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अध्याय 22. इतिहास – वास्तुकला (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 22. इतिहास – वास्तुकला

भारतीय वास्तुकला एवं मूर्तिकला का इतिहास बहुत पुराना है। यह भारतीय संस्कृति की विविधता को समझाने के लिए एक कुंजी है। भारतीय वास्तुकला विभिन्न कालों में विभिन्न धर्मों से प्रभावित होती रही है। यूनेस्को ने विश्व प्रसिद्ध स्मारकों की सूची जारी की है जिसमें 830 विरासतों में से 20 भारत में हैं। कला और स्थापत्य शैली भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग मानी जाती है। भारतीय स्थापत्य कला के सबसे प्राचीन और विशिष्ट प्रमाण हड़प्पा सभ्यता के शहरों में पाये जाते हैं। हड़प्पा काल के बाद ही स्थापत्य शैली को हिन्दू, बौद्ध एवं जैन स्थापत्य के रूप में बाँटा गया। मध्यकाल में स्थापत्य कला फारसी और देशी शैलियों से प्रभावित थी। इसके बाद औपनिवेशिक काल में भारतीय स्थापत्य कला पर पश्चिमी स्थापत्य का प्रभाव पड़ा। इस प्रकार भारतीय स्थापत्य का निर्माण देशी शैलियों और बाहरी प्रभावों के कला संश्लेषण से हुआ जिसमें इसने अपनी एक विशेष पहचान बनायी। भारतीय स्थापत्य कला में विभिन्न कालों की स्थानीय और प्रादेशिक सांस्कृतिक परम्पराओं, उपलब्ध सामग्री, सामाजिक आवश्यकताओं, आर्थिक समृद्धि विभिन्न समय के आनुष्ठानिक प्रतीकों को ध्यान में रखा है। वास्तु शास्त्र के अध्ययन से हमें सांस्कृतिक विभिन्नताओं का ज्ञान प्राप्त होता है।
हड़प्पा काल
हड़प्पा, मोहनजोदड़ो तथा सिन्धु घाटी सभ्यता के अनेक स्थलों पर हुई खुदाई से एक अत्यन्त आधुनिक शहरी सभ्यता का पता चलता है जिसे नगरीय सभ्यता कहा गया है। आधुनिक निकासी प्रणाली से पता चलता है कि आर्यों के आने से पहले भारत में एक अतिविकसित संस्कृति का अस्तित्व था। सिन्धु घाटी सभ्यता के स्थलों की खुदाई ए. एस.आई. सर्वेक्षण की देख-रेख में हुई थी जिसकी स्थापना अंग्रेजों ने की थी।
वैदिक काल
हड़प्पा के लोगों के बाद वैदिक आर्य आये। वे लकड़ी, बांस और सरकण्डों के मकानों में रहा करते थे। आर्य संस्कृति कृषि आधारित थी। आर्य अपने शाही महलों को बनाने में नष्ट होने वाली सामग्री जैसे लकड़ी इत्यादि का उपयोग करते थे। दुर्भाग्यवश वैदिक काल का कोई भी ढांचा नहीं प्राप्त हुआ है। हड़प्पा के लोगों ने मुख्य रूप से तीन प्रकार के घरों का निर्माण किया था –
(1) निवास गृह
(2) स्तम्भों वाले बड़े हॉल
(3) सार्वजनिक स्नानागार
► हड़प्पा सभ्यता की स्थापत्य कला की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इस सभ्यता में उत्कृष्ट नगर योजना अपनायी गयी थी और उन नगरों का निर्माण ज्यामितीय पद्धति के आधार पर किया गया था। सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं तथा अच्छी तरह बिछाई गयीं थीं। सिंधु घाटी के नगर नदियों के किनारे बसे थे इसलिए भयंकर बाढ़ों से बर्बाद हो जाते थे। इसलिये जब हम खुदाई करते हैं तो मिट्टी की परतें मिलती हैं। सिंधु घाटी का विनाश किस प्रकार हुआ, यह अभी भी रहस्यमय बना हुआ है। इस सभ्यता के घर (भवन) बहुत अच्छी प्रकार से (पकी हुई ईंटों से) बनाये जाते थे।
► हड़प्पा के लोगों को मूर्तिकला एवं हस्तकला का भी ज्ञान एवं कौशल प्राप्त था। दुनिया में पहली तांबे से बनी नृत्यांगना की मूर्ति मोहनजोदड़ों में पायी गयी है।
► हड़प्पा सभ्यता से अनेक प्रकार की मूर्ति प्राप्त हुई हैं जिनमें योग की मुद्रा में एक पुरुष की मूर्ति, मोहरें, पहनने वाले सुन्दर आभूषण एवं कुबड़ युक्त बैलों की मूर्तियां तथा एक सींग वाले पशुपति आदि शामिल हैं।
बौद्धकाल
छठी शताब्दी ईसा पूर्व भारत में दो नये धर्म जैन धर्म एवं बौद्ध धर्म का उदय हुआ था और वैदिक धर्म में परिवर्तन होने लगा। तभी उसी समय बड़े राज्यों का उदय होना शुरू हुआ। मगध के साम्राज्य के रूप में विस्तृत होने से स्थापत्य कला को और अधिक प्रोत्साहन मिला। भारत की प्रारम्भिक स्थापत्य कला के विकास में बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जिन स्थानों पर बुद्ध के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं, वहीं पर बौद्ध स्तूपों का निर्माण किया गया। बौद्ध काल से जुड़े अनेक स्तूपों का निर्माण हुआ। इनकी विशेषता यह थी कि ये सावधानी से तपाई गयी ईंटों से बने थे। एक स्तूप उनके जन्म स्थान लुम्बिनी में बना है, दूसरा स्तूप गया में बना है जहाँ पीपल के पेड़ के नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था, तीसरा स्तूप सारनाथ में बना है जहाँ बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। आज भी वे स्थान भारत की स्थापत्य कला के प्रतिमान हैं जहाँ बुद्ध से जुड़ी घटनाएँ घटीं तथा वहाँ पर बुद्ध के अवशेषों को रखा गया है। जिस संघ में भिक्षु एवं भिक्षुणी रहते थे वे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल के रूप में जाने जाते हैं। जहाँ बौद्धों और जैनों ने स्तूपों, विहारों तथा चैत्यों का निर्माण शुरू किया वहीं गुप्त वंश के शासन काल में मन्दिरों का निर्माण शुरू हुआ था।
प्राचीन भारत में स्थापत्य कला
भारतीय स्थापत्य कला के एक चरण की शुरुआत मौर्यों के शासन के दौरान शुरू होती है। मौर्यों के शासनकाल में भारत ने हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त की थी। यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर का राजदूत मेगस्थनीज़ मौर्यों के दरबार में आया था। मेगस्थनीज़ ने चन्द्रगुप्त मौर्य के महल को स्थापत्य की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया था। चन्द्रगुप्त मौर्य का महल लकड़ी का बना हुआ तथा विशाल था। अशोक के राज्य काल में स्थापत्य कला ने अत्यधिक उन्नति की थी। मौर्यों की स्थापत्य कला पर फारसी एवं यूनानी का प्रभाव था। अशोक के शासन काल में अनेक एकाश्म पत्थरों के स्तम्भ स्थापित किये गये थे। इन स्तम्भों में ‘धम्म’ की शिक्षाओं का वर्णन किया गया था। शीर्ष पर जानवरों की आकृति वाले स्तम्भ बहुत ही विशिष्ट हैं। सारनाथ का स्तम्भ जिसके शीर्ष पर शेर की आकृति है। इस स्तम्भ को भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रीय चिह्न के रूप में स्वीकृति प्राप्त है। हर स्तम्भ का वजन लगभग 50 टन तथा ऊँचाई 50 फीट है। सांची और सारनाथ के स्तूप मौर्यों की स्थापत्य कला की उपलब्धि के प्रतीक हैं। सांची स्तूप के प्रवेश द्वार पर जातक कथाओं का चित्रण उस समय के कलाकारों के सौंदर्य बोध और कौशल का नमूना है। यूनानी और भारतीय कला के मिश्रण से गन्धर्व कला का विकास हुआ था। गान्धार कला विद्यालय के अन्तर्गत बुद्ध की जीवन्त मूर्तियों में बोधिसत्व को यूनानी देवता के समान बनाया गया है जबकि समस्त विचार प्रेरणा तथा विषय भारतीय थे। उनके शारीरिक सौन्दर्य के लिए महंगे गहने, पोशाक का प्रयोग किया जाता था। सभी मूर्तियाँ पत्थर, टेराकोटा, सीमेन्ट जैसे पदार्थों से बनी थीं लेकिन कुछ मूर्तियाँ मिट्टी की भी होती थीं। मथुरा शैली की आकृतियाँ लाल पत्थर से बनी हुई धब्बेदार थीं उनमें आध्यात्मिकता के दर्शन होते थे। अमरावती स्कूल सातवाहनों के संरक्षण में विकसित हुआ था। गोदावरी के निचले भाग में एक विशाल स्तूप का निर्माण किया गया था। इस स्तूप की नक्काशी बहुत सुंदर ढंग से की गई थी। नागार्जुनकोण्डा भी बौद्धों की स्थापत्य कला के लिए जाना जाता है। बिना खम्भे वाले हिन्दू मन्दिरों का निर्माण गुप्त काल से ही देखने को मिलता है। देवगढ़ का मन्दिर (झांसी) इसका एक उदाहरण है। इस मन्दिर के बीच में गर्भ गृह है जहाँ भगवान की मूर्ति स्थापित की गयी है। भारतीय स्थापत्य के इतिहास में गुफा स्थापत्य का विकास एक महत्त्वपूर्ण चरण है। 2 ई.पू. सदी से 10वीं ईवी के बीच हजारों गुफाओं की खुदाई के साक्ष्य मिलते हैं। इन गुफाओं में सबसे प्रसिद्ध महाराष्ट्र की ‘अजन्ता तथा एलोरा’ और उड़ीसा की ‘उदयगिरि’ गुफा है।
निरावलम्बित मन्दिर
गुप्त वंश के शासन काल में मन्दिरों का निर्माण कार्य शुरू हुआ था तथा यह निर्माण उनके शासन काल के बाद में भी जारी रहा था। दक्षिण भारत में अनेक शासक, जैसे- पल्लव, चोल, पाण्ड्य, होमजाल आदि ने मन्दिरों का निर्माण कराया था। विजय नगर के शासक भी मन्दिरों के निर्माण में अग्रणी थे। महाबलिपुरम में ‘तटीय मन्दिर’ का निर्माण पल्लव शासकों ने करवाया। पल्लवों ने दूसरे संरचनात्मक मन्दिरों का भी निर्माण कराया था। जैसे- कांचीपुरम का ‘कैलाशनाथ मन्दिर’ तथा वैकुण्ठ का ‘पेरूमल मन्दिर’ आदि। चोल शासकों ने भी बहुत सारे मन्दिरों का निर्माण कराया था। इनमें तंजौर का ‘बृहदेश्वर मन्दिर’ बहुत प्रसिद्ध है। चोलों ने दक्षिण भारत में मन्दिर स्थापत्य की एक दूसरी शैली विकसित की थी जिसे द्रविड़ शैली कहा जाता है। इस शैली में मन्दिर में एक शिखर होता है तथा इसमें ऊँची-ऊँची दीवारें होती हैं और प्रवेश द्वार के ऊपर एक गोपुरम होता है। उत्तर और पूर्वी भारत में भी सुन्दर एवं आकर्षक मन्दिरों का निर्माण किया गया था। इन मन्दिरों का निर्माण नगर शैली में किया गया। इनमें अधिकतर मन्दिरों की छत सर्पिल होती है जिन्हें शिखर कहा जाता है। मन्दिरों की वेदी को ‘गर्भ-गृह’ कहते हैं और इसको खम्भों की सहायता से बनाया जाता है जिसको ‘सभा कक्ष’ या मण्डप कहते हैं। लिगंजन के मन्दिर का निर्माण गंग शासकों ने कराया था। इसी तरह के ‘मुक्तेश्वर’ का मन्दिर भुवनेश्वर में तथा ‘जगन्नाथ’ का मन्दिर पुरी में स्थित है। 13वीं शताब्दी में पूर्वी गंग शासक नरसिंह देव प्रथम ने कोणार्क के सूर्य मन्दिर का निर्माण करवाया था। मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड में खजुराहो के मन्दिरों का निर्माण चन्देल शासकों ने 10वीं तथा 11वीं सदी के बीच करवाया था। इनमें ‘कन्दरिया महादेव’ मन्दिर प्रमुख है। ‘दिलवाड़ा मन्दिरों’ का निर्माण सोलंकी शासकों के संरक्षण में हुआ था। यह मन्दिर जैन तीर्थंकरों को समर्पित हैं। इन मन्दिरों में विशिष्ट सुसज्जित मूर्तियाँ हैं जो बिल्कुल सफेद संगमरमर से बनी हैं। गुजरात का ‘सोमनाथ’ मन्दिर, मथुरा का ‘गोविन्द’ मन्दिर, गुवाहाटी का ‘कामाख्या’ मन्दिर, कश्मीर का ‘शंकराचार्य’ मन्दिर आदि महत्वपूर्ण मन्दिर हैं। ये मन्दिर भारतीयों के मन्दिर निर्माण कार्यों में सक्रिय रहने के प्रमाण हैं।
मध्यकालीन स्थापत्य कला
13वीं शताब्दी में तुर्कों के आने से वास्तुकला में एक नई तकनीक का प्रवेश हुआ। फारस, अरब और मध्य एशिया की वास्तुशिल्प कला की शैलियों का भारत में आगमन हुआ। गुम्बज, मेहराब और मीनारें इस काल की इमारतों के अभिन्न अंग थे। शासकों द्वारा बनाये गये महलों, मस्जिदों और मकबरों में ये सभी लक्षण पाये जाते थे। दिल्ली के तुर्की शासकों ने स्थानीय भारतीय शिल्पकारों की सेवाओं का प्रयोग किया जो बहुत ही कुशल थे। मुगल शासन के दौरान स्थापत्य कला में विकास की यह प्रक्रिया और अधिक परिष्कृत हुई और इसने महान ऊँचाइयों को प्राप्त किया। दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद और कुतुब मीनार इस युग की प्राचीनतम इमारते हैं। कुतुब मीनार में 5 मंजिलें हैं और इसकी ऊंचाई 70 मीटर है। अलाउद्दीन खिलजी ने कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद को बड़ा करवाया तथा इसकी चारदीवारी बनवाकर द्वार बनवाया जिसे ‘अल्हाई दरवाजा’ कहते हैं। उन्होंने जल शक्ति से चलित ‘हौज खास’ का निर्माण कराया जो दिल्ली में है। अफगान शासन के दौरान दिल्ली में इब्राहीम लोदी का मकबरा और सासाराम में सूरी का मकबरा बनाया गया। इस समय की स्थापत्य कला दर्शाती है कि किस तरह से निर्माताओं ने देशी शैलियों को अपनाया। तुर्की लोग भारत में बसने की प्रक्रिया में थे। उन्हें मंगोलों की ओर से खतरा होने के कारण ये शासक इमारतों को मजबूत बनवाया करते थे।
क्षेत्रीय साम्राज्यों में स्थापत्य कला
क्षेत्रीय राज्यों जैसे बंगाल, गुजरात की स्थापना के साथ वहाँ के शासकों ने अपनी शैली में कई इमारतें बनाई, जिसमें अहमदाबाद की जामा मस्जिद, जादी सैयद मस्जिद, झूलती मीनार इस वास्तु कला के कुछ उदाहरण हैं। मध्य भारत में भी कई इमारतें बनवाई गई। जैसे- माण्डू में जामा मस्जिद, हिण्डोला महल और जहाज महल। वीदर का महमूद भवन का मदरसा, गुलबर्गा की जामा मस्जिद, बीजापुर में इब्राहीम रोजा और गोल गुम्बज, गोलकुण्डा का दुर्ग कुछ प्रसिद्ध इमारतों के उदाहरण हैं। गोल गुम्बज में विश्व का सबसे बड़ा गुम्बद है। इन सभी इमारतों की शैली और डिजाइन उत्तर भारत की इमारतों से बिल्कुल भिन्न हैं। बंगाल में भी अद्भुत शैली से निर्मित कुछ भवनों और छतों का निर्माण किया गया था। जैसे- अदीना मस्जिद और पाण्डुआ में जलालुद्दीन का मकबरा, गौड़ में खील दरवाजा तथा तन्तीपारा मस्जिद, जौनपुर में अटाला मस्जिद आदि। विजयनगर साम्राज्य के राजाओं ने भी अपने राज्य में अनेक सुन्दर भवन व मन्दिर बनवाये थे। हम्पी में विट्ठल स्वामी मन्दिर और हजर रमा मन्दिर अच्छे मन्दिरों के उदाहरण हैं जिनके वर्तमान में केवल अवशेष बचे हैं। बहमनी सुल्तानों ने फारसी, सिरिया, तुर्की तथा दक्षिण भारत के मन्दिरों की शैली को अपनाया।
मुगल स्थापत्य कला
1526 ई. में मुगल स्थापत्य कला से मकबरों की इमारतं े एक भिन्न प्रकार से बनने लगीं। इन इमारतों के लिए अच्छे प्लेटफार्म बनाये गये और इनके चारों ओर सुन्दर बागों और फब्बारों से सजावट की जाती थी। जैसे फतेहपुर सीकरी की मस्जिद। मुगलों के आने से स्थापत्य कला में एक नयी शैली का विकास हुआ। मुगल शैली की वास्तुकला का प्रारम्भ अकबर के शासन में हुआ था। इस शासन की पहली इमारत दिल्ली में हुमायूँ का मकबरा था। यह मकबरा एक बगीचे के बीचों-बीच बना है जो लाल पत्थर से निर्मित है। अकबर ने आगरा और फतेहपुर सीकरी में किलों का निर्माण कराया, इसका उदाहरण बुलंद दरवाजा है। इसका निर्माण अकबर की गुजरात विजय के बाद हुआ था। बुलंद दरवाजे की मेहराब 41 मी. ऊँची है और यह विश्व का सबसे शानदार द्वार है। सलीम चिश्ती का मकबरा, जोधाबाई का महल, इबादत खाना, बीरबल का आवास तथा अन्य इमारतों में एक अन्य शैलियों के दर्शन होते हैं। मुगलों में शाहजहाँ सबसे महान भवन निर्माता सिद्ध हुए। उसने अपनी भवन इमारतों में संगमरमर का भरपूर उपयोग कराया जैसे- ताजमहल खूबसूरत डिजाइन, सुन्दर मेहराब और मीनार इसकी इमारतों की विशेषताएँ थी।

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