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अध्याय 13 प्रतिभाशाली, सृजनात्मक तथा विशिष्ट बालकों की पहचान (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 13 प्रतिभाशाली, सृजनात्मक तथा विशिष्ट बालकों की पहचान

प्रतिभाशाली बालक

प्रतिभाशाली बालक से तात्पर्य ऐसे बालकों से है जो अपनी शैक्षिक उपलब्धियों, क्रियाओं तथा अपनी क्षमताओं के आधार पर विद्यालय में उच्च स्थान प्राप्त कर लेते हैं। इन बालकों की मानसिक क्षमता सामान्य बालकों की मानसिक क्षमता से अधिक होती है।
पॉल विट्टी के अनुसार, “प्रखर बुद्धि बालक वह है जो किसी कार्य को करने के प्रयास को निरंतर उच्च स्तर पर बनाये रखता है।”
कॉलसनिक, “वह बालक जो अपनी आयु-स्तर के बालकों में किसी योग्यता में अधिक हो और जो हमारे समाज के लिए कुछ महत्वपूर्ण नई देन दे।”
टर्मन के अनुसार, “प्रतिभावान बालक शारीरिक विकास, शैक्षणिक उपलब्धि, बुद्धि और व्यक्तित्व में वरिष्ठ होते हैं।”
प्रतिभावान बालकों के अंतर्गत उच्च बुद्धि वाले बालकों के साथ-साथ उन सभी अन्य बालकों को सम्मिलित किया जाता है जो किसी भी क्षेत्र में विशेष योग्यता रखते हैं जैसे खेल, कला, साहित्य तथा काव्यरचना आदि।

प्रतिभाशाली बालकों की विशेषताएँ

प्रतिभाशाली बालकों की कुछ मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं
बुद्धिलब्धि
प्रतिभाशाली बालकों की बुद्धिलब्धि 120 से अधिक होती है।
टर्मन ने प्रतिभाशाली बालकों पर अध्ययन कर ज्ञात किया कि इस प्रकार के बालकों की बुद्धिलब्धि 140या इससे अधिक होती है। अन्य सभी वैज्ञानिक भी 120 या 140 से अधिक बुद्धिलब्धि वाले छात्रों को ही प्रतिभाशाली बालक मानते हैं।
शारीरिक विकास
प्रतिभाशाली बालकों का शारीरिक विकास अन्य बालकों की तुलना में अच्छा होता है। उनका स्वास्थ्य अच्छा रहता है। ऐसे बालकों का भावात्मक तथा मानसिक विकास भी अन्य बालकों की तुलना में उच्च कोटि का होता है।
अभिरुचियाँ
प्रतिभाशाली बालकों में सीखने की गति अधिक होती है। इन बालकों की स्मरण शक्ति उच्च स्तर की होती है। ऐसे बालकों में अच्छी पुस्तकों को समझने की प्रवत्ति अधिक होती है। ये छात्र अमूर्त विषयों को सीखने में भी अधिक रूचि लेते हैं।
सामाजिकता
प्रतिभाशाली बालकों का सामाजिक चरित्र भी उच्च स्तर का होता है। ये बालक सामाजिक गुणों का आदान-प्रदान सरलता से कर लेते हैं और समाज तथा सामजिक कार्यों में सरलता से सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं।
अन्य महत्वपूर्ण विशेषताएं
प्रतिभाशाली बालकों में किसी भी विषय को सीखने की गति तथा उस विषय से संबधित प्रश्न तथा उत्तर देने की गति तीव्र होती है।
► प्रतिभाशाली बालकों का दृष्टिकोण वैज्ञानिक होता है।
► प्रतिभाशाली बालक जीवन में घटित होने वाली सभी घटनाओं का बारीकियों से निरीक्षण करते हैं तथा विचार करते हैं।
► ये बालक खेल कूद में उत्कृष्ट होते हैं।
► पाठ्क्रम सम्बन्धी गतिविधियों तथा क्रियाकलापों में अत्यधिक उत्सुकता से भाग लेते हैं।
► प्रतिभाशाली बालक आत्मविश्वासी होते हैं।
► अन्य सभी छात्रों अथवा मित्रों से मधुर सम्बन्ध बनाकर रखते हैं।
► वातावरण तथा प्राकृतिक क्रियाओं के प्रति प्रतिभाशाली बालकों का व्यवहार अच्छा होता है।
► कक्षा में अध्ययन के क्षेत्र में उच्च श्रेणी प्राप्त करते हैं।

प्रतिभाशाली बालकों की पहचान

प्रतिभाशाली बालकों की पहचान करना माता-पिता, अध्यापक, संगी साथी एवं अन्य लोगों का एक सामूहिक प्रयास होना चाहिए। ऐसे प्रतिभाशाली बालकों की पहचान निम्न आधारों पर की जा सकती है:

बौद्धिक एवं शैक्षिक प्रदर्शन के आधार पर

प्रतिभाशाली बालकों की पहचान बौद्धिक एवं शैक्षिक प्रदर्शन के आधार पर की जा सकती है। शिक्षक को प्रतिभावान बालकों की पहचान करने के लिए, बालकों के व्यक्तित्व के बारे में अन्य लोगों से भी सूचनाएँ एकत्र करनी चाहिए। इन बालकों का बुद्धि स्तर 120 या 140 से अधिक होता है। प्रतिभाशाली बालक पाठ को सरलता एवं आसानी से सीख लेते हैं। ये छात्र कठिन से कठिन समस्या को आसानी से हल कर लेते हैं। इनका बुद्धि स्तर सामान्य बुद्धि के बालकों से उच्च होता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा सामाजिक दृष्टिकोण

प्रतिभाशाली बालकों का किसी भी शैक्षिक तथा सामाजिक समस्या के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण होता है। ये वैज्ञानिक तथा तार्किक ढंग से सोचकर ही किसी कार्य को करते हैं। इनका दृष्टिकोण इतना स्पष्ट होता है कि ये सभी समस्याओं को आसानी से हल कर लेते हैं। ये किसी भी सामाजिक समस्या के लिए जोखिम उठा सकते हैं।

प्रतिभाशाली बालकों की शिक्षा

प्रतिभाशाली बालकों की शिक्षा के लिए निम्न शैक्षिक व्यवस्था को अपनाया जाना चाहिए:

विशेष कक्षाएँ तथा विद्यालय

प्रतिभाशाली बालकों की शिक्षा के लिए विशेष कक्षाएँ तथा विद्यालय का प्रबंध करना चाहिए। विशेष कक्षाओं से आशय विद्यालय में एक अतिरिक्त कक्षा का आयोजन करने से हैं जिसमें वे सभी छात्र अपनी समस्याओं को शिक्षक से पूछ सकें। इन छात्रों के लिए अतिरिक्त क्रियाकलाप, प्रायोगिक कार्य तथा विस्तृत पाठ्यक्रम की व्यवस्था करनी चाहिए। इन छात्रों को पाठ्यक्रम के अतिरिक्त अन्य पाठ्यक्रम सम्बन्धी कार्य देना चाहिए जिससे वे अपनी बुद्धिलब्धि का समुचित उपयोग कर सकें।

गतिवर्धन

प्रतिभाशाली बालक का अपनी आयु के समान अन्य बालकों की अपेक्षा अधिक आसानी से पाठ को समझना, समस्या को हल कर लेना तथा शीघ्रता से पूरा कर लेना छात्र में गतिवर्धन के गुण को प्रदर्शित करता है। इस तरह से प्रतिभावन बालकों को गतिवर्धन का लाभ निम्न क्षेत्रों में मिल सकता है:
► प्रतिभाशाली बालक को तय की गई आयु से पूर्व विद्यालय में प्रवेश दे देना।
► तय किए गए समय से कम समय में किसी भी पाठ्यक्रम को उत्तीर्ण करने की अनुमति देना।

संवर्धित पाठ्यक्रम

संवर्धित पाठ्यक्रम से तात्पर्य ऐसे पाठ्यक्रम से होता है जो अनुभवों तथा विविधतापूर्ण क्रियाकलापों एवं प्रायोगिक कार्यों पर आधारित होता है। पाठ्यक्रम संवर्धन दो विधियों से किया जा सकता है:
1. व्यक्तिगत
2. समूहोन्मुख

सृजनात्मक बालक

सृजनात्मकता एक ऐसी अवधारणा है, जिसमें उपलब्ध साधनों के माध्यम से छात्र नवीन या अनजानी वस्तु, विचार या धारणाओं को जन्म देता है। सृजनात्मकता का अर्थ है- किसी नवीन खोज या अविष्कार की रचना करना। इसका सीधा सम्बन्ध नवीन खोज से होता है। सृजनशील बालकों में संवेदनशीलता तथा स्वायत्तता अधिक पाई जाती है।
स्टेन के अनुसार, जब किसी कार्य का परिणाम उत्तम हो जो किसी निश्चित समय पर उचित या उपयोगी या संतोषप्रद स्वीकार किया जाए तो वह सृजनात्मक कार्य कहलाता है।
बैरन के अनुसार, पूर्व में विद्यमान पदार्थों या तत्वों को मिलाकर नया योग बनाने की क्षमता ही सृजनशीलता है।
जेम्स ड्रेवर के अनुसार, अनिवार्य रूप से किसी नई वस्तु का सृजन करना ही सृजनात्मकता कहलाता है।

बालकों के लिए सृजनात्मकता का महत्व

बालकों के लिए सृजनात्मकता का अत्यधिक महत्व है। सृजनात्मकता के माध्यम से बालकों को न केवल संतोष ही प्राप्त होता है बल्कि बालक को इससे व्यक्तिगत संतोष भी प्राप्त होता है। सृजनशील बालकों का दृष्टिकोण सामान्य बालकों से भिन्न होता है। सृजनशील बालकों में हँसी मजाक करने की तथा मौलिक रचनात्मकता की प्रवृत्ति पाई जाती है। सृजनशील बालकों में एक से अधिक विचारों पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता होती है। इसमें बालक किसी समस्या का निर्णय स्वयं कर सकता है।

सृजनात्मकता के परीक्षण

बालकों में सृजनशीलता की पहचान करने के लिए अनेक परीक्षणों का निर्माण किया गया है। इन परीक्षणों के माध्यम से निरंतरता, लोचनीयता, मौलिकता तथा विस्तारता आदि का मापन करते हैं। प्रमुख परीक्षण निम्नलिखित हैं:
वृत्त-परीक्षण: इस परीक्षण में वृत्त में चित्र बनाए जाते हैं।
चित्र-पूर्ति परीक्षण: चित्र पूर्ति परीक्षण में अधूरे चित्रों को पूर्ण करना पड़ता है।
प्रोडक्ट इम्प्रूवमेंट टास्क: इसमें दिए गये खिलौने के माध्यम से छात्रों को अपने नवीन विचारों के माध्यम से उनमें नवीनता का सृजन करना होता है।

सृजनात्मक बालकों के लिये शैक्षिक कार्यक्रम

सृजनात्मक बालकों के लिए निम्न शैक्षिक कार्यक्रम लागू करना चाहिए:
पाठ्यक्रम
बालकों में सृजनशीलता को बढ़ावा देने के लिए शैक्षणिक पाठ्यक्रम को विशिष्ट बनाना जरुरी है। पाठ्यक्रम का निर्धारण सामान्य तथा विशिष्ट बालकों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम में कुछ क्रियाकलापों तथा प्रयोगों को शामिल करना चाहिए। पाठ्यक्रम में नवीन अन्वेषणों को बढ़ावा देने के लिए विशेष वाक्यों या समस्याओं को शामिल करना चाहिए। इन समस्याओं का हल ढूंढ़ने से छात्रों के विचारों में नवीनता आएगी।
अवरोधक तत्वों को समाप्त करने की कोशिश करना
बालकों में सृजनशीलता को बढ़ावा देने के लिए शिक्षक को अवरोधक तत्वों को समाप्त करने की कोशिश करनी चाहिए। प्रमुख अवरोधक तत्व सामजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक तथा चारित्रिक हैं। तकनीकी अवरोधक तत्वों को भी समाप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।
शैक्षिक साधन तथा सहायक सामग्री
बालकों में सृजनशीलता को बढ़ावा देने के लिए विशेष शैक्षिक साधन तथा सहायक सामग्री की भी व्यवस्था करनी चाहिए। विशेष शैक्षिक साधन से अभिप्राय दृश्य तथा श्रव्य सामग्री से है दृश्य सामग्री के अंतर्गत टी वी, फिल्म तथा कम्प्यूटर आदि आते हैं। श्रव्य सामग्री के अंतर्गत रेडियो, टेपरिकॉर्डर तथा ग्रामोफोन आदि आते हैं। दृश्य तथा श्रव्य सामग्री का प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में छात्रों को विषय के सम्पूर्ण ज्ञान देने के उद्देश्य से किया जाता है। दृश्य तथा श्रव्य सामग्री की सहायता से छात्रों को किसी भी विषय का व्याख्यान कक्षा समाप्त होने के बाद भी सुनने या देखने में सहायता मिलती है। कम्प्यूटर का उपयोग शिक्षा के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुआ है। कम्प्यूटर की सहायता से छात्र किसी भी विषय के बारे में किसी भी समय बैठे-बैठे सूचनाएँ प्राप्त कर सकता है। कम्प्यूटर की सहायता से छात्रों की क्रियाओं तथा विषय से सम्बधित जानकारी का आसानी से अवलोकन किया जा सकता है। कम्प्यूटर की सहायता से परीक्षाओं का आयोजन किया जा सकता है। परीक्षा में सम्मिलित विद्यार्थियों का सम्पूर्ण विवरण कम्प्यूटर पर सुरक्षित रखा जा सकता है। शिक्षकों से सम्बधित सम्पूर्ण जानकारी को भी कम्प्यूटर में सेव किया जा सकता है।

मंद बुद्धि बालक

मंद बुद्धि वाले छात्रों में अधिगम निष्पत्ति, निम्न बुद्धि वाले छात्रों की तुलना में कम होती है। इन छात्रों में कोई शारीरिक दोष नहीं होता है। ये छात्र कक्षा में स्वयं को उचित रूप से समायोजित नहीं कर पाते हैं। मंद बुद्धि बालक कक्षा में सदा ही पिछड़े रहते हैं। मंद बुद्धि वाले छात्रों को निम्नलिखित व्यवहारों की सहायता से पहचाना जा सकता है:
► मंद बुद्धि वाले छात्रों की शैक्षिक उपलब्धियों का स्तर निम्न होता है।
► मंद बुद्धि वाले छात्रों के ध्यान में एकाग्रता की कमी होना, जल्दी भूलने की आदत अथवा कुछ समय पहले पढ़े हुए पाठ को याद नहीं रख पाना।
► मंद बुद्धि वाले छात्रों में विचार शक्ति की कमी होती है तथा ये मूर्त पाठ्य पर अधिक निर्भर रहते हैं।
► मंद बुद्धि वाले छात्र अधिकांशत: असफल होने के भय से ग्रसित रहते हैं तथा त्वरित पुरस्कार एवं परिणाम की आशा करते हैं।
► इन छात्रों में आत्मविश्वास की अत्यधिक कमी होती है। ये छात्र स्पष्ट सम्प्रेषण करने में भी संकोच करते हैं।
► मंद बुद्धि बालकों में आत्मशक्ति के अवलोकन का अभाव होता है।
► मंद बुद्धि बालकों को किसी भी विषय को समझने में कठिनाई का अनुभव होता है।
► मंद बुद्धि बालकों में चिंतन, विश्लेषण तथा तर्क शक्ति का अभाव होता है। ये छात्र किसी भी विषय को न तो सरलता से समझ पाते हैं और न ही आसानी से सीख पाते हैं।
► इन छात्रों को स्वयं से संबंधित कार्यों को भी करने में समस्या आती है।
► मंद बुद्धि बालक तथ्यों को समझे बिना सिर्फ रटने का प्रयास करने लगते हैं। ये छात्र कक्षा के क्रियाकलापों से संबंधित कार्यों में रूचि नहीं लेते हैं।

मंद बुद्धि छात्रों का शिक्षण

मंद बुद्धि छात्रों को किसी भी विषय को प्रायोगिक विधियों के माध्यम से समझने में कठिनाई होती है। इसलिए ऐसे छात्रों को मूर्त उदाहरणों के माध्यम से समझाना उचित होगा। इन छात्रों को पाठ छोटे-छोटे प्रकरणों में विभक्त कर पढ़ाना चाहिए। मंद बुद्धि छात्रों का ध्यान बार-बार पाठ के महत्वपूर्ण बिंदुओं की ओर खींचना पड़ता है। छात्रों में परीक्षा में असफल होने का भय रहता है। छात्रों को सीखे गए विषय के लिए तत्काल फीडबैक देना अच्छा रहता है। मंद बुद्धि छात्रों को सम्प्रेषण कौशल भी सीखना चाहिए। शिक्षक को कक्षा में होने वाले क्रियाकलापों को इस प्रकार से चुनना चाहिए कि जिसमें कक्षा में उपस्थित सभी विद्यार्थी भाग ले सकें। पाठ्यक्रम का विभाजन सरल से जटिल की तरफ होना चाहिए। मंद बुद्धि छात्रों का ध्यान शिक्षक को रखना चाहिए। इन छात्रों में विषय तथा भविष्य के लिए आत्मविश्वास जाग्रत करना चाहिए। कक्षा में विषय प्रकरण को इस प्रकार पढ़ाना चाहिए जिससे कक्षा में मंद बुद्धि छात्रों की विषय में एकाग्रता बनी रहे।

पिछड़े बालक

पिछड़े बालक उन बालकों को कहा जाता है जो शिक्षा प्राप्त करने में अपनी आयु के अन्य बालकों से पिछड़ जाते हैं वे सभी बालक जो अन्य बालकों से अध्ययन की गति में पीछे छूट जाते हैं, पिछड़े बालकों के अंतर्गत आते हैं।
सिरिल बर्ट के अनुसार, पिछड़े बालक से तात्पर्य उन बालकों से है जिनकी बुद्धि लब्धि 85 से कम है।
टी ए के मेनन के अनुसार, पिछड़े बालक वे बालक हैं जिनकी आयु कक्षा की औसत आयु से 1 वर्ष से अधिक हो। पिछड़े बालक का मंद बुद्धि होना आवश्यक नहीं है।

पिछड़े बालकों की पहचान

► पिछड़े बालकों की सीखने की गति कम होती है।
► पिछड़े बालकों में समाज विरोधी कार्यों में तेजी से संलिप्त होने की प्रवत्ति होती है तथा अन्य बालकों के प्रति व्यवहार अभिव्यक्ति की समस्या होती है।
► पिछड़े बालक मानसिक रूप से अस्वस्थ्य भी हो सकते हैं। इन बालकों का व्यवहार सामान्यत: समाज में असमायोजित होता है।
► पिछड़े बालकों की शैक्षिक उपलब्धि समान आयु के अन्य छात्रों की तुलना में कम होती है।
► पिछड़े बालक किसी भी विषय पर अधिक देर तक ध्यान केंद्रित कर अध्ययन नहीं कर पाते हैं।
► पिछड़े बालक आमतौर पर कक्षा की शैक्षणिक गतिविधियों का उचित लाभ नहीं उठा पाते हैं।

बालकों में पिछड़ने या शैक्षिक मंदता के कारण

सामान्य रूप से बालकों में शैक्षिक मंदता के निम्न कारण माने जाते हैं:
विद्यालय वातावरण कुछ स्कूल तथा विद्यालय ऐसे होते हैं, जहाँ पर बालक को शिक्षा देने का कार्य उचित ढंग से नहीं होता है। इस कारण बालकों की मानसिक शक्ति कम हो जाती है। विद्यालय में शैक्षिक माहौल न होने के कारण बालकों के जीवन में अनुशासनहीनता, अध्ययन से दूरी तथा आत्मविश्वास एवं प्रेरणा में कमी आती है।
मानसिक कारण
मानसिक बुद्धि भी पिछड़ेपन का कारण है। मानसिक बुद्धिलब्धि से आशय अपनी आयु के अन्य बालकों से कम बुद्धिलब्धि का होना है। बर्ट ने अपने अध्ययन में पाया कि सभी पिछड़े बालकों की बुद्धिलब्धि सामान्य आयु के बालकों से कम थी। अत: स्पष्ट है कि मानसिक कारण बालकों में पिछड़ेपन का प्रमुख कारण है।
शारीरिक कारण
शारीरिक कारण भी बालकों में पिछड़ने या शैक्षिक मंदता का कारण हो सकता है। शारीरिक कारण से अभिप्राय शारीरिक अपंगता, विकलांगता, कम सुनाई या दिखाई देना तथा पढ़ने लिखने में परेशानी होना आदि से है। शारीरिक दोष होने के कारण बालक स्वयं को अन्य बालकों की अपेक्षा कमतर महसूस करने लगता है जिससे बालक अध्ययन में पिछड़ने लगता है। उस प्रकार शारीरिक कारण भी पिछड़ेपन का एक कारण है।

पिछड़े बालकों की शैक्षिक समस्या के निवारण के उपाय

बालकों में पिछड़ेपन का कोई एक निश्चित कारण नहीं है। बालकों में पिछड़ेपन की समस्या के कारण का पता लगाकर उस समस्या का निवारण संभव हो सकता है। पिछड़े बालकों की शैक्षिक समस्या के निवारण के उपाय निम्न हो सकते हैं:
पाठ्यक्रम
बालकों में पिछड़ेपन की समस्या का कारण पाठ्यक्रम भी हो सकता है। इस कारण बालकों के लिए उनकी योग्यता को ध्यान में रखते हुए अनुकूल पाठ्यक्रम तैयार करना चाहिए। पाठ्यक्रम में ऐसी गतिविधियों को शामिल करना चाहिए जिसमें कक्षा के सभी बालक आसानी तथा सक्रियता से भाग ले सकें। पिछड़े बालकों के लिये दृश्य अथवा श्रव्य सामग्री का प्रयोग करना अत्यंत आवश्यक है। पिछडे बालक पुस्तकीय ज्ञान में अत्यधिक रूचि नहीं दिखाते। इसलिए ऐसे छात्रों के लिए करके सीखना शिक्षण विधि अत्यधिक उपयोगी साबित होती है।
विशिष्ट विद्यालयों तथा कक्षाओं की स्थापना
पिछड़े बालकों के लिए विशिष्ट विद्यालयों तथा कक्षाओं की स्थापना करनी चाहिए। यदि पिछड़े बालक सामान्य बालकों के साथ शिक्षा देने से अक्सर पिछड़ जाते हैं तो विशिष्ट विद्यालयों में छात्रों को अपने अनुकूल वातावरण तथा सहपाठी मिलते हैं। जिसके कारण उनकी पुन: अध्ययन में रूचि जाग्रत होती है और वह शिक्षा की ओर अग्रसर होते हैं। विशिष्ट विद्यालयों में कक्षा में छात्रों की संख्या कम ही रखनी चाहिए। कक्षा में शिक्षक को सभी छात्रों पर सम्मान ध्यान देना चाहिए। अध्ययन में आने वाली समस्याओं को शिक्षक को दूर करना चाहिए।
शिक्षक तथा अभिभावक का व्यक्तिगत ध्यान
बालकों में पिछड़ेपन की समस्याओं को दूर करने के लिए शिक्षक को छात्रों पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देना चाहिए। कभी कभी बालक को शिक्षक की व्यक्तिगत सलाह भी अध्ययन की ओर अग्रसर कर सकती है। अभिभावक को भी बालक पर व्यक्तिगत ध्यान देना चाहिए तथा बालक के क्रियाकलापों पर नजर रखनी चाहिए। अभिवभावक तथा शिक्षक दोनों को ही पिछड़े बालक को अधिक समय देना चाहिए।

समस्यात्मक बालक

वे सभी बालक जिनके व्यवहार के कारण समस्या उत्पन्न होती है, समस्यात्मक बालक कहलाते हैं। समस्यात्मक बालक कक्षा की शैक्षणिक गतिविधियों में अवरोध उत्पन्न करते हैं। समस्यात्मक बालकों का व्यक्तित्व भी असामान्य होता है।

समस्यात्मक बालकों के प्रकार

समस्यात्मक बालकों के निम्न प्रकार हो सकते हैं: चोरी करने वाले बालक
चोरी करने वाले बालकों में चोरी करने की आदत का विकास होता है। अज्ञानता या माता पिता की अवेहलना के कारण चोरी करने की आदत का विकास होता है।
झूठ बोलने वाले बालक
झूठ बोलने वाले बालक कभी-कभी दूसरों को खुश करने के लिए झूठ बोलते हैं। कभी-कभी बालक विद्यालय में काम न पूरा कर पाने के कारण तथा शिक्षक के समक्ष उपस्थित होने पर झूठ बोलते हैं।

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