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अध्याय 18. इतिहास – राजनैतिक गतिविधियाँ (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 18. इतिहास – राजनैतिक गतिविधियाँ

परिचय
नागरिक स्तर पर या व्यक्तिगत स्तर पर किसी विशेष समूह द्वारा व्यवहार या सिद्धांत का निर्णय करना राजनीति कहलाती है। राजनीति में विचारों को आगे बढ़ाना, कानून बनाना इत्यादि कार्य किया जाता है। राजनीति प्रत्येक जगह व्याप्त है। गाँव की परम्परागत राजनीति से लेकर स्थानीय सरकार, राज्य या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद है। राजनीति एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा नागरिकों का किसी समूह द्वारा निर्णय लिया जाता है। यह उन सामाजिक संबंधों से बना है जो सत्ता और शक्ति के लिए होते हैं। राजनैतिक गतिविधियों से तात्पर्य है कि मानव समाज द्वारा अपनी समस्याओं के समाधान के लिए छोटे-बड़े परिवर्तन करते रहना। यह एक निरंतर होने वाली गतिविधि है। इसकी कोई मंजिल नहीं होती है। राजनैतिक गतिविधियों के अन्तर्गत परस्पर विरोधी हितों में सामंजस्य स्थापित किया जाता है।
नये सामाजिक और राजनीतिक समूह
समूह का तात्पर्य स्वैच्छिक रूप से संगठित ऐसे समूहों से होता है जो प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति, विधि निर्माण इत्यादि करते हैं। वे सार्वजनिक नीति के क्रियान्वयन को प्रभावित करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। राजनीतिक समूह एक संस्था होती है जो शासन में राजनीतिक शक्ति को प्राप्त करने और उसे बनाए रखने का प्रयत्न करती है। इसके लिए समूह चुनाव प्रक्रिया में भाग लेता है। इतिहासकार के अनुसार 700 ई. से 1750 ई. तक के समय में बड़े पैमाने पर और कई प्रकार के परिवर्तन देखने को मिलते हैं। इस कालावधि में नयी प्रौद्योगिकी का विकास हुआ। सिंचाई के लिए रहट का उपयोग किया जाने लगा, सूत काटने के लिए चरखा और युद्ध में आग्नेयास्त्रों का उपयोग किया गया। इस काल में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन देखने को मिलता है। नयी प्रौद्योगिकी का विकास होने से फसल की उपज बढ़ गयी। 700 ई. तक सभी को अपने भौगोलिक क्षेत्रों के बारे में जानकारी प्राप्त हो गयी थी। इस समय तक वे लोग अपनी सांस्कृतिक विशेषताएँ और भाषा को भी पहचान गये थे। 18वीं सदी में मुगल वंश के पतन के समय क्षेत्रीय राज्य फिर से उभरने लगे थे। वर्षों पहले से जो शासन इस क्षेत्र पर हो रहा था उस कारण इस क्षेत्र की प्रकृति बदल गयी थी। इस क्षेत्र पर कई राजा-महाराजाओं के द्वारा शासन किया गया था जिस कारण बहुत-सी चीजें इस क्षेत्र को विरासत के रूप में प्राप्त हुई थीं।
इतिहास के कालखंड
भारत का इतिहास कई हजार वर्ष पुराना है। इस देश पर बहुत से राजाओं ने अलग-अलग समय में शासन किया। मेहरगढ़ से नवपाषाण युग (7000 ई.पू. से 2500 ई.पू. तक) के बहुत सारे अवशेष प्राप्त हुए हैं। सिंधु घाटी सभ्यता (3300 ई.पू. से 1700 ई.पू. तक) विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। इस सभ्यता की लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। सिंधु घाटी सभ्यता वर्तमान में पाकिस्तान एवं उससे सटे भारतीय राज्य में फैली हुई थी। आर्यों के द्वारा उत्तर तथा मध्य भारत में एक सभ्यता विकसित की गयी, जिसे वैदिक सभ्यता कहा गया। वैदिक सभ्यता का काल 1500 ई.पू. से 500 ई.पू. के बीच था। प्राचीन भारत के इतिहास में वैदिक सभ्यता सबसे प्राचीन सभ्यता है जिसका संबंध आर्यों के आगमन से है। आर्यों की भाषा संस्कृत थी। वे लोग ‘सनातन’ धर्म को मानते थे। वैदिक सभ्यता सरस्वती नदी के तट पर विकसित हुई। वर्तमान में वह क्षेत्र अब पंजाब और हरियाणा राज्य में पड़ते हैं। महाजनपदों की कालावधि 700 ई.पू. से 300 ई.पू. के बीच थी। इस काल में जैन धर्म और बौद्ध धर्म काफी लोकप्रिय हुए। सम्राट अशोक इस काल के प्रतापी राजा थे जिसका साम्राज्य तक्षशिला से कर्नाटक तक और अफगानिस्तान से मणिपुर तक फैला हुआ था। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म धारण किया। बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध थे। गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में कपिलवस्तु के लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था। जैन धर्म के संस्थापक एवं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे। महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें एवं अंतिम तीर्थंकर थे। महावीर का जन्म 540 ई. पू. में कुण्डग्राम वैशाली में हुआ था। आठवीं सदी में सिंध पर अरबों ने कब्जा कर लिया। यहीं से इस्लाम का प्रवेश माना जाता है। बारहवीं सदी के अंत तक दिल्ली की गद्दी पर तुर्क दासों का शासन हो गया था। सन् 1526 में मध्य एशिया से निर्वासित राजकुमार बाबर ने काबुल में पनाह लेकर भारत पर आक्रमण कर दिया। मुगल वंश की स्थापना बाबर ने की थी। औरंगजे़ब के मरने के साथ ही मुगल साम्राज्य का अंत हो गया। इसके बाद अंग्रेजों ने डचों, पुर्तगालियों तथा फ्रांसीसियों को भगाकर भारत की सत्ता हासिल कर ली। भारत को आजादी 1947 में मिली। भारतीय इतिहास में समय के साथ-साथ परिवर्तन भी होता गया और कई क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था काफी सुदृढ़ हो गयी।
18वीं शताब्दी में नये राजनीतिक गठन
18वीं शताब्दी में ब्रिटिश सरकार ने भारत पर कब्जा कर लिया। इस समय राजनीतिक परिस्थितियाँ बड़ी तेजी से बदल रही थीं। इस समय यूरोपीय देश भारत से व्यापार करने के लिए इच्छुक थे। उन्होंने देश में स्थापित शासित प्रदेश, जो कि आपसी युद्ध में व्यस्त थे, का फायदा उठाया। 18वीं सदी तक अंग्रेज दूसरे देशों से व्यापार करने के इच्छुक लोगों को रोकने में सफल हो गये थे। 1857 ई. में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध असफल विद्रोह के बाद भारत के अधिकांश भाग पर अंग्रेजी शासन का प्रशासनिक नियंत्रण हो गया था।
मुगल साम्राज्य के लिए संकट की स्थिति
मुगल साम्राज्य की स्थापना 1526 ई. में हुई। यह एक इस्लामी तुर्की मंगोल साम्राज्य था, जिसने 17वीं सदी के अंत से 18वीं सदी के आरंभ तक भारत पर शासन किया। इसका पतन 19वीं सदी के मध्य में हुआ। 17वीं सदी की शुरुआत में यह अपनी शक्ति के शिखर पर था। इसने भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश भागों पर कब्जा कर लिया था। इसका शासन पूर्व में बांग्लादेश से पश्चिम में बलूचिस्तान तक और उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में कावेरी घाटी तक था। मुगल साम्राज्य 1725 ई. के बाद पतन की ओर जाने लगा। इसकी शक्ति में तेजी से कमी होने लगी। उत्तराधिकारियों में आपसी कलह और षड्यंत्रों के कारण साम्राज्य की शक्ति में कमी होने लगी। कृषि संकट के कारण स्थानीय लोगों ने विद्रोह शुरू कर दिया। यह विद्रोह कर के भार के विरुद्ध भी होने लगा। इसके साथ-साथ शक्तिशाली सरदार अपनी स्थिति सुधारने के लिए भी विद्रोह करते थे। पहले भी विद्रोहियों के द्वारा मुगल साम्राज्य को बार-बार धमकी दी जाती थी परन्तु अब ये विद्रोही अपनी स्थिति सुधारने के लिए आर्थिक संसाधनों का प्रयोग करने लगे। औरंगजे़ब के उत्तराधिकारी द्वारा इन पर नियंत्रण रखना कठिन हो गया। जिस कारण मुगल साम्राज्य का शासन दिल्ली तक ही सीमित रह गया। मुगल साम्राज्य का अंतिम शासक बहादुर शाह ज़फर था। अंग्रेजों ने उसे कैद कर लिया और 1857 के भारतीय विद्रोह के बाद ब्रिटिश द्वारा म्यांमार निर्वासित कर दिया गया। औरंगजे़ब ने दक्कन में बहुत दिनों तक लड़ाई जारी रखी जिससे मुगल साम्राज्य के सैन्य और वित्तीय दोनों संसाधनों का भारी नुकसान हुआ। औरंगज़ेब के उत्तराधिकारी के शासन के समय मुगल साम्राज्य के प्रशासन की कार्य-कुशलता खत्म होने लगी, जिससे मनसबदारों के शक्तिशाली वर्गों पर नियंत्रण रखना बहुत मुश्किल हो गया। राजस्व और सैन्य प्रशासन पर अभिजात वर्ग का नियंत्रण था। अभिजात वर्ग सूबेदार के रूप में कार्य करते थे। इसका नियंत्रण होने के कारण राजधानी तक पहुँचने वाले राजस्व की मात्रा में लगातार कमी होती रही। 1739 ई. में ईरान के शासक नादिर शाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया और यहाँ से भारी मात्रा में सोना-चाँदी लूट कर ले गये। इसके बाद 1748 ई. से 1761 ई. के बीच अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली ने पाँच बार उत्तरी भारत पर आक्रमण किया और बहुत सारी धन-दौलत लूटकर अपने साथ ले गये। मुगल साम्राज्य 18वीं सदी के दौरान कई स्वतंत्र राज्यों में बँट गया था। इनमें से अवध, बंगाल और हैदराबाद प्रमुख थे। इनका संबंध औपचारिक रूप से मुगल साम्राज्य से ही था। इन राज्यों के शासक काफी शक्तिशाली थे।
पुराने मुगल प्रांत
अकबर ने अपने शासनकाल में सर्वप्रथम प्रांतीय प्रशासन का नया आधार प्रस्तुत किया था। अकबर ने 1580 ई. में अपने प्रांत को 12 सूबों में विभाजित किया था। इसके बाद शाहजहाँ ने और राज्य पर विजय प्राप्त करके सूबों की संख्या 18 की। औरंगजे़ब ने दो शहर गोलकुण्डा और बीजापुर पर विजय प्राप्त करके 20 प्रांत बना दिये। 1707 ई. में औरंगजे़ब की मृत्यु के समय मुगल साम्राज्य में 21 प्रांत थे। इनमें से उत्तरी भारत में 14 प्रांत एवं दक्षिणी भारत में 6 प्रांत थे। मुगल साम्राज्य का एक प्रांत भारत के बाहर अफगानिस्तान था। आगरा, अजमेर, इलाहाबाद, अवध, बंगाल, बिहार, दिल्ली, गुजरात, कश्मीर, लाहौर, मालवा, मुल्तान, उड़ीसा, थट्ठा, काबुल, औरंगाबाद (महाराष्ट्र), बरार, बीदर, बीजापुर, हैदराबाद और खानदेश इत्यादि मुगल साम्राज्य के प्रांत थे। इनमें से तीन प्रांत अवध, बंगाल और हैदराबाद प्रमुख थे। अवध का संस्थापक सआदत खाँ, बंगाल का संस्थापक मुर्शीद कुली खाँ और हैदराबाद का संस्थापक आसफजाह था। मुगल अभिजातों द्वारा इन तीनों राज्यों की स्थापना की गयी थी। इन तीनों राज्यों की स्थापना करने वालों को मुगल दरबार में ऊँचा स्थान प्राप्त था। मुगल बादशाह इन तीनों पर बहुत भरोसा एवं विश्वास करते थे। प्रशासन की दृष्टि से मुगल साम्राज्य का विभाजन सूबों में, सूबे सरकार में, सरकार परगना में विभाजित था। प्रशासन की छोटी इकाई ग्राम होती थी, जो जिला या दस्तूर के अंतर्गत आता था। गाँवों को मावदा या दीह कहा जाता था।
हैदराबाद
हैदराबाद की स्थापना आसफजाह ने की थी, जिसका पूरा नाम निजाम-उल-मुल्क आसफजाह था। मुगल दरबार में आसफजाह को ऊँचा स्थान प्राप्त था। मुगल बादशाह को इस पर पूरा भरोसा और विश्वास था। यह एक शक्तिशाली व्यक्ति के रूप में उस दरबार में था। दक्कन प्रांत में इसे सूबेदार बनाया गया था। बाद में इसे मुगल बादशाह द्वारा दक्कन का कार्यभार सौंपा गया। दक्कन प्रांत पर आसफजाह का वित्तीय एवं राजनीतिक प्रशासन पर पूर्ण रूप से नियंत्रण पहले से ही था। मुगल दरबार में उत्तराधिकारियों में आपसी कलह और षड्यंत्र का लाभ लेते हुए आसफजाह ने हैदराबाद पर पूर्ण रूप से अधिकार कर लिया। आसफजाह को दक्कन का वायसराय भी कहा जाता था। मुगल शासक औरंगजे़ब के बाद हैदराबाद का प्रसिद्ध निजाम आसफजाह थे। जिसने आसफजाही राजवंश की नींव रखी। आसफजाह ने अपना प्रशासन चलाने के लिए उत्तर भारत से प्रशासकों और कुशल सैनिकों को बुलाया था। इसने मनसबदार नियुक्त किये और इन्हें जागीर प्रदान की गयी। इन्होंने अपना शासन आजादीपूर्वक किया। सन् 1748 ई. में जब आसफजाह की मृत्यु हुई, उसके बाद हैदराबाद दिल्ली शासक के अधीन हो गया।
बंगाल
बंगाल का संस्थापक मुर्शीद कुली खाँ थे। इसने बंगाल को मुगल साम्राज्य से अलग कर दिया था। 1717 ई. में मुगल शासक ने मुर्शीद कुली खाँ को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया था। यह मुगल सम्राट द्वारा नियुक्त अंतिम सूबेदार था। इसके बाद बंगाल में वंशानुगत सूबेदारी शासन की शुरुआत हो गयी। वह 1700 ई. से ही शासक बन गया था। उसने सूबेदार पद से जुड़ी हुई सत्ता को अपने नियंत्रण में ले लिया। इसके साथ ही राज्य के वित्तीय और राजनीतिक प्रशासन को अपने अधीन कर लिया। मुर्शीद कुली खाँ ज़मींदारों से मोटी रकम राजस्व के रूप में वसूलते थे। इसने मुगल साम्राज्य का प्रभाव खत्म करने के लिए राजस्व को पुन: निर्धारित किया। राजस्व का पुन: निर्धारण करने से ज़मींदार पर और अधिक राजस्व का बोझ बढ़ गया। राजस्व चुकाने के लिए ज़मींदारों को महाजनों और साहूकारों से कर्ज़ लेना पड़ता था। यदि ज़मींदार कर्ज़ नहीं चुका पाता था तो उसकी ज़मीन साहूकारों द्वारा ले ली जाती थी। अलीवर्दी खान के शासनकाल 1740 ई. से 1756 ईके बीच ज़मींदारी में बदलाव आया। अलीवर्दी खान ने राज्य और साहूकारों के बीच दूरी कम करने का उपाय किया। ज़मींदारों को अब राजस्व चुकाने में सहूलियत होने लगी। अलीवर्दी खान के शासनकाल में ज़मींदारों को राजस्व चुकाने के लिए ज़मीन गिरवी नहीं रखनी पड़ती थी।
अवध
अवध के संस्थापक सआदत खाँ थे। इनका पूरा नाम बुरहान-उल-मुल्क सआदत खाँ था। इसे 1722 ई. में मुगल बादशाह द्वारा अवध का सूबेदार बनाया गया था। बुरहान-उल-मुल्क ने अवध की सूबेदारी, दीवानी एवं फौजदारी पर अपना नियंत्रण स्थापित कर दिया। वह अवध की राजनीति, वित्तीय व्यवस्था और सैनिक इत्यादि को अपने अनुसार चलाने लगा। अवध गंगा नदी के उपजाऊ मैदान में फैला हुआ था। इस क्षेत्र में बढ़िया उपज होती थी। यह क्षेत्र समृद्धशाली था जिस कारण उत्तरी भारत और बंगाल के बीच व्यापार का मुख्य मार्ग था। सआदत खाँ ने मुगल साम्राज्य का प्रभाव कम करने के लिए मुगल बादशाह के द्वारा नियुक्त अधिकारी (जिसे जागीरदार कहा जाता था) की संख्या में भारी कमी कर दी और खाली पड़े स्थान पर अपने विश्वासी सेवकों को बहाल किया। धोखाधड़ी को बंद करने के लिए जगीरदारों के खातों की जाँच की गयी और सभी जिलों के अधिकारियों द्वारा राजस्व का पुनर्निर्धारण किया गया। 1723 ई. में सआदत खाँ ने नई ”राजस्व बन्दोबस्त“ व्यवस्था को शुरू किया। सआदत खाँ ने 1739 ई. में आत्महत्या कर ली। इसकी मृत्यु के पश्चात् सम्राट मुहम्मद शाह ने सफदरजंग को अवध का नवाब घोषित किया। मुगल सम्राट ने 1748 ई. में सफदरजंग को वजीर बनाया और उसे इलाहाबाद प्रांत भी दे दिया गया। सफदरजंग हिन्दू और मुसलमान में कोई भेदभाव नहीं करते थे। वह दोनों धर्मों को बराबर का महत्त्व देते थे। सफदरजंग की मृत्यु 1754 ई. में हुई थी। उसकी मृत्यु के पश्चात् अवध का नवाब एवं सम्राट शुजाउद्दौला को बनाया गया। इसने बक्सर युद्ध में भाग लिया था।
शुजाउद्दौला की मृत्यु के पश्चात् आसफउद्दौला को अवध का शासक बनाया गया था। उसने अपनी राजधानी को फैजाबाद से लखनऊ स्थनान्तरित किया था। लॉर्ड डलहौजी ने 1856 में अवध को ब्रिटिश सरकार के अधीन कर लिया। अवध मुगल साम्राज्य के विघटन के समय एक मुख्य राज्य के रूप में था।
राजपूतों की वतन जागीरी
राजपूत उत्तर भारत का एक क्षत्रिय कुल माना जाता था। ब्रिटिश काल में राजस्थान को राजपूताना कहा गया था। पहले यह गुर्जर देश था। उस समय क्षत्रिय वंश के अंतर्गत सूर्यवंश और चंद्रवंश दोनों घरानों का काफी ज्यादा विस्तार हुआ। मेवाड़ के महाराजा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान का नाम राजपूतों में सबसे ऊपर है। आंबेर और जोधपुर के राजघराने मुगल साम्राज्य में अपनी सेवा विशिष्टता के साथ देते थे। जिसके बदले में उसे अपने वतन जागीरी पर स्वायत्तता प्राप्त होती थी। भारत में हर्षवर्द्धन के बाद कोई ऐसा राजा नहीं हुआ जो संपूर्ण भारत पर अपना नियंत्रण रख सके। सातवीं से बारहवीं शताब्दी के युग को राजपूत युग कहा जाता है। इतिहासकारों के अनुसार राजपूत वे विदेशी जातियाँ हैं जिन्होंने भारत पर आक्रमण किया था। 18वीं शताब्दी में राजपूत शासकों ने अपने प्रशासनिक क्षेत्रों का विस्तार करना शुरू कर दिया था। राजपूत घराने ने मुगल सम्राट से सूबेदारी देने की माँग की। जिसके बाद जोधपुर के अजीत सिंह को गुजरात की सूबेदारी दी गई और आंबेर के सवाई राजा जय सिंह को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया गया। इसके बाद राजपूत घराने आस-पास के क्षेत्रों पर कब्जा करने के लिए आक्रमण करते रहते थे। जोधपुर घराने ने आक्रमण करके नागौर पर अधिकार कर लिया। आंबेर के सवाई राजा जय सिंह ने भी आस-पास के क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। उसके बाद अपनी नयी राजधानी जयपुर को बनाया।
सिक्ख
सिक्ख संप्रदाय की स्थापना प्रथम गुरु ‘गुरु नानक’ द्वारा की गयी थी। गुरु नानक के अनुयायी सिक्ख कहलाए। गुरु गोविंद सिंह ने 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना की थी। सत्रहवीं शताब्दी के समय में सिक्खों का एक राजनीतिक समुदाय के रूप में गठन हुआ। इस समय सिक्खों ने राजपूत और मुगल शासकों के खिलाफ युद्ध भी किया। सिक्ख मिसलों के अधीन सिक्ख राज्य स्थापित हुआ। इन सिक्ख मिसलों की संयुक्त सेनाओं को ‘दल खालसा’ कहते थे। इस दौरान मुगलों के खिलाफ सिक्खों का फौजीकरण हुआ। महाराणा रणजीत सिंह की हुकूमत के अधीन सिक्ख साम्राज्य एक ताकतवर साम्राज्य के रूप मे उभर कर सामने आया। बैसाखी और दिवाली पर्वों के समय में ‘दल खालसा’ अमृतसर में इकट्ठे होते थे। वे लोग एक बैठक करके सामूहिक निर्णय लेते थे। उस निर्णय को गुरुमना (गुरु के प्रस्ताव) कहा जाता था। सिक्खों का धार्मिक ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब है। सिक्खों के कुल दस गुरु हुए। इनके धार्मिक स्थल को गुरुद्वारा कहा जाता है। ये लोग एक ही ईश्वर को मानते हैं जिसे वे एक-ओंकार कहते हैं। सिक्खों का मानना है कि ईश्वर अकाल और निरंकार है। दक्षिण एशिया पर मुगल साम्राज्य के समय लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा हेतु सिक्खों का संघर्ष उस समय हुकूमत से था, जिस कारण सिक्ख गुरुओं को मुगलों ने हलाक कर दिया। गुरु गोविन्द सिंह की मृत्यु के पश्चात् 1708 ई. में बंदा बहादुर के नेतृत्व में खालसा ने मुगल साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह किया। उन्होंने गुरु गोविन्द सिंह और बाबा गुरु नानक के नाम के सिक्के गढ़वाए। बंदा बहादुर ने यमुना और सतलुज नदी के बीच के क्षेत्रों में अपने प्रशासन की स्थापना की थी।
मराठा
मराठा लोगों को ”महरट्ठा“ या ”महरट्टी“ भी कहा जाता था। मराठा साम्राज्य मुम्बई से गोवा तक और आंतरिक क्षेत्र पूर्व में 160 किमी नागपुर तक फैला हुआ था। इसकी स्थापना 17वीं शताब्दी में हुई थी। मराठा राज्य एक शक्तिशाली क्षेत्रीय राज्य था जिसने मुगल साम्राज्य का निरंतर विरोध किया था। 1720 ई. से 1761 ई. के बीच मराठा साम्राज्य का बहुत अधिक विस्तार हुआ। जब मुगल दक्कन की ओर बढ़ रहे थे, उस समय अहमदनगर और बीजापुर में मराठे प्रशासनिक एवं सैनिक सेनाओं में मुख्य पदों पर विराजमान थे तथा राज्य के कामकाज में उनका प्रभाव और शक्ति बढ़ती जा रही थी। दक्कन के सुल्तानों तथा मुगलों दोनों ने मराठा को अपने में मिलाने की चेष्टा की थी। मराठा साम्राज्य की स्थापना का श्रेय शाहजी भोंसले तथा पुत्र शिवाजी को जाता है। शाहजी ने मुगलों को काफी चुनौती दी थी। अहमदनगर में शाहजी का इतना ज्यादा प्रभाव था कि कोई भी नियुक्ति इन्हीं के द्वारा की जाती थी। चुनौती देने के लिए वह सैन्य बल का प्रयोग करते थे। शिवाजी ने शक्तिशाली योद्धा परिवारों (देशमुख) के साथ मिलकर एक स्थायी राज्य की स्थापना की। मराठा नरेश ने 1730 ईतक समस्त दक्कन प्रायद्वीप पर अपना नियंत्रण स्थापित कर दिया। दक्कन पर नियंत्रण स्थापित होने के कारण वहाँ पर चौथ एवं सरदेशमुखी कर वसूला जाने लगा। ज़मींदारों द्वारा वसूल किया जाने वाला राजस्व का 25 प्रतिशत चौथ कहलाता था। दक्कन में मुख्य राजस्व संग्रहकर्ता को दिया जाने वाला भू-राजस्व का 10 प्रतिशत हिस्सा सरदेशमुखी कर होता था। मराठा साम्राज्य के अत्यधिक विस्तार से उसे संसाधनों का भंडार मिल गया था। मराठों के सैन्य अभियान के कारण सभी शासक उसके विरुद्ध चले गये थे। पानीपत की तीसरी लड़ाई 1761 ई. में हुई थी, जिसमें किसी भी शासक ने इसकी सहायता नहीं की। अंतहीन सैन्य अभियानों के साथ मराठों ने एक प्रभावशाली शासन व्यवस्था शुरू की। कृषि पर ध्यान केन्द्रित किया गया एवं व्यापार को पुन: आरम्भ किया गया।
जाट
जाट मुख्यत: खेती करने वाली जाति है लेकिन औरंगजे़ब के अत्याचारों और निरंकुश प्रवृत्ति ने उन्हें एक बड़ी सैन्य शक्ति का रूप दे दिया। मुगल सल्तनत के आखिरी समय में जाट शक्तियाँ उभरी थीं। ब्रजमंडल के इतिहास में जाट ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मुगल साम्राज्य के अंत से अंग्रेजों के शासन तक ब्रजमंडल में जाटों का प्रभुत्व रहा। ब्रज की समकालीन राजनीति में जाट जाति शक्तिशाली बनकर उभरी थी। जाट नेताओं ने इस समय ब्रज में अनेक जगहों जैसे सिनसिनी, डीग, भरतपुर, मुरसान और हाथरस जैसे कई राज्यों को स्थापित किया था। इन सभी राजाओं में डीग, भरतपुर के राजा महत्त्वपूर्ण थे। इन सभी राजाओं ने ब्रज का मान-सम्मान बढ़ाया था। राजा सूरजमल के समय भरतपुर शक्तिशाली राज्य बन गया। जब नादिर शाह ने 1739 ई. में दिल्ली पर आक्रमण किया था तब दिल्ली के कई गणमान्य व्यक्ति भरतपुर में ही शरण लिए हुए थे। ऐतिहासिक काल में जाट समाज उन लोगों के लिए महान शरणास्थल बना रहा है, जो हिन्दुओं के सामाजिक अत्याचार के शिकार होते थे। जाट राजाओं ने ब्रज में हिन्दू शासन की स्थापना की थी। इसकी राजधानी डीग से हटाकर भरतपुर को बनाया गया। महाराजा सूरजमल और उनके बेटे जवाहर सिंह के शासनकाल के दौरान जाट राज्य में काफी विस्तार हुआ। जाट नेता चूड़ामन के नेतृत्व में उन्होंने दिल्ली के पश्चिमी भागों पर अपना अधिकार कर लिया। 1680 ई. तक जाटों ने अपना साम्राज्य दो शाही शहर दिल्ली और आगरा पर पूर्ण रूप से प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित कर दिया और वहाँ शासन चलाने लगे।

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