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अध्याय 2. सामाजिक अध्ययन का अधिगम – कक्षा प्रक्रियाएँ, गतिविधियाँ एवं प्रबंध (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 2. सामाजिक अध्ययन का अधिगम – कक्षा प्रक्रियाएँ, गतिविधियाँ एवं प्रबंध

कक्षा-कक्ष संचालन
कक्षा-कक्ष संचालन विद्यार्थियों के अधिगम पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालता है। कक्षा संचालन अधिगम-अध्यापन कार्य (प्रक्रिया) का एक महत्त्वपूर्ण अंग होता है। कक्षा के प्रभावी संचालन का उत्तरदायित्व मुख्यत: अध्यापक की सक्रियता पर आश्रित होता है, किन्तु विद्यार्थियों का सहयोग वांछनीय है। अत: अध्यापक को चाहिए कि वह अपने विद्यार्थियों के साथ सहयोग, मैत्री तथा सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करे। कक्षा-संचालन हेतु कक्षा-कक्ष का उपयुक्त व्यवस्थित होना अति आवश्यक है। जैसे कक्षा-कक्ष हवादार होना चाहिए, रोशनी की सही व्यवस्था होनी चाहिए आदि। कोई कक्षा सही मायने में तभी चल सकती है, जब सभी विद्यार्थियों की आवश्यकतानुसार व्यवस्था हो। उदाहरणस्वरूप, यदि किसी विद्यार्थी को कक्षा की पिछली सीट पर बैठकर श्यामपट्ट नहीं दिखाई देता या फिर किसी बच्चे को दूर बैठने पर सुनाई नहीं देता, तो अध्यापक को चाहिए कि वह उस विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को आगे बिठाए। कक्षा-कक्ष में अनुदेशन और अधिगम दोनों प्रभावी रूप से किया जाना चाहिए।
पाठ्यक्रम का प्रस्तुतीकरण
पाठ्यक्रम का प्रस्तुतीकरण कक्षा-संचालन में सबसे प्रमुख तत्त्व है। ‘पाठ्यक्रम का प्रस्तुतीकरण’ का आशय है- शिक्षक छात्रों को कक्षा-कक्ष में पढ़ाई जा रही पाठ्य-वस्तु की गहन जानकारी दे। यह प्रक्रिया कई प्रकार या विधि से की जा सकती है। जैसे – व्याख्यान विधि, आगमन विधि, निगमन विधि। इस प्रक्रिया में शिक्षक पाठ्यक्रम के विषय-संबंधी महत्त्वपूर्ण तथ्यों से अवगत कराने के साथ-साथ विषय से जुड़ी अन्य बातों से भी छात्रों को अवगत कराता है, जो सामान्यत: पाठ्य-पुस्तक में नहीं होती। पाठ्यक्रम का प्रस्तुतीकरण हेतु शिक्षक का अनुभव भी काफी अहम होता है। वह पाठ्य-वस्तु को समाज के विभिन्न उदाहरणों और संदर्भों से जोड़कर विद्यार्थियों में विषय की उपयोगिता सिद्ध करता है। इस प्रक्रिया में वह पुनर्बलन एवं समस्या निवारण विधि का भी प्रयोग करता है।
पाठ्य-वस्तु को सुदृढ़ करना
पाठ्यक्रम के प्रस्तुतीकरण के दौरान पाठ्यवस्तु का सुदढृ ी़ करण अति आवश्यक है। इस कार्य में शिक्षक की भूमिका काफी अहम होती है। वह पाठ्य-वस्तु को तत्कालीन सामाजिक विषयों से जोड़ता है या फिर समाज की उपलब्ध व्यवस्था से उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस कार्य में पुनर्बलन एवं समस्या निवारण प्रक्रिया काफी अहम है। पुनर्बलन प्रक्रिया में शिक्षक सही उत्तर देने वाले छात्रों को शाबाशी देता है। वह इसी तरह झिझकते छात्र को भी प्रोत्साहित करता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से शिक्षक कक्षा-कक्ष का वातावरण सुव्यवस्थित रखने के साथ-साथ छात्रों को अभिप्रेरणा भी प्रदान करता है। इसी तरह समस्या निवारण विधि द्वारा पाठ्य-वस्तु को सुदृढ़ किया जाता है। समस्या निवारण प्रक्रिया में शिक्षक छात्रों के सम्मुख कोई चुनौतीपूर्ण समस्या रखकर उन्हें समाधान की खोज की तकनीक व प्रशिक्षण प्रदान करता है।
कक्षा-कक्ष की गतिविधियाँ
कक्षा-कक्ष की गतिविधियों में वे सभी विधियाँ शामिल होती हैं, जो पाठ्यवस्तु को सुदृढ़ करने में सहायक होती हैं। विधि वह साधन है जिसे अध्यापक सीखने की क्रिया को सरल तथा प्रभावशाली बनाने के लिए अपनाता है। इसमें कई महत्त्वपूर्ण सोपान सम्मिलित हैं जिनकी व्यवस्था तर्कसंगत तथा क्रमबद्ध रूप से अध्यापक द्वारा की जाती है। कक्षा-कक्ष की गतिविधियों में शिक्षक शिक्षा के ऐसे स्वरूप पर बल देता है जिसमें अनुभवों का निरंतर पुनर्गठन तथा पुनर्निर्माण होता रहता है। वाद-विवाद विधि के माध्यम से छात्रों में तर्क शक्ति बढ़ती है। साथ ही विषय को तर्कपूर्ण तरीके से समझने का कौशल बढ़ता है। पाठ्य-पुस्तक के माध्यम से भी कई प्रकार की गतिविधियाँ की जाती हैं। निदर्शन गतिविधि के द्वारा अध्यापक प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण और संश्लेषण के आदर्श रूप छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करता है। सामाजिक विज्ञान के शिक्षण में प्रश्नावली विधि के माध्यम से अध्यापक छात्रों से विषय संबंधी प्रश्न पूछता है तथा उनके उत्तरों के आधार पर वह छात्रों के विषय संबंधी ज्ञान को और अधिक सुदृढ़ और व्यापक बनाता है। कक्षा-कक्ष में तत्कालीन घटनाओं से संबंधित चार्ट, मानचित्र आदि का निर्माण कर विषय के प्रति आकर्षित किया जाता है।
कक्षा के बाहर की जाने वाली गतिविधियाँ
कक्षा-कक्ष ज्ञान का एक ढांचागत सीमित रूप है। चूँकि विद्यालयी जीवन वास्तविकता में हमारे समाज का ही एक प्रतिरूप होता है। अत: कक्षा के बाहर निकल वास्तविक समाज से अनुभव अर्जित करना भी अधिगम प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
(i) साहित्यिक एवं भाषायी कौशल संबंधित गतिविधियाँ:
इनमें वाद-विवाद, परिचर्चा, विद्यालय पत्रिका, कविता-कहानी लेखन, समाचार-पत्र वाचन, भाषण प्रतियोगिता आदि शामिल हैं।
(ii) शारीरिक विकास हेतु गतिविधियाँ:
इनमें योगा, विभिन्न प्रकार के खेल, एन.सी.सी., स्काउट एवं गाइड, परेड आदि में भाग लेना शामिल है।
(iii) भ्रमण: सामाजिक विज्ञान अध्ययन में विभिन्न ऐतिहासिक जगहों का भ्रमण विद्यार्थी को अधिगम में काफी मदद करता है। शैक्षिक भ्रमण के अलावा, पिकनिक, माउंटिंग आदि भी अधिगम में सहायक हैं।
सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों का उद्देश्य
पाठ्य-पुस्तक, पाठ्यक्रम का एक हिस्सा मात्र है। अत: विद्यालय के सम्पूर्ण शैक्षिक कार्यक्रम, जिनमें पाठ्यक्रम संबंधित गतिविधियों के अलावा सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां भी शामिल होती हैं, से अधिगम को बल मिलता है।
► पाठ्यक्रम सहभागी क्रियाओं से विद्यार्थी में आपसी सद्भावना के साथ-साथ लोकतांत्रिक कौशल का विकास होता है।
► विभिन्न वातावरण से आये विद्यार्थियों में सहयोग और सह-अस्तित्व की भावना का विकास होता है, जिससे वे भावनात्मक रूप से एक-दूसरे से जुड़ते हैं। दूसरे शब्दों में, बालकों में समाजीकरण की भावना का विकास होता है। इससे बालकों के सर्वांगीण विकास को बल मिलता है। छात्रों में अनुशासन का विकास होता है।
व्याख्यान-प्रस्तुतीकरण
व्याख्यान विधि में ‘भाषित’ शब्दों द्वारा शिक्षण कराया जाता है।
‘व्याख्यान’ का अर्थ है- अध्यापक की औपचारिक वार्ता। इस विधि का ज्यादातर प्रयोग माध्यमिक विद्यालय स्तर पर सामाजिक विज्ञान शिक्षण हेतु किया जाता है।
► इस विधि की सफलता-असफलता मुख्यत: अध्यापक के व्यक्तित्व पर निर्भर करती है।
► प्राइमरी स्कूल में विद्यार्थियों में लंबी वार्ता या भाषण सुनने का धैर्य नहीं होता। अत: यह विधि मनोरंजक कहानी का रूप ले लेती है।
► व्याख्यान विधि में इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि भाषण नीरस न हो।
व्याख्यान विधि के लाभ
बोले हुए शब्द छपे हुए शब्दों की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होते हैं। भाशण या व्याख्यान के दौरान त्रुटियों में सुधार संभव होता है। इस विधि से विद्यार्थियों में श्रवण कौशल का विकास होता है। इसमें समय और शक्ति की बचत होती है तथा विद्यार्थियों को सुनकर सीखने का अनुभव व प्रशिक्षण प्राप्त होता है। व्याख्यान विधि स्पश्टीकरण का तथा विद्यार्थियों को प्रेरित करने का उत्तम साधन है।
व्याख्यान विधि की हानियाँ
इस विधि में छात्र श्रोता मात्र बनकर रह जाता है। अत: इसे शिक्षण की स्वाभाविक विधि नहीं मानी जाती है। सभी अध्यापक इस विधि का प्रभावपूर्ण तरीके से प्रयोग करने में सक्षम नहीं हो पाते हैं। कई बार व्याख्यान में अनावश्यक बातों का भी समावेश हो जाता है।
कक्षा-कक्ष में परस्पर संवाद
आज का युग तर्क का युग है। आपसी चर्चा एवं संवाद अधिगम को बल देते हैं। कक्षा-कक्ष में व्याख्यान की जगह परस्पर संवाद का होना अति आवश्यक है। चर्चा या संवाद विधि पढ़ाने की उस प्राचीन विधि के लिए एक चुनौती है जिसके अन्तर्गत अध्यापक ही सर्वेसर्वा होता था। संवाद में तर्क-वितर्क किसी भी रूप में हो सकता है – परिचर्चा, गोष्ठी अथवा सम्मेलन। इस बात को स्मरण रखना चाहिए कि कक्षा की चर्चा कोई जनता में भाषण करने की कला या वाद-विवाद में कुशलता प्राप्त करने का अवसर नहीं होता। कक्षा-कक्ष में संवाद समावेशी होना चाहिए। कक्षा के सभी विद्यार्थियों में संवाद कौशल के विकास हेतु अध्यापक को तत्पर रहना चाहिए।
पाठ्यक्रम की समस्या का निराकरण
विद्यार्थियों के अधिगम हेतु विशेष कक्षा के स्तर के अनुसार विद्यालयों में एक निश्चित पाठ्यक्रम की व्यवस्था की जाती है। पाठ्यक्रम में शैक्षिक एवं सह-शैक्षिक दोनों क्रियाएँ शामिल होती हैं। एक निश्चित आयु वर्ग के विद्यार्थियों के लिए विशिष्ट सामग्री तथा शिक्षण विधियों का चुनाव किया जाना आवश्यक है। वास्तव में पाठ्यक्रम की सामग्री के चुनाव तथा वर्गीकरण का कार्य अध्यापक के जिम्मे होता है। ‘कैसे’ और ‘कब’ पढ़ाए जाने की बात करना व्यर्थ है, जब तक पहले यह निर्णय न कर लिया जाए कि पढ़ाना ‘क्या’ है। पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जिससे विद्यार्थी वर्तमान काल की वास्तविक समस्याओं के समाधान कर सकें। पाठ्यक्रम में अधिकाधिक आत्मानुभूति के अवसर प्रदान किये जाने चाहिए। पाठ्यक्रम बाल केन्द्रित होने के साथ-साथ समाज केन्द्रित तथा लचीला होना चाहिए।
शिक्षण के उपागम
वर्तमान में कक्षा-शिक्षण पाठ्य-पुस्तक को पूर्ण करने तक सीमित होता जा रहा है। प्राय: देखा जाता है कि पाठ्यचर्या में चर्चा किये गये मुद्दों से बच्चे स्वयं के अनुभव को जोड़ने में असफल होते हैं। इसका कारण है- कक्षा-अध्यापन में प्रत्यक्ष ज्ञान का सहारा न लिया जाना। शिक्षण-प्रक्रिया द्वै सिद्धांत का ही रूप है। इसके द्वन्द्वात्मक रूप के कारण ही अध्ययन-अध्यापन में बालकों के साथ-साथ शिक्षक का भी अधिगम होता है। अत: शिक्षक को चाहिए कि वह पाठ्य-वस्तु को वास्तविक जीवन अर्थात् बालक के आस-पास के समाज से जोड़कर पढ़ाए। इस प्रक्रिया में ग्राह्य और सरलीकृत भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए। सीखने की प्रक्रिया को भागीदारी पूर्ण बनाने के क्रम में सूचना के मात्र आदान-प्रदान की बजाए वाद-विवाद एवं परिचर्चा को कक्षा-कक्ष में स्थान दिया जाना चाहिए। कक्षा में अनुपूरक पठन सामग्री से पाठ्य-पुस्तक एवं शिक्षकों की स्वायत्तता बढ़ती है। इससे क्रियाकलापों एवं परियोजना में आत्मविश्वास का स्तर बढ़ता है।
शिक्षण-शास्त्र की विवेचना
शिक्षण-कार्य की प्रक्रिया का विधिवत् अध्ययन शिक्षा शास्त्र या शिक्षण शास्त्र (Pedagogy) कहलाता है। इसमें अध्यापन की शैली या नीतियों का अध्ययन किया जाता है। शिक्षण में शिक्षक को इस बात का ध्यान रखना होता है कि अधिगमकर्ता अधिक से अधिक विषय को समझ सके। शिक्षण प्रक्रिया अध्यापक एवं शिक्षार्थी के मध्य अन्त:क्रिया होती है। यह अन्त:क्रिया विशेष लक्ष्य की ओर उन्मुख होती है। शिक्षक और शिक्षार्थी शिक्षा शास्त्र के आधार पर एक-दूसरे के व्यक्तित्व से लाभान्वित और प्रभावित होते रहते हैं और यह प्रभाव किसी विशिष्ट दिशा की ओर स्पष्ट रूप से अभिमुख होता है। क्रिया द्वारा सीखना, जीवन से सम्बद्धता स्थापित करना आदि कई सिद्धांत हैं जो शिक्षण में प्रयोग होते हैं। उचित अधिगम हेतु पाठ्यचर्या को उचित खण्डों, अन्वितियों अथवा इकाइयों में विभक्त किया जाना चाहिए। अधिगम हेतु विषय की पुनरावृत्ति करते रहना चाहिए और पाठ्य सामग्री में संसार की अपार धनराशि में से अत्यंत उपयोगी वस्तुओं को चुनकर रखा जाना चाहिए। साथ ही, सहभागितापूर्ण अध्ययन-अध्यापन की भावनाओं एवं अनुभव को कक्षा में महत्त्व दिया जाना चाहिए तथा शिक्षण कार्य भय एवं दबाव मुक्त होना चाहिए।

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