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अध्याय 21. इतिहास – दिल्ली के सुल्तान (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 21. इतिहास – दिल्ली के सुल्तान

परिचय
12वीं शताब्दी में तोमर राजपूतों ने दिल्ली को अपने साम्राज्य की राजधानी बनाया। जिसके बाद इस शहर की एक महत्वपूर्ण शहर के रूप में पहचान बनने लगी। अजमेर के चौहान (जिन्हें चाहमान नाम से भी जाना जाता है), इन्होंने 12वीं शताब्दी के मध्य में तोमरों को परास्त किया था। तोमरों और चौहानों के राज्यकाल में दिल्ली वाणिज्य का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। इस शहर में अनेक समृद्ध जैन व्यापारियों ने कई मन्दिरों का निर्माण कराया।
13वीं शताब्दी के आरम्भ में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही दिल्ली एक ऐसी राजधानी के रूप में परिवर्तित हो गयी जिसका नियंत्रण इस उपमहाद्वीप के बहुत बड़े क्षेत्र पर हो चुका था।
रजिया सुल्तान
1236 ई. में इल्तुतमिश की बेटी रजिया सुल्तान सिंहासन पर बैठी। उस समय के इतिहासकार मि-हाज-ए-सिराज ने स्वीकार किया है कि रजिया अपने सभी भाइयों से अधिक योग्य और सक्षम थी लेकिन एक रानी को शासक के रूप में मान्यता नहीं मिल पा रही थी। दरबारी जन भी रजिया के स्वतन्त्र रूप से शासन करने से प्रसन्न नहीं थे। 1240 ई. में रजिया को सिंहासन से हटा दिया गया।
दिल्ली सल्तनत का विस्तार
13वीं शताब्दी के प्रारम्भ में दिल्ली के सुल्तानों का शासन गैरिसनों
(सैनिकों की टुकड़ियों) के निवास के लिए बने मजबूत किलेबन्द शहरों से परे शायद ही कभी फैला हो। शहरों से सम्बद्ध लेकिन उनसे दूर भीतरी प्रदेशों पर उनका नियंत्रण न के बराबर था और इसलिए उन्हें आवश्यक सामग्री के लिए व्यापार करना या लूट पर निर्भर रहना पड़ता था।
दिल्ली के शासक राजपूत वंश
तोमर आरम्भिक बारहवीं शताब्दी 1165
अनंगपाल 1130 – 1145 ई
चौहान 1165 – 1192 ई
पृ थ्वीराज चौहान 1175 – 1192 ई
प्रारम्भिक तुर्की शासक (1206 1290 ई.) कुतुबउद्दीन ऐबक 1206 – 1210 ईइल्तुतमिश 1210 – 1236 ईरजिय ा 1236 – 1240 ईग्य ासुद्दीन बलबन 1266 – 1287 ई
ख्िलजी वंश (1290 1320 ई.) जलालुद्दीन खिलजी 1290 – 1296 ईअलाउद्दीन खिलजी 1296 – 1316 ई
तुगलक वंश (1320 1414 ई.) ग्यासुद्दीन तुगलक 1320 – 1324 ईमोहम्मद तुगलक 1324 – 1351 ईफिरोजशाह तुगलक 1351 – 1388 ई
सैयद वंश (1414 1451 ई.) खिज्र खाँ 1414 – 1421 ई
लोदी वंश (1451 1526 ई.) बहलोल लोदी 1451 – 1489 ई
दिल्ली से दूर बंगाल और सिन्ध के गैरिसन शहरों (गैरिसन शहर से तात्पर्य उस जगह से है जहाँ किलेबन्द पड़ाव में सैनिक रहते थे) का नियंत्रण बहुत कठिन था। शासन को अफगानिस्तान से आने वाले हमलावरों और सूबेदारों से बराबर चुनौती मिलती रहती थी जो जरा सी कमजोरी का पता चलते ही विद्रोह पर उतारू हो जाते थे। इन सब के चलते सल्तनत ने अपने को बचाये रखा। सल्तनत की भीतरी सीमाओं में जो अभियान चले उनका लक्ष्य गैरिसन शहरों की स्थिति को मजबूत करना था। जब ये अभियान चलाये जा रहे थे तब गंगा व जमुना के दोआब को साफ करके वहाँ के संग्राहकों एवं शिकारियों को उनके पर्यावास से खदेड़ दिया गया था। क्षेत्रीय व्यापार की उन्नति के लिए नये शहर व किले बनाए गये, कृषि को प्रोत्साहन दिया गया। अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में दक्षिण भारत को लक्ष्य करके सैनिक अभियान शुरू किये गये और ये अभियान मुहम्मद तुगलक के समय में अपनी चरम सीमा पर पहुँचे। इन अभियानों में सल्तनत की सेनाओं ने हाथी, घोड़े व मूल्यवान धातुएँ अपने कब्ज़े में ले लीं। वैसे तो दिल्ली सल्तनत की सेनाओं की शुरुआत कमजोर रही लेकिन 150 वर्ष के बाद मोहम्मद तुगलक के राज्यकाल के अन्त तक इस उपमहाद्वीप का एक विशाल क्षेत्र उसके युद्ध-अभियान के अन्तर्गत आ चुका था। इन्होंने शत्रुओं की सेना को परास्त करके शहरों पर कब्ज़ा किया। इसके सूबेदार प्रशासक मुकदमों में फैसले सुनाते थे और किसानों से कर वसूली करते थे। दिल्ली के सुल्तानों ने अनेक शहरों में मस्जिदें बनवाईं। इससे उनके मुसलमान और इस्लाम के रक्षक होने के दावे को बल मिलता है। सभी श्रद्धालुओं के परस्पर एक समुदाय से जुड़े रहने के लिए मस्जिदें सहायक थीं। एक समुदाय का अंग होने का बोध करना जरूरी था क्योंकि मुसलमान अनेक पृष्ठभूमियों से आते थे।
खिलजी और तुगलक वंश के अन्तर्गत प्रशासन
दिल्ली सल्तनत एक विशाल साम्राज्य था जिसकी देखरेख के लिए विश्वसनीय सूबेदारों तथा प्रशासकों की जरूरत थी। इल्तुतमिश ने सामंतों और ज़मींदारों के स्थान पर अपने विशेष गुलामों को सूबेदार नियुक्त किया। इन गुलामों को फारसी में बंदगा कहा जाता है तथा इन्हें सैनिक सेवा के लिए खरीदा जाता था। इन्हें राज्य के राजनीतिक पदों पर काम करने के लिए बड़ी सावधानी से प्रशिक्षित किया जाता था। सुल्तान भी इन पर विश्वास करते थे। खिलजी और तुगलक शासक बंदगा का इस्तेमाल करते रहे और जो निम्न वर्ग के लोग इन पर निर्भर थे उन्हें ऊँचे राजनीतिक पदों पर नियुक्त करते रहे। ऐसे लोगों को सेनापति व सूबेदार जैसे पद दिये जाते थे लेकिन इससे राजनीति में अस्थिरता आने लगी। गुलाम अपने मालिकों के प्रति वफादार रहते थे लेकिन उनके उत्तराधिकारियों के प्रति नहीं। नये सुल्तान अपने नौकर रखा करते थे। जब कोई नया शासक सिंहासन पर बैठता था तो नये और पुराने सरदारों के बीच टकराव शुरू हो जाता था। पहले वाले सुल्तानों की ही तरह खिलजी और तुगलक शासकों ने भी सेनानायकों को अलग-अलग आकार के इलाकों के सूबेदार के रूप में नियुक्त किया। इन इलाकों को इक्ता कहते थे और इन्हें संभालने वाले अधिकारी इक्तदार कहे जाते थे। सैनिक अभियानों का नेतृत्व करना और अपने इक्ता में कानून और व्यवस्था बनाये रखना मुक्ती का फर्ज था। अपनी सैनिक सेवाओं के बदले वेतन के रूप में मुक्ती अपने इलाके से राजस्व की वसूली किया करते थे। मुक्ती लोगों पर काबू रखने के लिए सबसे अच्छा तरीका यह था कि उनका पद वंश परम्परा से न चले और उन्हें कोई भी इक्ता थोड़े समय के लिए मिले। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में भू-राजस्व के निर्धारण व वसूली का कार्य राज्य ने अपने हाथों में ले लिया। स्थानीय सामंतों से कर लगाने का अधिकार छीन लिया गया और साथ ही साथ उन्हें भी कर चुकाने के लिए बाध्य किया गया। उस समय तीन प्रकार के कर थे –
(1) कृषि पर कर को खराज कहा जाता था और जो किसान की उपज का 50 प्रतिशत होता था
(2) मवेशियों पर कर
(3) घरों पर कर चंगेज़ खाँ के नेतृत्व में मंगोलों ने 1219 ई. में उत्तर-पूर्वी ईरान में ट्रान्स-आक्सासियाना (आधुनिक उज्बेकिस्तान) पर हमला किया और इसके बाद ही दिल्ली सल्तनत को उनका हमला झेलना पड़ा। अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद तुगलक के शासनकाल के आरंभ में दिल्ली पर मंगोलों के हमले बढ़ गये थे। जिसके चलते दोनों शासकों को एक बड़ी सेना बनानी पड़ी।
15वीं तथा 16वीं शताब्दी में सल्तनत
1526 तक दिल्ली तथा आगरा पर सैयद तथा लोदी वंशों का राज्य रहा। तब तक बंगाल, मालवा, गुजरात, जौनपुर, राजस्थान तथा पूरे दक्षिण भारत में स्वतंत्र शासक उठ खड़े हुये थे। उनकी राजधानियाँ समृद्ध थीं। राजपूतों तथा अफगानों जैसे शासक भी इसी काल में उभरकर सामने आये।
शेरशाह सूरी ने (1540 – 1545 ई.) बिहार में एक छोटे से इलाके के रूप में प्रबंधक का कार्य किया। आगे चलकर इसने मुगल सम्राट हुमायूँ को भी टक्कर दी और उसे परास्त किया। शेरशाह ने दिल्ली पर अधिकार करके अपना राजवंश स्थापित किया था।

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