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अध्याय 10 उपलब्धि का मूल्यांकन तथा विभिन्न प्रकार के प्रश्नों का निर्माण (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 10 उपलब्धि का मूल्यांकन तथा विभिन्न प्रकार के प्रश्नों का निर्माण

उपलब्धि का मूल्यांकन

शिक्षार्थी की उपलब्धि का मूल्यांकन लिखित तथा मौखिक दो प्रकार से होता है। शिक्षार्थियों के मूल्यांकन के लिए निबंधात्मक एवं वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाते हैं और उत्तर के आधार पर अधिगम का मूल्यांकन किया जाता है। अधिगम के मूल्यांकन के लिए ग्रेडिंग पद्धति के प्रयोग को श्रेष्ठ माना जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षार्थी की उपलब्धियों की रिपोर्ट तैयार करते समय समग्र ज्ञान में ग्रेडिंग के पाँच बिन्दुओं का प्रयोग किया जा सकता है। इन ग्रेडों में अंको का वितरण इस प्रकार किया जाना चाहिए:
ग्रेड परिणाम अंक (प्रतिशत)
ए+ सर्वोत्कृष्ट 90% – 100% ए उत्कृष्ट 75% – 89%
बी बहुत अच्छा 56% – 74% सी अच्छा 35% – 55% डी औसत 35% से कम

रचनात्मक मूल्यांकन

► रचनात्मक मूल्यांकन शिक्षक को बताता है कि सीखे गये पाठ को शिक्षार्थी किस तरह आत्मसात एवं उपयोग कर रहे हैं। शिक्षार्थी किस प्रकार विकसित हो रहे हैं इसका उत्तर पाने में मदद मिलती है। मनोवैज्ञानिक सेडलर के अनुसार, ‘‘रचनात्मक मूल्यांकन में प्रतिपुष्टि अर्थात् फीडबैक तथा आकलन सम्मिलित होते हैं।’’
ब्लैक एवं विलियम के अनुसार, ‘‘रचनात्मक मूल्यांकन अध्यापन की तरह वर्ष भर चलता रहता है।’’
► रचनात्मक मूल्यांकन अध्यापन का सतत चलने वाला आकलन है जिसके माध्यम से शिक्षक शिक्षार्थियों की गतिविधियों में संशोधन करते हैं। इसे योगात्मक मूल्यांकन भी कहते हैं। यह वर्ष के अन्त में शिक्षक को यह जानने में सहायक होता हैं कि शिक्षार्थी ने क्या सीखा है। शिक्षक मूल्यांकन करने का प्रयास करते हैं कि सीखी गई बातों को शिक्षार्थी लम्बी अवधि में किस तरह लागू करते हैं। ये शैक्षणिक प्रक्रियाओं का समग्र रूप से मूल्यांकन करने की सतत प्रक्रिया है। आंकलन के रचनात्मक, योगात्मक तथा प्रामाणिक पहलू इसकी समग्रतावादी प्रकृति तथा शिक्षा के भीतर मूल्यांकन के अवसरों की जटिलता, दोनों की ओर संकेत करते हैं।

रचनात्मक मूल्यांकन के लिए अनुशंसाएँ

► नीति निर्धारकों तथा शिक्षा बोर्डों को स्कूली प्रक्रिया के विभिन्न स्तरों पर मानकीकृत परीक्षाएँ, अलग-अलग विशिष्ट विषयों के लिए, विशिष्ट कक्षाओं या स्तरों के लिए विकसित करनी चाहिए। व्यक्तिगत तथा सामूहिक, दोनों स्तरों पर सिखाने और सीखने का मूल्यांकन करना चाहिए। किसी विषय में शिक्षार्थी के व्यक्तिगत प्रदर्शन का मूल्यांकन उसके अन्य साथियों के सापेक्ष तथा उसी परीक्षा में बैठने वाले देश भर के शिक्षार्थियों के सापेक्ष और अन्तर्राष्ट्रीय रूप से अन्य देशों में उसी कक्षा के विद्यार्थियों के सापेक्ष होना चाहिए। स्कूल के बाहर शिक्षार्थियों को मुक्त स्थान तथा समय मिलना चाहिए ताकि वह परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन कर सके। शिक्षार्थियों के लिए आईटी तकनीक का अधिक प्रयोग करना चाहिए। आकलन की अवधारणा को नए सिरे से
गढ़ा जाना चाहिए ताकि शिक्षार्थी अर्थपूर्ण सीख सकें। पहुँच की पड़ताल में बच्चे के घरेलू जीवन का मूल्यांकन और स्कूल जाने के लिए उसको मिलने वाले अवसर तथा प्रोत्साहन का मूल्यांकन करना चाहिए। स्कूल पहुँचने के लिए यातायात के साधन की उपलब्धता, बच्चे/उसके माता-पिता की स्कूल पहुँचने के सार्वजनिक यातायात का खर्च उठाने की क्षमता, बच्चों को स्कूल भेजने की परिवार की आर्थिक क्षमता इन सभी का मूल्यांकन करना जरूरी है।

रचनात्मक मूल्यांकन का सिद्धांत

शिक्षार्थी की निजी रुचियों के प्रासंगिक होने पर ही विषय-वस्तु सीखाने का काम कर सकती है। शिक्षार्थी अपने विद्यालय या परिवेश से भयभीत न हो तो उसके सीखने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। शिक्षार्थी की पहल पर शुरू किया गया शिक्षण लंबे समय तक टिकता है और याद रहता है।

रचनात्मकता मूल्यांकन कार्यान्वयन

► रचनात्मकता शिक्षण की एक ऐसी रणनीति है जिसमें शिक्षार्थी के पूर्व ज्ञान, आस्थाओं और कौशल का प्रयोग किया जाता है। रचनात्मक रणनीति के माध्यम से विद्यार्थी अपने पूर्व ज्ञान और सूचना के आधार पर नई किस्म की समझ विकसित करता है।
► इस शैली पर काम करने वाला शिक्षक प्रश्न उठाता है और शिक्षार्थी के जवाब तलाशने की प्रक्रिया का निरीक्षण करता है, उन्हें निर्देशित करता है तथा सोचने-समझने के नए तरीकों का सूत्रपात करता है। कच्चे आंकड़ों, प्राथमिक स्रोतों और संवादात्मक सामग्री के साथ काम करते हुए रचनात्मक शैली का शिक्षक, शिक्षार्थियों को अपने जुटाए आंकड़ों पर काम करने की छूट देता है और स्वयं की तलाश को निर्देशित करने का काम करता है। शिक्षार्थी समझने लगता है कि शिक्षण दरअसल एक ज्ञानात्मक प्रक्रिया है। इस किस्म की शैली हर उम्र के शिक्षार्थियों के लिए कारगर है, यह वयस्कों पर भी काम करती है। रचनात्मकता मूल्यांकन योजनाओं को सीखने और सिखाने के बारे में शिक्षकों के विचारों को व्यक्त करने का साधन होना चाहिए।
► यह कक्षा के सन्दर्भ में मूल्यांकन सिद्धान्तों के अर्थ की खोज में बढ़ाया जाने वाला पहला कदम है।
► इसे शैक्षणिक सिद्धान्तों पर गहराई से विचार करने का और उन्हें समझने का सोचा-समझा प्रयास होना चाहिए।
► शिक्षक मूल्यांकन योजनाओं को साधन के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। शिक्षा को लेकर अस्पष्ट विचारों को हटा देना चाहिए।

शिक्षार्थियों का मार्गदर्शन एवं परामर्श

शिक्षार्थियों के व्यक्तिगत मार्गदर्शन का मुख्य उद्देश्य उसके संतुलित विकास में सहायता करना है। व्यक्ति या शिक्षार्थी विभिन्न समस्याओं का सामना कर रहा होता है और उसका निराकरण आवश्यक हो जाता है। इसमें समस्या का निदान तथा उपचार किया जाता है। इसके लिए सुझाव, लगाव, शोधन, पुनर्शिक्षण आदि विधियों से उपचार किया जाता है। जटिल समस्याओं के लिए मनोविश्लेषण तथा सामूहिक चिकित्सा आदि की मदद ली जाती है।

शैक्षिक निर्देशन

शैक्षणिक निर्देशन का अर्थ उस व्यक्तिगत सहायता से है जो शिक्षार्थियों को इसलिए प्रदान की जाती है कि वे अपने लिए उपयुक्त शिक्षालय, पाठ्यक्रम, पाठ्य-विषय एवं स्कूली जीवन का चयन कर सकें और उनसे समायोजन कर सकें। इसमें शिक्षार्थियों की सीखने की समस्याओं का निदान तथा उनका उपचार किया जा सकता है। इसके लिए अनुस्थापन वार्ता, मनोवैज्ञानिक परीक्षण, तथ्य संकलन, साक्षात्कार तथा अनुवर्ती अध्ययन आवश्यक है।

व्यक्तिगत निर्देशन

निर्देशन की इस प्रक्रिया में व्यक्ति या शिक्षार्थी की व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान के लिए सहायता दी जाती है। शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिगत मार्गदर्शन निम्न प्रकार से दिया जा सकता है:
► अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करके
► उत्तरदायित्व की भावना का विकास करके
► खेलों तथा पाठ्य-सामग्री क्रियाओं का आयोजन करके
► स्वास्थ्य के प्रति चेतना का विकास करके
► मानवीय गुणों का विकास करके
► शिक्षार्थियों में सहयोग तथा नेतृत्व का विकास करके

निर्देशन की विधियाँ

निर्देशन कार्यक्रम व्यापक उद्देश्य वाला कार्य है, इसलिए इसमें विभिन्न विधियों की मदद ली जाती है। कुछ प्रमुख विधियाँ, जिनका उपयोग निर्देशन के लिए किया जाता है, वो निम्नलिखित है-
► परीक्षण विधि
► अवलोकन विधि
► परिमापन विधि
► घटना संबंधी तथ्य
► स्वानुभव विधि
► अन्य विधि

परामर्श की अवधारणा

► परामर्श का शाब्दिक अर्थ सलाह करना, परस्पर मतों का आदान-प्रदान तथा एक साथ मिलकर किसी कठिनाई या समस्या पर सोचना है। दैनिक जीवन में आने वाली कठिनाईयों का समाधान हम प्राय: अपने से बड़े, अनुभवी और समझदार व्यक्तियों की सलाह से करते हैं। परामर्श, परामर्शदाता तथा परामर्श लेने वाले के बीच एक प्रत्यक्ष संबंध है। परामर्श व्यक्ति की समस्याओं के समाधन की प्रक्रिया है।
► कार्ल रोजर्स के अनुसार परामर्श एक निश्चित रूप से स्वीकृत संबंध है जो परामर्श लेने वाले को स्वयं को समझने में सहायता प्रदान करता है, जिससे उसका अधिक से अधिक विकास हो सके।
► परामर्श की प्रक्रिया में सम्पूर्ण तथ्यों का संकलन किया जाता है। शिक्षार्थियों के सभी अनुभवों का अध्ययन किया जाता है, शिक्षार्थियों की योग्यताएं विशेष परिस्थिति के अनुसार देखी जाती है और समस्या समाधन के लिए शिक्षार्थियों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सहायता दी जाती है। परामर्श दो व्यक्तियों, परामर्शदाता एवं परामर्श लेने वाले में एक व्यक्तिगत और गतिशील संबंध है। इनमें दूसरा व्यक्ति अपनी समस्या पहले व्यक्ति की सलाह से सुलझाता है। दोनों मिलकर समस्या पर काम करते हैं, ताकि समस्या को अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जा सके तथा परामर्श लेने वाले को स्वयं समस्या सुलझाने में सहायता प्रदान की जाती है।

परामर्श के प्रमुख तत्त्व

विलियम कोटल ने परामर्श के निम्नलिखित तत्त्व बताए हैं। जो निम्न प्रकार से है:ं
► दो व्यक्तियों में पारस्परिक संबंध स्थापित होना।
► परामर्शदाता एवं परामर्शप्रार्थी के मध्य विचार-विमर्श के अनेक साधन होना।
► परामर्शदाता अपने कार्य को पूर्ण ज्ञान से करता है।
► परामर्शदाता का स्वरूप, परामर्शप्रार्थी की भावनाओं के अनुरूप परिवर्तित होता रहता है।
► प्रत्येक उपबोधन साक्षात्कार निर्मित होता है।
► परामर्श की तकनीक एवं उपकरण

निर्देशक परामर्श

इस प्रकार के परामर्श में परामर्शदाता केन्द्र में होता है अर्थात् परामर्श लेने वाले से अधिक योग्य, अनुभवी, तार्किक और समझदार होने के कारण परामर्शदाता महत्त्वपूर्ण होता है।
यह क्रिया निम्न चरणों द्वारा पूर्ण होती है।
► विश्लेषण – एकत्रित आंकड़ों का विश्लेषण किया जाता है।
► संश्लेषण – विश्लेषण करने के उपरांत सभी संमको में समन्वय किया जाता है।
► निदान – तत्पश्चात समस्या के कारणों की जाँच की जाती है।
► पूर्वानुमान – परामर्श लेने वाले की समस्याओं के भावी स्वरूप का अनुमान लगाया जाता है।
► उपचार – यह सभी चरणों से महत्त्वपूर्ण और जटिल होता है।

अनिर्देशक परामर्श

इस प्रविधि में परामर्श, परामर्श लेने वाले पर केन्द्रित तथा स्वतंत्र होता है। इसमें व्यक्ति स्वयं सक्रियता से समस्या निदान का प्रयास करता है तथा उसे अपनी समस्याओं से अन्तर्दृष्टि प्राप्त होती है। इसे निम्न चरणों में पूर्ण करते हैं:
► परामर्शदाता व्यक्ति की आवश्यकताओं की पहचान करता है।
► परिस्थिति और समस्या के विश्लेषण के उपरांत उपयुक्त परिवेश का निर्माण करता है।
► परामर्शदाता, परामर्श लेने वाले से सहयोग, सहानुभूति और मैत्री का संबंध स्थापित करता है। वह परामर्श लेने वाले की समस्या को गंभीरता से समझता है तथा उसके सकारात्मक एवं नकारात्मक अनुभूतियों का अन्तर स्पष्ट करता है। नकारात्मक अनुभूतियों को केन्द्र में रखते हुए परामर्श लेने वाले को उसकी अन्तर्दृष्टि को कार्यरूप में परिवर्तित करने में सहायता देना। वह समस्या समाधन की प्रक्रिया शुरू करता है।

समन्वयित परामर्श

इसमें परामर्शदाता सबसे पहले परामर्श लेने वाले के व्यक्तित्व और आवश्यकताओं की ओर ध्यान देता है। वह निर्देशन प्रविधि से प्रारंभ करता है और स्थिति के अनुसार कभी निर्देशक और कभी अनिर्देशक विधि का प्रयोग करता है। इस प्रविधि को निम्न चरणों में पूर्ण करते हैं:
► समस्या के कारण का निदान
► समस्या का विश्लेषण
► परिवर्तन की अस्थायी योजना
► निर्देशन की प्रभावी दशा प्राप्त करना
► साक्षात्कार और प्रोत्साहन
► समस्याओं का सुलझाव

प्रश्न पूछना

रेमाउण्ट के अनुसार, अच्छी प्रश्न कला की तकनीक को जानना, एक युवा शिक्षक का सर्वाधिक आवश्यक उद्देश्य होना चाहिए।
► कक्षा में प्रश्नों के पूछते रहने से कक्षा का माहौल जीवंत बना रहता है। इससे छात्रों में भी उत्तर देने की उत्सुकता बढ़ती है।
► प्रश्नों के द्वारा शिक्षार्थियों में चिंतन एवं शिक्षण क्रियाशीलता बनी रहती है।

प्रश्न पूछने के उद्देश्य

► शिक्षार्थी को पाठ के बारे में पढ़ने के लिए प्रेरित करना।
► पढ़ाये गये पाठ का आकलन करना।
► पाठ को समझने में हो रही कठिनाई को दूर करना।
► शिक्षार्थी से मौखिक प्रश्न पूछ कर दबाव बनाना ताकि महत्वपूर्ण विषय पढ़ाई से छूट ना जाये।

अच्छे प्रश्न की विशेषताएं

► द्विअर्थी वाले वाक्यों से प्रश्न नहीं बनाने चाहिए। जैसे भारत का सबसे बड़ा राज्य कौन-सा है? यहाँ राज्य क्षेत्रफल या जनसंख्या के अनुसार से बड़ा है, यह स्पष्ट नहीं है।
► किसी निश्चित क्रम में उत्तरों को रखने से बचना चाहिए।
► यदि सही उत्तर एक निश्चित क्रम में आने लगते हैं तो शिक्षार्थी उस क्रम को समझ जाते हैं और उस क्रम के आधार पर ही सही उत्तर दे देते हैं। अत: सही उत्तर के लिए कोई क्रम नहीं बने इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
► प्रश्न बनाने के लिये पाठ्य पुस्तक के वाक्यों का प्रयोग नहीं करना चाहिए और अपने शब्दों में प्रश्नों की रचना करनी चाहिए। प्रत्येक प्रश्न का विशिष्ट उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए, जैसे भारत के पहले प्रधानमंत्री कौन थे?
► प्रश्न परस्पर संबंधित नहीं होने चाहिए अर्थात् दो प्रश्न मिलते-जुलते नहीं होने चाहिए।
► प्रश्नों की रचना में कठिनाई स्तर तथा वैधता का भी ध्यान रखना चाहिए। प्रश्न ज़रुरत से ज़्यादा कठिन नहीं होना चाहिए। कक्षा स्तर तथा छात्रों के आयुस्तर को ध्यान में रखकर प्रश्न पूछे जाने चाहिए।
► प्रश्न का प्रारूप इस प्रकार होना चाहिए कि शिक्षार्थी यह समझ सकें कि उन्हें क्या करना चाहिए तथा परीक्षक उनके उत्तर का मूल्यांकन किस रूप में करेंगे।
► चिंतन को बढ़ावा देने के लिए प्रश्न पूछते रहना चाहिए।
► शिक्षक को हमेशा अपने शिक्षार्थियों से प्रश्न पूछते रहना चाहिए ताकि शिक्षक को सीखने और शिक्षार्थियों को सीखते रहने में प्रेरणा मिलती रहे।

प्रश्नों के प्रकार

पूरक प्रश्न

► शिक्षण से जुड़े ऐसे प्रश्न जिनका उत्तर एक शब्द में या कई वाक्यों एवं अनुच्छेदों में दिया जा सकता है, उसे पूरक प्रश्न कहते हैं। अल्प-भाषी शिक्षार्थियों से संक्षिप्त पूरक प्रश्न पूछकर उन्हें अधिक सोचने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। खुले या पूरक प्रश्नों का प्रयोग शिक्षार्थियों को यह दर्शाता है कि शिक्षक उनका सम्मान करते हैं और अच्छे विचारों को प्रस्तुत करने के लिए उन पर विश्वास करते हैं। इसके फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली स्वायत्तता, जुड़ाव और सामर्थ्य का बोध सीखने वाले के रूप में उन्हें आत्मविश्वास प्रदान करता है।
► पूरक प्रश्न शैक्षणिक और सामाजिक पढ़ाई का समर्थन करते हैं और बच्चों की स्वाभाविक जिज्ञासा को बढ़ाते हैं तथा उन्हें स्वयं से सोचने की चुनौती देते हैं। इसके फलस्वरूप ऐसे शिक्षार्थी बनते हैं जो कि प्रेरित होते हैं और जिनके उत्तर उनके सहपाठियों को जानकारी देते हैं।
► पूरक प्रश्न प्राय: इस तरह के वाक्यांशों के साथ शुरू होते हैं, जैसे कि ‘क्या होता है अगर?’, या ‘आप क्या सोचते हैं कि क्या घटित होगा?’
► सरल अवधारणाएं, जैसे कि शिक्षार्थियों को प्रश्न का उत्तर देने से पहले सोचने के लिए थोड़ा अधिक समय देना, उन्हें बेहतर उत्तर देने तथा बेहतर सोचने का अवसर देगी।
► ज्यादा पूरक प्रश्नों का प्रयोग करने से पाठ अधिक संवादात्मक बनते हैं, विशेष रूप से उस समय जबकि शिक्षार्थी प्रश्नों का उत्तर देने के लिए जोड़ों या समूहों में काम करते हैं।
► यह समस्त शिक्षार्थियों की भागीदारी में वृद्धि करता है और ज्यादा गहन पढ़ाई में सहायता करता है।

निबंधात्मक प्रश्न

► निबंधात्मक प्रश्न का अर्थ ऐसे प्रश्न से है जिसका उत्तर एक या एक से अधिक पृष्ठों में लिखा जा सकता है।
► इस प्रकार के प्रश्न शिक्षार्थियों के विषय की समझ एवं भाषा लेखन के आकलन करने के लिए पूछे जाते हैं। इसे निबंध परीक्षा भी कहते हैं। इन प्रश्नों में शिक्षार्थी विषय की परिभाषा, व्याख्या तथा विश्लेषण करते हैं।
► उदाहरणस्वरूप, दिल्ली में वायु प्रदूषण की स्थिति पर विचार कीजिए। इस प्रश्न में वायु प्रदूषण की परिभाषा, दिल्ली में उसकी स्थिति की व्याख्या तथा उसके प्रभावों का विश्लेषण किया जाएगा।

निबंधात्मक प्रश्न पूछने के उद्देश्य

► शिक्षार्थियों द्वारा लिखी गयी विषय वस्तु की जांच कर उसका मूल्यांकन करना।
► शिक्षार्थियों द्वारा अर्जित ज्ञान से मिलते-जुलते तथ्यों को देखना।
► विषय की समस्या एवं मुद्दों का आकलन करना।
► अनुमान के आधार पर सूचनाओं एवं तथ्यों को व्यवस्थित करना तथा उसका विश्लेषण करना।
► तथ्यों एवं अवधारणा के अनुसार अपने विचार प्रकट करना।

लघु उत्तरीय प्रश्न

► जिन प्रश्नों का उत्तर बहुत छोटा अर्थात् एक, दो, तीन या चार पंक्तियों में देना होता हैं, उसे लघु उत्तरीय परीक्षा कहा जाता है।
► यह निबन्धात्मक परीक्षा का ही परिष्कृत रूप है। इनमें निबन्धात्मक परीक्षाओं की अपेक्षा अधिक प्रश्न पूछे जा सकते हैं। अत: इस परीक्षा में पाठ्यक्रम के अधिक अंश से संबंधित ज्ञान की जाँच की जाती हैं। इनके उत्तर भी अपेक्षाकृत अधिक निश्चित होते हैं। इनमें शिक्षार्थियों की बोधशक्ति तथा ज्ञान का मूल्यांकन होता है।
► उदाहरणस्वरूप, दिल्ली का कुतुब मीनार क्यों प्रसिद्ध है?
(प्रश्नात्मक)
► सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं में चार अंतर बताइए। (कथनात्मक)

लघु उत्तरीय प्रश्न के उद्देश्य

► लघु उत्तरीय प्रश्न का प्रयोग वार्षिक एवं आंतरिक परीक्षाओं में किया जाता है।
► इस प्रकार के प्रश्न वस्तुनिष्ठ अध्ययन के लिए उपयोगी होते हैं।
► प्रश्नों में पाठ्यक्रम को अधिक से अधिक शामिल करने के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न पूछे जाते हैं।

अति लघुउत्तरीय प्रश्न

► अति लघुउत्तरीय प्रश्न, वस्तुनिष्ठता तथा निश्चित परीक्षा बिन्दु का आकलन करने के लिए पूछे जाते हैं।
► इस प्रकार के प्रश्नों में शब्द, पदबंध, वाक्य एवं अलंकार संबंधी प्रश्न पूछे जाते हैं। इनके उत्तर एक वाक्य या शब्द में दिए जा सकते हैं।

अति लघुउत्तरीय प्रश्न के उदाहरण

रिक्त स्थान की पूर्ति: इस प्रकार के प्रश्न शिक्षार्थियों के भाषिक ज्ञान की अभिव्यक्ति को समझने के लिए पूछे जाते हैं। जैसे- पेड़ के पत्ते हरे होते हैं क्योंकि …..।
समानार्थक प्रकार के प्रश्न: अनुच्छेदों द्वारा शिक्षार्थी के विचार, वाक्य संरचना, समानार्थक एवं विलोम शब्द के ज्ञान का आकलन किया जाता है।
स्थानीय प्रकार के प्रश्न: शिक्षार्थियों के मानचित्र एवं भूगोल कौशल का मूल्यांकन करने के लिए ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं। जैसे नक्शे में ताजमहल को दर्शाएँ।
रूपान्तरण प्रश्न: इस प्रकार के प्रश्न भाषा ज्ञान जैसे कथन, वाक्य, वाक्य रूपान्तरण आदि के मूल्यांकन के लिए पूछे जाते हैं।

चित्रात्मक प्रश्न

► प्राथमिक कक्षा के शिक्षार्थियों के अधिगम का मूल्यांकन करने के लिए चित्रात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।
► शिक्षार्थियों को कोई चित्र दिखाकर उसके आधार पर प्रश्न पूछे जाते हैं। जैसे किसी फल का चित्र दिखाकर उसका नाम पूछा जाता है।

निर्वचनात्मक प्रश्न

► एक तालिका, चार्ट या सारणी की मदद से विविध विषयों में शिक्षार्थियों के ज्ञान का मूल्यांकन करने के लिए ऐसे प्रश्न बनाए जाते हैं। इस प्रकार के प्रश्न विषय से संबन्धित विभिन्न पक्षों को जानने के लिए पूछे जाते हैं।
► उदाहरणस्वरूप जनसंख्या तालिका को देखकर किसी जिले की जनसंख्या, स्त्री-पुरुष अनुपात आदि के बारे में जाना जा सकता है।

रिक्त स्थान के प्रश्न

► इस प्रकार के प्रश्नों में एक कथन और उस कथन में उत्तर देने के लिए एक या एक से अधिक रिक्त स्थान दिये जाते हैं। इन रिक्त स्थानों को शिक्षार्थी दिये गये विकल्पों से अथवा स्वयं भरते हैं। उदाहरणस्वरूप, भारत की राजधानी _______ है। (दिल्ली)
वैकल्पिक प्रश्न: इस प्रकार के प्रश्न में शिक्षार्थी को सत्य/असत्य तथा सही/गलत हाँ/नहीं जैसे विकल्पों के बीच एक सही उत्तर का चयन करना पड़ता है।
मिलान प्रकार के प्रश्न: इस प्रकार प्रश्न में दो तालिका दी होती हैं। एक तालिका में दिये गये शब्द या कथन को दूसरी तालिका में दिये गये शब्द या कथन से मिलाना होता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न: इस प्रकार के प्रश्न में शिक्षार्थी को उत्तर का चयन करने के लिए सामान्यत: चार या चार से अधिक विकल्प दिये जाते हैं। प्रश्न में दिये गये कथन को पढ़कर सही विकल्प का चयन करना होता है।

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