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अध्याय 12 विकलांग तथा अधिगम अशक्तता वाले बालकों की पहचान (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 12 विकलांग तथा अधिगम अशक्तता वाले बालकों की पहचान

विकलांग बालक

► विकलांग बालक में शारीरिक एवं मानसिक या सांवेगिक रूप से कमियाँ पाई जाती है जिस कारण से ये बालक सामान्य बालकों की तुलना में पिछड़ जाते हैं। विकलांग शिक्षार्थियों की शिक्षा का उद्देश्य उन्हें वैयक्तिक, सामाजिक एवं व्यावसायिक रूप से जीवन में समायोजन सीखाना होता है। इन बालकों के लिए इनकी आवश्यकतानुसार शिक्षण प्रक्रिया होने से इन्हें सीखाने में काफी मदद मिल सकती है।
► गंभीर अवस्थाओं को छोड़कर साधारणत: विकलांग शिक्षार्थियों की योग्यता सामान्य या औसत बालकों जैसी ही होती है।
क्रो एवं क्रो के अनुसार, ‘ऐसे बालक जिनमें ऐसा शारीरिक दोश होता है जो किसी भी रूप में उसे साधारण क्रियाओं में भाग लेने से रोकता है या सीमित करता है, ऐसे बालक को हम विकलांग बालक कह सकते हैं।’
ए एडलर के अनुसार, ‘‘एक बालक जो शारीरिक दोशों से ग्रस्त है उसमें हीनता की भावना उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार की भावना से बालक को थोड़ी-सी संतुश्टि और प्रसन्नता मिलती है, वह इसकी क्षतिपूर्ति प्रतिश्ठा श्रेश्ठता या प्रसिद्धि प्राप्त करके करना चाहता है, इन सबसे उसको संतुश्टि प्राप्त होती है जो उसके शारीरिक दोशों के कारण है।’’

शारीरिक रूप से विकलांग बालकों की पहचान

► शारीरिक विकलांग से तात्पर्य शरीर की उस कमी से है जिसके कारण व्यक्ति के एक अथवा एकाधिक अंग अपनी स्वाभाविक क्रिया के सम्पादन में सर्वथा अक्षम हो जाते हैं।
► सामान्य या औसत बालकों की तुलना में उनके अंगों की कार्य क्षमता औसत से कम होती है।
► यह अक्षमता जन्म से होती है अथवा दुर्घटना या बीमारी के कारण उत्पन्न होती है।

शारीरिक विकलांगता के प्रकार

दृष्टि दोष वाले बालक
पूर्ण रूप से अंधे या आंशिक रूप से अंधे बालक को दृश्टि दोश वाले बालक माना जाता है। उन्हें दृश्टि सामग्रियों जैसे मानचित्र एवं वीडियो से सीखने का अवसर नहीं मिलता है। ऐसे बालकों के कान, नाक आदि सामान्य ढ़ंग से कार्य नहीं करते हैं। इनकी शिक्षण योग्यता सामान्य बालकों के समान होती है। इनमें दूसरों के व्यवहारों के अनुकरण करने की संभावना सीमित होती है और दूसरों के साथ परस्पर क्रिया के समय शारीरिक भाशा तथा अन्य अशाब्दिक संकेतों के निरीक्षण की योग्यता नहीं होती है या सीमित होती है।
► पूर्ण अन्धापन जन्मजात होता है तथा आंशिक अंधापन जन्म के बाद धीरे-धीरे आता है।
► उन्हें पढ़ने के लिए सहायक सामग्री की आवश्यकता पड़ती है तथा पढ़ने के लिए ब्रेल छपाई सहायक सिद्ध हुई है।
► इसी प्रकार से आंशिक अंधेपन से ग्रस्त बालक बड़े अक्षरों वाली छपाई की पुस्तकों या आर्वधक लेंस की सहायता से पढ़ सकते हैं।
दृष्टि दोष वाले बालक की पहचान
आँखों की बनावट में दोश होना
► आँखों को बार-बार मलना
► आँखों का बराबर लाल रहना
► वस्तुओं को बहुत निकट लाकर देखना
► ब्लैकबोर्ड पर लिखे लेखन को पढ़ने में मुश्किल होना
► आँखों से पानी बहना एवं भैंगेपन की शिकायत करना
श्रवण एवं वाणी दोष वाले बालक
सुनने की क्रिया शिक्षार्थी के अधिगम के लिए महत्वपूर्ण होती है।
► श्रवण सबंधी समस्याएँ शिक्षार्थियों के सीखने की क्षमता को प्रभावित करती हैं।
► वाणी दोश, श्रवण समस्याओं के कारण भी उत्पन्न हो सकते हैं।
► श्रवण शक्ति की माप, श्रवण यंत्रों द्वारा की जाती है।
► इसके द्वारा ध्वनियों को डेसीबल में मापा जाता है।
► श्रवण शक्ति में मंद दोश 20-30 डी.बी, सीमांत-दोश 30-40
वाला, सामान्य 40-60 डी.बी वाला, गम्भीर 60-70 डी.बी वाला और गहन दोश 75 डी.बी से अधिक सीमा तक का होता है।
► शिक्षार्थियों में गम्भीर श्रवण दोश के कारण बोलने की क्षमता का विकास नहीं हो पाता है।
► वाणी उपचार द्वारा बोलने की क्षमता का विकास किया जा सकता है।
श्रवण-दोषों को पहचानना
कान की बनावट में दोश होना
► कानों में दर्द तथा बहने की शिकायत होना
► लिखने में गलतियाँ करना और बोलते समय उच्च या निम्न स्वर में बोलना
श्रवण दोष वाले शिक्षार्थियों की शिक्षा
श्रवण दोश वाले शिक्षार्थियों को शिक्षक के निकट बैठाना चाहिए ताकि वे पाठ सुनने में सक्षम हो सकें।
► ऐसे शिक्षार्थियों को ध्यान में रखते हुए शिक्षक को बोलते समय अपनी ध्वनि ऊँचा होना चाहिए।
► शिक्षार्थियों को तीव्र गति से बोलने से रोकना चाहिए और स्पश्ट स्वर में बोलने का अभ्यास कराना चाहिए।
► शिक्षार्थी होंठो की गति को देखकर सुनने की चेश्टा करता है इसलिए उन्हें ऐसे शिक्षार्थियों को संबोधित करते समय धीमी गति से उच्चारण करना चाहिए।
► शिक्षार्थियों को परस्पर क्रिया-प्रतिक्रया कर सीखने के लिए उत्साहित करना चाहिए।
► शिक्षण में सहायक सामग्री के तीन आयाम वाले प्रारूपों का प्रयोग करना चाहिए।

मानसिक रूप से विकलांग अथवा मंद बुद्धि वाले बालकों की पहचान करना

मानसिक मंदता एक ऋणात्मक संकल्पना है। मानसिक रूप से मंद बालक घर, समाज तथा विद्यालय का कार्य नहीं कर पाते हैं। निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा मानसिक मंदता की पहचान की जा सकती है:
► बालक सामाजिक परिस्थितियों के साथ समायोजन नहीं कर पाता है।
► बालक अपने साथियों के साथ मित्रवत व्यवहार नहीं कर पाता है।
► व्यावहारिक तथा वातावरण सम्बन्धी कारणों से उसका मानसिक विकास नहीं हो पाता है।
► बालक उतना कार्य नहीं कर पाता है जितना उसके आयुवर्ग के बालकों से आशा की जाती है।
► विशेष शारीरिक दोष के कारण वह सामान्य कार्य नहीं कर पाता है।
► बालक में कुछ ऐसे दोष होते हैं जिन्हें परिष्कृत नहीं किया जा सकता है।

मानसिक रूप से विकलांग अथवा मंद बुद्धि वाले शिक्षार्थियों की शिक्षा

► ऐसे शिक्षार्थियों को मूर्त अथवा सजीव उदाहरणों से पढ़ाया जाना चाहिए।
► सामान्य शिक्षार्थियों की अपेक्षा मंदबुद्धि वाले शिक्षार्थियों को पुनरावृति एवं अभ्यास की अधिक आवश्यकता पड़ती है।
► सीखाने वाले पाठ को छोटे-छोटे उदाहरणों में प्रस्तुत करना चाहिए।
► मंद बुद्धि वाले शिक्षार्थियों को सीखने के लिए प्रेरित करने हेतु उनसे कठिन प्रश्न पूछने के बजाय सरल प्रश्न पूछे जाने चाहिए।
► ऐसे शिक्षार्थियों के लिए संप्रेशण कौशल का प्रशिक्षण भी आवश्यक है।

विकलांग बालकों की समस्याएँ

► शारीरिक तथा मानसिक दोशों के कारण विकलांग शिक्षार्थियों के सीखने की प्रक्रिया में बाधा होती है जिसका निदान करना आवश्यक होता है। विद्यालय एवं परिवार में दूसरों के साथ सामंजस्य बनाने में ऐसे शिक्षार्थी या बालक को परेशानी होती है।
► शारीरिक रूप से विकलांग बालक अपनी विकलांगता को स्वीकार कर लेता है, उसकी स्व-धारणा प्रभावित होती है और वह उसी के अनुरूप कार्य करने लगता है। कभी-कभी वह हताश होकर नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करता है और इससे उसके मनोसामाजिक समायोजन पर प्रभाव पड़ता है जो उसके सामाजिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
► सामान्य बालकों की तुलना में ऐसे बालकों में तनावपूर्ण समस्याओं का सामना करने की क्षमता कम होती है।
► आत्मविश्वास की कमी के कारण किसी नये कार्य को करने में ऐसे शिक्षार्थी या बालक को घबराहट होती है।
► दृश्टि दोश वाले शिक्षार्थी पढ़ाई-लिखाई में पिछड़ जाते हैं, संवेगात्मक रूप से परेशान रहते हैं और उनका सामाजिक समायोजन भी ठीक से नहीं हो पाता है।
► शारीरिक रूप से अपंग शिक्षार्थियों को कक्षा में प्रवेश करने तथा बैठने मे ं परश्े ानी होती है इसलिए ऐसे शिक्षार्थियो के लिए विशश् सुविधा होनी चाहिए।
► अभिभावक तथा शिक्षक को चाहिए कि विकलांग बालकों/ शिक्षार्थियों की समस्याओं को सुलझाने के लिए सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनायें।

विकलांग शिक्षार्थियों की शिक्षा व्यवस्था

विकलांग व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों की रक्षा और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम-1995 और बहु-विकलांगता व्यक्तियों के कल्याण के लिए बनाये गए राष्ट्रीय न्यास अधिनियम-1999 के अनुसार, निम्न श्रेणी में आने वाले शिक्षार्थी या व्यक्ति विकलांग क्रमश: इस प्रकार से हैं – अंधता, कम दृष्टि, उपचारित कुष्ठ रोग, बहरापन, लोकोमोटर विकलांगता, मंदबुद्धि, मानसिक रोग, स्वलीनता, मस्तिष्क पक्षाघात। इनकी शिक्षा व्यवस्था के लिए निम्नलिखित प्रावधान किए गए हैं:
► 2010 में सर्वशिक्षा अभियान में विशिष्ट प्रस्ताव आने पर विकलांग बच्चे के लिए हर वर्श तीन हजार रूपये देने की व्यवस्था है।
► विकलांग बच्चों के लिए समन्वित शिक्षा की योजना के स्थान पर 2009-10 में माध्यमिक स्तर पर विकलांग बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा की योजना शुरू की गई थी। इस योजना में नवीं से बारहवीं कक्षा के विकलांग बच्चों को समावेशी शिक्षा के लिए सहायता दी जाती है।
► इस योजना का उद्देश्य सभी विकलांग शिक्षार्थियों को प्राथमिक शिक्षा के पहले आठ वर्ष पूरे करने के बाद आगे के चार वर्षों की नवीं से बारहवीं तक की माध्यमिक स्तर की समावेशी शिक्षा प्रदान करना है।
► राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना के अंतर्गत विकलांगता वाले शिक्षार्थियों को आर्थिक सहायता दी जाती हैं, ताकि वे मान्यता प्राप्त संस्थानों से पेशेवर या तकनीकी पाठ्यक्रमों में शिक्षा प्राप्त करके नौकरी हासिल कर सकें।
► श्रवण-विकलांग बच्चे उसी पाठ्यक्रम का अध्ययन करते हैं, जो कि राज्य में स्टेट बोर्ड ऑफ स्पेशल एजुकेशन द्वारा निर्धारित हैं, लेकिन उन्हें भाषा एवं मौखिक मूल्यांकन में छूट दी जाती हैं।
► विकलांग शिक्षर्थियों को विशेष शिक्षक या स्रोत शिक्षक द्वारा विशेष सहायता दी जाती है।
► वे बच्चे जो अभी तक अच्छी भाषा एवं संवाद की कला नहीं विकसित कर पाए हैं, एवं जिन्हें लिखने एवं पढने में सहायता की आवश्यकता हैं और वे अपनी प्राथमिक शिक्षा विशेष स्कूल में जारी रखते हैं। विशेष शिक्षक वैयक्तिक शैक्षणिक कार्यक्रम बनाते हैं एवं विशेष पाठ्यक्रम विकसित करते हैं, ताकि विशेष बच्चों की वैयक्तिक आवश्यकताएं पूरी हो सकें। समेकित प्राथमिक विद्यालयों के बच्चे या विशेष प्राथमिक विद्यालयों के बच्चे माध्यमिक विद्यालयों में प्रवेश ले सकते हैं। श्रवण-विकलांग बच्चों को भाषा में छूट प्रदान की जाती हैं एवं भाषा के बदले में दूसरे वैकल्पिक विषयों का चुनाव करना पडता है। राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय उन विकलांग बच्चों/व्यक्तियों को शैक्षणिक मौका प्रदान करता हैं, जो आगे पढना चाहते हैं, लेकिन नियमित स्कूल में पढ़ना संभव नहीं है।

अधिगम अशक्तता

सीखने की अशक्तता का अर्थ एक ऐसे विकार से है जो एक या एक से अधिक उन बुनियादी मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं से जुड़ा है जो भाषा समझने और उसका मौखिक या लिखित प्रयोग करने के काम में शामिल हैं। इसमें सुनने, बोलने, पढ़ने, उच्चारण करने या गणित के सवाल हल करने में योग्यता कम हो जाती है। मनोवैज्ञानिकों तथा स्नायुतंत्र विशेषज्ञों के अनुसार, अक्षमता को निम्न पाँच प्रकार की श्रेणी में रखा जा सकता है:
► भाशा संबंधी एवं मौखिक रूप से संबंधी अशक्तता जैसे अफेज्या, डिस्फेजिया।
► पढ़ने की अशक्तता जैसे- एलेक्सिया, डिस्लेक्सिया।
► लिखने की अशक्तता जैसे- अप्रेक्सिया, डिस्ग्राफिया तथा डिस्प्रैक्सिया।
► वर्तनी संबंधी अशक्तता से पीड़ित शिक्षार्थी अक्षरों को क्रम से नहीं लिख पाता है, जैसे वजन को वनज लिख देता है।
► गणित संबंधी अशक्तता जैसे डिस्कैल्कुलिया।

प्रमुख अधिगम अशक्तता

अफेज्या

► इस प्रकार की अधिगम अक्षमता में शिक्षार्थी के अन्दर भाषा श्रवण दोष होता है।
► कक्षा में पढ़ने वाले शिक्षार्थी शिक्षक की बात को वैसे ही ग्रहण नहीं करते हुए शिक्षक द्वारा उच्चारित शब्द अथवा वाक्य को दूसरे रूप में सुनते हैं। विशेषकर मातृभाषा को छोड़ कर दूसरी भाषा का अध्ययन करते समय शिक्षार्थियों को इस प्रकार की परेशानी अधिक होती है।
► श्रवण शक्ति दोष, भाषा अध्यापक द्वारा क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग, स्थानीय भाषा का अलग होना, माता-पिता द्वारा स्थानीय बोली का सर्वाधिक प्रयोग तथा उच्चारण दोष के कारण अफेज्या होता है।

डिस्लेक्सिया

► इस प्रकार की अक्षमता में शिक्षार्थी या बालक को शब्दों एवं वाक्यों को शब्दश: पढ़ने में कठिनाइयों का सामना करना पढ़ता है। यह दोष मूलत: बाल्यावस्था में समाजीकरण की प्रक्रिया के दौरान स्थानीय लोगों द्वारा बोलचाल की बोली के प्रयोग के कारण होता है। जैसे पंजाब प्रांत में पला-बढ़ा बालक ‘स्कूल’ को सकूल, महाराष्ट्र में पला-बढ़ा बालक ‘गणित’ को गनित, मध्यप्रदेश के मालवा प्रांत में पाला-बढ़ा ‘शक्कर’ को हक्कर का उच्चारण करने में अभ्यस्त होने के कारण बड़ी कक्षाओं में भी त्रुटि करता है।
► उच्चारण दोष, स्वराघात शक्ति का अभाव, प्रारंभिक कक्षा में शुद्ध उच्चारण पर ध्यान न दिया जाना, स्थानीय बोली को सर्वाधिक महत्व, क्षेत्रीयता को अधिक महत्व देना, इसके कारण हैं।

डिस्कैल्कुलिया

इस प्रकार के अक्षमता रखने वाले बालक गणितीय त्रुटि जैसे गुणा, भाग, जोड़ अथवा घटाने के क्रम को या तो भूल जाते हैं अथवा उल्टा-सीधा कर देते हैं। उदाहरणस्वरूप, शिक्षार्थी गुणा करते समय 9×3 = 27 के स्थान पर कुछ और लिख देते हैं। 13 एवं 56 को जोड़ते अथवा घटाते समय, अंको को दाहिने तरफ के स्थान पर बायें तरफ से जोड़ अथवा घटा देते हैं। भाग वाले सवाल करते समय विभाजित संख्या के स्थान पर भाज्य अथवा एक दूसरे के विपरीत भाग कर देते हैं। गणितीय क्षमता का अभाव, प्रारंभिक शिक्षण के समय शिक्षण का गलत तरीके से गणित लिखना, स्नायुतंत्र में गड़बड़ी, बालक की कार्य करने में जल्दबाजी, प्रारंभ में गिनती पहाड़े को मातृभाषा में लिखना तथा बाद में अंग्रेज़ी में प्रयुक्त करना ये सभी डिस्कैल्कुलिया अशक्तता के कारण हैं।

हाइपरलेक्सिया

इस प्रकार की अशक्तता वाले बालक, शब्दों अथवा वाक्यों को बहुत कम या बिलकुल भी नहीं समझ पाते हैं और उन्हें बोर्ड पर लिखे गए शब्द ऊपर-नीचे दिखाई देते हैं।

डिस्ग्राफिया

► इनमें मुख्यत: अक्षर की पहचान, जैसे व और ब, ‘ग्रह’ और ‘गृह’, स और श आदि का उच्चारण एवं लेखन दोष पाया जाता है।
► दृष्टि दोष, कक्षा में असुविधाजनक बैठक व्यवस्था के कारण डिस्ग्राफिया अशक्तता उत्पन्न हो सकती है।

अलेक्सिया

► अलेक्सिया को शब्द अन्धता अथवा पाठ्य अन्धता भी कहते हैं।
► यह शिक्षार्थी के मस्तिश्क में किसी प्रकार के नुकसान या चोट लगने के कारण हो सकता है।
► अलेक्सिया के कारण शिक्षार्थियों को अफेज्या तथा डिस्ग्राफिया जैसी अधिगम अशक्तताएँ हो सकती हैं।

डिस्मोरफिया

► शिक्षार्थी मति-भ्रम की स्थिति में रहता है उसे यह महसूस होता है कि उसके शारीरिक अंग दूसरों से कमजोर हैं।
► इस मति-भ्रम के कारण वह अधिगम की प्रक्रिया में ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता है।

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