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अध्याय 20 अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 20 अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक

अधिगम को प्रभावित करने वाले

प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन नए-नए अनुभव एकत्रित करता है, इन नए अनुभवों से उसके व्यवहार में परिवर्तन आता है, व्यवहार में परिवर्तन आने की प्रक्रिया को ही अधिगम कहते हैं। अधिगम प्रक्रिया निरंतर चलने वाली और सार्वभौमिक प्रक्रिया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सीखना अनुभव द्वारा व्यवहार में परिवर्तन है।
वुडवर्थ के अनुसार, “नवीन ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया ही अधिगम है।”
शिक्षक से संबधित कारक: शिक्षक का विषय की समझ, शिक्षण कला में निपुणता और उसका शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य शिक्षार्थियों के अधिगम के लिए प्रमुख कारक है।
शिक्षार्थी से संबधित कारक: शिक्षार्थी की सीखने की प्रवृति, शारीरिक-मानसिक दशा उसके अधिगम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

अधिगम को प्रभावित करने वाले व्यक्तिगत कारक

परिवार

► परिवार शिक्षार्थी के अधिगम को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है।
► परिवार एक छोटा-सा सामाजिक वर्ग है जो सामान्यत: माता-पिता तथा एक अथवा अधिक बालकों द्वारा संगठित होता है।
मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, परिवार एक ऐसा समूह है जो पर्याप्त रूप से लैंगिक सम्बन्ध पर आधारित होता है।
► परिवार एक छोटी सी सामाजिक संस्था है जिसमें रहते हुए बालक माता-पिता के अतिरिक्त भाई-बहन तथा अन्य सम्बन्धियों के सम्पर्क में आता है।
► इन सभी का अपना अलग-अलग कार्य होता है। सभी सदस्य एक-दूसरे के साथ आदान-प्रदान करते हैं तथा एक-दूसरे पर अपना प्रभाव डालते हैं।
► बालक भी परिवार के प्रत्येक सदस्य द्वारा की गयी क्रिया से प्रभावित होता रहता है। इस प्रभाव से वह समाज के तौर-तरीके सीखता है तथा अपने व्यक्तित्व का निर्माण करता है।
► परिवार में रहते हुए ही बालक अपने भावों तथा विचारों को प्रकट करने के लिए एक शब्दावली बना लेता है।
यह उसकी भाषा होती है जिसके माध्यम से उसके ज्ञान भण्डार में वृद्धि होती रहती है।
► प्रथम 6 वर्षों तक बालक का सामाजिक वातावरण केवल परिवार ही होता है। परिवार में ही रहते हुए उसे कई प्रकार के संवेगात्मक अनुभव प्राप्त होते हैं। इन आवश्यकताओं तथा संवेगात्मक अनुभवों का बालक की शिक्षा से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। सन्तोषजनक अनुभवों से बालक को सीखने की प्रेरणा मिलती है।
► इससे उसका स्वाभाविक विकास होता है। इसके विपरीत कटु अनुभवों की उपस्थिति में बालक का विकास कुण्ठित होने लगता है। प्रत्येक परिवार का व्यक्तित्व अलग-अलग होता है। प्राय: देखने में आता है कि विभिन्न परिवारों की रुचियाँ तथा बोलने-चालने के ढंग अलग-अलग होते हैं जिससे बालक प्रभावित होता है।
► दो बालक एक ही स्कूल में पढ़ते हों, एक से ही शिक्षकों से प्रभावित होते हों, एक साथ अध्ययन करते हों, फिर भी अलग-अलग पारिवारिक वातावरण के कारण उनकी सामान्य ज्ञान, रुचियों भाषा-व्यवहार तथा नैतिकता पूर्णतया भिन्न होते हैं।
► जर्मनी के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री फ्रोबेल के अनुसार, मातायें बालकों की आदर्श गुरु होती है, तथा परिवार द्वारा प्राप्त हुई अनौपचारिक शिक्षा सबसे अधिक प्रभावशाली और प्राकृतिक होती है।

शिक्षार्थी के अधिगम में परिवार की भूमिका

मानसिक विकास
परिवार शिक्षार्थी के मानसिक विकास के लिए विचार, कल्पना निरीक्षण तथा परीक्षण के अवसर उपलब्ध करवाता है।
► इनके विकास हेतु बालक को अधिक से अधिक वस्तुओं से सम्पर्क स्थापित करने के लिए उपयुक्त अवसर परिवार में प्राप्त होते हैं।
यदि परिवार में उसे इस प्रकार के अवसर नहीं मिलते है तो उसका मानसिक विकास मंद या अवरुद्ध हो जाता है।
संवेगात्मक विकास
शिक्षार्थी के संवेगात्मक विकास पर भी परिवार का गहरा प्रभाव पड़ता है।
► घर की सफाई, फर्नीचर, पेड़-पौधें, फल-फूल, चित्र, गृह-सज्जा तथा इसी प्रकार के तत्व बालक को हर समय संवेगात्मक दृष्टि से प्रभावित करते हैं। निरन्तर सुन्दर वस्तु को देखने से बालक में सौन्दर्य बोध उत्पन्न हो जाता है जिससे उसकी विभिन्न रुचियाँ तथा अभिरुचियाँ विकसित होती हैं। परिवार के सदस्यों का आपसी व्यवहार अथवा सम्बन्ध भी बालक को संवेगात्मक दृष्टि से प्रभावित करता है।
सामाजिक विकास
परिवार का एक सूक्ष्म समाज होता है जहाँ पर बालक का सामाजिक विकास होता है।
► परिवार में बालक अन्य सदस्यों के साथ रहते हुए सामाजिक आदर्शों, परंपराओं तथा व्यवहारों को सीखता रहता है।
► इससे उसमें प्रेम, सहानभूति, सद्भावना, सहयोग, त्याग, परोपकार, उतरदायित्व तथा न्यायप्रियता आदि अनके सामाजिक भावनाओं एवं गुणों का विकास स्वत: ही हो जाता है।

अधिगम को प्रभावित करने वाले वातावरणीय कारक

समुदाय

► समुदाय के निर्माण एवं स्थायित्व की दृष्टि से दो या दो से अधिक व्यक्ति, निश्चित भौगोलिक क्षेत्र, सामुदायिक भावना सामान्य जीवन तथा नियमों आदि तत्वों का होना जरूरी है।
► सामान्यतया समुदाय का क्षेत्र उसके समुदायों की आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक समानताओं पर निर्भर करता है।
► समुदाय एक शिक्षार्थी की शिक्षा के लिए बाहरी वातावरण या परिवेश की तरह कार्य करता है।
► जिस प्रकार बालक की शिक्षा पर परिवार तथा स्कूल का गहरा प्रभाव पड़ता है, उसी प्रकार समुदाय भी बालक के व्यवहार में परिवर्तन करता है। शिक्षार्थी उस समूह के कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेता है जिसका वह सदस्य है। इससे बालक की प्रवृति, विचारधारा तथा आदतों का निर्माण होता है एवं उसकी संस्कृति, रहन-सहन तथा भाषा भी प्रभावित होती है।
► समुदाय का वातावरण बालक की अनुकरण करने की जन्मजात प्रवृति को विशेष रूप से प्रभावित करता है।
► बालक उन लोगों का अनुकरण करने लगता है, जिनके वह सम्पर्क में आता है जैसे यदि वह श्रमिकों के सम्पर्क में आता है, तो उसे श्रम का महत्व समझ आने लगता है।
► प्रत्येक समुदाय के बालकों की संस्कृति भाषा तथा दृष्टिकोण एवं व्यवहार में स्पष्ट अन्तर दिखाई पड़ता है।
विलियम ए ईगर के अनुसार, ‘स्वभाव से मानव सामाजिक प्राणी है। इसलिए उसने वर्षों के अनुभव से सीख लिया है कि व्यक्तित्व तथा सामूहिक क्रियाओं का विकास सर्वोतम रूप में समुदाय द्वारा ही किया जा सकता है।’

शिक्षार्थी के अधिगम में समुदाय की भूमिका

► समुदाय जगह-जगह पर पुस्तकालयों की व्यवस्था करता है जिससे बालक के ज्ञान में वृद्धि होती है।
► समुदाय द्वारा समय-समय पर वाद-विवाद प्रतियोगिताएं तथा कवि सम्मेलन होते हैं जिससे शिक्षार्थी का मानसिक विकास होता है। समुदाय में सामाजिक सम्मलेन, मेलें तथा उत्सव एवं धार्मिक कार्य भी होते रहते हैं जिससे शिक्षार्थियों में सामाजिकता की भावना विकसित होती है। इस सामाजिकता के विकसित होने से उसे सामाजिक रीति-रिवाजों, परंपराओं, मान्यताओं तथा विश्वासों एवं आदर्शों का ज्ञान प्राप्त होता है। इससे उसमें सहानभूति, सहयोग, सहनशीलता, समाज-सेवा एवं त्याग जैसे अनेक सामाजिक गुणों का विकास हो जाता है।

अधिगम को प्रभावित करने वाली शिक्षण-सहायक सामग्री

डेण्ड के अनुसार, सहायक सामग्री वह सामग्री है जो कक्षा में या अन्य शिक्षण परिस्थितियों में लिखी या बोली गई पाठ्य सामग्री को समझने में सहायता प्रदान करती है।
कार्टर ए. गुड के अनुसार, कोई भी ऐसी सामग्री जिसके माध्यम से शिक्षण प्रक्रिया को उद्दीप्त किया जा सके अथवा श्रवणेन्द्रिय संवेदनाओं के द्वारा आगे बढ़ाया जा सके वह शिक्षण सामग्री कहलाती है।

प्रौद्योगिकी

► शिक्षक, शिक्षार्थियों को पढ़ाने के लिए पुस्तकों के अलावा विभिन्न आधुनिक आईटी प्रौद्योगिकियों का प्रयोग करते हैं।
► प्रौद्योगिकी में अलग-अलग उपकरणों की एक बड़ी शृंखला शामिल होती है। जैसे- डेस्कटॉप कंप्यूटर्स, लैपटॉप्स, मोबाइल फोन्स, स्मार्टफोन्स, टैबलेट्स, प्रोजेक्टर्स, प्रिंटर्स, स्कैनर्स, डिजिटल कैमरे और इसी तरह के अन्य उपकरण। इन उपकरणों की मदद से पाठ्य पुस्तकों को पढ़ाया जाता है जैसे- शिक्षार्थियों को सभी पुस्तकें अपने साथ लेकर नहीं चलना पड़ता है और वे इंटरनेट द्वारा पुस्तकों को इलेक्ट्रोनिक रूप में कहीं भी देख व पढ़ सकते हैं।
► प्रोजेक्टर्स, प्रिंटर्स, स्कैनर्स, डिजिटल कैमरे द्वारा शिक्षार्थी मूल पाठ पुस्तक की नकल या दूसरी कॉपी ले सकते हैं। अपने किए गए कार्यों को शिक्षक को दिखला सकते हैं। डेस्कटॉप कंप्यूटर्स, लैपटॉप्स, मोबाइल फोन्स, स्मार्टफोन्स तथा टैबलेट्स ऐसे उपकरण हैं जिसमें पुस्तकों को इलेक्ट्रोनिक रूप में रख सकते हैं, उसे संपादित कर सकते हैं और देख व सुन सकते हैं।

शिक्षकों का आईसीटी ज्ञान और कौशल

► 2013 में सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशनल टेक्नोलॉजी (एनसीईआरटी में स्थित) ने शिक्षकों के लिए एक आईसीटी पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित किया था।
► विद्यालय में आईसीटी, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफ, 2005) द्वारा प्रवर्तित, सीखने के प्रति कुछ सहभागितापूर्ण कार्यपद्धतियों की सहायता कर सकता है। यह मात्र रटने से कहीं आगे बढ़कर उच्चतर स्तर के कौशल जैसे कि समस्या का समाधान करने, प्रश्न पूछने, संयोजन करने, मूल्यांकन करने तथा ज्ञान प्राप्त करने में सहायता कर सकता है।
► आईसीटी का प्रयोग पाठ्यक्रम के विशिष्ट भागों का समर्थन करने के लिए किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर रिकॉर्डिंग उपकरणों से भाषा शिक्षण को समृद्ध बनाया जा सकता है तथा अनुकरणों से विज्ञान के शिक्षण को समृद्ध बनाया जा सकता है। इंटरनेट तक पहुंच शिक्षार्थियों को स्वयं शोध करने तथा अपनी गहरी रूचि वाले विषयों को सीखने का अवसर प्रदान कर सकती है तथा इससे शिक्षार्थी के आत्मसम्मान में भी वृद्धि हो सकती है।

आईसीटी (सूचना प्रौद्योगिकी) का शिक्षण में प्रयोग

► आईसीटी टूल्स, सॉफ्टवेयर एप्लिकेशंस और डिजिटल संसाधनों का प्रभावी उपयोग करने में
► डिजिटल संसाधन व्यवस्थित और तैयार करने में
► शिक्षकों के नेटवर्क में भागीदारी करने में
► संसाधनों का मूल्यांकन और चयन करने में

परंपरागत दृश्य सहायक सामग्री

नमूने: वास्तविक वस्तुओं के बदले दिखाई जाने वाली वस्तु को नमूना या मॉडल कहते हैं। जैसे रेलगाड़ी का नमूना दिखाकर शिक्षार्थी को उसके बारे में बताना।
चित्र: इसका प्रयोग नमूने तथा वास्तविक वस्तु के नहीं होने पर किया जाता है जैसे पहाड़ का चित्र दिखाना। चित्र का आकार बड़ा तथा स्पष्ट होना चाहिए ताकि शिक्षार्थियों को सीखने में मदद मिल सके।
मानचित्र एवं ग्राफ: ऐतिहासिक स्थलों तथा भूगोल विषय को पढ़ाने के लिए मानचित्र का प्रयोग करना और गणित जैसे विषयों को समझने के लिए ग्राफ का प्रयोग किया जाता है।
ब्लैकबोर्ड: कक्षा में शिक्षार्थियों को कुछ लिख कर दिखाने के लिए ब्लैकबोर्ड का प्रयोग सबसे अधिक होता है।

वर्ड वॉल या बुलेटिन बोर्ड

► जब शब्दों का एक संग्रह कक्षा में व्यवस्थित तरीके से प्रदर्शित किया जाता है, तो इसे ‘वर्ड वॉल’ कहते हैं।
► इस प्रदर्शन का प्रयोग पढ़ने, लिखने, शब्दावली विकास, वर्तनी, शब्द/चित्र संबंध और सन्दर्भ के लिए एक परस्पर क्रियात्मक
(interactive) संसाधन के रूप में किया जा सकता है।
► वर्ड वॉल को अलग-अलग विषयों के अनुसार श्रेणीबद्ध किया जा सकता है। जैसे- रंग, नाम, दिनचर्या के शब्द, सहायक शब्द
(help words) और संख्याओं के नाम (number names), समान पहले या अंतिम वर्णों वाले शब्द, और शब्द परिवार (word families) आदि।
► वर्ड वॉल एक ऐसी दृश्य सहायक सामग्री है जिसके द्वारा शिक्षक विज्ञान से लेकर कला तक किसी भी विषय में अंग्रेज़ी भाशा की शब्दावली विकसित करने और मजबूत बनाने में छात्रों की मदद कर सकते हैं।
► वर्ड वॉल के लिए चॉकबोर्ड, चार्ट पेपर, कागज और रस्सी, या कक्षा की अंदरूनी एवं बाहरी दीवारों का प्रयोग किया जा सकता है।

परिवेशी प्रिंट

शिक्षार्थियों को समझाने के लिए जब ऐसे प्रिंट का प्रयोग किया जाता है जिसमें वस्तु का चित्र प्रमुखता से रखा जाता है और उसके नाम को छोटे अक्षरों में लिखा जाता है तो उसे परिवेशी प्रिंट कहते हैं। जैसे- बच्चों को सेब का चित्र दिखाकर उसके बारे में बताना। इसी तरह विद्यालय में खिड़की, रास्तों के लिए परिवेशी प्रिंट का प्रयोग किया जाता है।

अधिगम को प्रभावित करने वाले श्रव्य सहायक सामग्री

► कानों द्वारा सुनकर शिक्षण सामग्री को धारण करने को श्रव्य शिक्षण सामग्री कहते हैं।
► इसके अंतर्गत रेडियो, टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल जैसे उपकरण आते हैं।
► श्रव्य सहायक शिक्षण सामग्री का प्रयोग दूरस्थ शिक्षण के लिए प्रभावकारी है।
► दूरस्थ शिक्षा देने वाले संस्थान रेडियो, टीवी तथा इंटरनेट के माध्यम से कई शिक्षण कार्यक्रम चलाते हैं।
रेडियो: यह शिक्षा का महत्वपूर्ण उपकरण है। वर्तमान में नवीन यंत्रों के रहते इसके प्रयोग में कमी अवश्य आई है किन्तु, ग्रामीण आंचल में आज भी यह प्रभावशाली है। इसके माध्यम से उच्च कोटि के शिक्षा शास्त्री, भाषाविद के उद्गार, राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय चर्चा, नाटकों, कहानियों का प्रसारण आदि से भाषा शिक्षण में काफी मदद मिलती है।
कक्षा में उपयोग की जाने वाली

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