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अध्याय 18 संज्ञान तथा संवेग (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 18 संज्ञान तथा संवेग

संज्ञान का अर्थ

► संवेदी सूचनाओं को ग्रहण करके उसका समुचित उपयोग करने को संज्ञान या समझ कहते हैं।
► रेबर (1995) के अनुसार, ‘संज्ञान का तात्पर्य ऐसे मानसिक व्यवहारों से है, जिनका स्वरूप अमूर्त होता है और जिनमें प्रतीकीकरण, सूझ, प्रत्याशा, जटिल नियम उपभोग, प्रतिमा, विश्वास, अभिप्राय, समस्या समाधन तथा अन्य शामिल होते हैं।’
► संज्ञानात्मक विकास प्रक्रियाएँ ही विकासमान बालक को कविताएँ याद करने, गणित की समस्या को हल करने के तरीके के बारे में सोचने एवं निर्णय लेने, कोई अच्छी एवं सृजनात्मक रणनीति बनाने तथा क्रमागत अर्थपूर्ण वाक्य बनाने योग्य बनाती हैं।
► इस प्रकार संज्ञानात्मक विकास से तात्पर्य बालकों में संवेदी सूचनाओं को ग्रहण करके उस पर चिन्तन करने से तथा क्रमिक रूप से उसे इस योग्य बना देने से है जिसका प्रयोग विभिन्न परिस्थितियों में करके वे तरह-तरह की समस्याओं का समाधान आसानी से कर सकते हैं।

शिक्षार्थियों में संज्ञानात्मक विकास

► बच्चों का संवेगात्मक वातावरण, उसके व्यक्तित्व के भावात्मक तत्त्व और अन्य व्यक्तियों तथा परिस्थितियों के प्रति उसके भाव से निर्मित होता है। बच्चा या शिक्षार्थी जैसे-जैसे बड़ा होता है और उसकी शिक्षा आरंभ होती है उसके अनुभव तथा ज्ञान की सीमा विस्तृत होती जाती है। शिक्षक तथा परिवार के साथ उसकी अन्योन्यक्रिया बढ़ती जाती है तथा उसे प्रभावित करने वाले कारकों की संख्या भी बढ़ती जाती है।
► शिक्षार्थी अपने माता-पिता, मित्र, भाई-बहन, शिक्षक और अन्य महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों से उसके पारस्परिक संबंध और उनके प्रति अपनी संवेदनाओं के द्वारा निर्देशित होता है।

शैशवावस्था में संवेगात्मक विकास

► शैशवावस्था में भूख, क्रोध और कष्ट को वह चिल्लाकर अभिव्यक्त करता है। इसी तरह, पहले वर्ष में भय, हर्ष और स्नेह की अभिव्यक्तियाँ शिशु के चेहरे पर स्पष्ट रूप से नजर आने लगती हैं।
► जन्म के 6 या 7 माह के अन्दर उसमें अजनबी चेहरों में अन्तर करने की पर्याप्त परिपक्वता आ जाती है।
► शिशु की योग्यता के विकास के साथ-साथ उसकी क्रियाओं का क्षेत्र भी विस्तृत होता जाता है और क्रियाओं का क्षेत्र बढ़ने के साथ उसमें संवेगात्मक अनुभव करने वाली परिस्थितियाँ भी बढ़ती जाती हैं।
► इस तरह शिशु का संवेगात्मक विकास उसके शारीरिक और मानसिक विकास के समानान्तर चलता रहता है।

बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास

► प्रारंभिक बाल्यावस्था में, संवेग जैसे क्रोध, भय और प्रेम, स्वतंत्र रूप से अल्पावधि के लिए तथा स्वाभाविक रूप से व्यक्त किए जाते हैं।
► वयस्कों का स्वभाव अपेक्षाकृत जटिल होता है उनके संवेग मिश्रित होते हैं, दमित होते हैं, इनके संवेगों में भावों को व्यक्त करने से रोका जाता है और वे अपेक्षाकृत लंबे समय तक बने रहते हैं।
► संवेगों का विकास, बाल्यावस्था के सहज, स्वतंत्र तथा संक्षिप्त अभिव्यक्त संवेगों से वयस्कावस्था के जटिल, लंबे समय तक चलने वाले तथा नियंत्रित संवेग तक की सम्पूर्ण प्रक्रिया को व्याख्यायित करता है।
► बाल्यावस्था में, संवेगों के विकास पर बाहरी कारकों का प्रभाव, अत्यंत स्पष्ट या तीव्र होता है।
► विद्यालय तथा घर का स्वतंत्र एवं उन्मुक्त वातावरण बालक को उसके संवेगों को मुक्त रूप से अभिव्यक्त करने तथा उसमें उपयुक्त परिष्कार करने में सहयोग देता है।
► अत्यधिक नियंत्रण तथा कठोर अनुशासन से बच्चों के संवेगों की अभिव्यक्ति में बाधा पड़ती है परिणामस्वरूप बालक में अनेक मानसिक ग्रंथियाँ बन जाती हैं जो उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए हानिकारक होती हैं।

मध्य बाल्यकाल में संज्ञानात्मक विकास

► इस अवस्था में शिक्षार्थियों में बाहरी वस्तुओं के लिए जिज्ञासा बनी रहती है। उनकी स्मरण शक्ति तथा तर्कपूर्ण चिन्तन करने की शक्ति बढ़ जाती है जिससे उन्हें परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाने में सहायता मिलती है।
► शिक्षार्थी संगीत, कला एवं नृत्य जैसी संवेदी क्रियाकलापों में रूचि लेने लगते हैं।
► पियाजे के अनुसार, मध्य बाल्यकाल में शिक्षार्थी के अंदर क्रमश: तार्किक नियमों को समझने, स्थानिक तर्क में सुधार करने और वास्तविकता एवं काल्पनिकता में अंतर करने की क्षमता आ जाती है।
► इस अवस्था में शिक्षार्थियों में भाशिक विकास उच्च स्तर का होता है। वे सीखे हुए शब्दों के समान अर्थ वाले या विपरीत अर्थ वाले शब्द सीखने लगते हैं।

पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त

► एक व्यक्ति या शिक्षार्थी किस प्रकार क्रमश: ज्ञान अर्जित करता है इस प्रक्रिया को ही पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त कहते हैं।
► शिक्षार्थी के ज्ञान अर्जन की प्रक्रियाओं में संवेदन, प्रत्यक्षण, काल्पनिकता, धारणा और तर्कणा शामिल होती है।
► पियाजे के अनुसार, बालक के भीतर संज्ञान का विकास अनेक अवस्थाओं से होकर गुजरता है, इसलिये इसे अवस्था सिद्धान्त भी कहते हैं।
पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को निम्नलिखित चार
अवस्थाओं में बांटा है:
संवेदी पेशीय अवस्था (जन्म से 2 वर्ष तक)
► पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (2 से 7 वर्ष तक)
► मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7 से 11 वर्ष तक)
► अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (11 वर्ष से अधिक तक)

संवेग का अर्थ

► जीवन में संवेगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है तथा व्यक्ति के वैयक्तिक एवं सामाजिक विकास में संवेगों का योगदान होता है।
► निरन्तर संवेगात्मक असन्तुलन/अस्थिरता व्यक्ति के वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करती है तथा अनेक प्रकार की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक समस्याओं को उत्पन्न करती है। किसी व्यक्ति, वस्तु एवं स्थिति के सम्बन्ध में सुख-दुख की अनुभूति कम या अधिक मात्रा में होती है।
► संवेग की अवस्था में आंगिक प्रक्रियाओं जैसे नाड़ी, श्वसन, ग्रन्थिस्त्रावों का एक विसरित उद्दीपन होता है।
► शिक्षार्थी की चिन्तन एवं तर्क शक्ति क्षीण हो जाती है।
► शिक्षार्थी आवेगी बल का अनुभव करता है।
► कुछ मनोवैज्ञनिको का मत है कि संवेग विकास एवं वृद्धि की प्रक्रिया के दौरान प्राप्त किए जाते हैं।
► जन्म के समय संवेग निश्चित रूप से विद्यमान नही होते हैं। बाद में धीरे-धीरे बच्चा ऐसी निश्चित प्रतिक्रियाएँ करता है जिससे ज्ञात होता है कि उसे सुखद एवं दुखद अनुभूति हो रही है।

संवेग की परिभाषा

इगंलिश तथा इगंलिश (1958) के अनुसार- “संवेग एक जटिल भाव की अवस्था होती है जिसमें कुछ खास-खास शारीरिक व ग्रन्थि क्रियाएँ होती हैं।”
बेरान, बर्न तथा कैण्टोविल (1980) के अनुसार- “संवेग से तात्पर्य एक ऐसी आत्मनिष्ठ भाव की अवस्था से होता है जिसमें कुछ शारीरिक उत्तेजना पैदा होती है और फिर जिसमें कुछ खास-खास व्यवहार होते हैं।”
हांलिगवर्थ का मानना है कि प्राथमिक संवेग जन्मजात होते हैं। वाटसन ने बताया कि जन्म के समय बच्चे में तीन प्राथमिक संवेग भय, क्रोध एवं प्रेम होते हैं।

सवंगों की विशेषताएँ

► संवेगात्मक अनुभव किसी मूल प्रवृति या जैविकीय उत्तेजना से जुड़े होते हैं।
► सामान्यतया संवेग प्रत्यक्षीकरण का उत्पाद होते हैं।
► प्रत्येक संवेगात्मक अनुभव के दौरान प्राणी में अनेक शारीरिक परिवर्तन होते हैं।
► संवेग किसी स्थूल वस्तु या परिस्थिति के प्रति अभिव्यक्त किए जाते हैं।
► प्रत्येक जीवित प्राणी में संवेग होते हैं।
► विकास के सभी स्तरों में संवेग होते हैं और बच्चे व बूढ़ों में उत्पन्न किए जा सकते हैं।
► एक ही संवेग को अनेक प्रकार के उतेजनाओं (वस्तुओं या परिस्थितियों) से उत्पन्न किया जा सकता है
► संवेग शीघ्रता से उत्पन्न होते हैं और धीरे-धीरे समाप्त होते हैं।

संवेग के प्रकार

► संवेग की प्रकृति सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों प्रकार की होती है।
► वे संवेग जो प्रेम, प्रशंसा, दया तथा खुशी जैसे सकारात्मक परिणाम के रूप में व्यवहार में नजर आते हैं, उन्हें सकारात्मक संवेग कहते हैं।
► ईर्ष्या, क्रोध, घृणा इत्यादि के रूप में नजर आने वाले अवांछित, अप्रीतिकर और हानिकारक व्यवहारों को नकारात्मक संवेग कहते हैं।

प्रमुख संवेग निम्न प्रकार से हैं

भय
बालक के पहले वर्ष के अन्त के पहले ही भय से सम्बन्धित उत्तेजनाएं बच्चे पर प्रभाव डालने लगती है।
► समय के साथ-साथ उन वस्तुओं की संख्या बढ़ती जाती है जो बच्चे को डराती है।
► मानसिक विकास के साथ-साथ वह इस योग्य होता है कि उन वस्तुओं और व्यक्तियों को पहचान सके जो उसे डराती हैं।
► भय चाहे तार्किक हो या अतार्किक इसकी जड़ बच्चों के अनुभवों में होती है।
► छोटा बच्चा सामान्यत: जोर की आवाज, अजनबी व्यक्ति, जगह, वस्तुएँ, अंधेरी जगह तथा अकेले रहने से डरते है। यह भय अवस्था के साथ-साथ कम हो जाता है।
क्रोध
वातावरण में क्रोध दिलाने वाले उत्तेजक डर की अपेक्षा अधिक होते हैं।
► अधिकतर बच्चे शीघ्र ही यह समझ जाते है कि क्रोध ध्यान आकृष्ट करने का अच्छा तरीका है। इससे उनकी इच्छा की पूर्ति होती है।
► छोटे बच्चे को आराम न मिलने पर क्रोध आता है।
► जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है तो वह स्वयं काम करना चाहता है और कार्य न कर पाने पर गुस्सा दिखाता है।
► विद्यालय जाने से पूर्व की आयु के बच्चे उन पर गुस्सा करते है जो उनके खेल की चीजों को छूते हैं और उनके खेलने में बाधा उत्पन्न करते हैं।
► उत्तर बाल्यावस्था में बच्चे को मजाक उड़ाने, उनकी गलती निकालने और दूसरे बच्चो से तुलना करने पर उनके गुस्सा आता है। क्रोध को अभिव्यक्त करने का ढंग वातावरण से सीखा जाता है।
ईर्ष्या
ईर्श्या इस बात पर निर्भर करती है कि दूसरे उससे कैसा व्यवहार करते है तथा बालक को कैसा प्रशिक्षण मिला है।
► कभी-कभी माता-पिता दूसरो की प्रशंसा करते हैं। इस प्रकार वे अपने बच्चों में प्रतिद्वन्दिता एवं स्पर्धा उत्पन्न करते हैं।
► ईर्ष्या की स्थिति में बालक गुस्सा करते हैं और अपनी भावनाओं का दमन करने लगते हैं।
संतोष एवं खुशी
ये निश्चयात्मक संवेग है, क्योंकि व्यक्ति उस परिस्थिति को स्वीकार करता है जो इस संवेग को उत्पन्न करती है।
► छोटे बच्चों में ये संवेग शारीरिक कष्ट न होने पर देखा जाता है।
► बड़े बच्चों को सन्तोष तथा हर्ष तब होता है जब उन्हें सफलता मिलती है, दूसरें से प्रशंसा मिलती है और दूसरों से उच्चता या श्रेष्ठता का अनुभव होता है।
► किशोर शिक्षार्थी खुशी का अनुभव तब करता है जब उसका समायोजन अच्छा होता है।
► प्रशिक्षण व योग्यता से किशोर इस योग्य होता है कि वह परिस्थिति के साथ ठीक से समायोजन कर सके।
उत्सुकता
जैसे ही बालक बोलना सीखते हैं वे अपने कौतुहल को प्रश्न पूछकर शान्त करते हैं। आठ से नौ वर्ष के बच्चे इसी इच्छा के कारण अपना अधिक समय पढ़ने में लगाते हैं।
► किशोर लिंग, वैज्ञानिक चीजों, संसार की घटनाओं, धर्म व नैतिकता में उत्सुकता दिखाते हैं और इन विषयों पर वे प्रश्न भी करते हैं।
► किशोर शिक्षार्थी किताबें, पत्र पत्रिकाएं पढ़कर अपनी जिज्ञासा को शान्त करते हैं।
दु:ख
इस संवेग की अनुभूति तब होती है जब व्यक्ति या बालक ऐसी चीज खो देता है जिसको वो बहुत महत्व देता है तथा उससे उसे संवेगात्मक लगाव होता है।
► बालकों की अपेक्षा किशोर शिक्षार्थियों को इस संवेग का अनुभव बार-बार होता है क्योंकि किशोर में सोचने समझने की शक्ति बढ़ जाती है।

संवेग का शैक्षिक महत्व

► शिक्षक शिक्षार्थियों के संवेग को समझते हुए उनकी रुचि के अनुसार पढ़ा सकते हैं।
► शिक्षार्थियों के संवेगों व संवेगात्मक व्यवहार के प्रति शिक्षक का सकारात्मक दृष्टिकोण अपना सकते हैं।
► शिक्षार्थियों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को महत्व देना चाहिए।
► परीक्षा में नम्बरों पर बहुत बल नहीं होना चाहिए।
► सम्पूर्ण उपस्थिति के स्थान पर शिक्षार्थी के स्वास्थ्य पर बल देना चाहिए।
► संवेगात्मक समस्याओं के समाधान हेतु निर्देशन का प्रबन्ध किया जा सकता है।
► शिक्षार्थियों को सामाजिक मान्यता प्राप्त ढंग से संवेगात्मक व्यवहार करने का तरीका सिखाया जा सकता है।
► शिक्षार्थियों के संवेगों को समझते समय शिक्षक का पक्षपात रहित व वस्तुनिष्ठ व्यवहार होना चाहिए।

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