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अध्याय 29. इतिहास – 1857–58 का विद्रोह (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 29. इतिहास – 1857–58 का विद्रोह

10 मई 1857 को भारतीय सैनिकों ने मेरठ में बगावत कर दी। अंग्रेजों ने इसे सिपाही विद्रोह का नाम दिया। इस विद्रोह में भारतीय सैनिकों ने यूरोपीय अधिकारियों को मारकर दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गये। लाल किले में पहुँचकर उन्होंने वयोवृद्ध और शक्तिहीन मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट घोषित कर दिया।
यह विद्रोह अंग्रेजों की आक्रामक साम्राज्यिक नीतियों के विरुद्ध आन्दोलन था। वास्तव में यह आन्दोलन अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष था। इस आन्दोलन ने अंग्रेजी शासन को हिला दिया था। इस विद्रोह के प्रमुख केन्द्र दिल्ली, मेरठ, बरेली, आगरा, कानपुर, लखनऊ, झांसी आदि थे। इस विद्रोह के मुख्य नेता नाना साहब, तात्या टोपे, अजीमुल्लाह, बेगम हज़रत महल, मौलवी अहमदुल्लाह, रानी लक्ष्मीबाई, खान बहादुर खान और वीर कुंवर सिंह थे। यह विद्रोह भारत से ब्रिटिश शासन को समाप्त करने में असफल रहा। इस विद्रोह की असफलता के मुख्य कारण इसका स्थानीय और असंगठित होना, कमजोर नेतृत्व तथा धन व हथियारों का अभाव था।
1857 के विद्रोह के कारण राजनीतिक कारण
अंग्रेजों द्वारा विभिन्न राज्यों को अपने राज्य में मिलाने की नीति के द्वारा औपनिवेशीय विस्तार की प्रवृत्ति भारतीयों में असन्तोष का प्रमुख कारण था। अंग्रेज इंग्लैण्ड के लिए अधिक से अधिक धन की उगाही करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने विलय की नीति को अपनाया जिसे ”डाक्टरीन ऑफ लैप्स“ कहा गया। विलय की नीति के अतिरिक्त अंग्रेजों ने सहायक सन्धि के द्वारा अनेक स्वतंत्र राज्यों को अंग्रेजी शासन में मिला लिया। इन सभी नीतियों के जरिए लॉर्ड डलहौजी ने सतारा के मराठा राज्यों नागपुर, झाँसी तथा कई अन्य छोटे राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया। बाजीराव द्वितीय की मृत्यु के बाद उन्हें मिलने वाली पेंशन को बन्द कर दिया गया और उनके गोद लिये गये पुत्र नाना साहिब के पेन्शन प्राप्त करने के दावे को नकार दिया गया। अनेक भारतीय शासकों को कम्पनी का यह हस्तक्षेप पसन्द नहीं आया। अधिग्रहण के सिद्धान्त से पहले भारतीय शासकों को अपने राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में गोद लेने का अधिकार प्राप्त था चाहे वह उनकी अपनी सन्तान न हो लेकिन अब इसके लिए अंग्रेजों से अनुमति लेनी पड़ती थी। लोगों के रहन-सहन, पारम्परिक विश्वासों, मान्यताओं और मानकों में लगातार अंग्रेजों द्वारा हस्तक्षेप किये जाने को लोगों द्वारा उनके धर्म के लिए खतरा समझा जाने लगा और अंग्रेज प्रशासक धीरे-धीरे आक्रामक बनते चले गये तथा भारतीयों व अंग्रेजों के बीच खाई बनती चली गयी।
आर्थिक कारण
इस विद्रोह का एक महत्त्वपूर्ण कारण भारतीय अर्थव्यवस्था का विघटन था। सभी ऊँचे और अधिक वेतन वाले पद अंग्रेजों ने अपने लिए आरक्षित कर लिये। अपने व्यापार को बढ़ाने और विदेशी वस्तुओं के आयात-निर्यात के लिए उन्होंने राजनैतिक नियन्त्रण का प्रयोग किया। भारत से सम्पदा की लूटपाट और धन निकासी के लिए हर उपाय का प्रयोग किया गया। अंग्रेजी नीतियों के अधीन भारतीय अर्थव्यवस्था लगभग तहस-नहस हो गयी क्योंकि अंग्रेजों ने भारतीय व्यापार और उद्योगों को नष्ट करने का प्रयास किया ताकि वे इंग्लैंड के कारखानों में बने सामानों को भारत के बाजारों में खपा सकें। अंग्रेजों द्वारा मशीनों से बुने हुए सस्ते कपड़े भारत में बेचे जाते थे जिससे भारत के कुटीर उद्योग नष्ट हो गए। इसके परिणामस्वरूप लाखों शिल्पकार बेकार हो गये। अंग्रेजों द्वारा इंग्लैण्ड में स्थित कारखानों के लिए कच्चा माल भी भारत से ही भेजा जाता था। इससे भारतीय बुनकरों के लिए कुछ भी नहीं बचा। भारत के शोषण के लिए अंग्रेजों ने कच्चा माल खरीदने और अपना तैयार माल बेचने के लिए भाप से चलने वाले जहाज
(स्टीमशिप) और रेलवे की शुरुआत की। रेलवे ने अंग्रेजों के समक्ष एक बहुत बड़ा बाजार खोल दिया और भारतीय कच्चे माल को विदेशों में निर्यात करना बहुत सरल बना दिया। रेलवे ने कच्चे माल का उत्पादन करने वाले क्षेत्रों को निर्यात करने वाले बन्दरगाह से जोड़ दिया जिससे अंग्रेजी वस्तुओं से बाजार भर गया। अंग्रेजों ने रेलवे की शुरुआत भारत में अपने लाभ के लिए की थी किन्तु इसने भारत में राष्ट्रीय जागरण की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1853 में डलहौजी ने आगरा से कलकत्ता के लिए पहली टेलीग्राफिक लाइन खोली और उसने भारत में डाक सेवा प्रारम्भ की। भूमि अंग्रेजों के लिए लगान वसूली का एक बहुत बड़ा स्रोत था। इसलिए अंग्रेजों ने लगान वसूली बढ़ाने के लिए अनेक उपाय सोचे। भूमि लगान की माँग बढ़ाने के लिए बहुत बड़ी संख्या में लगान वसूल करने वाले ज़मींदारों, व्यापारियों और ऋणदाताओं के हाथों अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ा। इसे रैयतवाड़ी और महलवाड़ी पद्धतियों के जरिए लागू किया गया। उड़ीसा, बंगाल और बिहार की स्थायी व्यवस्था में भूमि पर किसानों के आनुवंशिक उत्तराधिकार को मान्यता प्राप्त नहीं थी। दूसरी ओर यदि वे अपने कुल उत्पादन का 10वां या 11वां भाग अदा नहीं कर पाते थे तो उनकी सम्पत्ति को बेच दिया जाता था। अधिकारी भी उन किसानों को परेशान करते थे जो न्याय न मिलने के विरुद्ध और भविष्य में परेशान किये जाने के डर से बचने के लिए अदालतों में जाते थे। अंग्रेजों द्वारा निर्मित ज़मींदारों का नया वर्ग उनका राजनैतिक सहयोगी बन गया। उन्होंने आवश्यकता के समय उन्हें समर्थन दिया और अंग्रेजों और लोगों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई। यहाँ तक कि कुछ ने तो स्वतन्त्रता आन्दोलन के विरुद्ध अंग्रेजों का साथ भी दिया।
1770 ई. से 1857 ई. के बीच कई बार छोटे-छोटे अकाल पड़े। इस काल में भारतीय किसानों के आर्थिक पतन की ओर उन्मुख होने के प्रमाण मिलते हैं। उपर्युक्त सभी घटकों ने अंग्रेज-विरोधी विचारधारा को फैलाने में सहायता की जो अन्त में 1857 ई. के विद्रोह के रूप में सामने आया।
सामाजिक और धार्मिक कारण
अंग्रेज, भारतीय जनमानस की भावनाओं के प्रति संवेदनशील नहीं थे। सती-प्रथा और कन्या शिशुओं की हत्या का विरोध, विधवा पुनर्विवाह और महिलाओं के लिए शिक्षा जैसे सामाजिक सुधारों ने अनेक लोगों को नाराज कर दिया था। ईसाई मिशनरियों ने लोगों को ईसाई बनाने के उद्देश्य से स्कूल और कॉलेज खोले। 1850 ई. के 22वें अधिनियम के पास होने से धर्मान्तरित ईसाइयों को अपनी पैतृक सम्पत्ति पाने का अधिकार मिल गया। इस कानून ने लोगों में और अधिक चिन्ता और डर पैदा कर दिया। 1806 ई. में मद्रास प्रेजिडेन्सी में सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई गई। जिससे हिन्दुओं व मुसलमानों की धार्मिक आस्था को ठेस पहुँची। हिन्दुओं के माथे से तिलक व मुसलमानों से दाढ़ी कटवायी गयी। इसलिए यह बात स्पष्ट है कि अंग्रेजों ने कभी भी भारतीयों को समझा नहीं।
विद्रोह की असफलता
1857 ई. का विद्रोह भारत के इतिहास की एक बहुत बड़ी घटना रही है लेकिन इतने बड़े संगठित और शक्तिशाली अंग्रेजी सत्ता के सामने सफलता प्राप्त करने के लिए इनके पास बहुत कम अवसर थे। 1857
ई. के विद्रोह को शुरू होने के एक वर्ष के भीतर दबा दिया गया।
1857 ई. के विद्रोह की असफलता के कारणों में एक कारण यह था कि विद्रोहियों के उद्देश्य में एकरूपता नहीं थी। लक्ष्मीबाई ने झाँसी को पुन: प्राप्त करने के लिए लड़ाई की जो कि ‘अधिग्रहण के सिद्धान्त की’ अंग्रेजी नीति के परिणामस्वरूप खो दी थी। यह विद्रोह भारत के कुछ ही क्षेत्रों में प्रभावी रहा। उत्तर में कश्मीर, पंजाब, सिन्ध और राजपूताना इस विद्रोह से दूर रहे। अफगानों और गोरखाओं ने भी अंग्रेजों को समर्थन दिया। भारत के अनेक शासकों ने विद्रोहियों का साथ देने से इंकार कर दिया। मध्य वर्ग, उच्च वर्ग व आधुनिक शिक्षित वर्गों ने विद्रोहियों का साथ नहीं दिया। इस आन्दोलन का नेतृत्व बहुत कमजोर था। भारतीय नेताओं में संगठन और संयोजन की योग्यता नहीं थी। नाना साहब के विद्रोह से बाहर निकलने और बहादुरशाह ज़फर की मृत्यु से पेशवागिरी और मुगल शासन का अन्त हो गया।
1857 के विद्रोह की असफलता के कारणों में एक मुख्य कारण यह भी था कि विद्रोहियों के पास शस्त्रों और धन का अभाव था। विद्रोहियों की संगठन व्यवस्था अच्छी नहीं थी तथा विद्रोहियों में परस्पर कोई समन्वय नहीं था।
विद्रोह की सार्थकता और प्रभाव
1857 ई. के विद्रोह से भारतीय अंग्रेजी शासन को समाप्त करना चाहते थे और इस उद्देश्य से उन्होंने डटकर मुकाबला भी किया।
यद्यपि वे अपने उद्देश्य प्राप्त करने में असफल रहे लेकिन भारतीयों के मन में राष्ट्रीयता का बीज बोने में सफल रहे। भारतीय लोग उन बहादुरों के लिए और भी जागरुक हो गये थे जिन्होंने इस विद्रोह में अपने जीवन का बलिदान दिया। लेकिन यहीं से हिन्दुओं और मुसलमानों में परस्पर अविश्वास की शुरुआत हो गयी जिससे बाद में अंग्रेजों ने इस अविश्वास का लाभ उठाकर भारतीयों का शोषण किया।
यह विद्रोह इस दृष्टि से अद्वितीय है कि इसने जाति समुदाय व वर्ग के बंधनों को समाप्त कर दिया। इस विद्रोह ने पहली बार भारत के लोगों को एकजुट कर दिया और अंग्रेजी शासन को एक चुनौती दी। इस विद्रोह ने अंग्रेजी शासन को अपनी नीतियों में बदलाव लाने के लिए बाध्य कर दिया। अगस्त 1858 ई. में भारत सरकार अधिनियम के द्वारा बोर्ड ऑफ कंट्रोल और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को समाप्त कर दिया गया और भारत के लिए एक स्टेट सेक्रेटरी के पद का निर्माण किया गया। इसमें 15 सदस्यों की एक भारतीय परिषद को शामिल किया गया जो भारत के वायसराय, वह पदनाम जिसे पहले भारत का गवर्नर जनरल कहा जाता था, की सहायता कर सके। भारतीय शासकों को आश्वस्त किया गया कि गोद लेने के उपरान्त उनके उत्तराधिकारी के अधिकार को मान्यता दी जाएगी। इस विद्रोह से अंग्रेजों को हिन्दू-मुस्लिम एकता पर पक्का अविश्वास हो गया था। सिविल और सैनिक प्रशासन में केन्द्रीय पदों पर अंग्रेजों ने अपना सख्त नियंत्रण बनाये रखा। इस विद्रोह ने एंग्लो-इण्डियन इतिहास में केन्द्रीय भूमिका निभायी। इससे अंग्रेज सावधान हो गये और अपने साम्राज्य के प्रति रक्षात्मक भूमिका में आ गये लेकिन भारतीयों के मन में कड़वाहट भरी रही। सेना और तोपखाना विभागों में सभी बड़े पदों को यूरोपियों के लिए आरक्षित कर दिया गया। इससे भारतीयों का अंग्रेजों में परस्पर अविश्वास व डर व्याप्त रहा। नस्लीय कड़वाहट इस संघर्ष की शायद सबसे खराब विरासत रही थी।

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