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अध्याय 15. इतिहास – नये विचार (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 15. इतिहास – नये विचार

परिचय
भारत एक ऐसा देश है जहाँ धार्मिक विविधता और धार्मिक सहिष्णुता को कानून तथा समाज दोनों द्वारा मान्यता प्रदान की गयी है। भारत के पूर्ण इतिहास के दौरान धर्म का यहाँ की संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में नये विचारों के उदय के कारण इसे धार्मिक आंदोलन का युग माना जाता है। लोहे के प्रयोग के कारण कृषि मूलक अर्थव्यवस्था का उदय हुआ जिससे इन धार्मिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि बनी। वैदिक धर्म के कर्मकांड और बाह्याडंबर के कारण सामान्य जनता में असंतोष व्याप्त था। इसी दौर में लोगों ने महावीर जैन एवं महात्मा बुद्ध के विचारों को आत्मसात किया।
जैन धर्म
जैन शब्द ‘जिन’ शब्द से निकला है। इसका अर्थ है: विजेता। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए। जैन धर्म के संस्थापक एवं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने जैन धर्म के व्यवस्थित रूप प्रदान किया। इनका काल महावीर स्वामी से 250 ई.पूमाना जाता है। पार्श्वनाथ, इक्ष्वाकु वंशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे। इन्होंने 30 वर्ष की अवस्था में संन्यास जीवन ग्रहण किया। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार पार्श्वनाथ को 100 वर्ष की आयु में सम्मेद पर्वत पर निर्वाण प्राप्त हुआ। महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें एवं अंतिम तीर्थंकर हुए। इनका जन्म 540 ई.पू. में कुंडग्राम (वैशाली, बिहार) में हुआ था। इनके पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक कुल के सरदार थे और माता त्रिशला लिच्छवि राजा चेटक की बहन थी। महावीर की पत्नी का नाम यशोदा था एवं पुत्री का नाम अनोज्जा प्रियदर्शनी था। प्रियदर्शनी का विवाह ‘जमालि’ नामक क्षत्रिय से हुआ, जो महावीर का प्रथम शिष्य बना था। महावीर के बचपन का नाम वर्द्धमान था। इन्होंने 30 वर्ष की अवस्था में माता-पिता की मृत्यु के उपरांत अपने बड़े भाई नंदिवर्धन से अनुमति लेकर संन्यास जीवन को ग्रहण किया था। 12 वर्ष तक कठोर तपस्या के बाद 42 वर्ष की अवस्था में महावीर को जृम्भिकग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के किनारे साल वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ। इसी समय से महावीर जिन (विजेता), अर्हत (पूज्य) और निग्रंथ (बंधनहीन)
कहलाए। महावीर ने अपना उपदेश प्राकृत भाषा में दिया था। बौद्ध साहित्य में महावीर को ‘निगण्ठनाथपुत्त’ कहा गया है। महावीर के अनुयायियों को मूलत: निग्रंथ कहा जाता था। महावीर का कहना था: ‘सभी जीव जीना चाहते हैं। सभी के लिए जीवन प्रिय है।’ प्रथम जैन भिक्षुणी नरेश दधिवाहन की पुत्री चंपा थी और चंपा नगरी जैन धर्म का मुख्य केंद्र बनी। प्राकृत भाषा में शिक्षा दिये जाने के कारण ही साधारण जन भी उनके अनुयायियों की शिक्षाओं को समझ सके। उस समय मुख्यत: व्यापारियों ने जैन धर्म का समर्थन किया। किसानों के लिए इन नियमों का पालन अत्यंत कठिन था क्योंकि फसल की रक्षा के लिए उन्हें कीड़े-मकोड़ों को मारना पड़ता था। महावीर ने अपने शिष्यों को 11 गणधरों में विभाजित किया था। इनमें से 10 गणधरों (गंधर्व) की मृत्यु महावीर के जीवन काल में ही हो गयी थी। आर्य सुधर्मा अकेला ऐसा गंधर्व था जो महावीर की मृत्यु के बाद भी जीवित रहा और जो जैन धर्म का प्रथम थेरा या मुख्य उपदेशक हुआ। महावीर तथा उनके अनुयायियों की शिक्षाएँ कई शताब्दियों तक मौखिक रूप में ही रहीं। वर्तमान रूप में उपलब्ध जैन धर्म की शिक्षाएँ लगभग 1500 वर्ष पूर्व गुजरात में वल्लभी नामक स्थान पर लिखी गयी थीं। जैन धर्म के त्रिरत्न सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक आचरण हैं। जैन धर्म में ईश्वर की मान्यता नहीं है, बल्कि आत्मा की मान्यता है।
बौद्ध धर्म
बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध थे। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। इनका जन्म 563 ई.पू. में कपिलवस्तु में लुंबिनी नामक स्थान पर हुआ था। बुद्ध क्षत्रिय थे। इनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के मुखिया थे। इनकी माता माया देवी की मृत्यु इनके जन्म के सातवें दिन हो गयी थी। इनका लालन-पालन इनकी सौतेली माँ प्रजापति गौतमी ने किया था। सिद्धार्थ का विवाह 16 वर्ष की अवस्था में यशोधरा के साथ हुआ था। जिनसे इनका एक पुत्र हुआ। इनके पुत्र का नाम राहुल था। सांसारिक वास्तविकता (बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, संन्यास) से व्यथित होकर इन्होंने 29 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग किया। बुद्ध के गृह त्याग की घटना को ‘महाभिनिष्क्रमण’ कहा गया है। गृह त्याग के बाद वे अनेक वर्षों तक भ्रमण करते रहे। उन्होंने वैशाली के आलारकलाम से सांख्य दर्शन की शिक्षा ग्रहण की। ‘आलारकलाम’ सिद्धार्थ के प्रथम गुरु हुए। विभिन्न विचारकों से मिलने के बाद अंतत: ज्ञान प्राप्ति के लिए उन्होंने स्वयं ही रास्ता ढूँढ़ने का निश्चय किया। लगातार 6 वर्ष की कठिन तपस्या के बाद बोध गया (बिहार) में एक पीपल वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जाने गये। बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दिया। इस घटना को बौद्ध धर्म ग्रंथों में धर्मचक्रप्रवर्तन कहा गया है। बुद्ध ने अपना उपदेश पालि भाषा (तात्कालिक जन साधारण की भाषा) में दिया। बुद्ध ने शिक्षा दी कि जीवन कष्टों और दुखों से भरा हुआ है और ऐसा हमारी इच्छा और लालसाओं के कारण होता है, क्योंकि मनुष्य की सारी इच्छाओं की तुष्टि संभव नहीं है। कभी-कभी हम जो चाहते हैं वह प्राप्त कर लेने के बाद भी संतुष्ट नहीं होते हैं। बुद्ध ने पैदल ही एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करने और लोगों को शिक्षा देने में व्यतीत किया। बुद्ध ने अपने सर्वाधिक उपदेश कोशल देश की राजधानी श्रावस्ती में दिये। इनके प्रमुख अनुयायी शासक थे: बिंबिसार, प्रसेनजित, उदयिन, अशोक, हर्शवर्धन आदि। बुद्ध की मृत्यु 483 ई.पू. (80 वर्ष की अवस्था में) कुशीनारा में हुई, जिसे बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा गया है। बौद्ध धर्म के बारे में हमें विशद ज्ञान त्रिपिटक (विनयपिटक, सूत्रपिटक व अभिदम्भपिटक) से प्राप्त होता है। इन तीनों में पिटकों की भाषा पालि है। बौद्ध धर्म मूलत: अनीश्वरवादी है। इसमें आत्मा की परिकल्पना नहीं है। बुद्ध ने लिप्सा को तृष्णा कहा। तृष्णा को क्षीण हो जाने की अवस्था को ही निर्वाण कहा गया है। बौद्ध धर्म के त्रिरत्न बुद्ध, धम्म एवं संघ हैं।
संघ
महावीर की तरह बुद्ध का भी मानना था कि गृह त्याग से ही सच्चे ज्ञान की प्राप्ति होगी। इसके लिए संघ का निर्माण हुआ। संघ में बौद्ध भिक्षु रहते थे। विनय पिटिका में संघ में रहने हेतु नियम वर्णित हैं। संघ में पुरुषों और स्त्रियों के रहने के लिए अलग-अलग व्यवस्था थी। सभी व्यक्ति संघ में प्रवेश ले सकते थे किंतु बच्चों को अपने माता-पिता से, दासों को अपने स्वामी से, कर्जदारों को अपने देनदारों से एवं स्त्री को अपने पति से अनुमति लेना अनिवार्य था। संघ में प्रवेश लेने के बाद सभी सादा जीवन बिताते थे। गाँवों में घर-घर जाकर भिक्षा माँगते थे। भिक्षु-भिक्षुणी आम लोगो को भिक्षा भी देते थे।
विहार
बौद्ध भिक्षु विभिन्न स्थानों का भ्रमण कर उपदेश दिया करते थे। अत: यात्रा में विश्राम के लिए विभिन्न शरण स्थल का निर्माण किया गया जिसे विहार कहा गया। बौद्ध अनुयायियों द्वारा विहार में प्रार्थना का आयोजन भी होता था। बौद्ध विहार में उच्च शिक्षा का ज्ञान दिया जाता था इनमें धार्मिक विषयों के अलावा अन्य विषय भी शामिल थे। प्राय: किसी धनी व्यापारी, राजा अथवा भू-स्वामी द्वारा दान में दी गयी भूमि पर विहार का निर्माण होता था। ‘विहार’ तुर्की शब्द है। बिहार शब्द विहार का अपभ्रंश रूप है।
उपनिषद्
बुद्ध के समान ही तत्कालिक अन्य चिंतक भी जीवन-जगत् से जुड़े कठिन प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ रहे थे। इनमें अधिकांश चिंतक जीवन को स्थामी मानते थे। वे आत्मा और ब्रह्म को समान मानते थे। उपनिषद् उत्तर वैदिक ग्रंथों का हिस्सा है। ये हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण श्रुति धर्म ग्रंथ हैं। ‘उपनिषद्’ का शाब्दिक अर्थ है: ‘गुरु के समीप बैठना।’ इन ग्रंथों के अध्यापकों और विद्यार्थियों के बीच बातचीत का संकलन है। इन वाद-विवादों में भाग लेने वाले अधिकांशत: पुरुष होते थे। कहीं-कहीं गार्गी जैसी स्त्री विचारकों का उल्लेख भी मिलता है। उपनिषद् वैदिक वांङ्मय के अभिन्न भाग ह।ैं इनमें परमश्े वर, परमात्मा, ब्रह्म और आत्मा के स्वभाव और संबंध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञान पूर्वक वर्णन दिया गया है। उपनिषदों में कर्मकांड को ‘अवर’ कहकर ज्ञान को इसलिए महत्व दिया गया है कि ज्ञान स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है। ब्रह्म, जीव और जगत् का ज्ञान पाना उपनिषदों की मूल शिक्षा है।
आश्रम व्यवस्था
प्राचीन काल में ब्राह्मण धर्म प्रचलन में था। सामाजिक व्यवस्था के दो मूल स्तंभ थे: वर्ण व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था। मनुष्य की प्रकृति, गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर मानव मात्र का वर्गीकरण चार वर्णों में हुआ था। व्यक्तिगत संस्कार के लिए उसके जीवन का विभाजन चार आश्रमों में किया गया था। ये चार आश्रम थे: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास। आश्रम शब्द का तात्पर्य जीवन के चरण से है। ब्रह्मचर्य उपनयन संस्कार के साथ प्रारंभ होकर समावर्तन के साथ समाप्त होता है। गृहस्थ जीवन मनुष्य के विवाह से प्रारंभ होता है। गृहस्थ समाज का आधार स्तंभ है। वानप्रस्थ निवृत्ति मार्ग का प्रथम चरण है। इसमें मनुष्य को जंगल में रहकर साधना करनी होती थी। प्रथम तीन आश्रमों और उनके कर्तव्यों के पालन के पश्चात् ही संन्यास ग्रहण होता था। बौद्ध और जैन सुधारणा ने आश्रम का विरोध नहीं किया किंतु प्रथम दो आश्रमों ब्रह्मचर्य और गृहस्थ की अनिवार्यता स्वीकार नहीं की।
ईरान में जरथुस्त्रवाद
जिस समय भारत में बौद्ध जैन धर्म की विचारधारा का विकास हो रहा था उसी समय ईरान में जरथुस्त्रवाद का प्रसार हो रहा था। जरथुस्त्र ईरानी पैगंबर थे, जिनकी विचारधारा का संकलन ‘जेंद अवेस्ता’ नामक ग्रंथ में मिलता है। जरथुस्त्र धर्म मुख्यत: द्वैतवादी है। जरथुस्त्र की शिक्षा का मूल सूत्र है: सद् विचार, सद् वचन तथा सद् कार्य। लगभग एक हजार वर्षों तक जरथुस्त्रवाद ईरान का प्रमुख धर्म रहा।

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