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अध्याय 12. इतिहास – प्रथम कृषक और चारवाहे (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 12. इतिहास – प्रथम कृषक और चारवाहे

खेती और पशुपालन की शुरुआत
दुनिया की बदलती जलवायु के साथ-साथ लोगों द्वारा उपयोग की वाली वनस्पतियों और पशुओं का भोजन के रूप में चयन बदलते रहे। आदिमानव का कृशक का रूप में विकास नवपाशाण युग तक होने लगा था। बदलती जलवायु के साथ-साथ संभवत: लोगों का ध्यान कुछ बातों पर गया, जैसे – खाने योग्य वनस्पतियाँ कहाँ-कहाँ मिल सकती हैं? बीज कैसे डंठल से टूटकर गिरते है? गिरे बीजों का अंकुरण और पौधों का निर्माण किस प्रकार होता है? आदि। इसी तरह संभवत: लोगों ने अपने घरों के आस-पास चारा रखकर जानवरों को आकर्शित करके उन्हें पालतू बनाया होगा। सबसे पहले कुत्ते का जंगली पूर्वज पालतू बनाया गया था। इसके बाद भेड़, बकरी, गाय और सूअर जैसे जानवर को पालतू बनाया गया। लोग जंगली जानवरों के आक्रमण से इसकी सुरक्षा किया करते थे। इस प्रकार धीरे-धीरे मानव पशुपालक बनें।
बसने की प्रक्रिया
लोगों का कृशक और पशुपालक बनने की समुचित प्रक्रिया को ’बसने की प्रक्रिया’ नाम दिया गया है। उगाये गये ये पौधे या जानवर जंगली पौधे और जानवरों से भिन्न हैं। उदाहरण के तौर पर लोग उन्हीं पौधो तथा जानवरों का चयन करते हैं जिनके बीमार होने की संभावना कम हो। यही नहीं, लोग उन्हीं पौधों की चुनते हैं जिससे बड़े दाने वाले अनाज पैदा होते हैं। साथ ही उन्हीं जानवरों को आगे प्रजनन के लिए चुना जाता है, जो आमतौर पर अहिंसक होते हैं। करीब 12000 साल पहले बसने की प्रक्रिया की शुरुआत हुई और पूरी दुनिया में यह प्रक्रिया धीरे धीरे चलती रही। आज हमारे भोजन और आवास वास्तव में इसी बसने की प्रक्रिया की वजह से हैं।
कृशि के लिए अपनायी गयी सबसे प्राचीन फसल गेहूँ तथा जौ हैं। इसी तरह सबसे पहले पालतू बनाये गये जानवरों में कुत्ते के बाद भेड़-बकरी आते हैं।
एक नवीन जीवन शैली
नवपाशाण युग के लोग कृशि कार्य और पशुपालन कार्य में संलिप्त हुए। पौधे उगाने और उनकी देखभाल के लिए उन्हें एक ही जगह पर लंबे समय तक रहना पड़ा। इनमें बीज बोने से लेकर फसलों के पकने तक, पौधों की सिंचाई करने, खरपतवार हटाने, जानवरों और चिड़ियों से उनकी सुरक्षा करने जैसे अनेक काम शामिल थे। अनाज को भोजन और बीज दोनों ही रूपों में बचा कर रखना अति आवश्यक था, इसीलिए भंडारण कार्य को प्रोत्साहन मिला। इसके लिए लोगों ने मिट्टी के बड़े-बड़े बर्तन बनाए, टोकरियाँ बुनी और जमीन में गड्ढा खोदा गया।
जानवर चलते – फिरते ’खाद्य भंडार’
मानव सभ्यता के इन आरंभिक काल में कृशि कार्य काफी कठिन रहा होगा। अत: लोगों ने पशुपालन पर भी बल दिया। पशुपालन हेतु जंगली जानवरों की तुलना में ऐसे अहिंसक जानवरों को चुना, जिनके दाँत और सींग छोटे होते हैं। प्रतिकूल मौसम में ये पालतू जानवर ही एकमात्र भोजन का साधन था। अत: इन्हें चलते-फिरते ’खाद्य भंडार’ की संज्ञा दी जा सकती है। इनसे दूध और माँस, दोनों ही प्राप्त होते थे यानी पशुपालन भोजन के भंडारण का एक महत्वपूर्ण तरीका बन गया। पुरातत्वविदों द्वारा जिन स्थानों पर अनाजों और पालतू जानवरों के अवशेश मिले हैं, उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:
अनाज हड्डियाँ पुरास्थल
गेहूँ, जौ भेड़, बकरी, मवेशी मेहरगढ़ (आधुनिक पाकिस्तान)
चावल जानवरों की हड्डियों के टुकड़े कोल्डिहवा (आधुनिक उत्तर प्रदेश)
चावल मवेशी महागढ़ (आधुनिक उत्तर प्रदेश)
गेहूँ और दलहन – गुफक्राल (आधुनिक कश्मीर)
गेहूँ – दलहन कुत्ते, भैंस, भेड़, बकरी बुर्जहोम (आधुनिक कश्मीर)
गेहूँ, हरे चने, जौ भैंस, बैल चिराँद (आधुनिक बिहार)
ज्वार-बाजरा भेड़, बकरी, सूअर, मवेशी हल्लूर (आधुनिक आंध्र प्रदेश)
काला चना, ज्वार-बाजरा भेड़, सूअर, मवेशी पैय्यमपल्ली (आधुनिक आंध्र प्रदेश)
स्थायी जीवन की ओर
पुरातत्विदों को कुछ पुरातत्वों पर झोपड़ियों और घरों के निशान मिले हैं। ऐसे प्रमाण उत्तरी भारत में नवपाशाण युग का स्थल बुर्जहोम
(वर्तमान कश्मीर) में पाया गया है। यहाँ के लोग गोलाकार या अण्डाकार गड्ढ़ों के नीचे घर बनाकर रहते थे, जिन्हें ’गर्तवास’ कहा जाता है। इन घरों से उन्हें ठंड के मौसम में सुरक्षा मिलती होगी। पुरातत्वविदों को झोपड़ियों के अन्दर और बाहर दोनों ही स्थानों पर आग जलने की जगह मिली है। ऐसा लगता है कि लोग मौसम के अनुसार घर के अन्दर या बाहर खाना बनाते होंगे। नवपाशाण युग के अंतिम चरण में मानव पत्थर के औजारों के साथ ताँबे के औजार भी बनाने लगा था। इसलिए इस युग को ताम्रपाशाण काल भी कहा जाता है। इस ताम्रपाशाण काल में मानव संभवत: हल की सहायता से गेहूँ का उत्पादन करने लगा था।
जनजाति: प्राय: जनजाति के लोग छोटी-छोटी बस्तियों में रहते हैं। ज्यादातर परिवार एक-दूसरे से संबंधित होते हैं और इस तरह के परिवारों के समूह मिलकर जनजाति का निर्माण करते हैं।
मेहरगढ़
मेहरगढ़ पुरातात्विक दृश्टि से एक महत्वपूर्ण स्थान है, जहाँ नवपाशाण युग (8000 ई.पू. से 2500 ई.पू. तक) के बहुत से अवशेश मिले हैं।
यह स्थान वर्तमान बलोचिस्तान (पाकिस्तान) के कच्ची मैदानी क्षेत्र में है। यह स्थान विश्व के उन स्थानों में से एक है, जहाँ प्राचीनतम कृशि एंव पशुपालन से संबंधित साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इन अवशेशों से पता चलता है कि यहाँ के लोग गेहूँ एवं जौ की खेती करते थे तथा भेड़, बकरी एवं अन्य जानवर पालते थे। मेहरगढ़ संभवत: वह स्थान है जहाँ लोगों ने सबसे पहले जौ, गेहूँ उगाना और भेड़ बकरी पालना सीखा।
यह स्थल हड़प्पा सभ्यता से पूर्व का ऐसा स्थल है जहाँ से हड़प्पा जैसे ईंटों के बने घर मिले हैं और लगभग 6500 वर्तमान पूर्व तक मेहरगढ़वासी हड़प्पा जैसे औजार एंव बर्तन भी बनाने लगे थे। मेहरगढ़ से प्राप्त होने वाली अन्य वस्तुओं में बुनाई की टोकरियाँ, औजार एवं मनके हैं, जो बड़ी मात्रा में मिले हैं। अभी तक की खुदाई में यहाँ से नवपाशाण काल से लेकर कांस्य युग तक के प्रमाण मिलते हैं जो कुल आठ पुरातात्विक स्तरों में बिखरे हैं।
दाओजली हेंडिग
दाओजली हेडिंग एक पुरास्थल है। यह चीन और म्यांमार की ओर जाने वाले रास्ते में ब्रह्मपुत्र की घाटी की एक पहाड़ी पर है।
यहाँ से मिले खरल और मूसल जैसे उपकरण से पता चलता है कि यहाँ के लोग अनाज उगाते थे।
यहाँ जेडाइट पत्थर भी मिला है। साथ ही पुरास्थल से काश्ठाश्म (अति प्राचीन लकड़ी, जो सख्त होकर पत्थर जैसा बन गयी है) के औजार और बर्तन भी मिले हैं।

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