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अध्याय 2 बाल विकास के सिद्धान्त (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 2 बाल विकास के सिद्धान्त

बाल विकास के सिद्धान्त

बाल विकास, किसी बालक के व्यवहार में आने वाले गुणात्मक तथा परिमाणात्मक बदलाव का अध्ययन है। इसके अंतर्गत किसी बालक के जीवनकाल में हुए शारीरिक, सामाजिक, संज्ञानात्मक, मानसिक तथा भाशायी विकास को शामिल किया जाता है। इस अध्ययन को लेकर विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग सिद्धांत दिये हैं।
हरलॉक (Hurlock) के अनुसार, ‘‘बाल विकास में किसी बालक या शिक्षार्थी के विकास के सभी पक्षों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।’’
जेम्स ड्रेवर (James drever) का मानना है कि, ‘‘बाल मनोविज्ञान के अंतर्गत किसी बच्चे के जन्म से लेकर परिपक्वतावस्था तक विकसित हो रहे व्यक्ति का अध्ययन किया जाता है।’’
आइजनेक (Eysneck) के अनुसार, ‘‘बाल मनोविज्ञान, शिक्षार्थी के मनोवैज्ञानिक विकास प्रक्रियाओं के अध्ययन से संबंधित है। इसमें किसी शिक्षार्थी के गर्भकालीन अवस्था से लेकर परिपक्वतावस्था तक के बीच हुए मनोवैज्ञानिक विकास प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।’’ हम बाल मनोविज्ञान के अंतर्गत बालक की क्षमताओं का तथा बाल विकास के अंतर्गत उसकी क्षमताओं के विकास की दशा को जाँचने का कार्य करते हैं।
बाल विकास के प्रमुख सिद्धांत निम्न प्रकार से हैं:
► निरंतरता का सिद्धांत: निरंतरता के सिद्धांत का तात्पर्य क्रमिक अथवा अनवरत विकास से है। किसी बालक का विकास कुछ ही दिनों में नहीं हो जाता है। जैसे एक भाशा या सामाजिक मूल्य को आत्मसात करने में बालक को लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यह उसके जन्म से लेकर जीवनपर्यन्त चलती रहती है। इस सिद्धांत के अनुसार, बालक के सभी वैयक्तिक पक्षों यथा शारीरिक, सामाजिक तथा मानसिकता का विकास निरन्तरता के गुणों द्वारा ही होता रहता है।
अंत: संबंध का सिद्धांत: किसी बालक के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक विकास के सभी आयाम आपस में एक-दूसरे से संबंद्ध हैं। किसी एक आयाम में बालक के कमजोर पड़ने से वह दूसरे आयाम के विकास में भी कमजोर पड़ सकता है। जैसे- सामाजिक रूप से पिछड़े बालक के मानसिक रूप से भी पिछड़ने की संभावना बनी रहती है।
वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धांत: इस सिद्धांत के अनुसार, किन्हीं दो बालकों के शारीरिक, मानसिक तथा संवेगात्मक विकास में भिन्नता पायी जाती है। इसका तात्पर्य है कि दो बालक अपनी सीखने की क्षमताओं या योग्यता में एक जैसे नहीं होते हैं। ऐसा उनकी बुद्धि क्षमता, आनुवांशिक गुणों एवं परिवेश के कारण होता है।
विकास क्रम में एकरूपता का सिद्धांत: इस सिद्धांत के अनुसार, किन्हीं दो बालकों के विकास में भिन्नताओं के बाद भी उनकी कुछ विशेशताओं में समानता पायी जाती है। जैसे- सभी बालकों में भाशा विकास घर से शुरू होता है और शारीरिक विकास के क्रम में बच्चा पहले बिस्तर पर पलटना सीखता है।
सामान्य से विशेष की ओर विकास: बालक सीखने के क्रम में सामान्य क्रिया-कलापों एवं शब्दों को सीखता है और बाद में विशिश्ट क्रिया-कलापों एवं शब्दों को समझ पाता है। जैसे एक बालक पहले जोड़-घटाव सीखता है फिर गुणा-भाग की क्रियाओं को सीखता है।
पूर्वानुमान का सिद्धांत: बालक की मानसिक एवं शारीरिक योग्यताओं को देखते हुए भविश्य में उसके विकास की दिशा का पूर्वानुमान लगाया जाता है। जैसे- यदि कोई बालक गणित में बहुत रूचि रखता हो और कठिन गणित के प्रश्नों को तुरंत हल कर देता हो तो आगे जाकर उसके गणितज्ञ बनने का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।
वंशानुक्रम एवं परिवेश का सिद्धांत: बालक में जन्मजात मानसिक तथा शारीरिक योग्यता उसके वंशानुक्रम गुणों की देन होती है। बालकों के विकास क्रम में उपलब्ध परिवेश उसके मानसिक तथा शारीरिक योग्यताओं को बढ़ाने का काम करते हैं। जैसे वंशानुगत रूप से लंबा बच्चा अपने परिवेश से दौड़ना सीख कर धावक बन सकता है। अत: विकास की प्रक्रिया के लिए वंशानुक्रम एवं परिवेश दोनों का समान महत्व है।

बाल विकास की प्रकृति

मनोविज्ञान के क्षेत्र में बाल विकास एक महत्वपूर्ण विशय है। इसमें बच्चों के व्यवहार के कई पक्षों एवं आयामों का अध्ययन किया जाता है। बाल विकास में अध्ययन के लिए विशिश्ट उपागम का उपयोग किया जाता है।
प्रयोगात्मक उपागम: इस उपागम से बालकों की विभिन्न समस्याओं से जुड़े कार्य-कारण के बीच के संबंधों का अध्ययन किया जाता है। इससे यह भी ज्ञात किया जाता है कि बालक किस परिस्थिति-विशेश में विशिश्ट व्यवहार करेगा अथवा उसकी अभिव्यक्ति कैसी होगी?
दैहिक उपागम: हार्मोन्स ग्रंथियों के कारण शिक्षार्थियों में शारीरिक वृद्धि, विकास और स्वास्थ्य प्रभावित होता है। बाल विकास में जैविक एवं मानसिक पहलू एक-दूसरे से जुड़े होते हैं अत: इसे दैहिक उपागम के द्वारा भी समझा जा सकता है।
विकासात्मक उपागम: बालक की विकास की मात्रा, गति एवं विकास की विशिश्टताओं को समझने के लिए हम विकासात्मक उपागम का अध्ययन करते हैं।
व्यक्तित्व-संबंधी उपागम: बालक के गुणों, आदतों एवं वृतियों के अध्ययन द्वारा उसके व्यक्तित्व का अध्ययन किया जाता है। इस उपागम से हम किसी बालक के विकास का पूर्वानुमान लगा सकते हैं।

बाल विकास के क्षेत्र

बाल विकास एवं विभिन्न अवस्थाएँ: बालक अपने जीवनकाल में कई अवस्थाओं यथा गर्भकाल, शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था से गुजरता है। बाल विकास के अंतर्गत इन सभी अवस्थाओं का अध्ययन किया जाता है।
बाल विकास एवं विभिन्न पहलु: किसी बालक के विकास को समझने के लिए उससे जुड़े कई पहलुओं का अध्ययन किया जाता है। इसके अंतर्गत शारीरिक, नैतिक, चारित्रिक, सामाजिक, क्रियात्मक एवं भाशा विकास को शामिल किया जाता है।
बाल विकास एवं प्रभावी तत्व: किसी बालक के विकास को प्रभावित करने वाले कारक वंशानुक्रम, परिवेश, परिपक्वता जैसे तत्वों का अध्ययन किया जाता है।
बाल विकास एवं असामान्यताएं: बालकों के जीवनकाल में प्रकट होने वाले असामान्य व्यवहारों, मानसिक विकारों तथा बौद्धिक समस्याओं का अध्ययन कर असामान्यताओं को समझा जाता है। इसके द्वारा बालक की समस्याओं का प्रभावी समाधान निकाला जा सकता है।

बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक

किसी बालक का विकास वंशानुगत, शारीरिक, बौद्धिक तथा संवेगात्मक जैसे आंतरिक कारकों और सामाजिक प्रकृति जैसे बाहरी कारकों से प्रभावित होता है।
आंतरिक कारक:
► वंशानुगत कारक: वंशानुगत कारक किसी बालक के रंग-रूप, आकार और उसके शारीरिक विकास को निर्धारित करते हैं। बच्चे में माता-पिता के गुण आ जाते हैं जो वैयक्तिक भिन्नता का कारण बनते हैं।
शारीरिक कारक: शारीरिक बनावट में कमी या विकलांगता का एक बालक की मनोदशा पर विपरीत असर पड़ता है। इससे उसका विकास भी अपेक्षानुरूप नहीं होता।
संवेगात्मक कारक: क्रोध, भय, ईर्श्या जैसे संवेगात्मक कारकों से बालक का विकास प्रभावित होता है।
बुद्धि: बुद्धि बालक को निर्णय लेने में मदद करती है। बुद्धि द्वारा एक बालक स्वयं को अपने परिवेश के साथ समायोजित करता है।
सामाजिक प्रकृति: बालक के सामाजिक मूल्य उसके मानसिक विकास को प्रभावित करते हैं। वह अपने सामाजिक प्रकृति के अनुसार ही अन्य बालकों से बरताव करता है।
बाहरी कारक:
► गर्भकाल में बच्चे का परिवेश: गर्भकाल के दौरान यदि बच्चे की माँ का स्वास्थ्य खराब हो तो उसका प्रभाव बच्चे के शारीरिक विकास पर पड़ता है। इसके साथ ही यदि उसके परिवेश में कोई बदलाव हो जैसे अचानक हिमपात हो जाये तो उससे भी बच्चे की वृद्धि पर असर पड़ता है।
जीवन की घटनाएं: किसी बालक के जीवन में घटने वाली प्रतिकूल घटनाओं का असर उसके विकास पर भी पड़ता है। जैसे- यदि कोई बालक किसी दुर्घटना के कारण विकलांग हो जाएं तो उसके सीखने की क्षमता कम हो जाएगी।
सामाजिक-आर्थिक स्थिति: बालक की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के अनुसार उसे स्कूल जाने तथा सीखने का अवसर मिलता है। जैसे- एक गरीब बच्चे को सारी शिक्षण सामग्री नहीं मिल पाती है तो शिक्षण में पिछड़ जाता है।
भौतिक वातावरण: बालक अपने आसपास के परिवेश अथवा भौतिक वातावरण के अनुसार बोलना सीखता है। यह उसके विकास में सहायक सिद्ध होता है। परिवेश यदि प्रतिकूल हो जैसे जल प्रदूशित हो तो इसका प्रभाव उसके स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

बाल विकास के सिद्धान्तों का शैक्षिक क्षेत्र में महत्व

शिक्षक बाल विकास के सिद्धांतो के अनुसार, किसी बालक के स्वभाव, मनोदशा एवं क्षमताओं की पहचान करता है। बाद में वह उसके अनुरूप ही बालक के विकास के लिए नीति निर्माण करता है तथा अध्यापन कार्य में परिवर्तन करता है।
► इन सिद्धांतो द्वारा शिक्षक सभी बालकों की वैयक्तिक भिन्नताओं की पहचान कर वृद्धि एवं विकास की गति को मापता है।
► बालकों के विभिन्न आयु वर्ग के अनुसार उनके सर्वांगीण विकास की जाँच की जाती है और उन्हें श्रेणीबद्ध किया जाता है।

बाल विकास की अध्ययन विधियाँ

1. क्रमबद्ध चरित्र-लेखन विधि: इस विधि का प्रयोग सबसे पहले प्रेयर ने 1882 में किया था। उन्होंने जन्म से लेकर 3 वर्श तक बच्चे द्वारा अनुभव की गई क्रियाओं का अध्ययन किया था। इस प्रयोग से वह बच्चों में ज्ञानेन्द्रियों के क्रमागत विकास तथा उसके व्यवहार की जाँच कर रहे थे। इस प्रयोग में बच्चों के दैनिक व्यवहारों को क्रमबद्ध लिखा जाता है और उसका अध्ययन कर व्यवहार में आवश्यक सुधार किया जाता है।
2. निरीक्षण विधि: बाल मनोविज्ञानी यंग के अनुसार, ‘‘बच्चों या किसी शिक्षार्थी के सामूहिक व्यवहार को बैठ कर अवलोकन करने को निरीक्षण विधि कहते हैं।’ इस विधि में निरीक्षण कार्य सावधानीपूर्वक किया जाता है और उपयुक्त योजना बनाई जाती है। बालकों के व्यवहारों का निरीक्षण करने के बाद उसका विश्लेशण किया जाता है। निरीक्षण विधि में शिक्षक सहभागी बनकर अथवा व्यवस्थित रूप से प्रतिदिन निरीक्षण कर सकते हैं। सहभागी विधि में शिक्षक बच्चों के साथ उनके क्रियाकलाप में भाग लेते हैं। सामान्यत: निरीक्षण विधि का प्रयोग परिकल्पनाएं बनाने के लिए करते हैं। इस विधि द्वारा वस्तुनिश्ठ प्रश्नों जैसे ‘क्या’, ‘कैसे’, ‘कहाँ’ आदि का सही जवाब मिलता है।
3. प्रयोगात्मक विधि: इस विधि में बालकों को एक समस्या दी जाती है और फिर यह देखा जाता है कि वे उस समस्या को प्रयोग द्वारा किस प्रकार से सुलझाते हैं? जैसे- कोई विशेश चित्र बनाने को दिया जाता है। बालक चित्र के विशय को किस प्रकार से प्रस्तुत करते हैं। यह देखकर उनकी परिपक्वता, सीखने की क्षमता, प्रेरणा, विभेदीकरण तथा संवेगात्मक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। प्रयोगात्मक विधि, कार्य एवं कारण के बीच संबंधों की जाँच करती है। इस विधि द्वारा व्यवहार को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का अध्ययन किया जाता है जो सटीक माने जाते हैं।
4. समकालीन एवं दीर्घकालीन अध्ययन प्रणालियाँ:
► समकालीन अध्ययन प्रणाली: इस प्रणाली में बालकों को विभिन्न आधार पर समूहों में बांटा जाता है। अध्ययन के विशय जैसे कौन-सा बालक दौड़ने में रूचि रखता है? यह निर्धारित करने के लिए अलग-अलग आयु स्तर के बालकों का चयन किया जाता है। दौड़ने के क्रम में इन सभी बालकों की शारीरिक एवं मानसिक योग्यता को परखा जाता है। इस प्रणाली से शिक्षक को जीवन में घटित होने वाली घटनाओं की जानकारी जल्द हो जाती है और दो विभिन्न बालकों के बीच तुलनात्मक अध्ययन संभव होता है।
दीर्घकालीन अध्ययन प्रणाली: इस प्रणाली में बालकों को एक ही आयु के आधार पर बांटा जाता है। उनकी शारीरिक एवं मानसिक योग्यता को क्रमबद्ध रूप से लिखकर उसे बढ़ती आयु के साथ मापा जाता है। इसके द्वारा बालकों की शारीरिक लंबाई, भार, बुद्धिलब्धि, सामाजिक एवं संवेगात्मक विकास से जुड़ी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है। उदाहरणस्वरूप- हम बालकों के लेखन कला को जाँचने के लिए 50 बालकों का चयन करते हैं और 1 वर्श बाद उनकी लेखन-शैली का निरीक्षण करेंगे। इस प्रकार से बालक के विकास क्रम का अध्ययन किया जाता है। इस प्रणाली में बालकों का व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों स्तरों पर विश्लेशण होता रहता है। बालकों के नमूने के चयन में गलती होने की संभावना कम रहती है। इसके द्वारा बालक के विकास प्रक्रिया का सही आकलन संभव होता है।
5. साक्षात्कार विधि: बालकों की ऐसी कई समस्याएँ होती हैं जिनके बारे में शिक्षक केवल अवलोकन या निरीक्षण द्वारा नहीं जान सकता है। जैसे- बालक, कक्षा में किस सामग्री की कमी महसूस करते हैं या उनका सहपाठियों के बारे में क्या सोचना है? इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए शिक्षक साक्षात्कार विधि का प्रयोग करते हैं। इस विधि में बालकों से कुछ निर्धारित प्रश्न पूछे जाते हैं और उनके उत्तर के आधार पर समस्या का अध्ययन करते हैं। बालकों से प्रश्न पूछने के लिए ‘खुली प्रश्नावली’ में ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं जिसमें बालकों के पास यह अवसर होता है कि वे स्वतंत्र होकर अपने शब्दों में उत्तर दें। इसी प्रकार ‘बंद प्रश्नावली’ में ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं जिसमें बालक के पास केवल हाँ या नहीं में उत्तर देने का अवसर होता है। जैसे- क्या सहपाठी आपको तंग करते हैं? हाँ/नहीं
6. मनोवैज्ञानिक परीक्षण विधि: बालकों के कुछ व्यवहार जैसे क्रोध, चिड़चिड़ेपन आदि को समझने के लिए मनोवैज्ञानिक परीक्षण विधि का प्रयोग किया जाता है। जैसे- गेंदों को जाली में डालने का खेल दिया जाता है। परीक्षण द्वारा यह जाना जाता है कि गेंद के जाल में कितनी बार नहीं जाने पर वे खीझते हैं? मनोवैज्ञानिक बेस्ट के अनुसार, ‘‘किसी बालक के व्यवहार के पक्षों को मापने एवं गणना के लिए मनोवैज्ञानिक परीक्षण का प्रयोग करते हैं।’’

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