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अध्याय 21 राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 21 राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा

बच्चों को कैसे तथा किस प्रकार पढ़ाया जाए

क्रिस्टोफर डे (1999) के अनुसार, बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षकों के व्यावसायिक विकास को एक जीवन-पर्यंत चलने वाली गतिविधि के रूप में देखा जाना चाहिए।
► व्यावसायिक और सहृदय शिक्षक तैयार करने के लिए (एनसीएफटीई, नेशनल काउसिंल फॉर टीचर एजुकेशन, 2009) एक व्यावसायिक कार्यबल का विकास करने के महत्व पर जोर देती है।
► अध्यापन कोई स्थिर व्यवसाय नहीं है बल्कि प्रौद्योगिकी, सदैव बदलते ज्ञान, वैश्विक अर्थशास्त्र के दबावों और सामाजिक दबावों से प्रभावित होकर बदलता रहता है। इसका अर्थ है कि इन परिवर्तनों को संबोधित करने के लिए अध्यापन के तरीकों और कौशलों का निरन्तर अद्यतन और विकास आवश्यक है। शिक्षकों का बदलाव भी क्षमता से युक्त होना अनिवार्य है।

बच्चों/शिक्षार्थियों को पढ़ाने के निम्न तरीके हैं

व्याख्या विस्तार
एक पूरे पाठ की व्याख्या करने के लिए विचार विस्तार
► विषयों, मुद्दों, लेखक के परिप्रेक्ष्य को पहचानना
► सवाल से परे चले जाना, चर्चा के अन्तर्गत मुद्दों का विस्तार
► बच्चे/शिक्षार्थियों को स्वयं के विचार पर प्रकाश डालने के लिए प्रेरित करना
► बच्चे/शिक्षार्थियों को समझाने के लिए शब्दों को परिभाषित करना
► सीखने के क्रम में उत्पन्न विसंगतियों का निराकरण करना
उत्तर समझाना
एक शिक्षार्थी के प्रश्नों पर विचार कर उसका जवाब बनाना चाहिए  उसके कार्यों को चित्रों से संबद्ध कर उत्तर समझाना चाहिए  प्रश्न से संबंधित अपनी मान्यताओं/अवधारणाओं को स्पष्ट करना
► पूरी तरह से प्रश्न का अर्थ समझाना
► परिणाम, प्रयोजन और कारण प्रश्नों का सीधा सम्बोधन
► स्पष्ट करने के लिए प्रश्न के बारे में ज्यादा बताना
► सरल व शीघ्र उत्तर देना
► प्रश्न के साधारण उत्तर देना
विकल्प पहचानना
सभी या कुछ भी नहीं का निर्णय करना
► स्पष्ट करने के लिए जवाब दोहराना
► वैकल्पिक विचारों से उत्तर देना
► शिक्षार्थी उत्तर समझ गया है या नहीं यह बताने में संकोच करता है अत: लिखित मूल्यांकन के विकल्प का प्रयोग करना

सीखना तथा ज्ञान

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या (एन.सी.एफ.) 2005 के अनुसार, शिक्षार्थियों को सीखाने तथा ज्ञान देने के लिए आपस में कई गतिविधियों को मिलाकर वैज्ञानिक पद्धति अपनायी जाती है। जो निम्नलिखित हैं:
► निरीक्षण, देखे गए तथ्यों में समानताओं और समरूपी संरचनाओं की खोज करना।
► अवधारणाएँ बनाना, स्थितियों के गुणात्मक और गणितीय प्रारूप गढ़ना।
► तार्किक ढंग से उनके निष्कर्ष निकालना।
► प्रेक्षणों तथा नियंत्रित प्रयोगों के द्वारा सिद्धान्तों के सच-झूठ होने की पुष्टि करना और सीखने के सिद्धान्तों, धारणाओं तथा नियमों पर पहुँचना।
► विज्ञान के नियम अचल शाश्वत सत्यों की तरह नहीं देखे जाने चाहिए।
► सर्वाधिक स्थापित और सार्वभौमिक वैज्ञानिक नियम तात्कालिक ही माने जाने चाहिए जो नए प्रेक्षणों, प्रयोगों और विश्लेषणों द्वारा संशोधित किए जा सकते हैं।
► राष्ट्रीय पाठ्यचर्या (एन.सी.एफ) में पाठ्यक्रम को सीखने के विभिन्न चरणों के अनुरूप बनाया गया है। इसका सुझाव है कि विज्ञान और सामाजिक विज्ञान को मिलाकर अधिक व्यापक ‘पर्यावरण-अध्ययन’ विकसित करने का प्रयास जारी रहना चाहिए।
► प्राथमिक स्तर पर जोर इस बात पर दिया गया है कि संसार, प्राकृतिक परिवेश, कृत्रिम रचनाएँ और लोगों के प्रति बच्चे के कौतूहल को बढ़ावा मिले।
► संसार को पहचानने की उसकी बुनियादी क्षमताओं-जैसे निरीक्षण करना, वर्गीकरण करना और निष्कर्ष निकालना आदि के साथ-साथ उसमें अपने हाथ जैसे अंगों से काम लेने के कौशल का भी विकास हो।

पाठ्यचर्या के क्षेत्र

भारत में शिक्षक शिक्षा नीति को समय के हिसाब से निरूपित किया गया है। यह शिक्षा समितियों/आयोगों की विभिन्न रिपोर्टों द्वारा दी गयी सिफारिशों पर आधारित है, जिनमें से महत्वपूर्ण हैं: कोठारी आयोग (1966), चट्टोपाध्याय समिति (1985), राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एन पी ई 1986/92), आचार्य राममूर्ति समिति (1990), यशपाल समिति
(1993) एवं राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढ़ाँचा (एनसीएफ, 2005)। नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार (आरटीई) अधिनियम, 2009, जो 1
अप्रैल, 2010 से लागू हुआ उसमें सभी बच्चों को अपनी प्रांरभिक शिक्षा पूरी करने का अधिकार दिया गया है। नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 में शिक्षकों की शिक्षा का प्रावधान:
► केन्द्र सरकार अध्यापकों के प्रशिक्षण के मानकों का विकास और उनका प्रवर्तन करेगा।
► केन्द्र सरकार द्वारा प्राधिकृत अकादमिक प्राधिकरण द्वारा यथा निर्धारित न्यूनतम योग्यता रखने वाले व्यक्ति शिक्षक के रूप में नियोजित किए जाने के पात्र होंगे।
► निर्धारित योग्यताएँ नहीं रखने वाले मौजूदा अध्यापकों को 5 वर्ष की अवधि में उक्त योग्यता अर्जित करना अपेक्षित होगा।
► सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि प्रत्येक स्कूल में छात्र-शिक्षक अनुपात अनुसूची के अनुसार हो।
► सरकार द्वारा स्थापित, स्वामित्व, नियंत्रित और पर्याप्त रूप से वित्तपोषित स्कूल में शिक्षकों की रिक्ति स्वीकृत क्षमता के 10
प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।

शिक्षकों की शिक्षा का राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढाँचा

राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने शिक्षक शिक्षा पर राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढाँचा तैयार किया है, जिसे मार्च 2009 में परिचालित किया गया था। यह ढांचा एन सी एफ, 2005 की पृष्ठभूमि में तैयार किया गया था। नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 में निर्धारित सिद्धांतों द्वारा शिक्षक शिक्षा पर परिवर्तित ढाँचा तैयार किया गया है। शिक्षक शिक्षा का दर्शन स्पष्ट करते हुए इस ढांचे में नए दृष्टिकोण के कुछ महत्वपूर्ण आयाम इस प्रकार से हैं:
► परावर्ती प्रचलन, शिक्षक शिक्षा का केन्द्रीय लक्ष्य
► छात्र-अध्यापकों के लिए स्व-शिक्षा परावर्तन, नए विचारों के आत्मसातकरण और अभिव्यक्ति का अवसर होगा
► स्व-निर्देशित शिक्षा की क्षमता और सोचने की योग्यता का विकास व समूहों में कार्य
► बच्चों से संवाद करने और उनसे जुड़ने का अवसर
► राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ने विशिष्ट उद्देश्यों, सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक शिक्षा के अनुकूल विस्तृत अध्ययन क्षेत्र, पाठ्यचर्या अंतरण तथा विभिन्न प्रारंभिक शिक्षक शिक्षा कार्यक्रमों के लिए मूल्यांकन कार्यनीति बनायी है।
► पाठ्यचर्चा आधारभूत मुद्दों को भी रेखांकित करती है जो इन पाठ्यक्रमों के सभी कार्यक्रमों का निरूपण निदेशित करेगा।
► सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के दृष्टिकोण और रीति विधान पर अनेक सिफारिशें की गयी हैं और इसके लिए कार्यान्वयन कार्यनीति भी रेखांकित की गई है। नेशनल काउंसिल ऑफ टीचर एजुकेशन के अनुसार, शिक्षकों के प्रशिक्षण का मुख्य लक्ष्य है:
► अपनी स्वयं की परिपाटी का अन्वेषण, उस पर चिंतन-मनन और विकास करना
► अपने शैक्षणिक अनुशासन या विद्यालयी पाठ्यक्रम के अन्य क्षेत्रों के बारे में अपने ज्ञान को गहन करना और अद्यतित करना
► विद्यार्थियों की शिक्षा पर शोध और चिंतन करना
► शैक्षणिक और सामाजिक मुद्दों को समझना और अद्यतित करना
शिक्षा व अध्यापन से व्यावसायिक रूप से जुड़ी अन्य भूमिकाओं जैसे शिक्षकों की शिक्षा, पाठ्यचर्या विकास या परामर्श के लिए तैयारी करना
► बौद्धिक अलगाव से बाहर निकलना और कार्यस्थल में अन्य लोगों, विशिष्ट विषयों के क्षेत्र में काम कर रहे शिक्षकों और शिक्षाविदों और साथ ही बुद्धिजीवियों के साथ अनुभव साझा करना

विद्यालय तथा कक्षा का वातावरण

प्राथमिक कक्षा

► प्राथमिक कक्षाओं के स्तर पर, बच्चे को इस प्रयास में संलग्न किया जाना चाहिए कि वह अपने परिचित अनुभवों के माध्यम से विशय के सिद्धान्तों को समझे।
► शिक्षार्थी को अपने हाथों से छोटी-छोटी तकनीकी इकाइयों और माड्यूलों की रचना करना चाहिए।
► पाठ्यक्रम के बोझ को सुसंगत बनाया जाना चाहिए और विषय के ढेर सारे पहलुओं को सतही ढंग से पढ़ा देने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।
► एन.सी.एफ. की दृष्टि से शिक्षकों के सशक्तीकरण और परीक्षा- व्यवस्था में सुधारों के द्वारा ही पढ़ाने और पढ़ने में बुनियादी बदलाव लाया जा सकता है।

माध्यमिक कक्षा

► माध्यमिक स्तर पर शिक्षार्थियों को विशयों को एक मिले-जुले अध्ययन क्षेत्र के रूप में सिखाया जाना चाहिए।
► प्रजनन और यौन-स्वास्थ्य सहित, पर्यावरण और स्वास्थ्य सम्बन्धी मुद्दों से जुड़ी गतिविधियाँ और इन मुद्दों का विश्लेषण भी उसकी शिक्षा का अंग होना चाहिए।
► शिक्षार्थी व्यवस्थित प्रयोगों के माध्यम से सैद्धान्तिक अवधारणाओं को जान सकें और उनका सत्यापन कर सके तथा साथ ही विज्ञान और तकनीक पर आधारित स्थानीय महत्व की छोटी-छोटी परियोजनाओं पर काम कर सके।

उच्च माध्यमिक स्तर पर

► शिक्षार्थी को अपने विशयों के साथ पर्यावरण और स्वास्थ्य-सम्बन्धी ज्ञान भी मिलना चाहिए। जिसमें गतिविधियों और सर्वेक्षणों के माध्यम से प्रजनन और यौन-स्वास्थ्य सम्बन्धी शिक्षा शामिल हो।
► उदाहरणस्वरूप, वजन उठाने के लिए पवनचक्की के एक कारगर मॉडल की कल्पना करके उसका निर्माण करना।
► विज्ञान की अवधारणाओं तक मुख्य रूप से गतिविधियों और प्रयोगों के माध्यम से पहुँचना चाहिए।
► इस स्तर की विज्ञान सामग्री और विषय को माध्यमिक स्तर पर सतही रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
► सामूहिक गतिविधि, साथियों और शिक्षकों से चर्चा, सर्वेक्षण, आँकड़ों को व्यवस्थित ढंग से एकत्रित करना और उन्हें प्रदर्शनियों आदि के माध्यम से विद्यालय में दिखाना- ये सभी शिक्षण प्रक्रिया के महत्वपूर्ण अंग होने चाहिए। वर्तमान समाज के सामाजिक, राजनैतिक और नीतिगत मुद्दों को बेहतर ढंग से समझने के लिए सभी का ‘वैज्ञानिक दृष्टि से साक्षर’ होना आवश्यक है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या प्रवेश परीक्षाओं के स्थान पर, एक राष्ट्रीय परीक्षा सेवा की बात करता है।

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