You are here
Home > Books > अध्याय 16 बच्चा: एक समस्या समाधानकर्ता तथा एक वैज्ञानिक अन्वेषक के रूप में (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 16 बच्चा: एक समस्या समाधानकर्ता तथा एक वैज्ञानिक अन्वेषक के रूप में (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 16 बच्चा: एक समस्या समाधानकर्ता तथा एक वैज्ञानिक अन्वेषक के रूप में

समस्या-समाधान का अर्थ

► शिक्षार्थियों को शिक्षण काल में अनेक समस्याओं या कठिनाईयों सामना करना पड़ता है, जिसका समाधान उसे स्वयं करना पड़ता है। शिक्षण काल में आने वाली अधिगम कठिनाईयों को समस्या और उस समस्या को हल करने की प्रक्रिया को समाधान कहते हैं। समस्या समाधान का अर्थ है लक्ष्य को प्राप्त करने में आने वाली समस्याओं का समाधान करना। स्किनर के अनुसार, ‘समस्या समाधान किसी लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा डालती प्रतीत होती कठिनाईयों पर विजय पाने की प्रक्रिया है। यह बाधाओं के बाद भी सामंजस्य बनाने की विधि है।’
► शिक्षार्थी या व्यक्ति जब अपने व्यवहारों तथा नियमित क्रियाकलापों के बावजूद किसी परिस्थिति में अपने कार्यों या शिक्षण को अभियोजित नहीं कर पाता है तो उसे परिस्थिति की समस्या कहते हैं। शिक्षार्थी द्वारा निरंतर प्रयास करते रहने से उसकी गलतियाँ कम होने लगती हैं और वह अपनी समस्याओं का हल खोज लेता है। शिक्षण काल में शिक्षार्थी अनवरत अपनी समस्याओं का समाधान खोजता रहता है तथा इस आधार पर वह समस्या समाधानकर्ता एवं वैज्ञानिक अन्वेशक है।

समस्या समाधान का व्यवहारवादी सिद्धांत

मनोवैज्ञानिक थॉर्नडाइक एवं कोहलर ने व्यवहारवादी सिद्धांत दिया था। इस सिद्धांत के अनुसार, एक शिक्षार्थी या प्राणी किसी समस्या का सामना करने पर विभिन्न व्यावहारिक क्रियाएँ करने लगता है। इसी प्रकार से वह अपने पिछले व्यवहारों से सीख लेता है और उसे समस्या समाधान के लिए व्यवहार में लाता है। उदाहरणस्वरूप, थॉर्नडाइक ने बिल्ली पर तथा कोहलर ने चिम्पैंजी पर व्यवहार प्रतिक्रिया का प्रयोग कर यह दिखाया कि किस प्रकार समस्या के समाधान के लिए सामान्य व्यवहार उपयोगी है। शिक्षार्थी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए विभिन्न व्यवहार करता है और प्रत्येक व्यवहार की संभावना अलग-अलग होती है।

बच्चा: एक समस्या समाधनकर्त्ता के रूप में

क्रो एवं क्रो के अनुसार, ‘‘शिक्षकों को समस्या समाधान की वैज्ञानिक विधि में प्रशिक्षण देना चाहिए। तभी वे शुद्ध, स्पश्ट और निश्पक्ष चिन्तन का विकास करने के लिए छात्रों का पथ-प्रर्दशन कर सकेंगें।’’
► एक बच्चा या शिक्षार्थी अपने अध्ययनकाल में कई समस्याओं का सामना करता है जैसे कक्षा में उपकरणों की कमी, कठिन पाठ्यक्रम आदि। शिक्षण-प्रक्रिया शिक्षार्थी को अपने व्यक्तित्व विकास एवं विभिन्न परिस्थितियों में ढ़लने के लिए प्रशिक्षित करती है।

शिक्षार्थी द्वारा समस्या समाधान करने की वैज्ञानिक विधि

► शिक्षार्थी के शारीरिक एवं मानसिक विकास के साथ ही उसकी समस्याएँ भी बढ़ती रहती हैं।
► परिपक्वता आने के साथ वह अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिए सोचना एवं वैज्ञानिक विधियों का उपयोग करना भी सीख लेता है। शिक्षार्थी सबसे पहले वास्तविक समस्या का चयन करता है और इस समस्या के कारण का पता लगाता है।
► समस्या का समाधान करने के लिए वह अपने शिक्षक तथा अभिभावकों द्वारा सिखायी गई पद्धतियों का प्रयोग कर उपयुक्त समाधान खोजने का प्रयत्न करता है। यदि वह पूर्व के व्यवहारों या पद्धतियों से समस्या का समाधान नहीं कर पाता है तो फिर अपनी सामान्य व्यवहार या बुद्धि का प्रयोग करता है।
कोहलर के अनुसार, शैक्षणिक समस्याओं के समाधान के लिए एक शिक्षार्थी या बच्चा अपनी अंतदृश्टि विधि अर्थात् चिंतन प्रक्रिया की मदद लेता है।
► प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाला बच्चा अपनी समस्या जैसे कक्षा में ब्लैकबोर्ड पर लिखा हआ नहीं दिखना आदि के समाधान के लिए वाक्य बोलकर शिक्षक को सूचित करता है। इस प्रकार से वह अपनी समस्याओं का वाक्यात्मक भाशा द्वारा समाधान खोजता है।

समस्या समाधान के चरण

बार-बार प्रयास द्वारा: एक बच्चा अपनी समस्याओं के समाधान के लिए प्रशिक्षित नहीं होता है अत: वह दूसरों को अवलोकन कर तथा बतायी गयी विधियों से बार-बार प्रयास करके अपनी समस्या का समाधान करता है। जैसे वर्णमाला सीखने के लिए एक ही अक्षर को लिखने का बार-बार प्रयास करना।
सूचनाओं का संग्रह: एक शिक्षार्थी या बच्चा समस्या से जुड़ी सभी सूचनाओं को पहले जमा या संग्रह करता है।
संभावित समाधानों का निर्माण करना: एक शिक्षार्थी या बच्चा संग्रहित सूचनाओं से समस्या का समाधान करने के लिए अपने व्यवहारों या विधियों का निर्धारण करता है।
संभावित समाधानों का मूल्यांकन करना: एक शिक्षार्थी या बच्चा अपने व्यवहारों या विधियों का निर्धारण करने के बाद उसके परिणामों पर चिंतन करता है। समस्या के समाधान के लिए उसकी सफलता बुद्धि एवं संग्रहित सूचनाओं पर निर्भर करती है।
संभावित परिणामों का परीक्षण करना: एक शिक्षार्थी या बच्चा चयनित विधि का नमूनों पर परीक्षण करता है। फिर उस विधि द्वार मिली सफलता के आधार पर उसका चयन समस्या के समाधान के लिए करता है।
निष्कर्षों का समाधान के लिए प्रयोग करना: एक शिक्षार्थी या बच्चा स्वयं चयनित विधि का प्रयोग समस्या के समाधान के लिए करता है।
स्वावलंबी बनकर: एक बच्चा आरंभ से ही अपना कार्य स्वयं करना चाहता है, जैसे अपने हाथों से खाने की चेश्टा करना। इस प्रकार से स्वावलंबी बनकर वह अपनी समस्याओं का समाधान करने की कोशिश करता है।

बच्चा: एक वैज्ञानिक अन्वेषक के रूप में

► एक शिक्षार्थी या बच्चा जब अधिगम द्वारा सीखे हुए तथ्यों या पद्धतियों का प्रयोग वैज्ञानिक विधि अर्थात् कार्य-कारण सिद्धांत को समझकर करता है तो उस बच्चे को वैज्ञानिक अन्वेशक के रूप में माना जाता है।
निरीक्षण: शिक्षार्थी या बच्चा सबसे पहले समस्या की परिस्थितियों तथा विशय वस्तु का निरीक्षण करता है।
तुलना: शिक्षार्थी या बच्चा विशयवस्तु की तुलना दी गयी परिस्थितियों से करता है।
प्रयोग: निरीक्षण तुलना के आधार पर शिक्षार्थी या बच्चा अपने विचारों का प्रयोग करता है।
प्रदर्शन: निरीक्षण तुलना के आधार पर शिक्षार्थी प्राप्त प्रयोगों का प्रदर्शन करता है।
सामान्यीकरण एवं प्रमाणीकरण: शिक्षार्थी किये गए प्रयोगों के परिणाम से सिद्धांत बनाता है और उससे समस्या का प्रमाणीकरण करता है।

अन्वेषणात्मक होने के लाभ

► शिक्षार्थी यदि अन्वेशणात्मक रूप से समस्या के समाधान की खोज करता है तो वह उस समस्या की गहनता को समझता है और अपनी स्मृति में उस समाधान को रख लेता है। शिक्षार्थी समस्या के समधान के लिए पूर्व में अपनाये गयी विधियों का शोध एवं खोज करता है।
► अन्वेशणात्मक रूप से समस्या के समाधान की खोज करने से शिक्षार्थियों का अधिगम अधिक स्पश्ट तथा स्थायी होता है।
► शिक्षार्थी अपने शिक्षण क्रियाकलापों के प्रति ध्यान देता है और उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित होता है।

शिक्षकों के अन्वेषणात्मक शिक्षार्थी या बच्चे का

तात्पर्य

► शिक्षार्थियों में अन्वेशणात्मक गुण उत्पन्न करने में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
► एक शिक्षक का दायित्व होता है कि वह अपने शिक्षार्थियों को समस्या समाधान की विधियाँ सिखाए एवं इसके लिए प्रशिक्षित करे।
► शिक्षार्थी के सामने छोटी-छोटी समस्याओं को प्रस्तुत कर वह उन्हें समस्या समाधान के लिए प्रशिक्षित कर सकता है।
► इसके द्वारा वह शिक्षार्थियों में तथ्यों के अध्ययन, अवलोकन एवं निरीक्षण की शक्ति का विकास कर सकता है।
► शिक्षार्थी द्वारा बताये गये समाधानों का परीक्षण कर उनके अंदर वैज्ञानिक अन्वेशक के गुण विकसित कर सकता है।

Top
error: Content is protected !!