You are here
Home > Books > अध्याय 14 बच्चों मे सोचना तथा सीखना (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 14 बच्चों मे सोचना तथा सीखना (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 14 बच्चों मे सोचना तथा सीखना

बच्चे कैसे सोचते हैं?

सोचना अथवा चिंतन बालक में किसी भी वस्तु या पदार्थ के ज्ञान के साथ प्रारम्भ हो जाता है। जब कोई बालक किसी वस्तु या घटना के सम्पर्क में आता है, तो वह सोचना प्रारम्भ करता है और यह जानने का प्रयास करता है कि उक्त वस्तु या घटना क्या है? इस प्रकार कह सकते हैं कि सोचना अथवा चिंतन एक उच्च प्रकार की ज्ञानात्मक प्रक्रिया है, जो पूर्व ज्ञान, अवधारणाओं, संकल्पनाओं, निर्णयों तथा सिद्धान्तों को संगठित करने में मुख्य भूमिका निभाती है। सोचना अथवा चिन्तन का प्रारम्भ अनुभवजन्य समस्याओं, दृश्य-परिदृश्य तथा वस्तुओं पर आधारित होता है। बालक किसी वस्तु को स्पर्श कर अनुभव प्राप्त करने का प्रयास करता है। बालक मूर्त तथा अमूर्त विचारों पर चिन्तन करता है। चिन्तन अथवा सोचने की प्रक्रिया का विकास एक निश्चित क्रम में होता है। बालकों में चिन्तन प्रक्रिया निम्नानुसार होती है:
1. प्रत्यक्षीकरण के आधार पर सोचना
2. कल्पनाओं के आधार पर सोचना
3. प्रत्ययों के आधार पर सोचना
4. तर्क के आधार पर सोचना
5. अनुभव के आधार पर सोचना
6. रुचि और जिज्ञासा के आधार पर सोचना
7. अनुकरण के आधार पर सोचना

सोचने अथवा चिन्तन की विशेषताएँ

चिन्तन अथवा सोचना बालक में जीवन के दौरान आने वाली शैक्षणिक समस्याओं, वस्तुओं तथा अज्ञात तथ्यों एवं गुण-धर्मों को समझने के कारण प्रारम्भ होता है। सम्पूर्ण विश्व में अनेक समस्याएँ हैं। जब कोई बालक इन समस्याओं के सम्पर्क में आता है, तो वह चिन्तन अथवा सोचना प्रारम्भ कर देता है। चिन्तन का संबंध केवल जैविक विकास में आने वाली समस्याओं से ही नहीं, अपितु सामाजिक विकास में आने वाली समस्याओं के साथ भी है। मनुष्य का सामाजिक चिन्तन भाषा अथवा किसी क्रियाकलाप द्वारा व्यक्त होता है। सोचने का सीधा सम्बन्ध समस्याओं के समाधान से होता है। चिन्तन व्यावहारिक सक्रियता के आधार पर भी प्रकट किया जा सकता है।

सोचने का नियम

सोचने के मुख्य नियम निम्न हैं:
1. विश्लेषण: विश्लेषण से आशय किसी वस्तु या पदार्थ के विभिन्न भागों में विभाजन और वस्तु के अलग-अलग पहलुओं, तत्त्वों, भौतिक तथा रासायनिक गुण-धर्मों, सम्बन्धों आदि का पूर्ण रूप से अमूर्तकरण होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई बालक प्रयोगशाला में प्रयोग करता है, तो वह सर्वप्रथम प्रयोग में आने वाले सभी पदार्थों को एकत्रित कर उनके भौतिक तथा रासायनिक गुणधर्मों का अध्ययन करेगा, तत्पश्चात् प्रयोग के लिए
आवश्यक मात्रा में तत्त्वों का उपयोग करेगा। उसके बाद प्रयोग प्रारम्भ करने पर प्रयोग में लायी जाने वाली सभी वस्तुओं के विभिन्न पहलुओं को जानने का प्रयत्न करेगा। इस प्रकार वस्तुओं को समझने अथवा जानने के लिए बालक सोचना प्रारम्भ करता है तथा प्रयोग के समय बरती जाने वाली सावधानियों के विषय में सोचना प्रारम्भ करता है।
2 संश्लेषण: संश्लेषण विभिन्न तत्त्वों या वस्तुओं को उनके भौतिक तथा रासायनिक गुणधर्मों के आधार पर संयुक्त करके, संबंध स्थापित करने की विधि को कहते हैं। बालक सर्वप्रथम जिन वस्तुओं को देखता है वह उसकी तुलना पूर्व में देखी हुई किसी अन्य वस्तु के साथ करना प्रारम्भ कर देता है और उनके मध्य एक उचित सम्बन्ध स्थापित करने के लिए सोचना प्रारम्भ कर देता है। तुलना करने पर बालक को यह ज्ञात होता है कि वस्तु अथवा घटना में क्या समान है या क्या असमान? संश्लेषण में बालक विभिन्न तत्त्वों को आपस में जोड़कर या सम्बन्ध स्थापित कर एक पूर्ण वस्तु बनाने का भी प्रयास कर सकता है। इस तरह की गयी तुलना सामान्यीकरण की ओर ले जाती है।
3. सामान्यीकरण: सामान्यीकरण पूर्व में किया गया विभिन्न वस्तुओं के विश्लेषण का परिणाम होता है। सामान्यीकरण में तुलनात्मक विशेषताओं का वर्णन तथा व्याख्यान किया जाता है। सामान्यीकरण मुख्यत: दो प्रकार का होता है: (1) साम्य मूलक, (2) बुनियादी साम्य मूलक। साम्य मूलक किसी भी वस्तु की बाह्य बनावट पर निर्भर करता है। जबकि बुनियादी साम्य मूलक वस्तु के रासायनिक तथा भौतिक गुणधर्मों पर निर्भर करता है।

सोचने के भेद

सामान्य रूप से मनोविज्ञान में सोचने को निम्न तीन रूपों में विभक्त किया गया है:
1. संवेदी-क्रियात्मक चिंतन: बालक जन्म के पश्चात् संवेदी क्रियाओं के आधार पर चिंतन प्रारम्भ करता है। संवेदी क्रियाओं से आशय बालक जीवन के प्रारम्भ में वस्तुओं को अपने हाथों से, व्यावहारिक रूप से उलट-पलट कर, जोड़-तोड़ कर उनके मध्य संश्लेषण अथवा विश्लेषण के माध्यम से संबंध स्थापित करने की कोशिश करता है। शैशवावस्था में प्रत्येक बच्चा दिये गये खिलौने को तोड़कर यह जानने का प्रयास करता है कि खिलौनों के अन्दर क्या है? इस प्रकार यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि बालक प्रारम्भ से ही व्यावहारिक रूप से समस्याओं को हल करने का प्रयत्न और प्रयास करता है। यहीं से बालक में सोचने की क्रिया का आरम्भ होता है।
2. बिंबात्मक चिंतन: बिंबात्मक चिन्तन से आशय बालक द्वारा किसी भी वस्तु को बिना छुए, वस्तु का एक छाया चित्र बना लेने से होता है। स्कूल में जाने वाले बच्चे केवल चित्रों तथा बिम्बों के माध्यम से ही सोच सकते हैं।
3. अमूर्त चिन्तन: अमूर्त चिंतन बालकों में संवेदी-क्रियात्मक चिन्तन तथा बिंबात्मक चिन्तन को पूर्णत: समाप्त कर देता है। अमूर्त चिंतन का विकास अमूर्त अवधारणाओं के संबंध में सोचने के साथ प्रारम्भ होता है। अमूर्त चिंतन को संकल्पनाओं तथा तर्कों के रूप में भी व्यक्त कर सकते हैं।

बच्चे किस प्रकार सीखते हैं?

सीखना एक ऐसी प्रक्रिया है जो जीवनपर्यन्त व्यवहारों में परिवर्तन के रूप में चलती रहती है। व्यवहार में परिवर्तन के आधार पर व्यक्ति जीवनपर्यन्त कुछ न कुछ सीखता रहता है।
फ्रेडसन के अनुसार, ”सीखना, अनुभव या व्यवहार में परिवर्तन है। अनुभव के आधार पर बालकों के व्यवहार में परिवर्तन अधिगम को निरूपित करता है।’’
वुडवर्थ के अनुसार, ”सीखना विकास की प्रक्रिया है।’’
स्किनर के अनुसार, ”सीखना व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है।’’
क्रो एवं क्रो के अनुसार, ”सीखना, आदतों, ज्ञान एवं अभिव्यक्तियों का अर्जन है। इसमें कार्यों को करने के नवीन तरीके सम्मिलित हैं और इसकी शुरुआत व्यक्ति द्वारा किसी भी बाधा को दूर करने अथवा नवीन परिस्थितियों में अपने समायोजन को लेकर होती है। इसके माध्यम से व्यवहार में परिवर्तन होता रहता है। यह व्यक्ति को लक्ष्य को पाने में समर्थ बनाती है। इस प्रकार कह सकते हैं कि बालकों में सीखना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें प्रशिक्षण तथा अनुभव के माध्यम से बालक के व्यवहार में स्थायी परिवर्तन, सीखना कहलाता है। बालक जीवन में विद्यालय, समाज तथा स्वयं की गतिविधियों के माध्यम से सीखता है। समाज तथा विद्यालय बालक को सीखने के समस्त उचित अवसर उपलब्ध कराते हैं। अधिगम या सीखने के महत्त्वपूर्ण पहलुओं में से एक है, सोचना। तर्क, विवेचना तथा कार्य आदि अन्य भी बालक के सीखने की क्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

बच्चों में सीखने के नियम

अमेरिकी प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ई.एल. थार्नडाइक ने सीखने के नियमों को दो भागों में विभक्त किया है, जो निम्न हैं:
मुख्य नियम
बच्चों में सीखने के मुख्य नियम को अग्र तीन भागों में विभक्त किया गया है:
1. तत्परता का नियम: इस नियम का आशय यह है कि अधिगम की प्रक्रिया तभी प्रारम्भ हो सकती है, जब बालक अधिगम के लिए तैयार तथा तत्पर हो। बालक की तत्परता मानसिक तथा शारीरिक दोनों रूपों में होनी चाहिए। इस नियम से इतना तो स्पष्ट है कि बिना तत्परता के कोई भी छात्र या बालक कुछ भी नहीं सीख पाएगा।
2. अभ्यास का नियम: इस नियम के अनुसार बालक को अभ्यास के माध्यम से कठिन से कठिन कार्य का अधिगम कराया जा सकता है। यह नियम दो भागों में विभक्त है –
(i) उपयोग का नियम: इस नियम के अनुसार, अधिगम अभ्यास के माध्यम से मजबूत बनता है।
(ii) अनुपयोग का नियम: इसके अनुसार यदि बालक किसी भी सीखे हुए कार्य की पुनरावृत्ति नहीं करता है, तो वह उस किये हुए कार्य को एक निश्चित समय के बाद भूल सकता है।
3. प्रभाव का नियम: इस नियम के अनुसार, जिस कार्य का बालक पर प्रभाव अधिक पड़ता है, वह उस कार्य को सीखने का स्वयं प्रयत्न करता है। जिस कार्य में बालक की रुचि नहीं होती है, वह उस कार्य को करना पसंद नहीं करता है। इस नियम को पुरस्कार तथा दण्ड का नियम भी कहते हैं।
गौण नियम
बच्चों के सीखने के नियमों के अन्तर्गत सीखने के गौण नियम को अग्र पाँच भागों में विभक्त किया गया है:
1. बहुअनुक्रिया नियम: बच्चों के सीखने में बहुअनुक्रिया नियम से आशय यह है कि कोई भी बालक समस्या का हल ढूँढ़ने के लिए अनेक क्रियाएँ करता है और वह इन प्रतिक्रियाओं को तब तक करता रहता है जब तक कि उस समस्या का हल नहीं मिल जाता है। इस प्रकार समस्या का हल मिल जाने पर बालक को सुख प्राप्त होता है। थार्नडाइक का प्रयत्न तथा भलू सिद्धान्त इसी नियम पर आधारित है।
2. मानसिक विन्यास का नियम: मानसिक विन्यास के नियम का आशय बालक की मानसिक स्थिति से है। यदि बालक किसी भी समस्या का हल सीखने के लिए मानसिक रूप से तैयार है, तो वह उस समस्या का हल आसानी के साथ सीख सकता है। यदि बालक मानसिक रूप से तैयार नहीं है, तो कितने भी प्रयास कर लीजिए, बालक उस समस्या के हल का अधिगम नहीं कर सकता है।
3. आंशिक क्रियाओं का नियम: इस नियम में बालक किसी समस्या को सुलझाने के लिए अनेक क्रियाएँ करता है, फिर अपनी सूझ-बूझ की सहायता से आंशिक क्रिया के माध्यम से किसी भी दी गयी समस्या का हल ढूँढ़ लेता है।
4. समानता का नियम: यदि किसी बालक ने पूर्व में अधिक से अधिक समस्याओं को हल कर रखा है, तो किसी भी नयी समस्या के आने पर वह समानता के आधार पर उस समस्या का हल ढूँढऩ े का प्रयत्न करता है। यह समानता का नियम कहलाता है। इस नियम में बालक स्वत: ही समस्या का हल ज्ञात करने का प्रयत्न करता है।
5. साहचर्य परिवर्तन का नियम: इस नियम में बालक पूर्व प्राप्त अनुभव तथा ज्ञान का उपयोग अन्य सहचारी समस्याओं के प्रति करने लगता है। इसमें बालक वास्तविक समस्या के होने पर तो व्यवहार करता ही है, परन्तु कभी समान (पूर्वघटित) समस्या का आभास होने पर भी वैसा ही व्यवहार करता है।

बच्चों में सीखने के प्रकार

बच्चों में सीखने के प्रकारों का विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अलग-अलग वर्णन किया है:
1. अभिग्रहण सीखना: इसमें बालक को अधिगम सामग्री लिखकर या बोलकर दे दी जाती है। इसके बाद बालक इसका उपयोग कर स्वयं सीख लेता है।
2. अन्वेषण सीखना: इस प्रक्रम में बालक को ऐसी अधिगम सामग्री प्रदान की जाती है, जिसे बालक पढ़कर या सीखकर किसी नये सम्प्रत्यय, विचार या नियम को सीखता है। यह प्रक्रम छात्रों के अधिगम के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है।
3. रट कर सीखना: यहाँ पर बालक को किसी भी विषय से संबंधित अधिगम सामग्री प्रदान कर दी जाती है और बालक को निर्देश दिया जाता है कि वह इस अधिगम सामग्री का अध्ययन रट कर करेगा।
4. अर्थपूर्ण सीखना: यहाँ पर बालक विषय वस्तु के प्रति अर्थपूर्ण अधिगम प्राप्त करता है। अर्थपूर्ण अधिगम से आशय है कि जिस भी समस्या को बालक हल कर रहा है, वह उस समस्या के आने के कारणों से लेकर समस्या के हल हो जाने तक के सभी पहलुओं पर निरन्तर नजर रखता है।

बच्चों में अधिगम प्रक्रिया की विशेषताएँ

बच्चों में सीखने या अधिगम प्रक्रिया की निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए:
1. अधिगम या सीखना शिक्षा प्राप्त करने की एक प्रक्रिया है। सीखने की यह प्रक्रिया जीवन पर्यन्त निरन्तर चलती रहती है।
2. बच्चों को किसी भी विषय या समस्या का हल खोजने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए, अधिगम या सीखने की प्रक्रिया सक्रिय प्रक्रिया है।
3. बच्चों को किसी भी विषय के अधिगम के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। दिये गये विषय का चुनाव इस प्रकार होना चाहिए कि बालक को विषय का अधिगम करते समय थकान नहीं महसूस होनी चाहिए।
4. अधिगम या सीखने के कई स्तर होते हैं। सीखने की प्रक्रिया लक्ष्य के अनुरूप होनी चाहिए। यह एक सामूहिक प्रक्रिया है।
5. अधिगम की प्रक्रिया का सापेक्षिक आधार होना चाहिए। अधिगम या सीखने की प्रक्रिया में सजगता एवं ध्यान से गहरा सम्बन्ध होता है।
6. सीखने की प्रक्रिया में समायोजन एक महत्त्वपूर्ण कारक है।
7. बच्चों या बालकों में सीखने की प्रक्रिया ज्ञात से अज्ञात की ओर तथा सरल से जटिल की ओर होती है। बच्चों को किसी भी विषय में पकड़ बनाने के लिए, उन्हें बार-बार अभ्यास के लिए प्रेरित करना चाहिए।
8. बालक को अभ्यास के लिए या सीखने के लिए निरन्तर अभिप्रेरित करना चाहिए, जिससे बालक उस समस्या अथवा विषय में निपुणता प्राप्त कर सके।

बच्चों में सीखने की प्रक्रिया से संबंधित समस्याएँ

1. अध्यापक की शिक्षण विधि: शिक्षण प्रक्रिया के दो महत्त्वपूर्ण तत्त्व शिक्षक तथा छात्र हैं। यदि अध्यापक की शिक्षण विधि अनुकूल नहीं है, तो छात्रों को विषय के अधिगम या सीखने में कठिनाई का अनुभव होता है। शिक्षक की शिक्षण विधि का सीधा प्रभाव बालक के सीखने की प्रक्रिया पर पड़ता है। इस कारण बालक विषय में ऊबने लगते हैं।
2. अनुकूल वातावरण: बच्चों में सीखने की प्रक्रिया का सबसे अहम कारक अनुकूल वातावरण का होना है। अनुकूल वातावरण मिलने पर बालक स्वयं अधिगम के लिए प्रेरित होता है। इसीलिए अनुकूल वातावरण की उपलब्धता नहीं होना भी बालक की सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है।
3. अभ्यास की कमी: यदि बालक किसी भी कार्य या क्रिया को सीख लेता है और फिर उस कार्य या क्रिया का अभ्यास नहीं करता है, तो सीखी गयी सभी विधियाँ वह भूल सकता है तथा इसका सीधा प्रभाव बच्चों या बालकों के प्रदर्शन पर पड़ता है।
4. तत्परता की कमी: तत्परता से आशय बालक की सीखने की प्रबल इच्छा से है। यदि बालक किसी कार्य को सीखने के लिए तत्पर नहीं है, तो उस समय बालक को सिखाया गया ज्ञान व्यर्थ जा सकता है। इसीलिए बालक में तत्परता का अभाव भी सीखने की प्रक्रिया पर प्रभाव डालता है।
5. शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य: सीखने की प्रक्रिया का दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण कारक शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य है। यदि बालक का शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य अच्छा है, तो बालक किसी भी समय सीखने के लिए तैयार रहेगा और उसकी सीखने में रुचि रहेगी।
6. बौद्धिक क्षमता: बालक का बौद्धिक स्तर भी सीखने की प्रक्रिया का निर्धारण करने में सहायक होता है। यदि बालक का बौद्धिक स्तर सामान्य से कम है, तो वह किसी भी विषय का अधिगम आसानी से नहीं कर पाएगा। इसीलिए बच्चों को सिखाते समय उनके बौद्धिक स्तर का भी ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है।
7. उचित प्रेरणा तथा मार्गदर्शन की कमी: बच्चों के सीखने में शिक्षक तथा माता-पिता के मार्गदर्शन की उचित आवश्यकता होती है। उचित प्रेरणा बच्चों के सीखने में सहायक सिद्ध होती है। मार्गदर्शन तथा उचित प्रेरणा का अभाव बालक के सीखने के प्रक्रम में अवरोध उत्पन्न कर सकता है।

Top
error: Content is protected !!