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अध्याय 19 अभिप्रेरणा तथा अधिगम (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 19 अभिप्रेरणा तथा अधिगम

अभिप्रेरणा का अर्थ तथा परिभाषा

► एक व्यक्ति या शिक्षार्थी के जीवन में प्रतिदिन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अभिप्रेरणा पायी जाती है। विद्यालय जाना पढ़ाई करना, व्यवसाय करना, खाना खाना, संगीत सुनना, सिनेमा देखना, खेल खेलना आदि सभी कार्यों के पीछे कोई न कोई अभिप्रेरणा विद्यमान रहती है। शिक्षार्थी का व्यवहार हमेशा ही कुछ प्रेरक या तत्वों द्वारा नियंत्रित और दिशा निर्देशित होता है तथा ये प्रेरक तत्व आन्तरिक होते हैं।
► मनोवैज्ञानिक अर्थ में अभिप्रेरणा से अभिप्राय केवल आंतरिक उत्तेजनाओं से होता है, जिसके आधार पर किसी शिक्षार्थी का व्यवहार निर्भर करता है। इस अर्थ में बाह्य उत्तेजनाओं को कोई स्थान नहीं मिला है।
► दूसरे अर्थ में ‘अभिप्रेरणा वास्तव में व्यक्तियों के भीतर (आन्तरिक) स्थित होती है जो उनमें क्रियाशीलता उत्पन्न करती है। यह क्रियाशीलता व्यक्तियों में लक्ष्य की प्राप्ति तक चलती रहती है। अभिप्रेरणा एक मनोव्यावहारिक क्रिया है। अभिप्रेरणा व्यक्ति की आन्तरिक अवस्था को कहा जाता है, और यह आन्तरिक अवस्था अमूर्त होती है। उसे ठोस रूप में नहीं देखा जा सकता। अभिप्रेरणा व्यक्ति की क्रियाओं व गतिविधियों को एक निश्चित दिशा प्रदान करती है।

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अभिप्रेरणा की परिभाषाएँ

रिली एवं लेविस के अनुसार, ‘अभिप्रेरणा एक ऐसा बल है जो व्यक्ति के भीतर से उत्पन्न होता है न कि कुछ ऐसी चीज है जो शिक्षक शिक्षार्थियों में अपनी ओर से पैदा कर सकते हैं।
गुड के अनुसार, ‘अभिप्रेरणा, कार्य को आरम्भ करने जारी रखने और नियमित करने की प्रक्रिया है।’
ब्लेयर मानते हैं कि प्रेरणा एक प्रक्रिया है, जिसमें सीखने वाले की आन्तरिक शक्तियाँ या आवश्यकताएँ उसके वातावरण में विभिन्न लक्ष्यों की ओर निर्देशित होती है। अभिप्रेरणा का सम्बन्ध उन कारणों से है जो व्यक्ति की क्रिया का बल बढ़ाते हैं या घटाते हैं।
► सारांशत: मनोविज्ञान में अभिप्रेरणा को एक काल्पनिक आन्तरिक प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जाता है।
यह व्यवहार करने के लिए शक्ति प्रदान करता है तथा व्यवहार को एक खास उद्देश्य की ओर ले जाता है।
► अभिप्रेरणा व्यक्ति की एक विशिष्ट स्थिति होती है जो उसे एक निश्चित लक्ष्य की ओर निर्देशित करती है। उदाहरण के लिए, प्यास की अवस्था में मनुष्य पानी की तलाश में रहता है। उसकी यह पानी पीने की क्रियाशीलता पानी मिलने और अपनी प्यास बुझाने तक जारी रहती है। पानी की प्राप्ति और प्यास की तृप्ति हो जाने के बाद उस अभिप्रेरणा विशेष की क्रियाशीलता समाप्त हो जाती है। इसी प्रकार अन्य क्रियाओं में भी अभिप्रेरणा देखी जा सकती है।

अभिप्रेरणा के प्रकार

उत्पत्ति या उद्गम के आधार पर अभिप्रेरणा दो प्रकार की होती है।
आंतरिक अभिप्रेरणा
बालक किसी कार्य को अपनी स्वयं की इच्छा से ही करता है, और उस कार्य को करने के बाद बालक को खुशी और संतोष प्राप्त होता है तो इसे आन्तरिक अभिप्रेरणा या प्राथमिक अभिप्रेरणा कहते हैं। इस प्रकार की अभिप्रेरणा के अन्तर्गत पाठ्यवस्तु तथा क्रियाओं से शिक्षार्थियों को स्वयं ही प्रोत्साहन मिलता है। इस अभिप्रेरणा का सम्बन्ध शिक्षार्थी की आंतरिक इच्छाओं, रुचियों और आवश्यकताओं से होता है।
► उदाहरण के लिए, कोई शिक्षार्थी गणित में रुचि लेता है, कोई शिक्षार्थी विज्ञान में रुचि लेता है। यह इसलिए होता है क्योंकि उन्हें इन विषयों के अध्ययन में आनन्द आता है जो आन्तरिक रूप से अभिप्रेरित होता है।
► इस प्रकार के स्वाभाविक व्यवहार द्वारा शिक्षार्थियों के सीखने की प्रक्रिया तीव्र होती है और उनकी रुचि विषय में बनी रहती है। आंतरिक अभिप्रेरणा अन्तर्नोद (Drive) की शक्ति को क्षीण कर आंतरिक तनाव कम करती है। इसके परिणामस्वरूप आंतरिक साम्य या संतुलन स्थापित होता है और व्यक्तिगत लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु सीखने की स्वाभाविक इच्छा उत्पन्न होती है।
बाह्य अभिप्रेरणा
इस प्रकार की अभिप्रेरणा का सम्बन्ध किसी व्यक्ति से न होकर वातावरण या किसी अन्य व्यक्ति की इच्छा से होता है। परीक्षा परिणाम, पुरस्कार, दण्ड, प्रतियोगिता, प्रशंसा, निन्दा आदि बाह्य अभिप्रेरणा के उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त सहयोग, मूल्यांकन, श्रवण दृष्टि सहायता भी अभिप्रेरणा की भूमिका निभाते हैं।
► बाह्य अभिप्रेरणा से तात्पर्य एक ऐसे प्रोत्साहन से होता है जो शिक्षार्थी को बाहरी वातावरण में दिया जाता है तथा जिससे शिक्षार्थी के व्यवहार को एक निश्चित दिशा की ओर मोडा जा सकता है।

अभिप्रेरणा के स्रोत

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, अभिप्रेरणा के तीन प्रमुख स्रोत आवश्यकताएँ, चालक या अन्तर्नोद तथा प्रोत्साहन हैं।
आवश्यकताएँ
► हेनरी मर्रे के अनुसार, ‘आवश्यकता एक परिकाल्पनिक शक्ति है जो व्यक्ति के प्रत्यक्षीकरण, बुद्धि तथा क्रिया को संगठित करती है।’
► जैविक और सामाजिक दो तरह की आवश्यकताएँ होती है।
► भोजन, प्यास, नींद, मलमूत्र त्याग आदि जैविक या शारीरिक आवश्यकताएँ है जबकि सामाजिक आवश्यकताओं में जैसे धनार्जन, दूसरों से सम्बन्ध बनाना, शिक्षा ग्रहण करना आदि को शामिल किया जाता है।
► जैविक आवश्यकताएँ ऐसी आधारभूत आवश्यकताएँ है जिनकी पूर्ति न होने पर व्यक्ति के शरीर में तनाव उत्पन्न होता है, जिससे मनुष्य उस आवश्यकता विशेष की पूर्ति के प्रति क्रियाशील हो जाता है।
► मनोवैज्ञानिकों ने आवश्यकता को अभिप्रेरणा की उत्पत्ति में पहला कदम बताया है। व्यक्ति की इन आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद उसकी क्रियाशीलता तथा शारीरिक तनाव समाप्त हो जाता है।
चालक या अन्तर्नोद
जब शिक्षार्थी या व्यक्ति में किसी चीज के प्रति आवश्यकता उत्पन्न होती है तो उस आवश्यकता को पूरा करने के लिए क्रियाशीलता बढ़ जाती है। इसी क्रियाशीलता को चालक या अन्तर्नोद कहा जाता है। चालक क्रिया करने की शक्ति या ऊर्जा है।
► उदाहरण के लिए, भोजन की आवश्यकता, किसी व्यक्ति या बालक में ‘भूख चालक’ को जन्म देती है। इसी प्रकार पानी की आवश्यकता ‘प्यास चालक’ को जन्म देती है। ये चालक प्राणी को एक निश्चित प्रकार की क्रिया या व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है।
► इन शारीरिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त कुछ मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ भी होती हैं, जिनके द्वारा मनोवैज्ञानिक अन्तर्नोद चालक उत्पन्न होते हैं। वस्तुत: चालक, शरीर की एक आन्तरिक क्रिया या दशा है, जो एक विशेष प्रकार के व्यवहार के लिए प्रेरणा प्रदान करती है।
प्रोत्साहन
► हिलगार्ड के अनुसार, ‘आवश्यकता, चालक को जन्म देती है, चालक बढ़े हुए तनाव या क्रियाशीलता की अवस्था है जो कार्य की ओर अग्रसर करता है।’ उन्होंने इसे आवश्यकता चालक उद्दीपन सूत्र कहा है। उद्दीपन बाहरी वातावरण की वस्तु है जो आवश्यकता को संतुष्ट करती है और इस प्रकार क्रिया के द्वारा चालक को कम कर देती है।
► प्रोत्साहन का सम्बन्ध बाहरी वातावरण या बाहरी वस्तुओं से होता है जो शिक्षार्थी या व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करता है। इसकी प्राप्ति से व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति तथा चालक में कमी हो जाती है।
► किसी वस्तु की आवश्यकता उत्पन्न होने पर उस आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए चालक उत्पन्न होता है और जिस वस्तु से यह आवश्यकता पूर्ण होती है उसे उद्दीपन कहते हैं। उदाहरण के लिए, भूख एक चालक है। जिसे भोजन संतुष्ट करता है अत: भूख चालक के लिए भोजन प्रोत्साहन या उद्दीपन का कार्य करता है।
► प्रोत्साहन या उद्दीपन वह वस्तुस्थिति या क्रिया है जो व्यवहार को उद्दीद्प्त, उत्साहित तथा निर्देशित करती है।
► आवश्यकता, चालक और उद्दीपन का एक दूसरे से गहरा सम्बन्ध है।

सीखने में अभिप्रेरणा की भूमिका

► सीखने की प्रक्रिया में अभिप्रेरणा का महत्वपूर्ण स्थान है। अभिप्रेरणा, सीखने का महत्त्वपूर्ण अंग है।
► एक शिक्षार्थी या व्यक्ति ऐसी किसी भी क्रिया में रुचि नहीं लेता है जिसमें प्रेरणा का अभाव हो। शिक्षार्थियों में स्वस्थ प्रतियोगिता की भावना का विकास, उन्हें अधिक ज्ञान का अर्जन करने के लिए प्रेरित करता है।
► शैक्षिक गतिविधियों में उनका ध्यान पुस्तकों पर केन्द्रित करने में अभिप्रेरणा सहायक सिद्ध होती है। अभिप्रेरणा बालकों के व्यवहार को एक निश्चित दिशा प्रदान करती है और बालकों के व्यवहार को लक्ष्य की ओर निर्देशित करती है।
► अभिप्रेरित व्यवहार उद्देश्यपूर्ण और सतत होता है।
► बालकों को सामुदायिक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रेरित करके उनमें सामुदायिक भावना और सामाजिक गुणों का विकास किया जा सकता है।
► कक्षा में शिक्षक द्वारा विषयानुसार उत्तम शिक्षण विधियों के प्रयोग से शिक्षार्थियों को तीव्र गति से ज्ञान अर्जन करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। इससे शिक्षार्थियों में अध्ययन के प्रति रुचि विकसित होती है।
► शिक्षार्थियों को अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित करने से उनमें अनुशासन की भावना का विकास किया जा सकता है। इस प्रकार बालकों को उत्तम गुणों तथा आदर्शों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

अभिप्रेरणा की मुख्य विधियाँ

कक्षा में बालकों को अभिप्रेरित करने की विधियाँ निम्नलिखित है:
► शिक्षार्थियों को कक्षा में पढ़ाई के प्रति अभिप्रेरित करने और उनकी अभिरुचि शिक्षण में बढ़ाने के लिए शिक्षा मनोवैज्ञानिकों ने कुछ विधियों का वर्णन किया है उनमें से कुछ मुख्य इस प्रकार से हैं।
► पाठ्यसामग्री को रोचक बनाकर शिक्षार्थियों को शिक्षा के प्रति अभिप्रेरित किया जा सकता है। इसके लिए इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि पाठ्य सामग्री या पाठ्य विषय वस्तु रोचक तथा शिक्षार्थियों की मानसिक योग्यता के अनुकूल हो।
► शिक्षार्थियों के आकांक्षा स्तर को उनकी मानसिक योग्यता के आधार पर ही विकसित किया जाना चाहिए।
► कभी-कभी शिक्षार्थी अपने अपेक्षा स्तर को अधिक ऊपर उठा लेते हैं और जब उस अपेक्षा स्तर को पाने में नाकाम होते हैं तो निराशा तथा कुण्ठा के शिकार हो जाते हैं जिससे उनमें सांवेगिक तनाव उत्पन्न होता है और वे शिक्षा में अपनी रुचि खो बैठते हैं।
► समूह में कार्य करवाना भी अभिप्रेरणा प्रदान करने की एक विधि है। बालक समूह में कार्य करना पसन्द करते हैं। यदि बालकों को सामूहिक कार्य दिए जाएँ तो उनकी कार्य कुशलता, कार्य क्षमता, सामाजिक मूल्यों तथा शैक्षिक अभिरूचि में वृद्धि होगी।
► शिक्षार्थियों में सीखने की आवश्यकता पैदा की जानी चाहिए। शिक्षार्थियों को इस बात का अहसास करवाया जाना चाहिए कि जीवन में शिक्षा प्राप्त करना कितना आवश्यक है। जीवन में शिक्षा का स्थान तथा शिक्षा के महत्त्व का अहसास होने पर शिक्षार्थी स्वत: ही शिक्षा के प्रति जागरूक होंगे।
► समय-समय पर उच्च शैक्षिक उपलब्धियों के लिए पुरस्कार की घोषणा करने से भी शिक्षार्थियों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए या पढ़ाई में ध्यान लगाने के लिए अभिप्रेरणा मिलती है। शिक्षकों को शारीरिक दण्ड का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
► अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए बालक की प्रशंसा करना भी एक प्रकार का पुरस्कार है जो बालक में शिक्षा के प्रति अभिप्रेरणा को बढ़ाता है।
► शिक्षार्थियों को खेल विधि द्वारा पढ़ाना बहुत उपयोगी है। इसके लिए शिक्षक को चाहिए कि जिन विषयों को खेल विधि के द्वारा समझाया जा सकता है, उन विषयों के लिए अवश्य ही इस विधि का प्रयोग करें। इससे बालकों का न केवल मनोरंजन होगा बल्कि वे शिक्षा भी प्राप्त करेंगे।
► सीखाने के लिए खेल विधि का प्रयोग करने से बालकों में शिक्षा व शिक्षण के प्रति अभिरुचि बढे़गी। खेल विधि छोटे बच्चों के लिए विशेष उपयोगी है।
► शिक्षार्थियों में आपस में स्वस्थ प्रतियोगिता का भाव उत्पन्न करके भी उन्हें शिक्षा के प्रति अभिप्रेरित किया जा सकता है। अत: शिक्षक को शिक्षार्थियों में स्वस्थ प्रतियोगिता का भाव पैदा करना चाहिए।
► विद्यालय की दिनचर्या में पढ़ाई के साथ-साथ पाठ्य सहगामी जैसे सांस्कृतिक एवं साहित्यिक क्रियाकलापों को भी उचित स्थान दिया जाना चाहिए।
► पाठ्यसहगामी क्रियाएँ न केवल बालकों में पढ़ाई की थकान को कम करती हैं बल्कि पढ़ाई में पूरी निष्ठा के साथ संलग्नता भी पैदा करती है। अत: पाठ्यसहगामी क्रियाएँ भी शिक्षार्थियों के लिए एक प्रकार से अभिप्रेरणा का काम करती है।
► विद्यालय में स्वस्थ शैक्षिक वातावरण भी बालकों के लिए शैक्षिक अभिप्रेरणा का कार्य करता है।
► विज्ञान विषय की पढ़ाई ऐसे कक्ष में हो जिसमें विज्ञान विषय से ही संबंधित पुस्तकें व उपकरण आदि हों। इसी प्रकार, भूगोल विषय की कक्षा भूगोल कक्ष में, इतिहास की इतिहास कक्ष में होनी चाहिए। ऐसा करने से निश्चित ही शिक्षार्थियों में विषय के प्रति रूचि बढ़ेगी।

शिक्षार्थियों को प्रेरित करने वाले कारक

आत्म संप्रत्यय

► आत्म संप्रत्यय यह निर्धरित करता है कि शिक्षार्थी कैसे प्रत्यक्षण कैसे करेगा, उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी और वह कैसा महसूस करेगा।
► कक्षा-कक्ष के सन्दर्भ में शिक्षार्थी का आत्म संप्रत्यय उसकी अभिवृत्तियों तथा संवेदनाओं के साथ मिलकर यह निर्धारित करता है कि शिक्षार्थी अपनी क्षमताओं का कितना प्रयोग कर पाता हैं। उदाहरण के लिए, नकारात्मक आत्म संप्रत्यय होने पर बालक अपनी क्षमता को कम आँकता है तथा असफलता की प्रत्याशा करता है।

आवश्यकता

► आवश्यकता पूर्ति एक शिक्षार्थी या व्यक्ति को सामान्य अवस्था में लाती है।
► व्यक्ति को जब किसी प्रकार की कमी महसूस होती है तो एक स्वचालित आन्तरिक प्रक्रिया उस कमी को दूर करके साम्यावस्था में लाने का प्रयत्न करती है। इस प्रकार व्यक्ति की आवश्यकताएँ उसके व्यवहार के लिए शक्ति का कार्य करती है।
► शिक्षार्थी या व्यक्ति के व्यवहार की भविष्यवाणी उसकी आवश्यकताओं के आधार पर की जा सकती है।
► किसी वस्तु की कमी के आभास को ही आवश्यकता का नाम दिया गया है। वस्तु की कमी के आभास से व्यक्ति में तनाव की स्थिति जन्म लेती है और जब तक उसकी वह आवश्यकता पूरी नहीं होती तब तक उसका तनाव बना रहता है। आवश्यकता पूरी होते ही तनाव समाप्त हो जाता है।

आवश्यकता पदानुक्रम सिद्धांत

► इस सिद्धांत का प्रतिपादन अमेरिका के मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक इब्राहिम मैस्लो ने किया था। यह अभिप्रेरणा के क्षेत्र में मान्य सिद्धांत है।
मैस्लो के अनुसार, अभिप्रेरणा किसी व्यक्ति को आत्मविकास तथा आत्मवास्तवीकरण की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रेरित करती है। मैस्लो ने आवश्यकताओं को एक अधिक्रम में रखा है कमी की आवश्यकताएँ आधारभूत आवश्यकताएँ हैं तथा उनकी पूर्ति के बाद आत्मविकास एवं ज्ञानात्मक उच्च आवश्यकताएँ हैं।
► मैस्लो का विचार था कि प्रथम प्रकार की आवश्यकता की पूर्ति के उपरांत दूसरे प्रकार की आवश्यकता अभिप्रेरित करने लगती है। इसी प्रकार द्वितीय आवश्यकता के बाद तीसरे प्रकार की आवश्यकता आदि। इसी क्रम में एक के बाद दूसरे वर्ग की आवश्यकताएँ व्यक्ति को अपेक्षित दिशा में कार्य करने को अभिप्रेरित करती हैं।
► कुछ व्यक्तियों में कोई विशेष आवश्यकता इतनी बलवती हो जाती है कि आवश्यकताओं के क्रम को छोड़कर व्यक्ति उसी आवश्यकता की पूर्ति हेतु कार्य करने लगता है। उदाहरण के लिए, मैस्लो ने भारत के योगियों एवं साधकों की चर्चा की है जिनमें पाँचवी आवश्यकता अर्थात आत्मसाक्षात्कार की आवश्यकता इतनी बलवती होती है कि वे इसके पूर्व की प्रथम से चतुर्थ प्रकार की आवश्यकताओं को त्याग कर आत्मवास्तवीकरण के लिए साधना करते हैं।
► प्रत्येक व्यक्ति में आत्मवास्तवीकरण की जन्मजात आवश्यकता होती है। आत्मसाक्षात्कार या आत्मविकास की आवश्यकताओं के अन्तर्गत मैस्लो ने मुख्य रूप से आत्मवास्तवीकरण एवं ज्ञानात्मक आवश्यकताओं पर अधिक बल दिया है।
► मैस्लो ने मनुष्य की सात प्रकार की आवश्यकताओं का वर्णन किया है तथा उन्हें एक अधिक्रम या पदानुक्रम में रखा है। इन 7
प्रकार की आवश्यकताओं को दो मुख्य वर्गों में रखा है। अभावजन्य आवश्यकताएँ: शारीरिक आवश्यकताएँ जैसे भूख, प्यास, सुरक्षा, प्रेम तथा समबलता आदि आधारभूत आवश्यकताएँ हैं। इनकी कमी की पूर्ति हेतु शिक्षार्थी या व्यक्ति अभिप्रेरित होता है तथा उस दिशा में कार्य करता है। आत्मोन्नति की आवश्यकताएँ: आत्मविकास या आत्मवास्तवीकरण की आवश्यकताओं के अन्तर्गत उच्च आवश्यकताएँ जैसे आत्मसाक्षात्कार, ज्ञान एवं समझ तथा सौन्दर्योपासना शामिल होती हैं।

अभिवृत्तियाँ

► कुछ मनोवैज्ञानिक अभिवृत्तियों को मुख्यत: संज्ञानात्मक मूल्यांकन मानते हैं जबकि अन्य उन्हें संज्ञानात्मक मूल्यांकन के साथ संवेगात्मक स्तर पर महसूस की जाने वाली प्रक्रिया के रूप में परिभाषित करते हैं।
► सामाजिक मनोवैज्ञानिक रोबर्ट बैरन तथा डान (1980) के अनुसार, अभिवृत्तियाँ संज्ञानात्मक, भावनात्मक तथा व्यवहारात्मक तीनों तत्वों से बनी होती है। उनके अनुसार अभिवृत्तियाँ व्यक्तियों, वस्तुओं, धर्म, समूह आदि से संबंधित आस्थाओं, भावनाओं और व्यवहारगत प्रवृत्तियों की व्यवस्था के रूप में काम करती है।
► अभिवृत्तियाँ किसी विशेश अवधि में स्थायी होने का आभास देती हैं परंतु यह समय बीतने पर बदल जाती हैं। जैसे शिक्षार्थी बाल्यकाल में कला विषय पसंद करता है परंतु वयस्क होने पर वाणिज्य पढ़ने लगता है।
► इस प्रकार बैरन की परिभाषा के अनुसार, हमारा व्यवहार, हमारी आस्थाओं और भावनाओं के अनुरूप होता है।
► अभिवृत्तियों की अन्य विशेषता यह है कि वे अर्जित की जाती हैं। जैसे धर्म, राजनीति समूह तथा अन्य लोगों और वस्तुओं से संबंधित अभिवृत्तियाँ सीखी जाती है। वे एक व्यक्ति तक उसके समाजीकरण के विभिन्न स्रोतों जैसे परिवार, पड़ोस, दोस्त, मीडिया आदि द्वारा पहुँचती है। बच्चों में विभिन्न अभिवृत्तियाँ जैसे खाने के प्रति (शाकाहारी या मांसाहारी भोजन करना चाहिए या नहीं), दोस्तों के चुनाव में जाति, लिंग के प्रति अभिवृत्ति, सफाई के प्रति अभिवृत्ति, फैशन के प्रति अभिवृत्ति, समूह का हिस्सा बनने के लिए, स्वयं में परिवर्तन करना आदि अभिवृत्तियाँ देखी जाती हैं जो उनके अधिगम की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है।
► शिक्षक के लिए एक बालक को समझने के लिए उनकी अभिवृत्तियों के बारे में जानना आवश्यक होता है ताकि उनके व्यक्तित्व में उसकी सहायता से इच्छित एवं अपेक्षित दिशा में परिवर्तन किया जा सके।

अभिवृत्ति निर्माण को प्रभावित करने वाले कारक

► अभिवृत्ति निर्माण हमारे सामाजिक परिवेश में होता है। परिवेश के विभिन्न पक्ष, अभिवृत्ति विकास को स्वरूप प्रदान करते हैं।
► परिवार तथा माता-पिता जिस तरह से बच्चों को प्रभावित करते हैं, वैसी ही अभिवृत्तियाँ निर्मित होती हैं।
► सामाजिक एवं धार्मिक समूह एक बालक या शिक्षार्थी के लिए संदर्भ समूह निर्मित करते हैं। बच्चे इन संदर्भ समूहों से बहुत कुछ सीखते हैं। यदि संदर्भ समूह किसी उत्पाद समूह के प्रति पक्षपात करता है, तो संभव है कि बच्चे भी उस समूह के प्रति वैसे ही अभिवृत्ति निर्मित करें।
► प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुभव या दैनिक जीवन के अनुभवों के अतिरिक्त, जीवन की विशिष्ट घटनाएँ एवं परिथितियाँ भी महत्त्वपूर्ण होती हैं।
► संचार माध्यमों का संपर्क आधुनिक जीवन में, अभिवृति निर्माण में महत्त्वपूर्ण है।

अभिरुचि

अभिरुचि एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है। अभिरुचि किसी तथ्य, वस्तु या अनुक्रिया के प्रति ध्यान से संबधित होती है। प्राय: अभिरुचि को लोग मनोरंजन मान लेते हैं। यह आवश्यक नहीं कि जिस वस्तु में हम रुचि ले रहे हो वह मनोरंजन ही हो। जैसे यदि कोई शिक्षार्थी गणित हल करने में रुचि ले रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं कि इससे उसका मनोरंजन हो रहा है। अभिरुचि जीवन की एक प्रमुख मनोवैज्ञानिक-सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है। जो जीवन के सुखांत या दुखान्त भावनाओं, आकर्षण- विकर्षण, पसन्द नापसंद को दर्शाती है। वस्तुत: रुचि क्रियात्मक रूप में एक मानसिक संस्कार है।
► व्यक्त अभिरूचि का तात्पर्य ऐसी अभिरुचि से है, जिसकी तात्कालिक चेतना व्यक्ति या बालक को रहती है और पूछे जाने पर वह इसे आसानी से बता सकता है। शिक्षक द्वारा पूछे जाने पर यदि कोई बालक यह बताता है कि उसकी रुचि गणित या इतिहास में है तो इसे व्यक्त अभिरुचि कहते हैं।
► प्रकट अभिरुचि का तात्पर्य ऐसी अभिरुचि से है जिसे व्यक्ति अपनी रुचि से करता है। यदि कोई बालक अपने खाली समय में खाना पकाने का कार्य करता है तो इस प्रवृत्ति को उसकी प्रकट अभिरुचि कहते हैं।
► परीक्षित अभिरुचि का तात्पर्य ऐसी अभिरुचि से है, जिसकी जानकारी बालक की उपलब्धियों के आधार पर होती है। यदि जाँच करने के बाद किसी बालक का उपलब्धि अंक सबसे अधिक इतिहास में देखा जाता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसकी अभिरुचि इतिहास में अधिक है।
► ऐसी अभिरूचि जिसकी जानकारी मानक खोज के आधार पर होती है उसे खोज संबंधी अभिरुचि कहते हैं।

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