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अध्याय 11 समावेशी शिक्षा तथा विविध पृष्ठभूमि के बालकों की पहचान (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 11 समावेशी शिक्षा तथा विविध पृष्ठभूमि के बालकों की पहचान

समावेशी शिक्षा

► स्मावेशी शिक्षा का लक्ष्य सभी शिक्षार्थियों को उनकी शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, भावात्मक तथा अन्य दशाओं पर विशेश ध्यान दिए बिना अच्छी शिक्षा देना है। राश्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 ने समावेशी शिक्षा के महत्व को देखते हुए अपंग तथा दोशग्रस्त शिक्षार्थियों के लिए विशेश विद्यालयों को प्रोत्साहित किया है। प्रारंभिक शिक्षा के सार्वभौमिकीकरण के लिए शिक्षार्थियों को उनकी भिन्नताओं के बाद भी आयु के अनुसार एक ही कक्षा में भाग लेने का अवसर दिया जाता है। शिक्षार्थियों को विभिन्न अधिगम शैलियों में पढ़ाया जाता है ताकि उन्हें अपनी अधिकतम क्षमतानुसार सीखने का अवसर मिल सके।
► समावेशी शिक्षा नियमित विद्यालयों में सामान्य शिक्षार्थियों के साथ अपंग शिक्षार्थियों के शिक्षण को भी सुगम बनाती है। समावेशन को प्रभावकारी बनाने के लिए शिक्षक, अभिभावक, समकक्ष शिक्षार्थी, समुदाय के सदस्य, शिक्षा प्राधिकारी का योगदान महत्वपूर्ण है। शिक्षार्थियों के विकास एवं प्रौढ़ावस्था हेतु उन्हें तैयार करने के लिए समावेशी शिक्षा आवश्यक है। भारत में विशेश विद्यालयों की कमी है। इसलिए सामान्य विद्यालयों में समावेशी शिक्षा की व्यवस्था कर मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को मुख्यधारा में लाना महत्वपूर्ण है।

समावेशी शिक्षा की समस्याएँ

► शिक्षक प्रबंधन, शिक्षक की शिक्षा एवं प्रशिक्षण, विद्यालय प्रशासन तथा प्रबंधन स्तर पर कमी
► पाठ्यक्रमों में व्यावहारिकता की कमी
► विद्यालय स्तर के आँकड़ों की अविश्वसनीयता
► आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए किए गए प्रावधानों को लागू नहीं किया जाना
► शिक्षा के अधिकार अधिनियम को जमीनी स्तर पर लागू नहीं किया जाना
► लैंगिक मुद्दे
► मूलभूत सुविधाओं की कमी

समावेशी शिक्षा के लाभ

► समाज के संपूर्ण विकास के लिए सभी बच्चों/शिक्षार्थियों को पढ़ने का अवसर मिलना चाहिए।
► पढ़ने की एकीकृत व्यवस्था होने से शिक्षार्थी शैक्षिक एवं सामाजिक दृश्टि से अच्छा प्रदर्शन करते हैं।
► समावेशी शिक्षा द्वारा सभी पक्षों की प्रतिबद्धता सुनिश्चित की जाती है तथा इससे शिक्षार्थियों का भय, अज्ञानता एवं पूर्वाग्रह दूर होता है। इसके द्वारा शिक्षार्थियों के बीच सहयोगी वातावरण, बेहतर समझ तथा सम्मान विकसित होता है। समावेशी शिक्षा प्रत्येक शिक्षार्थी के लिए उम्मीदों के साथ, उसकी व्यक्तिगत शक्तियों का विकास करती है। प्रत्येक शिक्षार्थी स्वाभाविक रूप से सीखने के लिए अभिप्रेरित होता है। समावेशी शिक्षा अन्य शिक्षार्थियों, अपने स्वयं की व्यक्तिगत आवश्यकताओं और क्षमताओं के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सहयोग करती है। समावेशी शिक्षा सम्मान और अपनेपन की विद्यालय संस्कृति के साथ-साथ व्यक्तिगत मतभेदों को स्वीकार करने के लिए अवसर प्रदान करती है। समावेशी शिक्षा, शिक्षार्थी को अन्य शिक्षार्थियों के समान कक्षा गतिविधियों में भाग लेने और व्यक्तिगत लक्ष्यों पर कार्य करने के लिए अभिप्रेरित करती है।

समावेशी शिक्षा के लिए कक्षा में सहयोग की भावना बढ़ाने के कुछ तरीके

► समुदाय भावना को बढ़ाने के लिए खेलों का आयोजन
► शिक्षार्थियों को समस्या के समाधान में शामिल करना
► किताबों और गीतों का आदान-प्रदान
► सम्बधित विचारों का कक्षा में आदान-प्रदान
► शिक्षार्थियों में समुदाय की भावना बढ़ाने के लिए कार्यक्रम तैयार करना
► शिक्षार्थियों को शिक्षक की भूमिका निभाने का अवसर देना
► विभिन्न क्रियाकलापों के लिए शिक्षार्थियों का दल बनाना
► अच्छे वातावरण का निर्माण करना
► शिक्षार्थियों के लिए लक्ष्य-निर्धारण
► अभिभावकों का सहयोग लेना
► विशेष प्रशिक्षित शिक्षकों की सेवा लेना

समावेशन के महत्वपूर्ण सिद्धांत

► विभिन्न स्तरों पर कार्य करने वाले शिक्षकों के उत्तरदायित्वों की भागीदारी
► शिक्षार्थियों को अतिरिक्त सहायता देना
► शिक्षार्थियों की अतिरिक्त जरूरतों तथा रूचियों की पूर्ति के लिए सहयोगी ढाँचे का विकास
► मानसिक विकलांगता के अलग-अलग प्रकारों के लिए योजना बनाना
► शिक्षार्थियों के परिवार एवं सामाजिक परिवेश की जानकारी रखना
► शिक्षण तथा अधिगम रणनीतियों में संशोधन
► शिक्षकों की व्यावसायिक कुशलता सुधारना

समावेशी शिक्षा की सफलता के कारक

विद्यालय से संबंधित
भौतिक बाधाओं का निराकरण
► मनोवैज्ञानिक बाधाओं का निराकरण
► सूचना बाधाओं का निराकरण
► मनोवृत्तिक बाधाओं का निराकरण
बच्चों से संबंधित
शैक्षिक तत्परता
► भावात्मक तत्परता
► शारीरिक तत्परता
► सम्प्रेशण कौशल
► सामूहिक प्रयास
समाज से संबंधित
समावेशी शिक्षा समाज के अंतरों को स्वीकार करती है और विविधता का पोशण करती है।
► माता-पिता की आशाओं को पूरा करने के लिए शिक्षार्थियों में सकारात्मक मनोवृत्ति उत्पन्न करना समावेशी शिक्षा की सफलता का महत्वपूर्ण कारक है।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के

बालकों की शिक्षा

अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों की दशा सुधारने के लिए समावेशी शिक्षा, उनके शैक्षिक एवं आर्थिक हितों को विशेश सावधानी से आगे बढ़ाती है। संविधान के अनुच्छेद 46
के अनुसार, राज्य कमजोर वर्गों, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक हितों को आगे बढ़ाता है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, तथा अनुच्छेद 45 के अनुसार, 5 से 14 वर्श के सभी बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों को शिक्षा देने के लिए योजनाएँ

► बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले शिक्षार्थियों या बच्चों के लिए जनजातीय आवासीय क्षेत्रों में शिक्षा गारंटी केन्द्र तथा वैकल्पिक विद्यालय स्थापित किए जाते हैं। शिक्षार्थियों या बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के प्रारंभ में उनकी मातृभाशा में पाठ्यपुस्तकें देना।
► शिक्षार्थियों को अनुकूलित पाठ्यक्रम एवं स्थानीय रूप से अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराना।
► शिक्षकों के लिए विशेश आवश्यक साधन तथा सामुदायिक शिक्षकों की नियुक्ति पर ध्यान देना।
► शिक्षकों के प्रयोग के लिए सेतु भाशा तालिका बनाना।
► जनजातीय क्षेत्रों में स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार विद्यालयी कार्यक्रम की रूपरेखा बनाना।
► आंगनबाड़ी केन्द्रों को सुदृढ़ करना और विद्यालय में बालिकाओं की सहभागिता बढ़ाने के लिए शिशुगृहों की व्यवस्था करना।
► विद्यालय प्रबंधन एवं विद्यालय विकास की योजनाओं में समुदाय के सदस्यों को शामिल करना।
► समाज के विभिन्न पक्षों में स्वामित्व की भावना विकसित करने के लिए ग्रामीण शिक्षा समिति तथा अभिभावक शिक्षक संघ में समुदाय के कमजोर वर्गों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना।

पिछड़े व निर्धन बालकों की शिक्षा के लिए योजनाएँ

ऐसे शिक्षार्थी या बच्चे जो अपनी शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते हैं उनकी पहचान निर्धन शिक्षार्थी या बच्चे के रूप में होती है।

घुमंतू बच्चों की शिक्षा

► प्रवासियों या घुमंतू बच्चे मौसम के अनुसार प्रवास करते हैं ऐसे बच्चों की शिक्षा-व्यवस्था बड़ी समस्या है।
► ऐसे बच्चों के लिए प्रवास अवधि के दौरान विशेश अवधि के छात्रावास/आवासीय शिविर।
► उन स्थान पर कार्यस्थल विद्यालय जहाँ प्रवासियों के परिवार काम पर लगे हुए हैं।
► शैक्षिक स्वयंसेवकों की नियुक्ति जो प्रवासी परिवारों के साथ जा सकते हैं।
► प्रवासन पत्रक/कार्ड द्वारा प्रवासी बच्चों का पता लगाना ताकि उनकी शिक्षा निरन्तर बनायी रखी जा सके।

शहरी वंचित बच्चे

शहरी क्षेत्र में विद्यालय बीच में छोड़ने वाले, घरों में काम करने वाले, सड़कों पर घूमने वाले, किशोरियाँ, सेक्स कर्मियों के बच्चे वंचित बच्चों की श्रेणी में आते हैं। ऐसे बच्चों के लिए आवासीय शिविरों की योजना बनायी जा सकती है। बच्चों का यह वर्ग या तो अपने परिवार से भागा होता है या उनके माता-पिता में से एक या दोनों नहीं होते हैं। ऐसे 7
से 9 वर्श के वंचित बच्चों के शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कम अवधि (2 से 6 माह) के गैर-आवासीय सेतु पाठ्यक्रमों की योजना बनायी जा रही है।

कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा योजनाएँ

► सर्वशिक्षा अभियान
► प्राथमिक शिक्षा के लिए राश्ट्रीय पोशाहार सहायता कार्यक्रम
► मध्याह्न भोजन योजना
► कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय
► प्रारंभिक स्तर पर राश्ट्रीय बालिका शिक्षा कार्यक्रम
► शिक्षा गारंटी योजना
► वैकल्पिक ओैर नवीन शिक्षा
► महिला समाख्या: यह ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं की शिक्षा एवं सशक्तीकरण के लिए ठोस कार्यक्रम है।

पिछड़े बालकों की शिक्षा के लिए केंद्रीकृत योजना

► माध्यमिक स्तर पर नि:शक्तजन समावेशी शिक्षा योजना
(ईडीएसएस) वर्ष 2009-10 से प्रारम्भ की गई है। यह योजना नि:शक्त बच्चों के लिए एकीकृत योजना (आईईडीसी) संबंधी पहले की योजना के स्थान पर है और कक्षा IX & XII में पढने वाले नि:शक्त बच्चों की समावेशी शिक्षा के लिए सहायता प्रदान करती है।
► समावेशी शिक्षा योजना को वर्ष 2013 से राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आरएमएसए) के अंतर्गत सम्मिलित कर लिया गया है।
► पिछड़े बालकों की शिक्षा के लिए शिक्षार्थी अभिमुखी घटक जैसे चिकित्सा और शैक्षिक निर्धारण, पुस्तकें और लेखन सामग्री, वर्दियां, परिवहन भत्ता, पाठक भत्ता, बालिकाओं के लिए वृत्तिका, सहायक सेवाएँ, सहायक युक्तियाँ, भोजन और आवास सुविधा, रोगोपचार सेवाएँ, शिक्षण-अधिगम सामग्री इत्यादि का प्रावधान किया गया है।

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