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अध्याय 17 बालकों में अधिगम की वैकल्पिक अवधारणाएँ (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 17 बालकों में अधिगम की वैकल्पिक अवधारणाएँ

अधिगम की परिभाषाएं

स्किनर के अनुसार, “अधिगम व्यवहार में उतरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है।”
वुडवर्थ के अनुसार, “नवीन ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया ही अधिगम है।”
क्रो एवं क्रो के अनुसार, “आदतों, ज्ञान और अभिवृतिओं का अर्जन ही अधिगम है।”
गिलफोर्ड के अनुसार, “व्यवहार के कारण व्यवहार में परिवर्तन ही अधिगम है।”
गेट्स व अन्य के अनुसार, “अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में परिवर्तन ही अधिगम है।”
मार्गन एवं गिलीलैण्ड के अनुसार, “सीखना, अनुभव के परिणामस्वरूप प्राणी के व्यवहार में परिमार्जन है जो प्राणी द्वारा कुछ समय के लिए धारण किया जाता है।’’

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक

► पूर्व अधिगम
► विषय वस्तु का स्वरूप
► विषय के प्रति मनोवृति
► सीखने की इच्छा
► सीखने की विधि
► अभिप्रेरणा
► वातावरण
► थकान
► शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य
► वंशानुक्रम

अधिगम के सिद्धांत को निम्न सिद्धांतों के नाम से भी जाना जाता है

► उद्दीपन-अनुक्रिया का सिद्धांत
► प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धांत
► संयोजनवाद का सिद्धांत
► प्रयत्न एवं भूल का सिद्धांत

अधिगम सिद्धांत के महत्वपूर्ण तथ्य

► यह सिद्धांत प्रसिद्ध अमेरिकी मनोवैज्ञानिक ‘एडवर्ड एल. थार्नडाइक’ द्वारा प्रतिपादित किया गया। यह सिद्धांत थार्नडाइक द्वारा 1913 में दिया गया। इन्होंने अपनी पुस्तक ‘शिक्षा मनोविज्ञान’ में इस सिद्धांत का वर्णन किया है।
► थार्नडाइक ने अपना प्रयोग भूखी बिल्ली पर किया।
► भूखी बिल्ली को जिस बॉक्स में बन्द किया उस बॉक्स को ‘पजल बॉक्स’ (Puzzle Box) कहते हैं।
► भोजन या उद्दीपक के रूप में थार्नडाइक ने ‘मछली’ को रखा। थार्नडाइक का प्रयोग: थार्नडाइक ने अपना प्रयोग भूखी बिल्ली पर किया। बिल्ली को कुछ समय तक भूखा रखने के बाद एक पिंजरे में बन्द कर दिया। जिसे ‘पजल बॉक्स’ (Puzzle Box) कहते हैं। पिंजरे के बाहर भोजन के रूप में थार्नडाइक ने मछली का टुकड़ा रख दिया। पिंजरे के अन्दर एक लीवर (बटन) लगा हुआ था जिसे दबाने से पिंजरे का दरवाजा खुल जाता था। भूखी बिल्ली ने भोजन (मछली का टुकड़ा) प्राप्त करने तथा पिंजरे से बाहर निकलने के लिए अनेक प्रयास किए। बिल्ली के लिए भोजन उद्दीपक का काम कर रहा था और उद्दीपक के कारण बिल्ली प्रतिक्रिया कर रही थी। उसने अनेक प्रकार से बाहर निकलने का प्रयत्न किया। एक बार संयोग से उसके पंजे से लीवर दब गया। लीवर दबने से पिंजरे का दरवाजा खुल गया और भूखी बिल्ली ने पिंजरे से बाहर निकल कर भोजन को खाकर अपनी भूख को शान्त किया। थार्नडाइक ने इस प्रयोग को बार-बार दोहराया। उसने देखा कि प्रत्येक बार बिल्ली को बाहर निकलने में पिछली बार से कम समय लगा और कुछ समय बाद बिल्ली बिना किसी भी प्रकार की भूल के एक ही प्रयास में पिंजरे का दरवाजा खोलना सीख गई। इस प्रकार उद्दीपक और अनुक्रिया मे ंसम्बन्ध स्थापित हो गया।

थार्नडाइक के अधिगम नियम

तत्परता का नियम: यह नियम कार्य करने से पूर्व तत्पर या तैयार किए जाने पर बल देता है। यदि कोई बालक किसी कार्य को सीखने के लिए तत्पर या तैयार होते है, तो उसे शीघ्र ही सीख लेता है। तत्परता में कार्य करने की इच्छा निहित होती है।
ध्यान केंद्रित करने में भी तत्परता सहायता करती है।
अभ्यास का नियम: यह नियम किसी कार्य या सीखी गयी विषय वस्तु के बार-बार अभ्यास करने पर बल देता है। यदि हम किसी कार्य का अभ्यास करते रहते हैं तो उसे सरलतापूर्वक करना सीख जाते हैं। यदि हम सीखे हुए कार्य का अभ्यास नहीं करते हैं तो उसे भूल जाते हैं।
परिणाम का नियम: इस नियम को सन्तोष तथा असन्तोष का नियम भी कहते हैं। इस नियम के अनुसार जिस कार्य को करने से प्राणी को सुख तथा सन्तोष मिलता है, उस कार्य को वह बार-बार करना चाहता है और इसके विपरीत जिस कार्य को करने से दु:ख या असन्तोष मिलता है, उस कार्य को वह दोबारा नहीं करना चाहता है।

थार्नडाइक के अधिगम नियम के द्वितीयक नियम

बहु-प्रतिक्रिया का नियम: इस नियम के अनुसार जब प्राणी के सामने कोई परिस्थिति या समस्या उत्पन्न हो जाती है तो उसका समाधान करने के लिए वह अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएँ करता है और इन प्रतिक्रियाओं को करने का क्रम तब तक जारी रहता है जब तक की सही प्रतिक्रिया द्वारा समस्या का समाधान या हल प्राप्त नहीं हो जाता है। प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धांत इसी नियम पर आधारित हैं।
मनोवृत्ति का नियम: इस नियम को मानसिक विन्यास का नियम भी कहते हैं। इस नियम के अनुसार जिस कार्य के प्रति किसी बालक की जैसी अभिवृति या मनोवृति होती है उसी अनुपात में बालक उसे सीखते हैं। यदि बालक मानसिक रूप से किसी कार्य को करने के लिए तैयार नहीं हैं तो या तो हम उसे करने में असफल होते हैं या अनेक गलतियाँ करते हैं या बहुत विलम्ब से करते हैं।
अल्पकाल के क्रिया का नियम: इस नियम के अनुसार किसी कार्य को छोटे-छोटे भागों में विभाजित करने से कार्य सरल और सुविधाजनक बन जाता है। इन भागों को शीघ्रता और सुगमता से करके सम्पूर्ण कार्य को पूरा किया जाता है। इस नियम पर ‘अंश से पूर्ण की ओर’ का शिक्षण सिद्धांत आधारित है।
सादृश्यता अनुक्रिया का नियम: इस नियम को आत्मीकरण का नियम भी कहते हैं। यह नियम पूर्व अनुभव पर आधारित है। जब प्राणी के सामने कोई नवीन परिस्थिति या समस्या उत्पन्न होती है तो वह उससे मिलती-जुलती परिस्थिति या समस्या का स्मरण करता है, जिसका वह पूर्व में अनुभव कर चुका है। वह नवीन ज्ञान को अपने पूर्व ज्ञान का स्थायी अंग बना लेते हैं।
साहचर्य परिवर्तन का नियम: इस नियम के अनुसार एक उद्दीपक के प्रति होने वाली अनुक्रिया बाद में किसी दूसरे उद्दीपक से भी होने लगती है। दूसरे शब्दों में पहले कभी की गई क्रिया को उसी के समान दूसरी परिस्थिति में उसी प्रकार से करना। इसमें क्रिया का स्वरूप तो वही रहता है, परन्तु परिस्थिति में परिवर्तन हो जाता है। थार्नडाइक ने पावलॉव के शास्त्रीय अनुबन्धन को ही साहचर्य परिवर्तन के नियम के रूप में व्यक्त किया।

पैवलॉव एवं वाटसन का शास्त्रीय अनुबंध का सिद्धांत

► पैवलॉव ने 1904 में शास्त्रीय अनुबंध सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। उसने अनुबंधित क्रिया को समझाने के लिए कुत्ते के ऊपर प्रयोग किया था।
► मानसिक तथा संवेदनात्मक रूप से बीमार शिक्षार्थियों के नैदानिक उपचार के लिए शास्त्रीय अनुबंध (अनुकूलित-अनुक्रिया) सिद्धांत का प्रयोग किया जा सकता है।
► इस सिद्धांत द्वारा शिक्षार्थियों में विशेश प्रकार की अभिवृत्तियों का विकास किया जाता है।
► भय, प्रेम तथा घृणा जैसे भाव उत्पन्न करने के लिए शिक्षक इस सिद्धांत का उपयोग करते हैं।

इस सिद्धान्त के अन्य नाम

► शास्त्रीय अनुबंधन का सिद्धान्त
► सम्बन्ध प्रतिक्रिया का सिद्धान्त
► क्लासिकी अनुबन्ध सिद्धान्त
► अनुकूलित/अनुबन्धित अनुक्रिया सिद्धान्त

शास्त्रीय अनुबंध सिद्धान्त का शैक्षिक महत्त्व

► पुनरावृत्ति के आधार पर अनुबन्धन स्थापित करने पर बल।
► भाषा को सीखने व सिखाने के लिए विशेष उपयोगी।
► आदतों के निर्माण में विशेष उपयोगी।
► यान्त्रिक तरीके से सीखने पर बल।
► इसी प्रकार बालकों में प्रेम व घृणा का विकास होता है।
► भय, सम्बन्धित मानसिक भ्रान्तियों को दूर करने में सहायक।

पैवलॉव का प्रयोग

► पैवलॉव ने कुत्ते पर प्रयोग को तीन चरणों में पूरा किया।
► इस प्रयोग में कुत्ते को स्वचालित यंत्र द्वारा भोजन दिया जाता था। पहली बार स्वभाविक उद्दीपन होने अर्थात भूख लगने पर भोजन दिया, जिसके प्रति कुत्ते ने स्वाभाविक अनुक्रिया की और उसके मुख से लार प्रवाहित हुआ।
► इस प्रक्रिया को कई बार दोहराया गया और एक निश्चित समय पर प्रतिदिन घंटी बजने के कुछ मिनट के बाद कुत्ते को भोजन दिया जाता था। भोजन को देखकर कुत्ते की लार टपकती थी।
► कुछ दिनों बाद यह देखा गया कि भोजन के लिए घंटी बजते ही कुत्ते की लार टपक पड़ती थी।
► इस प्रयोग द्वारा पैवलॉव ने यह निष्कर्ष निकाला कि यदि लम्बे समय तक स्वभाविक तथा अस्वाभाविक उद्दीपन को एक साथ प्रस्तुत किया जाये तो व्यक्ति अस्वाभाविक उद्दीपन/ उत्तेजना के प्रति भी स्वभाविक अनुक्रिया करने लगता हैं।
► इसे अनुकूलित अनुक्रिया अथवा अनुबन्धित अनुक्रिया कहते हैं।

वाटसन का प्रयोग

► वाटसन ने अपनी पत्नी रैनर के साथ (1920 में) मिलकर अपने पुत्र अल्बर्ट (11 माह) पर प्रयोग किया।
► अल्बर्ट के सम्मुख बालों वाला खरगोश दिया गया जिसके बालों पर हाथ रखना उस बालक को अच्छा लगता था।
► कुछ समय बाद वाटसन ने उस खिलौने में डरावनी ध्वनि डाल दिया।
► बालक जब उस खिलौने को छूता था तो डरावनी ध्वनि निकलती थी।
► परिणामस्वरूप बालक अल्बर्ट डरकर रोने लगता था। कुछ समय बाद यह देखा गया कि अल्बर्ट को जब भी कोई बालों वाली वस्तु दी जाती तो अल्बर्ट डर कर रोने लगता। यह सब अनुबन्धन के कारण होता है।

शास्त्रीय अनुबन्ध प्रयोग के बारे में

► अस्वाभाविक या कृत्रिम उत्तेजना के कारण स्वाभाविक या प्राकृतिक उत्तेजना के समान हुई प्रतिक्रिया को ‘सम्बद्ध प्रतिक्रिया’ या ‘सम्बद्ध सहज क्रिया’ कहते हैं।
► जो क्रिया (लार का गिरना) स्वभाविक उद्दीपक (भोजन) के प्रति हो रही थी, वही क्रिया अस्वाभाविक उद्दीपक (घण्टी) के प्रति होने लगी, इसी को हम अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धान्त कहते हैं।
► पुनरावृत्ति के आधार पर जो सम्बन्ध स्थापित होता है, उसे अनुबन्धन कहते है।
► अनुबन्धन स्थापित हो जाने के बाद यदि बार-बार मात्र अनुबन्धित उद्दीपक (घण्टी) ही प्रस्तुत किये जाने पर अन्ततोगत्वा अनुबन्धित अनुक्रिया का बन्द हो जाना विलोप कहलायेगा।

स्किनर का सक्रिय अनुबन्धन सिद्धांत

► अमेरीकी मनोवैज्ञानिक बी.एफ.स्किनर ने सक्रिय अनुबंधन का सिद्धांत दिया था।
► इस सिद्धांत का प्रमुख आधार थॉर्नडाइक द्वारा दिया गया ‘प्रभाव का नियम’ था।
► एक शिक्षार्थी या व्यक्ति को किसी अनुक्रिया या व्यवहार के बाद संतोश की अनुभूति होती है तो उसे वह दोहराना चाहता है और जब किसी अनुक्रिया के बाद असंतोश का अनुभव होता है तो शिक्षार्थी उस क्रिया को नहीं दोहराना चाहता है।
► इस प्रकार ऐसे व्यवहार में उत्तेजना एवं अनुक्रिया का बंधन कमजोर हो जाता है।
► यह नियम स्किनर के क्रियाप्रसूत और अनुबंधन का आधार है।
► क्रियाप्रसूत का अर्थ उस कार्य से है जो शिक्षार्थी सीखते समय करता है।
► सीखने के लिए शिक्षार्थी को अपने परिवेश के प्रति जागरूक रहना पड़ता है।

स्किनर का प्रयोग

► स्किनर ने 1930 में सफेद चूहों पर प्रयोग किया था।
► स्किनर ने एक ध्वनिविहिन बॉक्स बनाया, जिसमें एक लीवर को दबाने से भोजन के कुछ दाने आ जाते थे।
► एक चूहे को स्किनर ने बॉक्स में रख दिया तो उस चूहे ने बॉक्स में उछलकूद मचाना शुरू कर दिया। इसी उछलकूद में लीवर दब गया और भोजन के दाने चूहे को मिल गये।
► चूहा फिर इधर-उधर घूमते हुए लीवर को दबा देता है तो उसे भोजन की प्राप्ति हो जाती है। धीरे-धीरे वह लीवर को दबाना सीख जाता है क्योंकि लीवर के दबने से उसे भोजन की प्राप्ति हो जाती है।
► चूहे द्वारा की गयी इस प्रक्रिया का अध्ययन करने पर पाया गया कि चूहे को प्रत्येक बार लीवर दबाने में पिछली बार से कम समय लगा और कुछ समय बाद वह तुरंत ही लीवर दबाना सीख गया।
► इसका प्रमुख कार्य अनुक्रिया तथा पुनर्बलन की पुनरावृत्ति को बल देना है।

स्किनर के सक्रिय अनुबंध का शैक्षिक महत्त्व

► शिक्षार्थी को प्रभावी एवं शीघ्रता से पढ़ाने के लिए पाठ को छोटे-छोटे भागों में बाँटकर पढ़ाना।
► शिक्षार्थी को उसके पढ़ाई के लिए प्रतिपुश्टि या फीडबैक देना ताकि वह अपने परिणामों का मूल्यांकन कर सके और शिक्षण में सुधार कर सके।
► अभिक्रमित अधिगम के लिए इस सिद्धांत का प्रयोग किया जाता है।
► सक्रिय पुनर्बलन में यह सिद्धांत महत्वपूर्ण है।

कोह्लर का अंतर्दृष्टि सिद्धांत

► कोह्लर ने सूझ-बूझ अर्थात् अंतर्दृश्टि द्वारा सीखने का सिद्धांत दिया था।
► मूल रूप से यह सिद्धांत गेस्टाल्टवादी वैज्ञानिकों जैसे वरदाइमर, कोफ्फका तथा लेविन की देन है।
► गेस्टाल्ट का अर्थ समग्र रूप से किसी आकृति को समझने से है।
► इस सिद्धांत को प्रतिपादित करने के लिए कोह्लर ने एक प्रयोग किया था।

कोह्लर का प्रयोग

► कोह्लर ने एक भूखे चिम्पांजी को एक कमरे में बंद किया।
► कमरे की छत में कुछ केले इस प्रकार लटका दिए कि वे चिम्पांजी की पहुंच के बाहर थे।
► कमरे में कुछ दूरी पर तीन-चार खाली बक्से भी रखे गए। चिम्पांजी ने उछलकर केले लेने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हुआ।
► कुछ समय पश्चात फर्श पर रखे खाली बक्सों को देखकर चिम्पांजी उनको केले के नीचे खींच कर लाता है और फिर एक के ऊपर एक को रखकर उस पर चढ़ गया तथा केले प्राप्त कर लिए। यह उसकी सूझ ही थी जिसके द्वारा उसे केले प्राप्त करने में सफलता मिली। चिम्पांजी के समान बालक या शिक्षार्थी भी सूझ द्वारा सीखते हैं।

अंतर्दृष्टि सिद्धांत का शैक्षिक महत्व

► शिक्षार्थी के सामने पाठ्यसामग्री पूर्ण रूप से प्रस्तुत करनी चाहिए।
► शिक्षार्थी को बौद्धिक विकास के लिए अपनी सूझ-बूझ का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
► पाठ्यक्रम के सभी भागों को एक जगह रखने के लिए सूझ-बूझ तथा अंतर्दृश्टि प्रक्रिया का प्रयोग किया जा सकता है।
► शिक्षार्थी को पहले से पाठ की विशयवस्तु का ज्ञान हो तो वह अपनी सूझ-बूझ का बेहतर प्रयोग कर सकता है।

लेविन का अधिगम संबंधी सिद्धांत

► अपने परिवेश में एक व्यक्ति या शिक्षार्थी किस प्रकार सीखता है, यह लेविन के अधिगम संबंधी सिद्धांत का आधार है।
► सीखना एक सापेक्षिक क्रिया है और इसके द्वारा एक शिक्षार्थी में नवीन अंतदृश्टि का विकास होता है।
► शक्ति, अभिप्रेरणा, जीवन विस्तार तथा अवरोध इस सिद्धांत की चार अवधारणाएँ हैं। एक शिक्षार्थी के सीखने की प्रक्रिया नकारात्मक या सकारात्मक शक्ति से प्रभावित होती है। शिक्षार्थी जब किसी विशिश्ट उद्देश्य से प्रेरित होकर सीखता है तो उसे अभिप्रेरणा कहते हैं।
► एक शिक्षार्थी की आवश्यकताएँ तथा योग्यताएँ उसके परिवेश की सीमा से जुड़ी होती हैं। इसे ही जीवन-विस्तार कहते हैं।
► सीखने के क्रम में शिक्षार्थी का सामाजिक-पारिवारिक परिवेश कई बार अवरोध खड़ा करता है। जैसे- परिवार द्वारा शिक्षार्थी को मनपंसद क्रियाकलाप में शामिल होने से रोकना। इससे शिक्षार्थी अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए प्रेरित नहीं हो पाता है।
► यह सिद्धांत शिक्षकों को अधिगम प्रक्रिया में उचित नियोजन, व्यवस्था तथा प्रबंधन में सहायता करता है।

कार्ल रोजर्स का अनुभवजन्य अधिगम सिद्धांत

► प्रौढ़ शिक्षार्थियों की अधिगम प्रक्रिया को स्पश्ट करने के लिए कार्ल रेन्सम रोजर्स ने अनुभवजन्य अधिगम सिद्धांत का प्रतिपादन किया था।
► इस अवस्था के प्रौढ़ शिक्षार्थियों को सीखाने के लिए उन्होंने संज्ञानात्मक तथा अनुभवजन्य अधिगम की अवधारणा का प्रतिपादन किया था।
► शिक्षार्थी अपनी रूचि अनुसार अनुभव लेता है जो उसकी सम्पूर्ण प्रगति के लिए महत्वपूर्ण होता है।
► शिक्षार्थियों के लिए अधिगम स्रोत तथा संसाधन की व्यवस्था करने में यह सिद्धांत सहायक होता है।

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