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अध्याय 3 आनुवंशिकता तथा वातावरण का प्रभाव (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 3 आनुवंशिकता तथा वातावरण का प्रभाव

आनुवंशिकता की परिभाषा तथा स्वरूप

व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले प्रमुख घटकों में से आनुवंशिकता एक प्रमुख घटक है। अंग्रेजी भाषा में इसे हेरेडिटी (Heredity) कहते हैं। इसकी उत्पत्ति लैटिन शब्द हेरीडिटीस (Heredities) से हुई है। आनुवंशिकता का अर्थ व्यक्तियों या बच्चों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी निरन्तर संचरित होने वाले बौद्धिक, शारीरिक, मानसिक तथा व्यक्तित्व संबंधी गुणों से है। आनुवंशिकता से हम जान पाते हैं कि शिक्षार्थी किस प्रकार अपनी वंशानुगत क्षमता के अनुसार विकसित होता है। इस तथ्य के अनुसार प्रजातिगत विशेषताएँ व लक्षण (Symptoms) माता-पिता के अनुरूप ही बच्चों में पाये जाते हैं।
बील्स तथा हायजर (Bills & Haizer) के अनुसार, ”वंशानुक्रम का अर्थ साधारणतया उस प्रक्रिया से है, जिसके अनुसार दो भिन्न व्यक्ति अपने ही समान बालक को जन्म देते हैं।”
बेकन (Bacon) के अनुसार, ”दो पीढ़ियों को जोड़ने वाली शृंखला को हम वंशानुक्रमण कहते हैं।”
थॉमसन (Thomson) ने कहा है, “वंशानुक्रम आगामी पीढ़ियों के बीच उत्पत्ति संबंधी संबंध समझने के लिए एक सुविधाजनक शब्द है।”
बैलर (Baller) तथा चार्ल्स (Charles) ने व्यक्ति के व्यवहार से संबंधित ऐसे गुणों की सूची बनायी थी, जो उन्हें आनुवंशिक रूप से प्राप्त होते हैं। शिक्षार्थी को वंशानुगत रूप से विशेश प्रकार की संरचना प्राप्त होती है तथा उसी के अनुरूप उसका व्यवहार भी विकसित होता है। इनमें निम्नलिखित गुण शामिल होते हैं –
► विशेश भार ग्रहण करने की क्षमता
► शरीर की कद-काठी जैसे शारीरिक ढाँचा, मांसपेशियों का निर्माण तथा हाथ-पैर आदि की लंबाई
► लिंग
► शारीरिक बनावट जैसे त्वचा, बाल का रंग, आँखों का रंग, नाक-कान की बनावट तथा सिर की बनावट आदि
► प्राकृतिक अनुक्रिया, स्नायु तंत्र की प्रक्रिया, बौद्धिक क्षमता, शीघ्र एवं देरी से व्यवहार करने की क्षमता
► संवेदी क्षमता – देखने, सुनने, स्पर्श करने तथा सूंघने की कम या अधिक क्षमता
► शारीरिक विकास की गति
► कुछ लक्षणों की ओर पूर्वप्रवृत्ति बच्चे को माता-पिता की सम्पूर्ण विशेषताएँ आनुवंशिक प्रक्रिया में जीन्स (Genes) द्वारा ही नहीं प्राप्त होती हैं। गर्भाधान काल में ये जीन्स भिन्न-भिन्न प्रकार से संयुक्त होते हैं। जिसे भिन्नता का नियम (Law of Variation) कहते हैं। प्रत्यागमन नियम (Law of Regression) के अनुसार, प्रतिभा-सम्पन्न माँ-बाप की सन्तान मन्द बुद्धि की हो सकती है। बालक मूल रूप से माता-पिता की कुछ-विशेषताएँ प्राप्त करता है जो कि जीन्स के कारण ही सम्भव हो पाता है। अत: स्पष्ट है कि आनुवंशिकता के वाहक जीन्स होते हैं। मानव शरीर लाखों कोष्ठों अथवा कोशिकाओं से निर्मित होता है। जैसे-जैसे शारीरिक संरचना का विकास होता है, इन कोशिकाओं की संख्या में भी वृद्धि होती है। एक बच्चे को ऐसी आधी कोशिकाएँ माता एवं आधी पिता से प्राप्त होती हैं। मूल रूप से ये कोशिकाएँ अनेक रासायनिक पदार्थों का बहुत छोटा-सा मिश्रण होता है। इसे ‘कोशारस’ एवं ‘कोष केन्द्र’ के दो भागों में बाँटा जाता है।
कोशारस अर्द्ध-द्रव एवं चिपचिपा होता है, जबकि कोष केन्द्र एक बुलबुले की तरह कोशारस में विद्यमान रहता है। जीव-निर्माण प्रक्रिया में दो आधी-आधी कोशिकाएँ संयोजित रहती हैं। शरीर के प्रत्येक कार्य के लिए जिन रासायनिक पदार्थों या एन्जाइम की आवश्यकता होती हैं, उनका निर्माण इन जीऩों द्वारा होता है। इस प्रकार मनुष्य में स्थित गुण एवं अवगुण की वंशानुगत विशेषताएँ विभिन्न जीनों के संचरण (Transmission) के कारण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होती रहती हैं। मेण्डल के अनुसार, ‘यदि एक बालक को घर का वातावरण न मिले तो उसका बौद्धिक विकास कम होता है।’

आनुवंशिकता का प्रभाव

वंशानुगत लक्षण

(i) प्रभावी लक्षण: माता-पिता के वे वंशानुगत लक्षण जो संतान में दिखाई देते हैं प्रभावी लक्षण कहलाते हैं। जैसे मेंडल के प्रयोग में लंबा पौधा का “T” लक्षण, प्रभावी लक्षण है जो अगली पीढ़ी में भी दिखाई देता है।
(ii) अप्रभावी लक्षण: माता-पिता से संतान में आये वे वंशानुगत लक्षण जो छिपे रहते हैं उसे अप्रभावी लक्षण कहते हैं।
जीनोटाइप: जीनोटाइप एक जीनों का समूह है जो किसी व्यक्ति के विशिष्ट लक्षणों के लिए उत्तरदायी होता है। यह कोशिकाओं में उपस्थित आनुवंशिक सूचना होती है जो किसी व्यक्ति में हमें प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देती है।
यह दो विकल्पीय-युग्म (alleles) सूचनाएँ होती हैं जिन्हें निरीक्षण द्वारा देखा नहीं जा सकता है। इसका पता जैविक परीक्षणों से लगाया जाता है। ऐसी सूचनाएँ वंशानुगत लक्षण होती हैं जो माता-पिता से अगली पीढ़ी में जाती हैं। जीनोटाइप का उदाहरण:
► आँखों के रंग के लिए उत्तरदायी जीन  बालों के रंग के लिए उत्तरदायी जीन  लंबाई के लिए उत्तरदायी जीन  आनुवंशिक बीमारियों के लिए उत्तरदायी जीन आदि जीनोटाइप बदलाव निम्न तरीकों से किया जा सकता है:
(i) जीन या गुणसूत्रों में परिवर्तन करके
(ii) जीनों का पुन: संयोजन करके
(iii) जीनों का संकरण करके

वातावरण की परिभाषा

डगलस तथा हालैंड के अनुसार, ‘किसी व्यक्ति पर पड़ने वाले समस्त प्रभावों, शक्तियों तथा सामूहिक रूप से वर्णित दशाओं को वातावरण कहते हैं। यह जीवित प्राणियों के जीवन, स्वभाव, व्यवहार, बुद्धि, विकास तथा परिपक्वता को प्रभावित करता है।
एनास्टैसी के अनुसार, ‘वातावरण वह चीज है जो किसी व्यक्ति या शिक्षार्थी को उसके जीवन के अलावा प्रभावित करती है।’
वुडवर्थ के अनुसार, ‘वातावरण या परिवेश में वे सभी बाहरी तत्व आते हैं जो किसी व्यक्ति को जन्म से ही प्रभावित करते हैं।’

वातावरण का प्रभाव

► बुद्धि आनुवंशिकता (प्रकृति) तथा वातावरण अर्थात् पर्यावरण की जटिल अंर्तक्रिया का परिणाम होती है। पर्यावरण या परिवेश में किसी व्यक्ति के आस-पास के जल, वायु, पहाड़, पठार, नदी आदि शामिल होते हैं। इसे वातावरण या परिवेश के नाम से भी जाना जाता है।
► वातावरण किसी शिक्षार्थी के विकास का महत्वपूर्ण कारक है। शिक्षार्थी के विकास में आनुवंशिकता के साथ ही वातावरण का भी बराबर का योगदान होता है। व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक इसे सामाजिक वंशानुक्रम भी कहते हैं और वे इसे आनुवंशिकता से अधिक महत्व देते हैं।
► वातावरण क्रमश: आन्तरिक एवं बाह्य दो प्रकार के होते हैं।

आनुवंशिकता तथा वातावरण का संबंध

आनुवंशिकता द्वारा किसी व्यक्ति की बुद्धि की परिसीमाएँ निर्धारित की जाती हैं। बुद्धि का विकास उस परिसीमन के अंतर्गत पर्यावरण में उपलब्ध अवलंबों और अवसरों द्वारा तय होता है। अगर व्यक्ति का वातावरण प्रेरक है तो उसकी बुद्धि का विकास आसान हो जाता है। परंतु किसी भी स्थिति में उसकी बुद्धिलब्धि परिसीमाओं द्वारा तय किये गये बौद्धिक स्तर के परे नहीं जा सकती। यह परिसीमित बुद्धि ही उच्चतम बौद्धिक स्तर है जो इंसान अपने पूरे जीवनकाल में हासिल कर सकता है।

आनुवंशिकता तथा वातावरण का बुद्धि पर प्रभाव

► शिक्षार्थी द्वारा पाठ्यक्रम को सीखने उसे समायोजित करने तथा निर्णय लेने की योग्यता को बुद्धि कहते हैं। तेज बुद्धि वाले शिक्षार्थियों का मानसिक विकास भी जल्द होता है।
गोडार्ड के अनुसार, आनुवंशिक रूप से मन्दबुद्धि वाले अभिभावक की सन्तान भी सामान्यत: मन्दबुद्धि वाली होती है। इसी तरह तीव्रबुद्धि वाले अभिभावक की सन्तान की बुद्धि भी तीव्र होती है।
► शिक्षार्थी की संवेगात्मक क्षमता का विकास भी उसकी मानसिक क्षमता के अनुसार ही होता है।
► शिक्षार्थियों में सामाजिक एवं पारिवारिक वातावरण के अनुरूप ही उनके संवेगों का विकास होता है। क्रोध या ईर्श्या जैसे संवेगों का उसके विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
► यदि शिक्षार्थी संवेगात्मक रूप से असन्तुलित हों तो वे सीखने में ध्यान नहीं दे पाते हैं और इससे उनका मानसिक विकास प्रभावित होता है।
► मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि प्रजाति के कारण भी बुद्धि की श्रेश्ठता निर्धारित होती है।

शिक्षार्थी का विकास एवं वातावरणीय कारक

► शिक्षार्थी को जन्म से लेकर जीवनपर्यन्त प्रभावित करने वाले तत्वों को वातावरण में सम्मिलित किया जाता है। यह वातावरण या परिवेश उसके मानसिक एवं शारीरिक विकास को प्रभावित करता है।
► गर्भावस्था के दौरान बच्चे की माता का मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य उस बच्चे के लिए प्रारंभिक वातावरण तैयार करने का प्रमुख कारक है।
► शिक्षार्थी के विकास के लिए प्रतिकूल वातावरण, जैसे पूर्वाग्रह से ग्रसित शिक्षक, जो मान लेते हैं कि शिक्षार्थी अपने सामाजिक परिवेश के कारण दिया गया कार्य नहीं कर सकता है, उसके बौद्धिक विकास के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है।

शिक्षार्थी का विकास एवं पालन-पोषण का प्रारूप

शिक्षार्थी या बच्चे के विकास में उसकी जैविक आवश्यकताओं की पूर्ति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शिशुकाल में यदि बच्चे को उचित देखभाल मिलती है तो उनमें सुरक्षा की भावना पैदा होती है। शिशु को कम या अधिक दूध पिलाने से उसके मौखिक व्यक्तित्व (Oral) के चिह्न दिखायी पड़ते हैं। जैसे नियमित रूप से आहार नहीं मिलने से विश्वास तथा अविश्वास की भावना प्रकट होने लगती है। इसी प्रकार शिशु को यदि कश्ट हो तो उसके व्यक्तित्व में शंकालु एवं लज्जाशीलता का स्वभाव देखा जाता है।

शिक्षार्थी या शिशु और अभिभावक का परस्पर

संबंध

एक शिक्षार्थी या शिशु जब खुद से अपना आहार खाने लगता है तो अभिभावक के साथ उसका सामाजिक संबंध बनने लगता है। इस स्तर पर शिशु का व्यक्तिक तथा सामाजिक मनोविज्ञान उसे सामाजिक प्राणी बनने में मदद करते हैं। अभिभावक के व्यवहार का उसके व्यवहार पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है:
► यदि अभिभावक, शिशु से बिल्कुल स्नेह नहीं करते हैं तो उसके स्वभाव में आक्रामकता, दूसरों से तालमेल बिठाने में कठिनाई, असुरक्षा की भावना, जिद्दीपना, अवज्ञाकारी जैसे लक्षण परिलक्षित होते हैं।
► शिशु को अधिक लाड़-प्यार मिलता है अथवा उसे नासमझ ही समझा जाता है तो वह एकांत में रहने वाला, दब्बू, बालपन की भावना वाला हो जाता है।
► यदि शिक्षार्थी को अत्यधिक दबाव में रखा जाता है तो उसमें आज्ञाकारी, विनम्रता, असहयोगी भावना, साहसी, शर्मीलापन, रूखे स्वभाव के जैसे लक्षण पाये जाते हैं।
► शिक्षार्थी के अभिभावक जब बहुत विनम्र स्वभाव के हों तो वह लापरवाह, अवज्ञाकारी, स्वतंत्र वृत्ति का, आत्मविश्वासी अथवा विक्षिप्त स्वभाव का हो सकता है।
► शिक्षार्थी जब एक संतुलित परिवार में पल रहा हो तो वह मिलनसार, शांत चित्त वाला, अनुकूल, दूसरों के साथ बेहतर व्यवहार करने वाला हो सकता है।
► जब किसी बच्चे या शिक्षार्थी को उसके परिवार में सभी प्यार करते हों अर्थात् वह सभी के लिए स्वीकार्य हो तो वह सामाजिक दृश्टि से भी सहज स्वीकार्य तथा भावी कठिनाई से जूझने वाला होता है।
► शिक्षार्थी के अभिभावक यदि तर्कशील या वैज्ञानिक स्वभाव वाले हों तो वह आत्म निर्भर, सहयोगी एवं अपनी जिम्मेदारी समझने वाला होता है।

एकल अथवा संयुक्त परिवार के वातावरण का शिशु पर प्रभाव

एकल परिवार, शिशु को बहुत प्यार देते हैं जो उसे आत्मकेन्द्रित एवं अन्तर्मुखी बनाते हैं। इसके विपरीत संयुक्त परिवार में वह बहिर्मुखी तथा मिलकर रहने वाला होता है। किसी शिक्षार्थी की मनोदशा उसके परिवार की सामाजिक स्थिति के अनुसार निर्धारित होती है। जैसे एक मध्यमवर्ग क े शिशु मे ं अपनी समझ-बझू से वातावरण के अनुसार बदलने की क्षमता, स्वत: निर्णय लेने की भावना विकसित होती है। वहीं किसी गरीब परिवार के अभिभावक अपने शिशु को स्वतंत्र निर्णय लेने में मदद नहीं कर पाते हैं। वे अपने शिशुओं को नियंत्रित रखते हैं। इससे इन दोनों परिवारों के शिशुओं का प्रेरणा स्तर भी प्रभावित होता है।

शिशु का परिवार एवं उसका लिंग निर्धारण

शिक्षार्थी के जैविक लिंग के अनुसार ही वह समाज में अपनी भूमिका का निर्वाह करता है। उसकी जीवन पद्धति समाज के सांस्कृतिक एवं सामाजिक वातावरण के अनुसार निर्धारित होती है। एक लड़का कार, बंदूक जैसे खिलौनों से खेलना पसंद करता है परंतु लड़की रसोई के सामान से संबंधित खिलौने पसंद करती है। खिलौनों के इस पसंद के पीछे सामाजिक वातावरण प्रमुख कारक है। बचपन से ही शिशु से कहा जाता है कि वह लड़का/लड़की है और इसलिए उसे इसी प्रकार से व्यवहार करना चाहिए। इस प्रकार शिक्षार्थी के व्यक्तित्व का निर्माण अनजाने में होता है।

सहोदर संबंध का वातावरण पर प्रभाव

परिवार में किसी शिशु का जब सहोदर भाई या बहन जन्म लेता/लेती है तो उसकी मनोदशा परिवर्तित हो जाती है। दो सहोदर कभी आपस में सहयोगी बनते हैं तो कभी वे एक-दूसरे से लड़ पड़ते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अकेले जन्मे शिशु का व्यवहार सहोदरों से भिन्न होता है। एकल शिशु की अधिक देखभाल की जाती है जिससे वह आत्मकेन्द्रित हो जाता है। परिवार का पहला शिशु, दूसरे शिशु के आने पर उसके प्रति ईर्श्या से भर जाता है क्योंकि अभिभावक दूसरे शिशु को अधिक प्यार करने लगते हैं। इसी प्रकार जिन शिशुओं से एक बड़ा तथा एक छोटा होता है उस बीच वाले शिशु का व्यवहार दोनों से भिन्न होता है। उसमें कुछ हीन ग्रंथि हो जाती है क्योंकि उसे बड़े तथा छोटे शिशु की अपेक्षा कम लाड़-प्यार मिलता है। ऐसा पाया गया है कि परिवार के पहले शिशु अति प्रतिभाशाली होते हैं तथा सबसे बाद में जन्म लेने वाले शिशु रचनात्मक तथा अर्थपूर्ण कार्य करने वाले होते हैं।

आस-पड़ोस के वातावरण का शिक्षार्थी पर प्रभाव

शिक्षार्थियों के सांस्कृतिक वातावरण के लिए आस-पड़ोस महत्वपूर्ण कारक है। शिक्षार्थी पड़ोस के सामाजिक वातावरण एवं जीवन मूल्यों से बहुत कुछ सीखता है। सामान्यत: पड़ोस का जीवन मूल्य एवं शिक्षार्थी के परिवार का जीवन मूल्य समान ही होता है। यदि यह भिन्न हो तो उसका शिशु पर गहरा प्रभाव पड़ता है। पड़ोसी उसके व्यवहार में हस्तक्षेप नहीं करते हैं परंतु उसके व्यक्तित्व पर अवलोकन एवं दिखावे का प्रभाव पड़ता है।

समवयस्क शिशुओं का प्रभाव

शिशु का प्रथम सम्पर्क अपने समवयस्क शिशुओं के साथ होता है। समान आयु वर्ग के इन शिशुओं के साथ एक शिशु सामाजिकता सीखता है। जैसे एक शिशु या शिक्षार्थी सीखता है कि अपनी स्वीकार्यता के लिए उसे अपने कुछ हठ छोड़ने होंगे। इसी प्रकार वह अपनी बारी की प्रतीक्षा करना सीख लेता है और अपना आग्रह छोड़ कर समूह की बात मानने लगता है। वह दल के सदस्य के रूप में अपनी भूमिका तथा उसके अनुरूप व्यवहार करना सीखता है।

विद्यालय का वातावरण पर प्रभाव

किसी शिक्षार्थी के लिए उसके विद्यालय के सहपाठी ही पहले औपचारिक समुदाय के रूप में होते हैं। विद्यालय का वातावरण किसी शिक्षार्थी के विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है। विद्यालय में शिक्षार्थी विभिन्न गतिविधियों जैसे सहपाठी को किसी कार्य में अच्छा करते देखकर उसे करना, विशयों को क्रम से पढ़ना, खेल में सहयोग करना, समय पर पहुँचना अर्थात् समय की पाबंदी आदि से सीखने के लिए अभिप्रेरित होता है। इसी प्रकार विद्यालय में कई धारणाएँ जैसे विद्यालय में मानक भाशा में शिक्षा प्राप्त करने से वह मातृभाशा को कम महत्व देता है। विद्यालयी शिक्षण तथा घरेलू यथार्थता के बीच के विरोधाभासों के कारण शिक्षार्थी कई बातों को छिपाता है अथवा झूठ बोलता है। इन धारणाओं से एक शिक्षार्थी की सीखने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। कभी-कभी इससे जीवन में लापरवाही भी उत्पन्न होती है।

जनसंचार के साधन का वातावरण पर प्रभाव

शिक्षार्थी को संचार के साधन जैसे रेडियो, दूरदर्शन, समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, इन्टरनेट तथा सोशल मीडिया आदि सामग्री संस्कृति के गौण पहलुओं से परिचित कराते हैं। संस्कृति की विविधता शिक्षार्थी को दूसरे जीवन दर्शन, रहन-सहन की शैली से परिचित कराकर उसे सीखने के लिए अभिप्रेरित करती है। एक शिक्षार्थी अपनी परिचित जीवन शैली अथवा संस्कृति को उस नयी संस्कृति से मिलाता है और सांस्कृतिक संघर्श के बाद इनके प्रति सामंजस्य बना लेता है।

आनुवंशिकता तथा वातावरण के बाल विकास पर पड़ रहे प्रभावों का शैक्षिक महत्व

► शिक्षार्थियों के विकास एवं सीखने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षकों को उनकी आनुवंशिकता तथा वातावरण की पूरी जानकारी होना आवश्यक है। यदि शिक्षक अपने शिक्षार्थी के आनुवंशिक एवं जैविक गुणों को जानता हो तो वह शिक्षार्थी के बौद्धिक विकास तथा समायोजन संबंधी समस्याओं को सुलझा सकता है। जैसे कोई शिक्षार्थी कक्षा में पढ़ते समय सो जाता है क्योंकि उसके अभिभावक रात में देरी से सोते हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षक अभिभावक से बात करके या फिर विद्यालय में थोड़ी देर सोने की अनुमति देकर उसकी समस्या सुलझा सकते हैं।
► शिक्षा का उद्देश्य शिक्षार्थियों में शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक तथा चारित्रिक विकास करना है जिसके लिए आनुवंशिकता एवं वातावरण दोनों पक्ष महत्वपूर्ण होते हैं। किसी शिक्षार्थी का आनुवंशिक गुण अच्छा हो परंतु उसका परिवेश अच्छा नहीं है तो शैक्षिक विकास में कमी आएगी।
► कुछ आनुवंशिक गुणों को वातावरण द्वारा भी सुधारा नहीं जा सकता; जैसे मंदबुद्धि या औसत बुद्धि के शिक्षार्थी को वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर बनाना बहुत मुश्किल काम है। ऐसे शिक्षार्थियों को दूसरे कार्यों में दक्ष किया जा सकता है।
ब्लेयर, जोन्स तथा सिम्पसन (Blair, Jones & Simpson) के अनुसार, ‘शिक्षक को चाहिए कि वह शिक्षार्थी के सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक वातावरण को पहचाने ताकि वह शिक्षार्थियों की आवश्यकता एवं लक्ष्य के अनुरूप शिक्षण पद्धति अपना सके।’
► उदाहरणस्वरूप, यदि कोई शिक्षार्थी अपनी सामाजिक स्थिति के कारण पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं होता है और सोचता है कि पढ़-लिखकर भी पारंपरिक काम ही करना है। ऐसी स्थिति में शिक्षक उसे महापुरुशों की जीवनी द्वारा अपनी सामाजिक स्थिति को बदलने तथा सीखने के लिए अभिप्रेरित कर सकता है।
► कमजोर मनोदशा वाले शिक्षार्थियों की समस्या सुलझाने के लिए शिक्षक विद्यालय में कई कार्यक्रमों जैसे कि सुलेखन अभ्यास का आयोजन कर शैक्षिक वातावरण को बेहतर कर सकता है।

शिक्षार्थियों के लिए वातावरण का महत्व

फ्रेंज बोन्स के अनुसार, ‘वातावरण में बदलाव के कारण शिक्षार्थी का शारीरिक विकास प्रभावित होता है। उनके अनुसार विभिन्न प्रजातियों के शारीरिक अंतर का कारण वंशानुक्रम न होकर वातावरण है।’
► सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण का प्रभाव बालक के मानसिक विकास पर पड़ता है। उचित सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण न मिलने पर बालक के मानसिक विकास की गति धीमी हो जाती है।
क्लार्क के अनुसार, कुछ प्रजातियों की श्रेष्ठता का कारण वंशानुक्रम न होकर वातावरण है। भारत में आदिवासियों का मानसिक स्तर उच्च जातियों की तुलना में बहुत निम्न है, क्योंकि उन्हें उच्च जातियों के समान शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक वातावरण उपलब्ध नहीं है।
कूले के अनुसार, ‘व्यक्तित्व पर वंशानुक्रम की अपेक्षा वातावरण का अधिक प्रभाव पड़ता है।’ बहुत से ऐसे विद्वानों के उदाहरण हैं जिनका जन्म निर्धन परिवारों में हुआ था फिर भी वे अपने व्यक्तित्व का विकास करके महान बन सके क्योंकि उनके माता-पिता ने उन्हें उचित वातावरण में रखा था।
► वातावरण संबंधी ज्ञान शिक्षार्थी की समायोजन संबंधी समस्याओं को सुलझाने में सहायक होता है। किसी शिक्षार्थी की समस्याओं की उपेक्षा नहीं करके ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जिससे उस वातावरण का प्रभाव कम हो सके।
► शिक्षार्थी के विकास की दिशा काफी कुछ वातावरण द्वारा निर्धारित होती है। अनुकूल वातावरण मिलने पर शिक्षार्थी सदाचारी और चरित्रवान बनता है। इसी बात को ध्यान में रख कर अभिभावक विद्यालय से बाहर तथा शिक्षक विद्यालय के भीतर के वातावरण को अनुकूल बनाने का प्रयत्न करते हैं।
► मनुष्य के अन्दर अन्तर्निहित शक्तियों का स्वाभाविक विकास उपयुक्त वातावरण में ही हो सकता है। शिक्षार्थी को मूल प्रवृत्तियाँ उसे वंशानुक्रम से प्राप्त होती हैं लेकिन उसका समुचित विकास उपयुक्त वातावरण में ही होता है।

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