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अध्याय 15 शिक्षण तथा अधिगम की आधारभूत प्रक्रियाएं (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 15 शिक्षण तथा अधिगम की आधारभूत प्रक्रियाएं

शिक्षण तथा अधिगम की प्रक्रिया

► शिक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया है जो किसी शिक्षार्थी को ज्ञान, वैयक्तिक कौशल एवं सामाजिक मूल्य आदि सिखाकर उसे सामाजिक प्राणी के रूप में ढालती है।
वेश्लर के अनुसार, ‘शिक्षण एक संश्लिश्ट तथा जटिल प्रक्रिया है। इसके द्वारा शिक्षार्थियों में विशिश्ट परिवर्तन लाने के लिए उन्हें अंत:क्रियापरक परिवेश में रखा जाता है।’
क्लार्क के अनुसार, ‘शिक्षण से तात्पर्य उन क्रियाओं से है जिनकी संरचना एवं परिचालन शिक्षार्थियों के व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए किया जाता है।’
► शिक्षार्थियों को सीखाने के लिए शिक्षक विशिश्ट परिवेश की अभिकल्पना करता है ताकि प्राकृतिक घटक, पुस्तकों में उपलब्ध जानकारी, प्रयोगशाला-उपकरण जैसे परिवेशीय उद्दीपनों के साथ अंत:क्रिया कर सकें। अधिगम सदैव लक्ष्य-निर्दिष्ट तथा सप्रयोजन होता है। अधिगम अर्थात् सीखना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। अधिगम व्यक्तिगत होता है अर्थात् प्रत्येक अधिगमकर्ता अपनी गति से, रूचि, आकांक्षा, समस्या, संवेग, शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य आदि के आधार पर सीखता है। अधिगम सृजनात्मक तथा अभिप्रेरणात्मक होता है।

शिक्षण की विशेषताएँ

► शिक्षण व्यावसायिक एवं सामाजिक प्रक्रिया है जो कला एवं विज्ञान दोनों के रूप में है। शिक्षण में शिक्षक द्वारा किये गये प्रेक्षण, विश्लेशण तथा परस्पर की गयी क्रियाएँ शामिल होती हैं।
► शिक्षण व्यवस्थित तथा कौशलों से युक्त विशिश्ट कार्य है और यह संप्रेशण कौशल द्वारा पूरा किया जाता है। इसे औपचारिक एवं अनौपचारिक कई प्रकार से पूरा किया जा सकता है।
शिक्षा
शिक्षा का अर्थ शिक्षार्थी के उन सभी अनुभवों से है जिनका प्रभाव उनके ऊपर जन्म से लेकर मृत्यु तक पड़ता है।
► शिक्षा वह अनियंत्रित वातावरण है जिसमें रहते हुए शिक्षार्थी अपनी रूचि के अनुसार अनुभव प्राप्त करता है तथा विकसित होता है। शिक्षा समाज एवं शिक्षक द्वारा परिवार, समाज, विद्यालय तथा महाविद्यालयों में सचेश्ट एवं औपचारिक रूप से प्राप्त होती है।
एस.एस. मैकेन्जी के अनुसार, ‘‘संकुचित अर्थ में शिक्षा का अर्थ शिक्षार्थियों की शक्तियों के विकास तथा सुधार के लिए चेतनापूर्वक प्रयास करना है।’’
प्रोफेसर ड्रिवर के अनुसार, ‘‘शिक्षा एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा शिक्षार्थी के ज्ञान, चरित्र, तथा व्यवहार को एक विशेष सांचे में ढाला जाता है।’’
काण्ट के अनुसार, ‘‘शिक्षा व्यक्ति की उस पूर्णता का विकास है जिसकी उसमें क्षमता है।’’
प्रशिक्षण
शिक्षार्थी को जब निरन्तर अभ्यास एवं निर्देशन द्वारा कोई विशय-वस्तु जैसे विज्ञान का प्रयोग सिखाया जाता है तो उसे प्रशिक्षण कहते हैं। प्रशिक्षण का उद्देश्य संबंधित विशय में शिक्षार्थी को विशिश्ट कौशल देना तथा उसकी कमियों को दूर करना है। प्रशिक्षण द्वारा कमजोर एवं विकलांग शिक्षार्थियों की कमियों को दूर किया जाता है तथा कठिन विशयों को सीखाने पर जोर दिया जाता है।
शिक्षण प्रक्रिया
विशय या विशयगत शिक्षा जैसे खेल, हस्तकला सीखने के लिए शिक्षार्थी जिन अवस्थाओं से गुजरता है उसे शिक्षण प्रक्रिया कहते हैं। अधिगम या सीखने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण भाग यह है कि शिक्षार्थी को यह बताया जाये कि वह जो कौशल या विशय सीख रहा है वह ठीक है या नहीं।
► उपर्युक्त चित्र से स्पश्ट होता है कि किसी शिक्षार्थी का अभीश्ट व्यवहार किस दिशा में हो यह उद्देश्य द्वारा निर्धारित किया जा सकता है। इसी प्रकार शिक्षार्थी अधिगम अनुभव द्वारा अपने व्यवहारों में परिवर्तन करना सीखता है।
► शिक्षक किसी शिक्षार्थी को प्रतिपुश्टि/फीडबैक देने के लिए कुछ सिद्धांतो एवं चरणों का उपयोग करते हैं।
► शिक्षा का उद्देश्य, अधिगम का अनुभव तथा शिक्षार्थी का मूल्यांकन ये सभी शिक्षण प्रक्रिया के आवश्यक अंग हैं।
► शिक्षण का एक स्तर दूसरे स्तर से किस प्रकार से जुड़ा हुआ है यह शिक्षण प्रक्रिया द्वारा समझा जाता है।

शिक्षण की अवस्थाएँ

शिक्षार्थी सीखने के क्रम में निम्न अवस्थाओं से गुजरते हैं:
अर्जन अवस्था अर्जन का अर्थ कुछ नया सीखने से है। इस अवस्था में शिक्षार्थी या बच्चे को नये कार्य जैसे अक्षरों की पहचान सिखायी जाती है। शिक्षार्थियों को सीखाने के लिए शिक्षक कार्य का स्वयं प्रदर्शन करते हैं, जैसे अक्षर को लिखकर दिखाते हैं या फिर आकर्शक चार्ट आदि के द्वारा सीखाते हैं। एक समय में कार्य का एक चरण किया जाता है और फिर शिक्षार्थी से अनुकरण करने को कहा जाता है। शिक्षक, शिक्षार्थियों के साथ स्वयं भी उस कार्य में भाग लेते हैं। उदाहरणस्वरूप, विज्ञान की प्रयोगशाला में शिक्षक विभिन्न प्रयोगों में शिक्षार्थियों के साथ भाग लेते हैं।
निपुणता अवस्था
शिक्षार्थी जब क्रिया करना सीख लेता है तो उस कार्य को अच्छे से करने के लिए उसे प्रशिक्षण देने की आवश्यकता होती है। कार्य के सही ढ़ंग से करने को ‘निपुणता’ कहते हैं। उदाहरणस्वरूप, प्राथमिक कक्षा का शिक्षार्थी लिखना तो सीख लेता है परंतु उसे अक्षरों की बनावट को सुधारने एवं लिखने की गति बढ़ाने की आवश्यकता होती है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए शिक्षक, शिक्षार्थी से अभ्यास करवाते हैं तथा प्रतिपुश्टि/फीडबैक देते हैं। शिक्षक मूल्यांकन द्वारा निर्धारित करते हैं कि शिक्षार्थी की प्रगति संतोशजनक है या नहीं इस पूरी प्रक्रिया को निपुणता अवस्था कहते हैं।
अनुरक्षण अवस्था
शिक्षार्थी को सीखे हुए पाठ को याद रखने के लिए उसका बार-बार अभ्यास करने के लिए कहा जाता है। अभ्यास द्वारा पाठ को याद रखने की इस प्रक्रिया को अनुरक्षण व्यवस्था कहते हैं। कक्षा में नया पाठ सीखाने से पहले शिक्षार्थी को पुराना पाठ लिखकर दिखाने को कहा जाता है, जैसे अंकों का योग करना सीखाने से पहले 1 से 10
तक की संख्या लिखने को कहा जाता है। इस प्रकार से दोहराने की प्रक्रिया द्वारा सीखे गये कार्यों को याद रखने एवं पुन: स्मरण करने में मदद मिलती है।
सामान्यीकरण अवस्था
शिक्षार्थी द्वारा सीखे गये पाठ एवं कार्यों को दूसरे ढ़ंग से सीखाने या अभ्यास कराने को सामान्यीकरण कहते हैं।
► इसका अर्थ है कि जिन विधि या सिद्धांतों की मदद से शिक्षार्थी को कोई कार्य करना सिखाया जाता है वह उसी कार्य को दूसरी विधि या सिद्धांतों की मदद से पूरा कर सकता है। इस प्रक्रिया को ‘प्रशिक्षण का हस्तांतरण’ भी कहते हैं।
► उदाहरण के लिए, शिक्षार्थी को फ्लैश कार्ड पर काले रंग से संख्याओं को लिखकर संख्या 1,2,3 पढ़ना सिखाया जाता है।
यदि शिक्षार्थी उन्हीं संख्याओं को दूसरे स्थानों पर जैसे ब्लैक बोर्ड या साइन बोर्ड पर पढ़ सकता है तो इस प्रक्रिया को सामान्यीकरण कहते हैं। मानसिक रूप से मंद बच्चे स्वयं सामान्यीकरण नहीं कर पाते और ऐसा कर पाने के लिए उन्हें सहायता की आवश्यकता होती है।
अनुकूलन अवस्था
शिक्षार्थी जब सामान्यीकरण करने योग्य हो जाता है तो वह सीखे गये पाठ या कौशल को बिना किसी सहायता के नये क्षेत्र या स्थिति में लागू कर पाता है। इस कौशल को अनुकूलन अवस्था कहते हैं। अनुकूलन अवस्था को सामान्य शब्दों में ‘समस्या समाधान’ भी कहते हैं। शिक्षार्थी दूसरों को अवलोकन कर सीख लेते हैं और सीखे गये कौशलों का प्रयोग विभिन्न स्थितियों में करते हैं।

शिक्षण अधिगम के सिद्धान्त

स्वयं करके सीखने का सिद्धांत

शिक्षार्थी सीखने के क्रम में कुछ चीजों या कार्यों को स्वयं करके सीखता है। उदाहरणस्वरूप, एक बच्चा या शिक्षार्थी विभिन्न आकार के वस्तुओं में से छोटे आकार वाली वस्तुओं को स्वयं ही छाँटता है। इस प्रकार से शिक्षार्थी विभिन्न आकारों से परिचित होता है। धीरे-धीरे शिक्षक एवं अभिभावकों से बातचीत करके तथा अंत:क्रिया करके उसे आकारों के बारे में और भी अतिरिक्त जानकारी प्राप्त होती है। शिक्षार्थी मुख्य रूप से खेल क्रियाओं के दौरान स्वयं के प्रयासों से सीखते हैं।

सरल से जटिल की ओर सीखने का सिद्धांत

► शिक्षार्थी को सीखाने के लिए पहले सरल चरण अपनाये जाते हैं फिर कठिन चरण सिखाये जाते हैं। उदाहरणस्वरूप, पहली कक्षा के शिक्षार्थी को अंकों का जोड़ सीखाने के लिए पहले 2 में 2 जोड़ना सीखाया जाता है। बाद में 2 + 2 + 3 का जोड़ सीखाया जाता है। इसी प्रकार से बड़े अंकों को जोड़ना सीखाया जाता है।
► सरल कार्य या पाठ सीख कर शिक्षार्थी सफलता का अनुभव करता है और वह सीखने के लिए प्रेरित होता है। शिक्षार्थी को आरंभ में यदि कठिन कार्य या पाठ सीखाया जाए और यदि वह असफल होता है तो सीखने के लिए हतोत्साहित हो सकता है। सीखाते समय शिक्षार्थियों को सफलता का अनुभव करवाना इस सिद्धांत का मुख्य पहलू है। जटिल कार्य को सरल कार्य में बांटने तथा सरल कार्यों को सबसे कम कठिन से अधिक कठिन कार्य के क्रम में व्यवस्थित करने की प्रक्रिया को ‘कार्य विश्लेशण’ कहते हैं। ‘कार्य विश्लेशण’ द्वारा मानसिक रूप से कमजोर शिक्षार्थियों को सीखाने की रणनीति बनायी जाती है।

ज्ञात से अज्ञात की ओर सीखने का सिद्धांत

► शिक्षार्थी को पहले से ज्ञात विशय या पाठ आरंभ में सीखाया जाता है और बाद में उसे नया पाठ या विशय सीखाया जाता है।
► शिक्षक इसके लिए पहले शिक्षार्थी को नया विशय सीखाने से पहले विशय से संबंधित प्रश्न पूछते हैं। जोड़ या योग सीखाने से पहले शिक्षक, शिक्षार्थी को एक अंक के योग के प्रश्न करने को देता है जो शिक्षार्थी पहले से जानते हैं। इस प्रकार से सीखे गये कार्यों को दोहराने से शिक्षार्थियों को उन्हें याद रखने में आसानी होती है तथा वह नये विशय को अच्छे से सीख पाता है। ज्ञात से अज्ञात की ओर सीखाने के लिए शिक्षक ‘सरल से जटिल’ सिद्धांत का प्रयोग करता है।

मूर्त से अमूर्त की ओर बढ़ने का सिद्धांत

► शिक्षार्थियों में सीखने की प्रक्रिया मूर्त से अमूर्त की ओर बढ़ती है। मूर्त तथा प्रत्यक्ष अनुभवों द्वारा विशय एवं घटनाओं से परिचित होने के बाद ही शिक्षार्थियों में यह कौशल आता है कि वे विशय एवं घटनाओं के बारे में अमूर्त विचार कर सके।
► इस प्रकार जन्म से लेकर बड़े होने तक किसी संकल्पना या अवधारणा सीखने के लिए शिक्षार्थी मूर्त अवस्था, चित्रात्मक अवस्था और अमूर्त अवस्था से होकर गुजरता है। मूर्त अवस्था में शिक्षार्थी वस्तुओं को छूकर तथा घटनाओं को अनुभव करके सीखता है। शिक्षार्थी वस्तु एवं घटनाओं के बारे में उनके आकार, बनावट, रंग, संरचना, स्वाद तथा भार द्वारा सीखता है।
► शिक्षार्थियों को अपनी दैनिक क्रियाओं एवं गतिविधियों के दौरान चीजों को पकड़ने, छूने, उनकी खोजबीन करने, उनके बारे में समझ बनाने तथा संकल्पनाएँ बनाने के अवसर मिलते हैं। चित्रात्मक अवस्था को अर्धमूर्त अवस्था (semi-concrete stage)
भी कहते हैं। शिक्षार्थी को जब असली वस्तुओं को छूने, पकड़ने तथा उनकी खोजबीन करने का अनुभव हो जाता है तो वह उस वस्तु को उसके चित्र के साथ संबंद्ध कर पाता है। उदाहरण- शिक्षक द्वारा चित्रात्मक क्रियाओं जैसे फ्लैश कार्ड्स दिखाने पर शिक्षार्थी द्वारा किसी फल के बारे में बताना की क्रिया। शिक्षार्थी चित्र को देखकर वस्तु के आकार, बनावट तथा रंगों का स्मरण कर पाता है।
► अमूर्त अवस्था किसी अवधारणा को सीखने की अंतिम अवस्था है। शिक्षार्थी को जब प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं को छूने तथा प्रयोग करने के साथ-साथ चित्रात्मक क्रियाओं का अनुभव हो जाता है तो वह उस चीज को देखे बिना ही उसका स्मरण कर सकता है। शिक्षार्थी मूर्त एवं चित्रात्मक अवस्था के दौरान अपने अनुभवों के आधार पर वस्तु का मानसिक चित्र बना लेता है अर्थात् वह कल्पना में उस वस्तु या घटना के बारे में सोच सकता है।

पूर्ण से अंश की ओर सीखने का सिद्धांत

‘पूर्ण से आंशिक’ की ओर बढ़ने के सिद्धांत के अनुसार, शिक्षार्थी को पहले वस्तुओं के बारे में सीखाया जाता है और बाद में उसका विस्तृत विवरण दिया जाता है। उदाहरणस्वरूप किसी शिक्षार्थी को एक फल के बारे में जानकारी देते हुए पहले पहचानना सिखाया जाता है। बाद में उस फल को छीलने, उसके रंग तथा उसे विभिन्न खाद्य पदार्थ के रूप में उपभोग करने के बारे में बताया जाता है।

शिक्षण तथा अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक

शरीर-क्रियात्मक कारक

► इसके अंतर्गत आनुवांशिक, मनोदशा, जैव रासायनिक असंतुलन, नशीले पदार्थों का सेवन, संक्रामक बीमारी, कुपोशण तथा जन्मजात दोश जैसे कारक आते हैं। शिक्षार्थी को शुरू में देखकर तथा सुनकर बोलना सिखाया जाता है। जब सुनकर बोलना सिखाया जाता है तो उस समय श्रवण दोश अधिगम को प्रभावित करता है।
► इसी प्रकार सूक्ष्म दृश्टि दोश या एनिसीकोनिया रोग होने पर दोनों आँखों में बनने वाले वस्तुओं के प्रतिबिम्ब के आकार तथा स्वरूप में अंतर होता है जिससे शिक्षार्थी को पढ़ने में दिक्कत होती है। अपरिपक्व शरीर जैसे कानों की विकृत बनावट या कमजोर स्मरण शक्ति से भी अधिगम प्रक्रिया प्रभावित होती है।

मनोवैज्ञानिक कारक

► बुद्धिमत्ता, व्यक्तित्व, अभिरूचि, अभिक्षमता जैसे मनोवैज्ञानिक कारक अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। इसी प्रकार अभिप्रेरणा, आात्मधारणा, तत्परता तथा अवधान भी मनोवैज्ञानिक कारक हैं जो शिक्षण को प्रभावित करते हैं।
► शिक्षार्थी अपने विशय में क्या सोचता है यह अधिगम के लिए महत्वपूर्ण है जैसे मंदबुद्धि शिक्षार्थी की प्रवृति आक्रामक या पलायनवादी होती है। शिक्षार्थी यदि यह सोचता है कि वह कुछ नहीं कर सकता है तो अधिगम प्रक्रिया में उसकी कोई रूचि नहीं होती है।

सामाजिक-संवेगात्मक कारक

► किसी बच्चे या शिक्षार्थी को पालने का तरीका, पुरस्कार एवं दंड, विभिन्न कार्यों में स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता जैसे संवेगात्मक कारक उसकी अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। इसी प्रकार पढ़ने एवं खेलने की सुविधाएँ, अभिभावक की आकांक्षा, पारिवारिक विघटन तथा आपसी मनमुटाव, लैंगिक मुद्दे जैसे सामाजिक कारकों से अधिगम प्रक्रिया प्रभावित होती है।
► अशांत पारिवारिक पृश्ठभूमि शिक्षार्थियों के सोचने की प्रक्रिया में बाधा खड़ी करती हैं।

शैक्षिक कारक

► अपर्याप्त या गलत शिक्षण, जैसे शिक्षक द्वारा सही दिशा-निर्देश नहीं देना, पाठ्यवस्तु की पुनरावृत्ति, पाठ्यवस्तु की निरन्तरता, अधिगम के लिए समस्या है।
► विश्राम का अभाव, विशय की कठिनता तथा पाठ्यपुस्तक की सार्थकता भी शैक्षिक कारक हैं जो अधिगम को प्रभावित करते हैं।
► यदि शिक्षक अपनी बात शिक्षार्थी तक प्रेशित नहीं कर पाता है तथा नीरस ढ़ंग से पढ़ाता है तो शिक्षार्थी का अधिगम प्रभावित होता है और ऐसी स्थिति में वे पढ़ाई में रूचि लेना छोड़ देते हैं।
► कक्षा में उचित माहौल का अभाव, जैसे कक्षा में आवश्यकता से अधिक शिक्षार्थियों की संख्या, श्यामपट्ट, बेंच-डेस्क का अभाव तथा शिक्षक द्वारा कुछ खास शिक्षार्थियों पर ही ध्यान देने से अधिगम एवं शिक्षण प्रक्रिया प्रभावित होती है।
► द्विभाशी या बहुभाशी शिक्षार्थियों की उपस्थिति से भी शिक्षण प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होती है।

परिवेश संबंधी कारक

शैक्षिक परिसर में यदि कोलाहल हो रहा हो, हवा एवं प्रकाश कम हो और प्रदूशण हो रहा हो तो भी अधिगम प्रक्रिया प्रभावित होती है। शिक्षक कुछ शिक्षार्थियों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित होते हैं जैसे गाँव से आने वाले या किसी समुदाय विशेष से आने वाले शिक्षार्थी के बारे में धारणा बना लेते हैं कि यह अमुक कार्य या विशय को ठीक से नहीं समझ सकता है। ऐसा सोच कर शिक्षक उसे ठीक से नहीं पढ़ाते हैं या उसके साथ सही व्यवहार नहीं करते हैं, जिसके कारण अधिगम प्रक्रिया बाधित होती है।

प्रतिपुष्टि

► प्रतिपुश्टि का अर्थ शिक्षार्थियों को उनके द्वारा किये गये कार्यों के बारे में बताना है ताकि वे यह जान सके कि वह अपने कार्य में किस तरह सुधार ला सकते हैं। मूल्यांकन, शिक्षार्थी को शिक्षण दे रहे शिक्षक की ओर उन्मुख होता है जबकि प्रतिपुश्टि शिक्षार्थी को अपने कार्यों में सुधार करने के लिए होती है। उदाहरणस्वरूप, शिक्षक किसी शिक्षार्थी को दो अंकों वाली संख्याओं को जोड़ना सीखाता है तो पाता है कि शिक्षार्थी दहाई अंक का योग सही नहीं कर पाता है क्योंकि वह इकाई अंक के हासिल को दहाई अंक में नहीं जोड़ता है। ऐसी स्थिति में शिक्षक उस शिक्षार्थी को प्रतिपुश्टि देकर कहाँ गलती हो रही है यह बताता है परिणामस्वरूप शिक्षार्थी अपने कार्य में सुधार कर पाता है।
► सभी शिक्षार्थियों को सीखने के लिए प्रतिपुश्टि की आवश्यकता होती है तथा मानसिक रूप से कमजोर शिक्षार्थियों के लिए यह महत्वपूर्ण होता है। प्रतिपुश्टि भावी व्यवहार का मार्गदर्शन करने में तथा उसे उत्तरदायी बनाने में सहायक होती है।

शिक्षण विधि

► शिक्षक, शिक्षण विधियों जैसे शिक्षक नियंत्रित अनुदेशन, शिक्षार्थी निय ित्रत अनुदश्े ान, समहू -निय ित्रत विधि द्वारा शिक्षार्थियों के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन लाता है।
► शिक्षक नियंत्रित अनुदेशन विधि में एक शिक्षक द्वारा व्याख्यान, पाठ-प्रदर्शन तथा अनुवर्ग-शिक्षण विधि का प्रयोग किया जाता है।
► शिक्षार्थी नियंत्रित अनुदेशन में शिक्षक, शिक्षार्थियों की प्रकृति के अनुसार उसे शिक्षा देने पर जोर देते हैं।
► शिक्षक शिक्षार्थियों को खेल विधि, कहानी विधि, गृहकार्य विधि जैसी रूचिपूर्ण विधियों द्वारा शिक्षण कार्य करवाता है।
► शिक्षार्थियों को विभिन्न समूहों में बांटकर शिक्षा देने की विधि को समूह-नियंत्रित विधि कहते हैं। शिक्षक, शैक्षिक यात्रा, ऐतिहासिक खोज में इस विधि का प्रयोग करते हैं।
► शिक्षक एवं शिक्षार्थी नियंत्रित अनुदेशन में शिक्षक तथा शिक्षार्थियों की परस्पर भूमिका होती है। इस विधि में प्रश्नोत्तर, अन्वेशण, सामूहिक वाद-विवाद आदि का प्रयोग किया जाता है।

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