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अध्याय 1 वृद्धि एवं विकास की अवधारणा तथा अधिगम से उसका संबंध (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 1 वृद्धि एवं विकास की अवधारणा तथा अधिगम से उसका संबंध

विकास की परिभाषाएं

विकास एक सतत् प्रक्रिया है। एक बालक का विकास जीवनपर्यन्त होता रहता है। बालक के विकास में शारीरिक, संवेगात्मक परिवर्तन, सामाजिक एवं मानसिक विकास शामिल होते हैं। यह प्रक्रिया बाह्य कारणों से प्रभावित होती है इसलिए विभिन्न चरणों में अपना स्वरूप बदलती है। विकास के फलस्वरूप हुए परिवर्तन परस्पर संबंधित होते हैं। इस विकास की प्रक्रिया से वैयक्तिक भिन्नताएँ प्रभावित होती हैं। इसके परिणामस्वरूप बालक में कई विशेशताएँ उभर कर सामने आती हैं।
मनोविज्ञानी ई. हरलॉक (E.Hurlock) का मानना है कि ‘‘शिक्षार्थी का विकास, अभिवृद्धि के साथ ही उसके व्यवस्थित एवं समनुगत (coherent pattern) परिवर्तन द्वारा होता है। इसमें लगातार परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम शामिल रहता है, जिसके कारण शिक्षार्थी में नवीन विशेशताएं तथा योग्यताएं प्रकट होती रहती हैं।’’ ‘व्यवस्थित’ (Orderly) शब्द का अर्थ विकास की प्रक्रिया में होने वाले परिवर्तनों के क्रम से है जो पूर्व परिवर्तनों पर आधारित होते हैं। जबकि समनुगत (coherent pattern) का तात्पर्य ऐसे परिवर्तनों से है जो संबंधविहिन नहीं होते हैं और उनमें परस्पर कोई ना कोई संबंध अवश्य रहता है।
मुनरो (Munro) के अनुसार, ’‘विकास किसी शिक्षार्थी में हो रहे परिवर्तनों की वह शृंखला है जो उसके भ्रूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक की अवस्था में चलता रहता है, इन प्रक्रियाओं को ही विकास कहते हैं।’’
गेसेल (Gesel) के अनुसार, ‘‘विकास, प्रत्यय से अधिक है। इसे देखा एवं जाँचा जा सकता है। साथ ही शरीर अंक विश्लेशण, शरीर ज्ञान तथा व्यवहारात्मक इन तीन दिशाओं में मापा जा सकता है। व्यावहारिक संकेत द्वारा विकासात्मक स्तर तथा विकासात्मक शक्तियों को दर्शाया जा सकता है।’’

विकास के सिद्धांत

प्रत्येक शिक्षार्थी का विकास निश्चित नियमों के आधार पर होता है। इन नियमों के आधार पर ही उसकी शारीरिक एवं मानसिक क्रियाएँ विकसित होती हैं। विकास के प्रमुख नियम निम्नलिखित प्रकार से हैं:
1. निश्चित प्रारूप: किसी बालक का विकास मस्तकाधोमुखी दिशा एवं निकट दूर दिशा में होता है।
मस्तकाधोमुखी विकास क्रम: इसमें बालक का विकास उसके सिर से लेकर पैर की ओर होता है।
निकट दूर विकास क्रम: इसमें बालक का विकास, केंद्रीय भागों से शुरू होकर दूर के भागों में होता है जैसे कि पेट एवं धड़ में विकास की क्रियाशीलता पहले आती है।
2. सामान्य से विशेष की ओर विकास: बालक, विकास के क्रम में पहले सामान्य तथा बाद में विशेश क्रियाएँ करता है। विकास का यह नियम शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक विकास पर लागू होता है।
3. स्थिर व्यक्तिगत विभेद: किसी बालक में शारीरिक क्रियाएँ जल्द होती हैं तो वह जल्द बोलने लगता है। वहीं किसी अन्य बालक में शारीरिक क्रियाएँ देर से शुरू होती हैं तो वह देर से बोलता है। इस प्रकार से किन्हीं दो बालकों के बीच विकास क्रम में विभेद हो सकता है जो सदैव स्थिर होती है।
4. अवस्था अनुसार विकास: बालक का विकास उसके अवस्था अनुसार होता है। जैसे- एक वर्श का बालक बोलने लगता है परंतु यह बोलने की प्रक्रिया उसके जन्म से ही शुरू हो जाती है। माता-पिता अपने बालक के साथ जन्म से ही कुछ-कुछ बोलने लगते हैं और वह सुनकर शब्दों को सीखना शुरू कर देता है।
5. विकास परिपक्वता एवं शिक्षण का परिणाम: परिपक्वता का अर्थ, बालक में आनुवंशिक रूप से शारीरिक गुणों का विकास है। बालक का अंग स्वत: शारीरिक क्रियाओं द्वारा परिपक्व हो जाता है। इसी प्रकार से शिक्षण द्वारा सीखने का परिपक्व आधार बनता है। जैसे- वस्तुओं को हाथों से पकड़ना आदि।

वृद्धि एवं विकास में अंतर

वृद्धि: विकास क्रम में बालक के शरीर की लंबाई, चौड़ाई तथा भार में बदलाव होते रहते हैं। सामाजिक वातावरण, भोजन तथा जलवायु आदि से यह परिवर्तन प्रभावित होता है। हम बालक के शरीर की वृद्धि को माप सकते हैं। यदि यह वृद्धि पूर्व की अपेक्षा अधिक हो तो इसे सामान्य वृद्धि कहते हैं।
सोरेनसन (Sorenson) के अनुसार, ‘अभिवृद्धि का अर्थ शरीर तथा शारीरिक अंगों के भार एवं आकार में परिवर्तन होना है, इस वृद्धि को मापा जा सकता है।’ विकास: जीवन चक्र में समय-समय पर होने वाले परिवर्तनों को ही विकास कहते हैं। विकास के द्वारा बालक क्रमश: परिपक्वता की ओर बढ़ता रहता है। जिसके कारण उसके विभिन्न गुणों एवं विशेशताओं में गुणात्मक परिवर्तन होते रहते हैं। किसी बालक के विकास में सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, मानसिक, शारीरिक एवं संवेगात्मक परिवर्तन शामिल होते है। इन परिवर्तनों को क्रमश: मा़त्रात्मक परिवर्तन तथा गुणात्मक परिवर्तन से मापते हैं। मात्रात्मक परिवर्तन जैसे आयु के साथ बालक का वजन बढ़ना, इसे हम माप सकते हैं। इसी प्रकार, गुणात्मक परिवर्तन अर्थात् नैतिक मूल्यों का निर्माण जैसे कूड़ा, कूड़ेदान में डालना। इसे हम शिक्षार्थी के व्यवहार को देखकर समझ सकते हैं।
वृद्धि एवं विकास में अंतर

वृद्धिविकास
वृद्धि द्वारा बालक के परिणामात्मक परिवर्तन जैसे-बालक की लंबाई, भार आदि कोमापते हैं।विकास के द्वारा बालक के व्यावहारिक परिवर्तन जैसे- कार्यकुशलता, कार्यक्षमता,व्यवहार में परिवर्तन को मापते हैं।
वृद्धि एक निश्चित उम्र के बाद रूक जाती है।विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जो जीवनपर्यन्त चलती रहती है। वृद्धि, विकास कीप्रक्रिया का एक भाग है।
बालक की वृद्धि होने के साथ-साथ विकास भी हो ऐसा आवश्यक नहीं।बालक की शारीरिक वृद्धि, अवरूद्ध हो जाने के बाद भी उसका विकास क्रम चलतारहता है।
वृद्धि का कोई निश्चित लक्ष्य नहीं होता है।बालक अपने विकास द्वारा जीवन में कुछ निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिशकरता है।
बालक की शारीरिक वृद्धि प्रत्यक्ष रूप से उसके विकास से संबंधित नहीं है।बालक के विकास का एक निश्चित क्रम होता है। जैसे पहले बोलना फिर लिखकरसीखना।

विकास के आयाम

► मानव विकास एक अनवरत चलने वाली क्रिया है। जहाँ शारीरिक विकास, बालक की आयु के साथ रूक जाता है वहीं मनोशारीरिक क्रियाओं में विकास की क्रिया चलती ही रहती है।
► बालक की मनोशारीरिक क्रियाओं में भाशायी, संवेगात्मक, सामाजिक तथा चारित्रिक विकास सन्निहित होते हैं। यह विभिन्न आयु स्तरों पर बदलता रहता है।
► बालक की विभिन्न आयु स्तरों को विकास के आयाम अथवा अवस्थाएँ कहते हैं।
► विकास के आयाम या अवस्था को लेकर अलग-अलग मनोवैज्ञानिकों की अवधारणा में अंतर है। रॉस के अनुसार विकास की चार अवस्था क्रमश: शैशवावस्था, पूर्व-बाल्यावस्था, उत्तर-बाल्यावस्था तथा किशोरावस्था हैं।
► हरलॉक ने बाल विकास को 11 भागों में विभाजित किया है। ये क्रमश: गर्भावस्था, शैशवावस्था, बचपनावस्था, पूर्व-बाल्यावस्था, उत्तर-बाल्यावस्था, वय:संधि, पूर्व-किशोरावस्था, उत्तर-किशोरावस्था, प्रौढ़ावस्था, मध्यावस्था तथा वृद्धावस्था हैं। विकास के प्रमुख आयाम:

आयाम या अवस्था लगभग आयु अवधि
गर्भावस्थागर्भाधान से लेकर बालक के जन्म तक9 माह 10 दिन
शैशवावस्थाजन्म से लेकर बालक के5 वर्शों तक 5 वर्श
बाल्यावस्था5 वर्श से लेकर बालक के12 वर्श तक 7 वर्श
किशोरावस्था12 वर्श से लेकर बालक के18 वर्श तक 6 वर्श
प्रौढ़ावस्था18 वर्श से अधिक60 से अधिक

इस प्रकार से मनोवैज्ञानिकों ने विकास को निम्नलिखित अवस्थाओं में बांटा है:
1. गर्भावस्था: इस अवस्था में बालक के शारीरिक विकास की गति तेज होती है।
2. शैशवावस्था: यह किसी बालक के जन्म से लेकर 15 दिन तक की अवस्था होती है। इस अवस्था में बच्चा नये वातावरण में माता-पिता के साथ समयोजित करता है अत: इसे समायोजन अवस्था भी कहते हैं।
3. बाल्यावस्था: इस अवस्था में बच्चे के अंदर सभी संवेग जैसे- प्रसन्नता, क्रोध, प्रेम, घृणा आदि विकसित होते हैं। यह अवस्था जन्म से लेकर दो वर्शों तक रहती है। इस अवस्था में बच्चों या शिक्षार्थियों में ‘जिज्ञासु’ प्रवृति पायी जाती है। वे अपने माता-पिता एवं शिक्षकों से तरह-तरह के सवाल करते हैं। बाल्यावस्था में समूह-प्रवृति का विकास होता है और वे अपने सहपाठियों के साथ रहना एवं खेलना पसंद करते हैं।
4. वय:संधि: इस अवस्था में शारीरिक परिपक्वता का विकास होता है और यौनांग विकसित होते हैं। 11 से 13 वर्श के बीच की अवस्था को वय:संधि अवस्था कहते हैं।
5. किशोरावस्था: इस अवस्था में बालकों को दैनंदिन की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वे कल्पनाशील होते हैं और सामाजिक समायोजन में उन्हें कठिनाई होती है। शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन के कारण संवेगात्मक, सामाजिक और नैतिक जीवन का स्वरूप बदलता रहता है। यह परिवर्तन की अवस्था है।
6. प्रौढ़ावस्था: 21 से 40 वर्श की आयु को प्रौढ़ावस्था कहते हैं। इस समय में व्यक्ति अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश करता है।

अधिगम का अर्थ और परिभाषा

अधिगम अर्थात् सीखना एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। मनोवैज्ञानिकों ने इसे एक मानसिक प्रक्रिया माना है जो जीवनभर चलती रहती है। इसमें बालक परिपक्वता की ओर बढ़ता है। वह अपने अनुभवों एवं प्रशिक्षणों से लाभ उठाकर स्वाभाविक व्यवहार या अनुभूति में प्रगतिशील परिवर्तन तथा परिमार्जन करता है। इसे ही अधिगम कहते हैं।
उदाहरण: एक बालक का आग से जलकर, दोबारा उसके पास न जाना अधिगम की प्रक्रिया है। बच्चे द्वारा केला या आम छीनना स्वभाविक (Instinctive) क्रिया है। हाथ फैलाकर आम माँगना सीखी हुई क्रिया है। अधिगम की विशेशताएँ:
► अधिगम का अर्थ सीखने की प्रक्रिया है जो हमेशा चलती रहती है।
► सामान्यत: व्यवहार में परिवर्तन को अधिगम कहते हैं। इसके द्वारा बालक अपने आस-पास घट रही घटनाओं को समझ पाता है।
► किसी विशय को रटकर याद कर लेने को अधिगम या सीखना नहीं कहा जा सकता है।
► बच्चे स्वभाव से ही सीखने के प्रति उत्सुक रहते हैं।
► यदि बालक शुरू में सीखने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो तो उसे नहीं पढ़ाना चाहिए। यह बाद में उनके सीखने की प्रवृति को प्रभावित करता है। वे बहुत से तथ्य भले ही याद कर लें परन्तु इससे उन्हें तथ्यों को अपने आसपास के परिवेश से जोड़ने में कठिनाई होती है।
► बालक विद्यालय एवं घर, दोनों ही स्थान पर सीखता है। यदि इन दोनों स्थानों पर सीखने के बीच सह-संबंध हो तो सीखने की प्रक्रिया मजबूत होती है।
► सीखने में सामाजिक संदर्भ तथा संवाद की विशेश भूमिका होती है। बालक अपने परिवेश में सुनकर तथा लोगों के व्यवहार को देखकर भी सीखता है। इसके द्वारा उसके संज्ञानात्मक विकास को बल मिलता है।
► बालक अवधारणाओं को परीक्षा के बाद भूल न जाएं इसके लिए सीखने की उचित गति को अपनाना चाहिए।
► सीखने या अधिगम की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण तथा विविधतापूर्ण होनी चाहिए। इससे बालक की सीखने के प्रति रूचि बनी रहती है।
परिभाषा: जे. पी. गिलफोर्ड के अनुसार, ‘‘व्यवहार के कारण व्यवहार में परिवर्तन ही अधिगम है।’’
गेट्स के अनुसार, ‘‘अनुभवों तथा प्रशिक्षणों द्वारा अपने व्यवहार का संशोधन तथा परिमार्जन करना ही अधिगम है।’’
स्किनर के अनुसार, ‘‘प्रगतिशील व्यवहार एवं व्यवस्थापन की प्रक्रिया को अधिगम कहते हैं।’’
अधिगम के प्रकार
1. ज्ञानात्मक अधिगम: यह बौद्धिक विकास तथा ज्ञान अर्जित करने की समस्त क्रियाओं में प्रयुक्त होता है। ज्ञानात्मक अधिगम तीन प्रकार के होते हैं: प्रत्यक्षात्मक, प्रत्ययात्मक तथा साहचर्यात्मक।
(i) प्रत्यक्षात्मक सीखना: बालक जब किसी वस्तु को देखकर, सुनकर या स्पर्श करके ज्ञान प्राप्त करता है तो उसे प्रत्यक्षात्मक सीखना कहते है। यह प्रक्रिया मुख्यत: शैशवावस्था एवं बाल्यावस्था में देखी जाती है।
(ii) प्रत्ययात्मक सीखना: बालक जब साधारण ज्ञान या अनुभव प्राप्त कर लेता है तो वह तर्क चिन्तन और कल्पना के आधार पर सीखने लगता है। इस प्रकार वह अनेक अमूर्त बातें सीख जाता है। इस प्रकार से सीखने की प्रक्रिया को प्रत्ययात्मक सीखना कहते हैं।
(iii) साहचर्यात्मक सीखना: जब पुराने ज्ञान तथा अनुभव के द्वारा किसी तथ्य को सीखा जाता है तो उसे साहचर्यात्मक सीखना कहते हैं।
2. भावात्मक अधिगम: इस प्रकार के अधिगम का सम्बन्ध ज्ञान व कौशल से नहीं होता है। इसका संबंध बालक के कोमल भावों या मनोभावनाओं से होता है। इस अधिगम द्वारा बालक किसी वस्तु को देखकर किसी आवाज को सुनकर या किसी लुभावने रंग को निरखकर आनन्द की अनुभूति करता है। इस अधिगम प्रक्रिया में यह आवश्यक है कि बच्चों की रुचि को ध्यान में रखा जाये।
3. क्रियात्मक अधिगम: इस अधिगम प्रक्रिया द्वारा कला एवं हस्तशिल्प में निपुणता प्राप्त की जाती है। संगीत, नृत्य, मॉडल बनाना, ड्रॉईंग आदि कौशल क्रियात्मक अधिगम के अन्तर्गत आते हैं। अधिगम के चरण: अधिगम के चरण क्रमश: इस प्रकार से हैं- तैयारी, उद्देश्य, प्रस्तुतीकरण, अभ्यास, शुद्धिकरण तथा पुन:अभ्यास।

विकास और अधिगम का संबंध

अधिगम अर्थात् सीखने की प्रक्रिया, बच्चे या शिक्षार्थी के शारीरिक विकास के विभिन्न चरणों से प्रभावित होती है। शारीरिक विकास के अनुसार ही शिक्षार्थी का मानसिक तथा संज्ञानात्मक विकास होता है।
1. शैशवावस्था तथा अधिगम:
गर्भावस्था किसी बच्चे के विकास की पहली अवस्था और शैशवावस्था दूसरी अवस्था होती है। जन्म से 3 वर्श तक बच्चे का शारीरिक एवं मानसिक विकास तेजी से होता है। जन्म से लेकर 6 वर्श तक अर्थात् शैशवावस्था में बच्चा देख-सुन कर सीखता है। गेसल के अनुसार, ‘‘शैशवावस्था में बच्चा बाद के 12 वर्शों की तुलना में दोगुना सीख लेता है।’’  बच्चे का विकास, अनुसरण एवं सीखी हुई बातों को दोहराने से होता है, इसलिए शिक्षक एवं माता-पिता दोहराने पर जोर देते हैं।
► इस काल में बच्चे का भार एवं लंबाई बढ़ती है और उसके अनुसार ही वे चलना एवं संतुलन स्थापित करना सीखते हैं।
► बच्चों में ध्यान, कल्पनाशीलता एवं संवेदना जैसी मानसिक क्रियाओं का विकास शैशवावस्था में ही होता है। वे किसी बात पर बुरा मानना, गुस्सा करना इसी समय सीखते हैं। इस समय उनमें हर बात को जानने की जिज्ञासा होती है और वे बहुत सवाल करते हैं।
► मनोवैज्ञानिक थॉर्नडाइक के अनुसार, इस समय बच्चा किसी भाशा को सहज ही सीख सकता है। इस अवस्था को शिक्षा की दृश्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।
► 2 से 5 वर्श में, शिशु में सामाजिक भावना का विकास होता है और वे अपने परिवार के प्रति लगाव रखने लगता है तथा छोटे भाई या बहन की सुरक्षा करने लगता है।
2. बाल्यावस्था तथा अधिगम:
बाल्यावस्था में बालक के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। 6
से 12 वर्श की अवस्था को बाल्यावस्था माना जाता है। इस अवस्था में बालक के भार एवं लंबाई दोनों में गुणात्मक वृद्धि होती है।
► इस समय बालक शैशवावस्था की तुलना में वास्तविकता की ओर अधिक आकर्शित होता है और उस वस्तु या परिदृश्य के बारे में जानना चाहता है।
► इस अवस्था में बालक के चिंतन एवं तर्क शक्तियों का विकास होता है और वह पढ़ने के प्रति रूचि दिखाने लगते हैं। शैशवावस्था की तुलना में उनके सीखने की गति कम हो जाती है परन्तु सीखने का क्षेत्र बड़ा होता जाता है।
स्ट्रेंग के अनुसार, इस आयु में बच्चों को सीखाने के लिए अलग-अलग विधियों का प्रयोग करना चाहिए। इस अवस्था में वे भाशा सीखने के लिए रूचि दर्शाते हैं।
बर्ट के अनुसार, इस आयु में बच्चों के बीच आवारागर्दी, बिना छुट्टी के स्कूल छोड़ने की प्रवृति पायी जाती है।
रॉस ने इस अवस्था को ‘मिथ्या- परिपक्वता’ का समय कहा है। उनके अनुसार इस समय बालकों में थोड़ी परिपक्वता आ जाती है परन्तु वे स्वयं को वयस्क समझने लगते हैं।
कोल एवं ब्रूस के अनुसार, ‘‘बाल्यावस्था, संवेगात्मक विकास का अनोखा काल है।’’  इस अवस्था में बच्चों को अच्छे-बुरे का ज्ञान होने लगता है और वे सामाजिक मूल्यों जैसे ईमानदारी, सौम्यता सीखने लगते हैं।
► बालकों में सामूहिक प्रवृति बढ़ने लगती है और वे अपना समय दूसरे बच्चों के साथ बिताना पसंद करने लगते हैं।
► बालक अपने संवेग जैसे गुस्सा करने या रोने पर नियंत्रण रखना सीखने लगते हैं।
► 9 वर्श के बाद उसके शारीरिक एवं मानसिक विकास में स्थिरता आ जाती है जिससे उसके शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों में सुदृढ़ता आती है और वे पढ़ने के प्रति अधिक आकर्शित होते हैं।
3. किशोरावस्था तथा अधिगम:
बाल्यावस्था के बाद की अवस्था अर्थात् 12 से 18 वर्श तक की अवस्था को किशोरावस्था कहते हैं।
► इस अवस्था में बालकों में मानसिक, शारीरिक, सामाजिक एवं संवेगात्मक बदलाव होते हैं। इसे बालक के जीवन में परिवर्तन काल भी माना जाता है।
► इस अवस्था में लड़कों की तुलना में लड़कियों की लंबाई तथा भार में अधिक वृद्धि देखी जाती है।
► इसी काल में प्रजनन अंग विकसित होते हैं और बुद्धि का पूर्ण विकास हो जाता है।
► शारीरिक विकास का प्रभाव बालक के सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर पड़ता है। पूरी जानकारी के अभाव में किशोर कई यौन रोगों तथा यौन-दुर्व्यवहार के शिकार बन जाते हैं।
► इस अवस्था में बालक के मस्तिश्क का सभी दिशाओं में विकास होता है। उनकी कल्पनाशीलता का विकास, सोचने-समझने तथा तर्क करने की शक्ति का विकास और विरोधी मानसिक दशाओं का विकास होता है। किशोर बालक कई प्रकार के संवेगों जैसे प्रेम, नफरत से संघर्श करता है। जिसकी वजह से उसकी सीखने की प्रक्रिया में बाधा खड़ी हो जाती है।
रॉस के अनुसार, ‘‘किशोर समाज-सेवा के आदर्शों का निर्माण करने में भूमिका निभाता है।’’
ब्लेयर, जोन्स एवं सिम्पसन के अनुसार, ‘‘किशोर महत्वपूर्ण बनना, अपने समूह में स्थित रहना तथा श्रेश्ठ व्यक्ति के रूप में पहचान बनाना चाहता है।’’
विकास के विभिन्न आयाम तथा उनका अधिगम से संबंध
शारीरिक विकास: शारीरिक विकास की प्रक्रिया, बालक के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
मानसिक विकास: मानसिक विकास या संज्ञानात्मक विकास बालक को सीखने के क्रम में हो रहे परिवर्तनों के साथ समायोजन स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भाषायी विकास: भाशायी विकास किसी बालक को अपने सहपाठियों एवं शिक्षक के साथ सह-संबंध स्थापित करने में सहायता देता है। जैसे एक बालक अपने घर में मातृभाशा सीखता है परन्तु स्कूल में द्वितीय भाशा सीखता है।
सामाजिक विकास: सामाजिक विकास किसी बालक को ईमानदारी, परंपरा जैसे सामाजिक मूल्यों को सीखने में सहायक सिद्ध होता है।
सांवेगिक विकास: संवेग या भाव जैसे क्रोध, आश्चर्य, घृणा किसी बालक में विभिन्न शारीरिक एवं मनोदशा संबंधी परिवर्तनों को जन्म देते
हैं। अपने संवेगों पर नियंत्रण रखना सीख कर बालक अपना विकास करते हैं।
मनोगत्यात्मक विकास: मनोगत्यात्मक विकास अर्थात् क्रियात्मक विकास बालक के शारीरिक विकास, स्वस्थ रहने तथा मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके परिणामस्वरूप बालक आत्मविश्वास हासिल करता है जो कौशलों के विकास में सहायक होता है।
विकास को प्रभावित करने वाले कारक: एक शिक्षार्थी के विकास को प्रभावित करने वाले कारक निम्न प्रकार से हैं:
1. वंशानुक्रम: किसी बच्चे का रंग-रूप, लंबाई, बुद्धि तथा मानसिक योग्यताएं वंशानुक्रम द्वारा निर्धारित होती हैं। गर्भाधारण के समय माता-पिता के जीन भिन्न-भिन्न प्रकार से मिलते हैं। इस कारण से एक ही माता-पिता के बच्चों में भिन्नता पायी जाती है। बच्चे में वंशानुक्रम माता के रज तथा पिता के वीर्य के संयोग से तय होता है। डिंकमेयर (Dinkmeyer) के अनुसार, ‘‘बच्चे में जन्म के समय से ही वंशानुगत कारक पाये जाते हैं। यह वंशानुगत शक्तियाँ उसके मौलिक स्वभाव तथा जीवन चक्र को प्रभावित करती हैं।’’
2. वातावरण: बच्चे के बाहरी परिवेश, परिस्थितियों एवं सामाजिक प्रभाव को वातावरण कहा जाता है। वातावरण किसी बालक के मानसिक एवं शारीरिक विकास तथा व्यवहार को प्रभावित करता है। इससे अधिगम की प्रक्रिया प्रत्यक्षत: बदलती है।
3. आहार: बच्चे को जन्म से लेकर बड़े होने तक मिल रहे आहार की मात्रा तथा आहार में मौजूद सामग्री से उसका विकास प्रभावित होता है।
4. रोग: बालक के मानसिक विकास को रोग भी प्रभावित करते हैं।
यदि कोई बालक बचपन में बीमार रहता है तो उसके शारीरिक एवं मानसिक विकास में बाधा आ जाती है।
5. बुद्धि: बालक का शारीरिक एवं मानसिक विकास, बुिद्ध को सीधे-सीधे प्रभावित करता है। मंद या कम बुद्धि वाले बच्चे को सीखने में परेशानी होती है और उनका विकास तुलनात्मक रूप से अधिक समय में होता है।

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