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अध्याय 10. इतिहास – भारतीय इतिहास के स्रोत (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 10. इतिहास – भारतीय इतिहास के स्रोत

यूँ तो भारतीय इतिहास की जानकारी के संबंध में अनेक साधन उपलब्ध हैं, किन्तु भारत के प्राचीन इतिहास की जानकारी के साधन संतोशप्रद नहीं हैं। इनकी न्यूनता के कारण अति प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं शासन का क्रमबद्ध इतिहास नहीं मिलता है। फिर भी ऐसे साधन उपलब्ध हैं जिनके अध्ययन से अतीत और वर्तमान भारत के निकट के संबंध की जानकारी मिलती है। प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोतों का विभाजन निम्नलिखित रूप में किया जा सकता है: उपर्युक्त वर्गीकृत साधनों में से भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं – धर्मग्रंथ, वैदिक धर्मग्रंथ, जैन धर्मग्रंथ, ऐतिहासिक एंव समसामयिक ग्रंथ और पुरातत्व संबंधी साक्ष्य।
धर्मग्रंथ
भारतीय इतिहास को जानने मे विभिन्न धर्मग्रंथ, वैदिक बौद्ध तथा जैन ग्रंथ काफी सहायक हैं। इनमें सबसे प्राचीनतम वेद हैं। वैदिक मंत्रों तथा संहिताओं की गद्य टीकाओं को ब्राह्मण कहा जाता है। पुरातन ब्राह्मण में ऐतरेय, शतपथ, पंचविश, तैत्तिरीय आदि विशेश महत्वपूर्ण हैं। उपनिशदों में बृहदारण्यक तथा छान्दोग्य सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। इन ग्रंथों में बिम्बिसार के पूर्व के भारत की अवस्था जानी जा सकती है। पुराणों की कुल संख्या अठारह है। इनकी रचना का श्रेय ’सूत’ लोकहर्शण अथवा उनके पुत्र उग्रश्रवा को दिया जाता है। पुराणों में पाँच प्रकार के विशयों का वर्णन सिद्धांत: इस प्रकार है – सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर तथा वंशानुचरित। वेदों में यज्ञों एंव कर्मकांडों के विधान को समझने हेतु ब्राह्मण ग्रंथ की रचना हुई। ब्राह्मण ग्रंथों में स्मृतियों का भी ऐतिहासिक महत्व है। मनुस्मृति में, जिनकी रचना संभवत: दूसरी शताब्दी में की गयी है, धार्मिक तथा सामाजिक अवस्थाओं को पता चलता है। वेद और उनके ब्राह्मण ग्रंथ इस प्रकार हैं – ़ ग्वेद – ऐतरेय व कौशीतकि यजुर्वेद – शतपथ या वाजसनेय सामवेद – पंचविश अथर्ववेद – गोपथ
वैदिक धर्मग्रंथ
वैदिक ग्रंथों में सबसे प्रमुख वेद हैं। वेद आर्यों के प्राचीनतम ग्रंथ हैं। जो चार हैं: ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। सबसे पुराना वेद है। इसकी रचना 3500 साल पहले हुई। ऋग्वेद में एक हजार से ज्यादा प्रार्थनाएँ हैं, जिन्हें सूक्त कहा गया है। ऋग्वेद की भाशा प्राक् संस्कृत या वैदिक संस्कृत कहलाती है। वेदांग: युगान्तर में वैदिक अध्ययन के लिए छ: विधाओं की शाखाओं का जन्म हुआ जिन्हें वेदांग कहते हैं। वेदांग का शाब्दिक अर्थ है वेदों का अंग। इनकी कुल संख्या छ: है – शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द शास्त्र तथा ज्योतिश। आरण्यक ग्रंथों, जिनकी कुल संख्या सात है, में दार्शनिक एवं रहस्यात्मक विशयों का वर्णन है।
धार्मिक साहित्य के ब्राह्मण ग्रंथों के अतिरिक्त अब्राह्मण ग्रंथों से उस समय की विभिन्न अवस्थाओं का पता चलता है। इनसे वैदिक काल के प्रमुख दर्शन, बौद्ध-जैन आदि का पता चलता है।
बौद्ध धर्मग्रंथ
बौद्ध मतावल्बियों ने जिस साहित्य का सृजन किया, उसमें भारतीय इतिहास की जानकारी के लिए प्रचुर सामग्रियाँ निहित हैं। ’त्रिपिटक’ इनका महान ग्रंथ है। सुत्त, विनय तथा अभिधम्म मिलकर ’त्रिपिटक’ कहलाते हैं। बौद्ध ग्रंथ ’अगुंत्तर निकाय’ (चौथा निकाय) में छठी शताब्दी ई.पू. के सोलह महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। बौद्ध धर्मग्रंथ मुख्यत: पाली भाशा में लिखे गये हैं। जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्व जीवन से संबंधित घटनाओं का वर्णन मिलता है। इनकी संख्या 549 है। वैदिक कालीन प्रमुख दर्शन और उनके प्रवर्तक निम्नलिखित हैं –
दर्शन – प्रवर्तक
सांख्य – कपिल
योग – पतंजलि
वैशेशिक – कणाद
न्याय – गौतम पू
र्व मीमांस – जैमिनी
चार्वाक – चार्वाक
जैन धर्मग्रंथ
जैन ग्रंथ प्रधानत: धार्मिक है। ये प्रधानत: धार्मिक है। इन ग्रंथों में ’परिशिश्ट पर्वत’ विशेश महत्वपूर्ण है। जैन धर्मग्रंथों की रचना मुख्यत: प्राकृत भाशा में हुई है। ज्ञात हो कि वैदिक संस्कृत के समानान्तर प्राकृत भाशा आम बोलचाल की भाशा थी।
’भद्रबाहु चरित्र’ दूसरा प्रसिद्ध जैन ग्रंथ है, जिसमें जैनाचार्य भद्रबाहु के साथ-साथ चन्द्रगुप्त मौर्य के संबंध में भी उल्लेख मिलता है। जैन ग्रंथों में कथा कोश, त्रिलोक प्रज्ञस्ति, कालिका पुराण, कल्प सूत्र, भद्रबाहु चरित्र, उत्तराध्ययन सूत्र आदि भारतीय इतिहास की सामग्रियाँ प्रस्तुत करते हैं। इन ग्रंथों का संकलन वल्लभी (वर्तमान गुजरात) में छठी शताब्दी में हुआ था।
ऐतिहासिक एवं समसामयिक ग्रंथ
ऐसे अनेक विशुद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ हैं जिनमें केवल सम्राट तथा शासन से संबंधित तथ्यों का ही उल्लेख किया गया है। ऐसे ग्रंथों में कल्हण कृत ’राजतरंगिणी’ (1148 ई.) नामक ग्रंथ आता है, जो पूर्णत: ऐतिहासिक है। कश्मीर के सारे नरेशों के इतिहास जानकारी इस प्रसिद्ध ग्रंथ से मिलती है।
► इसी श्रेणी में सिंहल के दो ग्रंथ – दीपवंश और महावंश भी आते हैं, जिनमें बौद्ध भारत का उल्लेख मिलता है।
► गुप्तकालीन विशाखदत्त का ’मुद्राराक्षस’ सिकन्दर के आक्रमण के शीघ्र बाद ही भारतीय राजनीति का उद्घाटन करता है।
► कौटिल्य (चाणक्य) का ’अर्थशास्त्र’ भी इस संबंध में महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इस ग्रंथ में रचनाकार की तत्कालीन रचना पद्धति पर प्रकाश डाला गया है।
► पणिनी का ’अश्टाध्यायी’ एक व्याकरण ग्रंथ होते हुए भी मौर्य पूर्व तथा मौर्यकालीन राजनीतिक अवस्था पर प्रकाश डालता है।
► इसी तरह पतंजलि का ’महाभाश्य’ भी राजनीति के संबंध में चर्चा करता है।
विदेशी विवरण: देशी लेखकों के अतिरिक्त विदेशी लेखकों के साहित्य से भी प्राचीन भारत के इतिहास पृश्ठ निर्मित हुए हैं। टेसियस, मेगास्थनीज, टॉलमी, प्लिनी आदि यूनानी रोमन लेखकों के विवरण से हमें प्राचीन भारत के इतिहास का पता चलता है। मेगास्थनीज सेल्यूकस निकेटर के राजदूत थे, जिनके ग्रंथ ’इण्डिका’ में मौर्य-युगीन समाज व संस्कृति के विशय में वृहत् जानकारी मिलती है। फाह्यान, ह्वेनसांग, इत्सिंग आदि चीनी लेखकों के विवरणों से हमें भारतीय इतिहास की जानकारी मिलती है। प्लिनी ने अपने ’प्राकृतिक इतिहास’ में भारतीय पशुओं, पौधों व खनिजों का वर्णन किया है। अल्बरूनी (अरबी लेखक) कृत ’तहकीक-ए-हिन्द’ में मध्यकालीन भारत के समाज की विस्तृत जानकारी मिलती है।
पुरातत्व संबंधी साक्ष्य
पुरातत्व संबंधी साक्ष्य, जैसे: अभिलेख, मुद्राएँ, भग्नावशेश स्मारक आदि के माध्यम से भारतीय इतिहास की जानकारी मिलती है।
अभिलेख: पत्थर अथवा धातु जैसी अपेक्षाकृत कठोर सतहों पर उत्कीर्ण किया गया लेख है। इसी तरह प्राचीनतम सिक्कों, जिसे आहत सिक्के या काशार्पण भी कहा जाता है, से भारतीय इतिहास की क्रमबद्ध झलकियाँ मिलती हैं।

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