस्त क्रान्ति (1942 ई.)
1942 की अगस्त क्रान्ति भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में अंग्रेजी साम्राज्यवाद से मुक्ति-संघर्ष की गाथा है। स्वाधीनता आन्दोलन के संघर्ष में 1857 का मुक्ति संग्राम उल्लेखनीय है। इसमें हर वर्ग, ज़मींदार, मज़दूर और किसान, स्त्री और पुरुष, हिन्दू और मुसलमान – सभी लोगों ने अपनी एकता एवं बहादुरी का परिचय दिया। ‘अगस्त क्रान्ति’ या 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ को हम भारतीय स्वाधीनता का द्वितीय मुक्ति संग्राम कह सकते हैं। इसके फलस्वरूप 5
वर्ष बाद 1947 में हमें आजादी मिली।
पाकिस्तान की माँग (1940 ई.)
सन् 1940 में मुस्लिम लीग ने देश के पश्चिमोत्तर तथा पूर्वी क्षेत्रों में मुसलमानों के लिए ”स्वतंत्र राज्यों“ की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया। 1937 के प्रांतीय चुनावों के परिणाम से मुस्लिम लीग को इस बात का यकीन दिला दिया था कि भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं और किसी भी लोकतांत्रिक संरचना में उन्हें हमेशा गौण भूमिका निभानी पड़ेगी। तीस के दशक में मुस्लिम जनता को अपने साथ लामबंद करने में कांग्रेस की विफलता ने भी लीग को अपना सामाजिक जनाधार फैलाने में मदद की। 1945 में विश्व युद्ध खत्म होने के पश्चात् अंग्रेजों ने भारतीय स्वतंत्रता के लिए कांग्रेस और लीग से वार्ता शुरू कर दी परंतु यह वार्ता असफल रही क्योंकि लीग का कहना था कि उसे भारतीय मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि माना जाए। अत: उसने एक पृथक राष्ट्र पाकिस्तान की मांग की।
क्रिप्स प्रस्ताव (1942 ई.)
क्रिप्स मिशन का मुख्य उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध में भारत का सहयोग प्राप्त करना था। युद्ध का खतरा भारतीय मूल तक आ गया था। युद्ध प्रयासों में भारतीयों का शत-प्रतिशत सहयोग प्राप्त करना मित्र राष्ट्रों की जरूरत बन गया था। परिणामस्वरूप भारत के राजनीतिक संकट को हल करने के लिए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने 11 मार्च 1942 को क्रिप्स मिशन की घोषणा की। 23 मार्च 1942 को क्रिप्स स्टैफर्ड के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल भारत आया, जिसे क्रिप्स मिशन कहा गया। भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों व हिन्दू महासभा और उदारवादी दलों के नेताओं के साथ विचार और विमर्श किया गया। अत: द्वितीय महायुद्ध में भारतीय जनता का सहयोग प्राप्त करने के लिए 30 मार्च 1942 को क्रिप्स प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। जो प्रस्ताव भारतीय जनता के समक्ष प्रस्तुत किये गये उन्हें क्रिप्स मिशन के नाम से जाना जाता है।
भारत छोड़ो आन्दोलन (1942 ई.)
8 अगस्त, 1942 को कांग्रेस ने ‘भारत छोड़ो’ नामक एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें ब्रिटिश सरकार की तुरंत समाप्ति को एक अनिवार्य आवश्यकता बताया गया। महात्मा गांधी ने लोगों को ”करो या मरो“ का नारा दिया, साथ ही उन्हें इस बात के प्रति भी आगाह किया कि यह आंदोलन पूर्णतया अहिंसक होना चाहिए।
‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ ब्रिटिश सरकार के खिलाफ एक सर्वप्रिय विद्रोह था। अग्रणी नेताओं की गिरफ्तारी, सरकार के उत्पीड़न, मुस्लिम लीग की उदासीनता और द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र शक्तियों के एकजुट हो जाने की वजह से यह आंदोलन विफल हो गया।

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