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अध्याय 17. इतिहास – सुदूरवर्ती भूभागों के साथ सम्पर्क (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 17. इतिहास – सुदूरवर्ती भूभागों के साथ सम्पर्क

दूरस्थ भूमि से सम्पर्क में व्यापारियों की भूमिका
सुदूरवर्ती क्षेत्र में व्यापारी मुख्य भूमिका अदा करते थे। व्यापारी एक जगह से दूसरी जगह जाकर बहुत प्रकार की वस्तुएँ बेचते थे। उदाहरणस्वरूप दक्षिण भारत मसाले विशेषत:, काली मिर्च, सोना तथा कीमती पत्थरों के लिए जाने जाते थे। रोमन साम्राज्य में काली मिर्च काफी प्रसिद्ध थी। जिसके कारण इसे ‘काला सोना’ कहा जाता था। व्यापारी वस्तुओं को समुद्री मार्ग और सड़क मार्ग के माध्यम से रोम पहुँचाते थे। दक्षिण भारत में रोमन सिक्के बहुतायत मात्रा में मिले हैं। इससे पता चलता है कि उस समय दक्षिण भारत का रोम के साथ अच्छे व्यापार संबंध थे। नाविक मानसूनी हवा का लाभ उठाते थे। वे अफ्रीका या अरब के पूर्वी तट से इस उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट पर पहुँचने के लिए दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं की सहायता लेते थे। लंबी दूरी की यात्रा करने के लिए मजबूत जहाज बनाया जाता था।
समुद्र तट से लगे राज्यों का दूरस्थ भूमि से संपर्क
भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिण तटीय भाग में पहाड़, पठार और नदी के मैदान हैं। मैदानी भाग में कावेरी का मैदान सबसे ज्यादा उपजाऊ है। धीरे-धीरे इस क्षेत्र के सरदारों और राजाओं के पास बहुत ज्यादा संपत्ति और शक्ति हो गयी थी। मुवेन्दार एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ ‘तीन मुिखया’ होता है। इसकी जानकारी संगम कविताओं में मिलती है। इसका प्रयोग तीनों शासक परिवारों के मुखिया अर्थात् चोल, चेर तथा पांडेय के लिए किया गया है। यह लगभग 2300 वर्ष पहले दक्षिण भारत में बहुत शक्तिशाली माने जाते थे। इन तीनों मुखियाओं को दो-दो सत्ता केन्द्र प्राप्त थे। दोनों केंद्र में से एक तटीय हिस्से में और दूसरा अंदरूनी हिस्से में हुआ करती था। सभी छह केंद्रों में से एक चोलों का पतन पुहार या कावेरी पट्टिनम और दूसरा पांडयों की राजधानी मदुरै काफी महत्वपूर्ण था। मुवेन्दार के लगभग 200 वर्षों बाद सातवाहन राजवंश का बहुत ज्यादा प्रभाव बढ़ गया। सातवाहनों के प्रमुख राजा सातकर्णी थे। इसके बारे में उसकी माता गौतमी बलश्री के एक अभिलेख से जानकारी प्राप्त हुई है। सभी सातवाहन शासक दक्षिणपथ के स्वामी कहे जाते थे। दक्षिणपथ का शब्दार्थ दक्षिण की ओर जाने वाला रास्ता है।
कुषाण
कुषाण वंश का संस्थापक कूजुल कडफिसेस था। इसने ई.पू. 120 से 160 ई. तक राज्य किया। इस वंश का महानतम राजा कनिष्क था। इसकी राजधानी पूरूपपुर या पेशावर थी। कुशाणों की द्वितीय राजधानी मथुरा थी। बौद्ध धर्म की चौथी बौद्ध संगति कनिष्क के शासन काल में हुई जो बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय का अनुयायी था। उसके शासनकाल में गांधार शैली एवं मथुरा शैली का विकास हुआ। रेशम मार्ग को नियंत्रित करने वाले शासकों से सबसे प्रसिद्ध कुषाण थे।
दूरस्थ भूमि से आये तीर्थयात्री
तीर्थ की यात्रा पर निकले हुए व्यक्ति को तीर्थयात्री कहते हैं। धार्मिक स्थानों को भारत में तीर्थ स्थान के नाम से जाना जाता है। व्यापारी काफिलों में जहाज से दूर दूर तक की यात्रा करते थ्ंो। उनके साथ बहुत-से स्त्री-पुरुष तीर्थयात्री के रूप में चलते थे। भारत की यात्रा पर कई तीर्थयात्री आये। जिनमें से फाह्यान, ह्वेनसांग और इत्सिंग प्रमुख हैं। फाह्यान जो चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में 450 ई. में भारत आया था। ह्वेनसांग जो हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया था। वह 630 ई. से 643 ई. तक भारत में रहा और 6 वर्षों तक नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद इत्सिंग ने 7वीं शताब्दी में भारत की यात्रा की। ये सभी चीनी तीर्थयात्री थे जो बुद्ध से जुड़ी जगहों और मठों को देखने आये थे। सभी तीर्थ यात्रियों ने अपना-अपना यात्रा वृत्तांत लिखा है।

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